Tuesday, November 10, 2015

कविता में शहर 

हिंदी के सुपरिचत कवि सुधीर सक्सेना के साथ लखनऊ में हुई  एक मुलाकात के दौरान  उन्होंने मुझे अपनी लम्बी कविता धूसर में विलासपुर प्रदान की. अपनी कुछ व्यस्तताओं के चलते मैं इस कविता को तुरंत नहीं पढ़ पाया. मगर कुछ  फुरसत में होने पर मैंने इस पुस्तिका को पढ़ना प्रारंभ किया. शुरू किया तो अंत तक पढ़ता  चला गया. 

यह कविता विलासपुर की उन गहरी स्मृतियों से जुडी है जो कवि के ह्रदय में बसी हुई हैं . ये स्मृतियाँ कवि को शहर के साथ अपने प्रारम्भिक दौर की यादों से जोड़ती है  जो अब धूसर हो गयी है. धूसर शब्द का तात्पर्य उन धुंधली पड़ती स्मृतियों से ही है जो कवि को शहर के  इतिहास, पौराणिक पृष्ठभूमि, राजनीति, संस्कृति तथा मित्रजनो तक पहुंचाती है. यहाँ नए पुराने साहित्यकार और कलाकार भी हैं जिनसे  शहर की  सांस्कृतिक पहचान है., शहर के भूत और वर्तमान से जुड़े हुए. यह कविता पुराने नगर कि खोज है और उसे नए परिवर्तित होते विलासपुर से जोड़कर देखने का प्रयास भी है. यहाँ पुराने शहर के प्रति प्रेम एक नास्टैल्जिया है, एक अतीतकमना, जो परोक्षतः उन मूल्यों को रेखांकित करता है जिनसे शहर विलासपुर जुड़ता है. यह मूल्यों के क्षरित होने की  भी कहानी है जिसे  हम विलासपुर में ही क्या देश के  हर शहर में देख सकते हैं.

वास्तव में यह कविता एक शहर के इतिहास भूगोल और संस्कृति में मनुष्यता के निशानों कि खोज है जो आज के निर्मम परिवर्तनों में कमजोर होते जा रहे हैं. सारे शहर को बाज़ार निगलता जा रहा है, और संस्कृति  पर उपभोक्तावाद चढ़ता जा रहा है. इसका एक प्रतीक है पानी. शहर में पानी जमीन के नीचे धंसता जा रहा है. साथ ही साथ वह जहरीला होता जा रहा है.

सुधीर सक्सेना कविता में यात्रा वृत्तान्त को लाने वाले कवि रहे हैं. धूसर में विलासपुर को पढना एक यात्रा से गुजरने के सामान ही  है जिसमे हम इतिहास और वर्तमान से गुजरते हुए एक शहर में होते परिवर्तनों में अपने समय का आइना देखते  हैं.
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धूसर में विलासपुर/ कवि: सुधीर सक्सेना / लोकमित्र प्रकाशन, दिल्ली / २०१५ / मूल्य १०० रुपये 



Monday, November 09, 2015

                          भारत और नेपाल के संबंध 

कल NDTV को दिए गए एक साक्षात्कार में अरुण शौरी ने यह खुलासा किया कि भारत नेपाल में मधेशियों के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गया है. उन्होंने यह भी कहा कि इससे भारत और नेपाल के बीच के सम्बन्ध ख़राब हो सकते हैं. देखा जाय तो यह कूटनीतिक दृष्टि से सही फैसला नहीं है क्योंकि नेपाल से बातचीत का रास्ता ही बेहतर था. प्रचंड और नेपाल के अन्य नेता बातचीत के लिए तैयार ही थे. अब यदि नेपाल चीन की  ओर उन्मुख होगा तो कोई विकल्प नहीं बचेगा. सुनायी दे रहा है कि चीन अब नेपाल कि मदद करने को तैयार है और नेपाल के लिए रास्ता मांग रहा है. यदि ऐसा होता है तो नेपाल से जुड़े क्षेत्र खतरे कि छाया में आ जायेंगे. दोनों देशों के बीच के तनाव को दूर करने के राजनीतिक प्रयास तुरंत प्रारंभ किये जाने चाहिए.

Monday, December 31, 2012


फैजाबाद में आनंद पटवर्धन की फिल्म 'राम के नाम' पर बवाल
                                                                                रघुवंशमणि


फैज़ाबाद शहर में इधर एक अजीब सा विवाद पैदाहुआ है जिसे सुनकर सोच-समझ वाले लोग माथा पीट लेंगे। वे यह समझ नहीं पायेंगे कि इस मसले पर रोयें या हॅंसे। उन्हें इस बात पर भी आश्चर्य होगा कि लोगों की जानकारियाँ किस कदर कम हैं और वे इसी कम जानकारी के आधार पर कैसे-कैसे विचित्र निर्णय ले लेते हैं? हमें इस तरह के पूर्वाग्रहों पर भी आश्चर्य होगा कि लोग साहित्य, कला और सिनेमा के प्रति कभी-कभी कैसे अजीबोगरीब ढर्रे अपना लेते हैं। राजनीतिक पूर्वाग्रह और संकीर्ण धार्मिक भावनाएँ कभी-कभी हमारी दृष्टि को ऐसा छेक लेती हैं कि हमारी विवेकशीलता तक बाधित हो जाती है।

बात विगत दिनों स्थानीय कामता प्रसाद सुन्दरलाल साकेत महाविद्यालय में अयोध्या फिल्म सोसाइटी द्वारा आयोजित हुए अवाम का सिनेमा में दिखायी गयी फिल्म को लेकर उ--ठा है। इस कार्यक्रम के दौरान 20 दिसम्बर 2013 को प्रसिद्ध वृत्तचित्र निर्माता आनन्द पटवर्धन की फिल्म राम के नाम का प्रदर्शन किया गया। इस फिल्म के प्रदर्शन के बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने महाविद्यालय परिसर में इस फिल्म पर हमला बोल दिया। उन्होंने यह आरोप लगाया कि यह फिल्म हिन्दू देवी-देवताओं के विरुद्ध है और इस प्रकार के कार्यक्रम महाविद्यालय में फिर नहीं होने चाहिए। इसे विद्यार्थी परिषद से जुड़े छात्र नेताओं ने भारतीय संस्कृति पर हमला बताया और कहा कि इसमें विभिन्न हिन्दू देवताओं का अपमान किया गया है, भारतीय महापुरुषों पर गलत टिप्पणी की गयी है और आपत्तिजनक दृश्य दिखलाये गये हैं। यह भी कहा गया कि इस फिल्म के माध्यम से साम्प्रदायिकता भड़काने का प्रयास किया गया है। इस प्रकरण में नारेबाजी की गयी और इस आयोजन से जुड़े हिन्दी के प्रख्यात कवि और महाविद्यालय के हिन्दी विभाग के प्रवक्ता अनिल सिंह का घेराव किया गया। मेरी दृष्टि में ये बाते इसलिए दुर्भाग्यपूर्ण हैं कि ये किसी फिल्म को राजनीतिक पूर्वाग्रहग्रस्त और असहिष्णु तरीके से देखने के कारण पैदा हुई परिस्थितियाँ हैं। यह किसी फिल्म या कला से जुड़ी कृति को देखने का स्वस्थ और सही तरीका नहीं है।

फिल्म राम के नाम पर इस प्रकार के आरोप बहुत हास्यास्पद हैं। यह फिल्म उस दौर में बनायी गयी थी जब भारतीय जनता पार्टी के नेता लालकृष्ण आडवानी ने रामजन्मभूमि आन्दोलन को परवान चढ़ाने के लिए अपनी रथयात्रा प्रारम्भ की थी और उनकी यात्रा को लालू यादव ने बिहार में रोक लिया था। उस समय यह चर्चा थी कि आनन्द पटवर्धन इस रथयात्रा के साथ चलकर अपनी फिल्म बना रहे हैं। कुछ लोगों ने यह दुष्प्रचार भी कर रखा था कि आनन्द तो रथयात्रा से प्रभावित हैं और वे उसे कवर कर रहे हैं। आनन्द पटवर्धन के कार्यों से कम परिचित लोगों ने इस बात को सही मान लिया था। मगर जो लोग आनन्द पटवर्धन के कार्यों से परिचित थे उन्हें इस बात पर विश्वास नहीं हुआ। अन्त में जब यह फिल्म सामने आयी तो लोगों ने देखा कि वास्तविकता क्या थी। यह अपने किस्म का एक प्रतिरोध का सिनेमा था जिसमें आनन्द पटवर्धन ने सामान्य लोगों से बातचीत करते हुए रामजन्मभूमि आन्दोलन से जुड़े हुए तमाम पक्षों को बेबाक तरीके से उद्धाटित किया था। इस फिल्म के अंत में प्रस्तुत किये गये स्वर्गीय बाबा लालदास के लम्बे वक्तव्य से यह स्पष्ट होता है कि वास्तव में हिन्दू धर्म क्या है और यह किस प्रकार संकीर्ण राजनीतिक हिदुत्व से अलग है।

आनन्द पटवर्धन हिन्दी के उन वृत्तचित्र निमाताओं में से रहे हैं जिनकी ख्याति पूरे विश्व में है। वे भष्टाचार, राजनीति, गरीबों की स्थिति, हाशिये पर पड़े लोगों और युद्ध जैसे विषयों पर फिल्में बनाते रहे हैं। उनकी चर्चित फिल्मों में बम्बईः हमारा शहर, अन्तरात्मा के बन्दी, युद्ध और शान्ति, जय भीम कामरेड जैसी फिल्में रही हैं। इन फिल्मों को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ डाक्युमेन्ट्री फिल्मों में रखा जाता है। ऐसे विश्वस्तरीय फिल्मकार की फिल्म पर लगाये गये ये आरोप बेहद हास्यास्पद और राजनीति प्रेरित लगते हैं। हमें ऐसे फिल्मकार की कृतियों पर राष्ट्रीय स्तर पर गर्व होना चाहिए। उनकी फिल्मों की समीक्षा करते समय हमें उन फिल्मों में व्याप्त मनुष्यता के पक्ष को नहीं भूलना चाहिए। राम के नाम भी एक ऐसी ही फिल्म है जिसमें धर्म के सकीर्ण पक्ष को धर्म के व्यापक परिप्रेक्ष्य के साथ रख कर देखा गया है। उनकी अन्य फिल्में भी क्रूरता, अमानवीयता और पूर्वाग्रह के विरुद्ध मनुष्यता का पक्ष प्रस्तुत करती हैं।

आज जब हम अपने समाज में साम्प्रदायिकता का नंगा नाच देख रहे हैं तो आश्चर्य होता है कि आनन्द पटवर्धन ने इन सभी बातों को किस प्रकार 1991 में ही ठीक से रेखांकित कर दिया था। साम्प्रदायिकता से ग्रस्त हिदुत्ववादी रामजन्मभूमि आन्दोलन के प्रारम्भिक चरण में ही बहुत से ऐसे तत्व दिखायी दे रहे थे जो बाद में साम्प्रदायिक उन्माद बढ़ाने में सहायक हुए और पूरे देश में साम्प्रदायिक दंगों का कारण बनें। 2002 में हिन्दुत्ववादी साम्प्रदायिक तत्वों ने गुजरात में भयानक साम्प्रदायिक काण्ड किया। आनन्द पटवर्धन की यह फिल्म बाबरी मस्जिद ध्वंस के पूर्व बन रही साम्प्रदायिकता की गर्म हवा के तापमान का ठीक से अनुमान लगाने वाली फिल्म थी। इसी के चलते इसे श्रेष्ठ खोजी फिल्म का पुरस्कार दिया गया था। इस वृत्तचित्र को दूरदर्शन पर प्राइम टाइम के दौरान प्रदर्शित भी किया गया था। यह तथ्य ही इस बात का प्रमाण है कि भारत के फिल्म सेंसर बोर्ड ने इसे किसी भी प्रकार से आपत्तिजनक नहीं पाया था। वैसे भी यह फिल्म अनेक स्थानों पर अनेक बार प्रदर्शित की जा चुकी है।

 अतः अब इस फिल्म पर आपत्ति उठाना नासमझी के अतिरिक्त कुछ नहीं। ऐसे में विद्यार्थी परिषद से जुड़े छात्रों को समझदारी से काम लेते हुए इस विवाद को आगे नहीं बढ़ाना चाहिए। फैज़ाबाद शहर का सांस्कृतिक परिदृश्य पहले से ही संवेदनशील है। ऐसे में उनकी कोई भी जिद राजनीतिक और गैरजिम्मेदाराना समझी जायेगी। अयोध्या फिल्म सोसाइटी पिछले छः वर्षों से हाशिये पर पड़े लोगों का सिनेमा प्रस्तुत करती रही है। पिछले वर्षों में इस संस्था ने बहुत सी ऐसी फिल्में प्रस्तुत की हैं जिन्हें सामान्यतः सिनेमा घरों में नहीं दिखाया जाता। इस परंपरा को किसी भी तरह से रोका जाना अथवा बाधित करना वास्तव में बेहद दुर्भाग्यपूर्ण होगा।

Sunday, December 02, 2012

रिपोर्ट

उपद्रवियों का कोई धर्म नहीं होता

फैज़ाबाद, 2 दिसम्बर 2012। ‘‘उपद्रवियों का कोई मजहब नहीं होता और साम्प्रदायिकता का कोई धर्म नहीं। सभी प्रबुद्ध नागरिकों को सद्भाव का प्रचार-प्रसार करना चाहिए। फैज़ाबाद की साम्प्रदायिक घटनाओं के बाद बुद्धिजीवियों में एक तरह की इख़लाकी पस्ती दिखायी पड़ती है। हमें इस निराशा से निकलकर धर्मनिरपेक्षता और सद्भाव के लिए संघर्ष करना चाहिए।’’ ये विचार स्थानीय तरंग सभागार में भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी द्वारा आयोजित भारतीय परिवेश में सद्भावना और धर्मनिरपेक्षता की प्रासंगिकता और हमारे दायित्व विषयक संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए लेखक एवं संपादक आफताब रजा रिजवी ने व्यक्त किये। यह संगोष्ठी फैज़ाबाद में पिछले दिनों हुई साम्प्रदायिक घटनाओं के बरक्स सद्भाव और धर्मनिरपेक्षता के प्रचार’प्रसार के लिए आयोजित की गयी थी।



इससे पहले गोष्ठी का प्रारम्भ करते हुए सम्पूर्णानन्द बागी ने कहा कि हमारा देश अपनी प्रकृति में धर्मनिरपेक्ष है, मगर थोड़े से उपद्रवियों को चलते धर्मसमभाव का ताना-बाना अव्यवस्थित हो जाता है। शहर के जाने-माने शायर साहिल भारती ने कहा कि सद्भावना पैदा करना प्रशासन की भी जिम्मंेदारी है जबकि प्रशासन ने ही फैजाबाद में लापरवाही दर्शायी है। युवा कवि विशाल श्रीवास्तव ने यह बताया कि साम्प्रदायिकता के तत्व भारतीय समाज में पहले से सक्रिय रहे हैं। वैश्वीकरण के प्रारम्भ होने के बाद फासीवाद का उदय बिल्कुल नये तरीके से हुआ है। मशहूर शायर इस्लाम सालिक ने कहा कि इन साम्प्रदायिक घटनाओं में प्रशासन भी शामिल हो जाता है जिससे साम्प्रदायिकता की योजनाबद्ध घटनाएॅं और अफवाहें खतरनाक रूप ले लेती हैं। समाजवादी पार्टी के नेता और एडवोकेट मंसूर इलाही ने कहा कि साम्प्रदायिकता फैलाने वाले लोग कम हैं मगर उनके विरुद्ध कठोर कार्यवाही नहीं होती जिसके कारण साम्प्रदायिक तत्वों का मन बढ़ जाता है। उन्हें सख्त सजा दिलायी जानी चाहिए। बस्ती से आये राजनारायण तिवारी ने फैज़ाबाद की घटनाओं को शर्मनाक बताते हुए कहा कि वैश्वीकरण के आने के साथ ही साथ साम्प्रदायिकता बढ़ी है। एटक के नेता जमुना सिंह ने बाजारवाद और उसकी संस्कृति को साम्प्रदायिकता के उभार के लिए जिम्मेदार माना।



भारतीय प्रेस कौंसिल के सदस्य और वरिष्ठ पत्रकार सम्पादक शीतला सिंह ने कहा कि 2012 की स्थितियाॅं 1992 की स्थितियों से अधिक खतरनाक और निराशा पैदा करने वाली हैं। आज राजनीति साम्प्रदायिक विभाजन को बढ़ा रही है । दुख की बात यह है कि पढ़ा-लिखा समाज भी कम्युनल होता जा रहा है। शहर के जाने माने बुद्धिजीवी गुलाम मोहम्मद ने कहा कि हमारे दौर में अवांक्षित तत्व सबल होते जा रहे है। लोगों को तोड़ने वाले नहीं, जोड़ने वाले तत्वों का साथ देना चाहिए। शिक्षक नेता अशोक कुमार तिवारी ने फैजाबाद की घटनाओं को एक राजनीतिक साजिश बताते हुए सद्भावना और भाईचारे कायम रखने में सहयोग करने के लिए बुद्धिजीवियों को आगे आने के लिए कहा। राजनायण तिवारी ने कहा कि फैज़ाबाद की सारी घटनाओं के पीछे स्पष्टतः चुनावी राजनीति थी। युगलकिशोर शरण शास्त्री ने साझी संस्कृति और साझी विरासत को बचाने की बात कही।



सुपरिचित पत्रकार सुमन गुप्ता ने कहा कि 1992 की घटनाओं के बाद लेाग निश्चिन्त हो गये कि भविष्य में फैज़ाबाद में साम्प्रदायिक घटनाएॅं नहीं होंगी। मगर साम्प्रदायिकता नये तरीके से सामने आयी है। धर्म को अपने साथ लपेटने वाली राजनीति के तहत उपद्रवियों को सजा नहीं मिलती और उनका हौसला बुलन्द हो जाता है। कामरेड रामतीर्थ पाठक ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि वामपंथी हमेशा से साम्प्रदायिकता का विरोध करते रहे हैं। हर धर्म के प्रगतिशील बुद्धिजीवियों को धार्मिक विकृतियों और साम्प्रदायिकता का विरोध करना चाहिए। गोष्ठी का संचालन कर रहे डाॅ रघुवंशमणि ने कहा कि इस तरह के कार्यक्रमों को लेकर जनता के बीच जाने की आवश्यकता है।



गोष्ठी मे यह संकल्प लिया गया कि साम्प्रदायिक सद्भाव के ये कार्यक्रम दूर-दराज के गाॅंवों तक ले जाये जायेंगे। गोष्ठी के अन्त में भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी के महासचिव रामजीराम यादव ने गोष्ठी में आये अतिथियों को धन्यवाद देते हुए आभार व्यक्त किया। गोष्ठी में कामरेड अतुल कुमार सिंह, कामरेड रामप्रकाश तिवारी, हृदयराम निषाद, इर्तिजा हुसैन, सईद खाॅं, अयोध्या प्रसाद तिवारी, रामकुमार सुमन, बद्रीनाथ यादव, महंथ दिनेश दूबे, मुन्नालाल सहित सैकड़ों लोग उपस्थित थे।







रघुवंशमणि

Friday, October 26, 2012

                          अपनी साझी संस्कृति को बचाइये





                                                                                                             रघुवंशमणि




फैज़ाबाद में दुर्गापूजा के अन्तिम चरण में जिस प्रकार की शर्मशार करने वाली घटनाएॅं घटी हैं, वे निहायत ही गंभीर हैं। दो समुदाय आपस में टकराये, मारपीट की, और दुकानंे जलायी गयीं। जैसा कि अक्सर होता है इन घटनाओं के बाद लोग एक दूसरे पर आरोप लगाएॅंगे और सारा माहौल तनावपूर्ण हो जायेगा। कुछ लोग इसमें साम्प्रदायिक हिसाब-किताब लगायेंगे और अपना उल्लू सीधा करेंगे। फिर राजनीतिक बगुले अपना कूटनीतिक ध्यान साधेंगे। लेकिन यह एक सच है कि फैज़ाबाद जैसे साम्प्रदायिक सौहार्द वाले शहर में ये घटनाएॅं बेहद दुर्भाग्यपूर्ण हैं। हमारी धर्मसमभाव और धार्मिक सहिष्णुता की संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में इस प्रकार की घटनाएॅं बेहद चिन्ता का विषय हैं।



धार्मिक त्यौहारों के ये अवसर अक्सर कुछ लापरवाही और नासमझदारी के कारण तनाव के मौकों में बदल जाते हैं। धार्मिक लोगों में इधर सहिष्णुता घटती ही जा रही है, वे किसी भी धर्म के हो सकते हैं। अब वे बिना सोचे-समझे नाराज होते हैं और उन्माद की ओर चले जाते हैं। इसलिए कुछ ऐसी जरूरी बातें जरूर हैं जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता है।



सबसे जरूरी बात यह है कि हम एक दूसरे के धर्म का सम्मान करें और ऐसी कोई बात न करें जिनके कारण दूसरे समुदाय के लोगों को कष्ट पहुॅंचे। उदाहरण के लिए दुर्गा पूजा के पाण्डालों में अक्सर ऐसे गीत बजाये जाते हैं जो बेहद साम्प्रदायिक और दूसरों को कष्ट पहुॅंचाने वाले हैं। इन दिनों पूरी दुर्गापूजा के दौरान राम का मंदिर बनाने के संकल्प वाला गीत लोग बजाते रहे। जाहिर है कि इससे मुस्लिम धर्म मानने वाले लोगों को कष्ट पहुॅंचना ही था। जो बात विवादित है और उच्चतम न्यायालय की विषयवस्तु है, उसे लेकर गीत बजाना जरूरी नहीं। फिर एक गाना यह भी बज रहा था कि ‘जिस हिन्दू का खून न खौले’। इस तरह के गीतों को बजाना बहुत उचित नहीं है। कारण यह कि किसी धार्मिक त्यौहार में किसी राजनीतिक दल का एजेण्डा आगे बढ़ाना धर्म को संकीर्ण करना है। कहना तो यह चाहिए कि यह धर्म का अपमान है। खासतौर पर हिन्दूधर्म का जो अपने को उदार और सहिष्णु कहता है। वास्तव में यह एक तरह का परपीड़न है जिसे धर्म की श्रेणी में रखा ही नहीं जा सकता। गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा भी हैः



‘परहित सरिस धर्म नहि भाई। परपीडा सम नहिं अधमाई।।’



इस तरह के गीतों के बजने और राजनीतिक एजेण्डे के सामने लाये जाने का कारण यह है कि दुर्गापूजा समितियों पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का प्रभुत्व है। वे अपने राजनीतिक कार्यक्रमों के एक अंग के तहत दुर्गापूजा का भी आयोजन करते हैं। दुर्गापूजा इस अर्थ में उनके लिए सिर्फ एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं है। मगर उन्हें भी कम से कम इस बात का तो ध्यान रखना चाहिए कि किस तरह की बातों से शान्ति भंग हो सकती और तनाव पैदा हो सकता है।



लेकिन सबसे बड़ी आपत्तिजनक बात यह है कि प्रशासन इन सभी मामलों में महज एक मूकदर्शक बना रहता है। न तो वह शोर-शराबे पर नियंत्रण करता है और न ही अन्य लंपटतापूर्ण व्यवहारों पर जो कि दुर्गापूजा के दौरान आम हो जाते हैं। पुलिस की उपस्थिति भी ऐसे मौकों पर लगभग शून्य रहती है। जबकि ऐसे मौकों पर उन्हें अधिक दिखायी देना चाहिए। प्रशासन की उपस्थिति के अहसास से भी बहुत सी अनहोनी घटनाएॅं नहीं हो पाती हैं। प्रशासन की इस अनुपस्थिति का फायदा शरारती और गैरसामाजिक तत्व उठाते हैं।



फिलहाल अभी आगे बहुत से त्यौहार हैं। विजयदशमी और बकरीद है। इसलिए प्रशासन, धार्मिक लोगों और प्रबुद्धजनों को अपनी महत्वपूर्ण सामाजिक और सांस्कृतिक भूमिकाओं में तत्पर हो जाना चाहिए। फैज़ाबाद शहर अपनी सांस्कृतिक सहिष्णुता के लिए जाना जाता है। इस संस्कृति का उदाहरण दूर-दूर तक दिया जाता है। इस आदर्श संस्कृति पर कोई आॅंच नहीं आनी चाहिए। यह फैजाबाद के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।

Tuesday, October 16, 2012

जीवन शैली की तलाश



एक ऐसी जीवन शैली की तलाश होनी चाहिए जो बहुत सरल, सहज और आर्थिक रूप से सस्ती हो. यह जीवन शैली होगी, धर्म नहीं. यानि उसमे सुविधानुसार परिवर्तन किया जा सके. वह रूढ़, कट्टर नहीं होनी चाहिए. यह प्रकृति से कन्धा मिलाकर चले. सबसे बड़ी बात यह संभव होनी चाहिए.


जीवन के सभी रूपों में आइये इसकी तलाश करें.



रघुवंशमणि

Saturday, September 22, 2012

प्रतिबिम्ब


प्रतिबिम्ब

                                          रघुवंशमणि




मौत की आॅंखों में

कितनी झुर्रियाॅं होंगी

क्या इन झुर्रियों की दरारों में

कहीं कोई बूॅंद भी होगी

छिपी-खोयी

पत्थरों की घाटियों में

वर्षा के बचे जल की तरह



पहाडों से रिसते

सिसकते धार की तरह



क्या वह सारे चिन्हों को

शब्दों की तरह पहचानेगी

उन्हें पढ़ेगी इतिहास की तरह

समय की कार्बन डेटिंग में



मौत कैसी होती है

होती क्या है वह



जब झाॅंकती है आॅंखों में

तो क्या देखती है वह

तरल स्थिरता की गहराई में

अपने आप को



क्या वह प्रतिबिम्ब होती है

धीरे-धीरे करीब पहुॅंचती



... ............... ..........

Tuesday, October 18, 2011

फैज़ाबाद में इप्टा की इकार्इ का पुनर्गठन

फैज़ाबाद में इप्टा की इकार्इ का पुनर्गठन





फैज़ाबाद। 16 अक्टूबर। नाटक, गीत और लेखन स्वभावत: सामूहिक गतिविधियां हैं। सृजन की ये यात्राएं 'मैं से 'हम की तरफ जाती हैं। इप्टा का अर्थ जनता से जुड़ना और जनता को जोड़ना है। बाजारवाद से लेकर साम्प्रदायिकता तक के विरुद्ध प्रतिरोध को इसी प्रकार विकसित किया जा सकता है।



ये उदगार भारतीय जन नाटय संघ इप्टा के प्रान्तीय सचिव राकेश जी ने स्थानीय तरंग सभागार में इप्टा की औपचारिक स्थापना के लिए आयोजित कार्यक्रम में व्यक्त किये। वे इस कार्यक्रम के मुख्य वक्ता और मुख्य अतिथि थे। उन्होंने यह भी कहा कि इप्टा को ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर भी अपने कार्यक्रम करने चाहिए।अपनी सांस्कृतिक विरासत के साथ आगे बढ़ते हुए नयी पीढ़ी को अपने साथ जोड़ना चाहिए। कलाकारों और संस्कृतिकर्मियों के लिए यह जरूरी है कि वे जनता से जुड़ी नैतिकता एवं जीवनमूल्यों को अर्जित करें ताकि इस प्रकार वे अपने संस्कृतिकर्म के द्वारा जनता के हृदय को छू सकें। उन्होंने कहा कि फैज़ाबाद की सांस्कृतिक जमीन जनजागरण के लिए जरखे़ज है।



इससे पहले डा. रघुवंश मणि ने फैज़ाबाद में इप्टा के पिछले कार्यो को याद किया और नाटकों के सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित किया। साहित्यकार आर. डी. आनन्द ने अपने वक्तव्य में आज के समय को समस्याग्रस्त और कठिन बताते हुए संस्कृतिकर्म के जोखिम और उत्तरदायित्वों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज की परिसिथतियां इप्टा के प्रारमिभक दौर के समय की अपेक्षा अधिक कठिन और दुरूह हैं। ऐसे में संस्कृतिकर्म की भूमिका ज्यादा बड़ी है।



गोरखपुर से पधारे इप्टा पर्यवेक्षक शहजाद रिजवी ने यह आशा व्यक्त की कि फैजाबाद की इप्टा इकार्इ भविष्य में मजबूत होगी और अपनी अलग पहचान बनाएगी।



कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे अतुल सिंह ने इप्टा के बीते दिनों को याद किया और कहा कि इप्टा का मतलब समाज की विकृतियों को सामने लाना है ताकि उन्हें समाज से उन्मूलित किया जा सके। उन्होंने कहा कि गीत और नाटकों का किताबों या भाषणों की तुलना में सीधा प्रभाव पड़ता है।



कार्यक्रम के दूसरे चरण में आराधना दूबे द्वारा लिखित और निर्देशित नाटक दहेज का मंचन हुआ जिसमें आराधना दूबे, आरती वर्मा , अनीता वर्मा, पूनम वर्मा, रेनू वर्मा, सुमन निषाद, अंतिमा शर्मा, इजा अग्रहरि, पूजा अग्रहरि, सोनी यादव, सीमा यादव, नीरज कनौजिया, अंजनीराम और शालिनी तिवारी ने भाग लिया। प्रेम सागर, सुरेश तिवारी एवं बद्री प्रसाद विश्वकर्मा ने जनगीत प्रस्तुत किये।

Wednesday, August 17, 2011

''आरक्षण के बारे में

''आरक्षण के बारे में

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''आरक्षण फिल्म के आरक्षण के बारे में कम भारत की शिक्षा व्यवस्था के बारे में अधिक है। इस फिल्म को देखने के बाद ही प्रदेश सरकारों का भ्रम दूर हुआ होगा। बौद्धिक हलकों में चल रही बहसों पर अब पटाक्षेप हो जाना चाहिए क्योंकि यह फिल्म आरक्षण के विरुद्ध तो कतर्इ नहीं। फिल्म का प्रारम्भ अवश्य मण्डल कमीशन के मामले से होता है मगर जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, मुददा बदलता जाता है। फिल्म के केन्द्र में आ जाता है शिक्षा का व्यवसायीकरण। फिल्म इस मुददे पर कुछ विकल्प भी सुझाती है। मुझे ये विकल्प तो लचर टार्इप के लगे। उपचारात्मक शिक्षा ही रामबाण नहीं है। वास्तव में शिक्षा को लेकर सरकार के दृषिटकोण को ही बदलना होगा और यह मामूली बात नहीं।



फिलहाल यह फिल्म किसी भी विषय पर हो, इसे प्रतिबंधित किया जाना तो बिल्कुल ही गलत था। शायद सरकारें दंगाइयों और उनकी राजनीति से इतना घबराती है कि वे पहले किताबों, फिल्मों पर रोक लगाती है। पढ़ती, देखती या सोचती बाद में है। वास्तव में उन्हें ये कार्य पहले करने चाहिए। इस पूरे प्रकरण में फायदा तो फिल्म का ही हुआ। मुफत के प्रचार से बेहतर लाभ किसी फिल्म को क्या हो सकता है? लेकिन प्रकाश झा को कम से कम इस बात के लिए बधार्इ दी जानी चाहिए कि उन्होंने शिक्षा व्यवस्था पर एक विचारोत्तेजक बम्बर्इया फिल्म बनायी है।

Thursday, June 09, 2011

शस्त्र, शास्त्र और गाॅधीवाद

रघुवंशमणि



योगगुरु बाबा रामदेव कुछ दिनों पूर्व तक बेहद सफल व्यक्तित्व नज़र आ रहे थे। उन्होंने योगाभ्यास और आयुर्वेदिक स्वास्थ औषधियों की शानदार व्यवसायिक पैकेजिंग की थी और पूरी दुनियाॅं में अपनी सफलता के झंडे गाड़ दिये थे। फिर उन्होंने पूरे देश में यात्रा करके बाकायदा अपनी भारतीय स्वाभिमान पार्टी के लिए पृष्ठभूमि भी तैयार कर ली थी। दिल्ली में अनशन के अभियान के समय तो ऐसा लगा कि सरकार उनके सामने झुक गयी है। मगर उसके बाद की राजनीतिक गतिविधियों के दौरान बाबा रामदेव विचलित नज़र आये और उनके वक्तव्यों से यह जाहिर होने लगा कि योगाभ्यास के दौरान योगासनों पर उनका कितना भी अभ्यास क्यों न रहा हो, राजनीति के आसन पर वे अभी ठीक से बैठने का अभ्यास नहीं कर पाये हैं।

कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली दिल्ली की सत्ता ने पूलिसिया बल प्रयोग के द्वारा जब उन्हें रामलीला मैदान से हटाया तो मीडिया ने बाबा को जबर्दस्त एक्सपोजर दिया। अन्ना हजारे ने अपने पुराने सहयोगी के समर्थन में और पुलिसिया गतिविधि के विरोध में गाॅंधी जी की समाधि पर आठ घंटे का अनशन रखा। आर. एस. एस. और बी.ज.ेपी. को तो स्वामी जी का समर्थन करना ही था। पूरे देश में बुद्धिजीवियों ने भी रामदेव के साथ हुई इस घटना की भूरि-भूरि निन्दा की। यह सब बाबा के समर्थन में ही हुआ। यहाॅं तक कि साम्यवादी दलों के समर्थकों ने भी बाबा का समर्थन न करते हुए भी इस घटना की निन्दा की और सरकार को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया। इस प्रकार बाबा को मिलने वाला यह बड़ा समर्थन था।

मगर बाबा रामदेव ने हरिद्वार पहुॅंचने के बाद जिस प्रकार के वक्तव्य दिये वे किसी राजनीतिक नेता के लिए बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं कहे जायेंगे। उनकी स्थिति स्व. टिकैत या योगी आदित्यनाथ से बेहतर नहीं थी जो मौके-मौके पर कैमरे के सामने रोते रहे हैं। किसी भी नेता के पीछे चलने वाली जनता अपने नेताओं के आॅंसुओं से भावुक तो हो सकती है, मगर वास्तव में वह अपने नेताओं को विपरीत परिस्थितियों में भी मजबूत और दृढ़ देखना चाहती है। बाबा रामदेव का यह कहना कि सरकार उनकी हत्या कराना चाहती है, किसी के भी गले से नीचे उतरने वाली बात नहीं थी क्योंकि यदि सरकार उन्हें मारना-मरवाना चाहती तो उसके पास काफी वक्त था। फिर बाबा का यह कहना कि उनके 5000 कार्यकत्र्ता गायब हैं, निहायत ही अविश्वसनीय बात थी।

लेकिन सबसे राजनीतिक गैरसमझदारी से भरी बात उन्होंने तब कही जब उन्होंने अपने शिष्यों से शास्त्र सीखने के साथ शस्त्र उठाने की भी बात कही। अभी चार दिन पहले तक गाॅंधीवादी तरीके से अहिंसक आन्दोलन और अनशन करने वाले बाबा रामदेव का क्या अपने सिद्धान्तों से इतनी जल्दी मोहभंग हो गया? गाॅंधी जी ने अपने लगभग तीन दशकों की अहिंसात्मक लड़ाई में बहुत बार गिरफतारियाॅं दीं, उनके समर्थक मारे पीटे गये, जेल में ठूॅंसे गये, मगर उन्होंने कभी भी अपनी अहिंसा की राजनीति पर अविश्वास नहीं व्यक्त किया। उन्होंने अपने अहिंसात्मक संघर्ष के तरीके पर केवल एक बार अविश्वास जाहिर किया था। वह समय था साम्प्रदायिक दंगों के उभरने का, जब बिहार और बंगाल खून से रंग गये थे। मगर यह उनके लिए अपनों से पराजित होने जैसी स्थिति थी। किसी राजनीतिक सत्ता के अत्याचार के सामने तो वे अपने अहिंसात्मक शस्त्र के साथ हमेशा डट कर खड़े रहे।

मगर बाबा रामदेव के समक्ष गाॅंधी जी जैसी कोई स्थिति नहीं थी। दिल्ली के रामलीला मैदान की घटना की निन्दा तो सभी ने की, मगर उन्हें जलियाॅंवाला बाग की घटनाओं के समान कहना अतिरेकपूर्ण ही होगा। तो फिर ऐसा क्या हुआ कि बाबा पूरी तरह से विचलित हो गये और अहिंसा से हिंसा के रास्तेे पर उतर आये? वे हर जिले से आने वाले 20 स्वयंसेवकों को लाठी ही नहीं जूडो-कराटे भी सिखाने का संकल्प ले रहे हैं। यह उनके जैसे स्थपित व्यक्तित्व के लिए उचित नहीं और उनके राजनीतिक कच्चेपन का सबूत है। भारत का संविधान और उसकी मुख्यमार्गी राजनीति पार्टियाॅं परोक्षरूप से भले ही हिंसा का इस्तेमाल कर ले, वे इस प्रकार खुलेआम हिंसा का समर्थन नहीं करती।

बाबा रामदेव के इस प्रकार के वक्तव्यों से उन पर लगने वाले कांग्रेसी आरोपों की ही पुष्टि होती है कि वे दिल्ली में गड़बड़ी फैलाना चाहते थे। इससे यह भी प्रमाणित किया जायेगा कि वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तरह की ही राजनीति कर रहे हैं।

आज के दौर में अहिंसा की राजनीति करना आसान काम नहीं। यह एक दुधारी तलवार पर चलने जैसा काम है। इसके लिए सिर्फ मीडिया का समर्थन काफी नहीं होता। गाॅंधी स्वयं दृढ़प्रतिज्ञ थे और सत्याग्रह को चलाने की बुद्धिमत्ता भी उनमें कूट कूटकर भरी हुई थी। ये सभी बातें फिलहाल तो बाबा रामदेव में नहीं हैं।

Thursday, November 04, 2010

आर. के. सिंह की कुछ अंग्रेजी कविताओं के अनुवाद

आर. के. सिंह की कुछ अंग्रेजी कविताओं के अनुवाद

1.

वह पागल घोषित है
पाॅंव बॅंधे हैं उसके
गली में सरकती है
वह आगे पीछे

नंगी भूखी वह
ठिठुरती है दिसम्बर में
नाली के पास सिकुड़ी

फुटपाथियों की उपेक्षिता
कागज, लकड़ी और चीथड़ों से
आग जलाने की कोशिश है

पुल के नीचे चाय की चुस्कियाॅं लेते
मैं राजघाट की घंटियाॅं सुनता हूॅं
तीर्थयात्री ट्रेन पकड़ने की जल्दी में हैं।


2.

दो सूखे वृक्षों के बीच अनन्त सौंदर्य सी खड़ी
दुपहरी में गुजरतेे मछुवारों को देखती
उसकी आॅंखें भी तो मछलियाॅं हैं
पर परवाह किसे है उनकी
गिरकर शांत होती हैं फड़फड़ाती पत्तियाॅं
लपटों के शांत होने पर देखती है
टीलों के उच्चावच पर अपनी टूटी चूड़ियाॅं
और एक बिलखता गुलाब सफेद साड़ी में
छिपा लेती है वह

3.

चेहरे पर जर्द पर्त
राख में तलाशती अंगुलियाॅं
पिछवाड़े बागान के करीब ही
बिनती हैं जले हुए कोयले
कल का खाना बनाने के लिए

4.

ग्ंगा यमुना का संगम
एक समलैंगिक मिलाप है
सुन्दर परन्तु बंजर

मेरे मित्र को पता है
स्वर्ग का रास्ता
इन सर्पीली नदियों से होकर नहीं जाता

5.

सूरज के फैलते मकड़जाली चक्र मेरे
मेरे अस्तित्व और चीजों को धुंधलाते हैं
सुबह से शाम तक मेरे चारो तरफ
मिथक स्वयं को दोहराता है

मेरे अंदर की उभरती रोशनी
कागजी भगवान का आभामण्डल
चारो तरफ सभी कुछ आन्दोलित करती
जीवन और मृत्यु का समीकरण है

इस वक्त का सशंकित सन्नाटा
षडयन्त्र है एक गंभीर दृश्य को आभामण्डित करने का
भावनाओं को प्रतिबिम्बित करने में
अंधभावनाओं और लघुदृष्टियों की पूर्णता में

6.

यह नहीं कि कुछ पैसे मैं
रिक्शे पर खर्च नहीं कर सकता
नहीं खरीद सकता कार या स्कूटर
मैं जुड़ा रहा चाहता हूॅं
धरती और धूल से
अपने भार के साथ
अकेले चलना चाहता हूॅं
मेरे कन्धे पर सब्जियाॅं और सामान
चालीस साल पहले जैसी लटकी हैं
सोचता हूॅं बिना किसी शर्म के
स्वाभिमान और पसीने के साथ
दूरियाॅं तय कर सकता हूॅं
और कह सकता हूॅं खुद से
देखो मैं उनसे जुदा हूॅं

पैसे से होने दो उनका मूल्यांकन
जिसको वे अपनी टांॅगों के बीच या सपनोें में
छिपाकर रखते हैं
मुझे मेरे कामों से जाना जाय
मेरी मेहनत से जिसने किसी का अपकार नहीं किया
और कल जब मैं इतना बूढ़ा हो जाऊ
कि खड़ा न रह सकूॅं अपने पैरो पर, चल न सकूॅं
तो याद करूॅंगा कि जमा कर रखे थे मैंने
अपने पैर जमीन पर
और उन सबको जाना था
जिन्होंने बेदिली से अपना हाथ बढ़ाया था

वे किसी को शाप न दें अगर
उनके गिरने पर ध्यान न दे कोई


7.

जब फूल सूख जाएॅंगे
शहद के लिए मण्डराती
मक्खियों को कौन जीवित रखेगा
या उन हाथों को महसूसेगा
जो नारंगी के बागों में लगे
छत्तों को संवारते हैं

वे तब मिलकर
अपने स्वर्णिम दिनों को
याद कर सकती हैं

या इस टोने को
खत्म करने के लिए
कोई राग गुनगुना सकती हैं

या जिस भी वजह से
धुवांसे सन्नाटे में
उनका छत्ता जला हो

लेकिन पता है मुझे अब
मधुमक्खियाॅं नहीं लौटेंगी
नग्न वृक्षों की ओर

8.

जाति बदलना संभव न था
उसने अपना धर्म बदल डाला
फिर भी वे न बदले
न ही बदली उनकी संकीर्ण दुनिया

भेड़िये, लोमड़ी और कौए
उस प्रबोधन की परेशानी को
न बदल सके आसमान के साथ
जो देवताओं का पर्दा है

पिंजरा अभी भी भागता फिरता है
एक पंछी की तलाश में
और वह सूरज की आशा में
अकेली लड़ाई लड़ता है

9.

मौन फुटपाथ है
ध्यानियों की शरणस्थली
दूधिया सन्नाटे में

गुजरती सुन्दरियाॅं
पानी में नग्न होतीं
सिकुड़ती चमड़ी

कार्तिक में गंगा पर
आदि ईश्वर हॅंसता है
उनकी नंगी पीठ के पीछे

घायल कर देने वाली शीत में
ऊॅं वासनाओं के लिए
सुविधाजनक है

और अश्वपति नहीं अब बस
दो श्वेत चन्द्रवृत्तों के पीछे
जेट से भागते लटके हैं वे

10.

इच्छाओं को त्याग दूॅं तो भी नहीं खत्म होता यह सब
दुःख का न होना निर्वाण की कुंजी नहीं

व्यतीत को प्रेम न करने और वासनाओं
और नये मानसिक भ्रमों और भयों के जंजाल में

अहसास की खुजली, बदलती गिरावट
अस्तित्व के द्वीप की धुॅंधलाती रौशनी में

जीवन बस जमता जाता, रुके तालाब की दुर्गन्ध
फिर भी खिलता है आशा का कमल

11.

मैने उपवास नहीं रखा
मेरे लिए नहीं है नौरोज़

न होली ही है
अब मैं हिन्दू नहीं रहा

बहुत पहले इसाइयों ने भी
मेरी आस्था और प्रेम पर संदेह किया था

मुस्लिम इतने कट्टर हैं कि
एक सेकुलर को अस्वीकार कर दें

अब मैं अकेला देखता हूॅं
रंगों की त्रासदी

मैं उत्सव मनाता हूॅं
भिन्नता और आत्मा की स्वतंत्रता का

पर वे मेरे जन्म पर सवाल उठाते हैं
और मुझे ढोंगी बताते हैं


12.

मैं यीशू तो नहीं
पर सूली पर चढ़ने की
पीड़ा समझता हूॅं

एक सामान्य आदमी की तरह
सब झेलता जो उन्होंने झेला था
वही जीवन जीता

कभी विनती करता और रोता
प्रेम के अभाव में भी
आगे अच्छे दिनों की आशा करता

घटती सामथ्र्य, असफलता
बोरियत और अनकिये अपराधों के
दोशारोपणों के साथ

मैं जीसस नहीं हूॅं
मगर मैं सूॅघ सकता हूॅं
हवा में जहर और धुॅंवा

मनुष्यता के लिए अनुभव करता हूॅं
उन्हीं की तरह सलीब ढोता
अपने स्वप्नों को पुनः जीता

मैं यीशू तो नहीं
पर सूली पर चढ़ने का
दर्द समझता हूॅं

13.

यह मकान ढह सकता है कभी भी
इसकी दीवारें फटी हैं
नींव पर दरारें खुली हैं
पर कोई परवाह नहीं करता

वे चुप्पी साधे रहते हैं
सतही चिप्पियों की सुरक्षा में
और धीरज रखने की बात करते हैं
स्वार्थ सिद्धि के लिए करते हैं छद्म

अपनी अधमता को रहस्यमय बनाते
विवेक और भविष्य की चिन्ता दबाते
चहारदीवारी के बीच मास्टरों की
चुप्पियाॅं खरीदते

14.

हम कहाॅं पहुॅंचेंगे आखिर
ताबूत में यात्रा करते

या इन्द्रधनुषी सिंहद्वार के परे
लंगर डालने की कल्पना करते

सुनहरी और चमकती राख
मरजीवों को फिर जीवित नहीं करेगी

मिथकों और कहानियों में खोये
हमे वापस लाना होगा

जीवन तत्वों का संतुलन
नये सूरज बनाने के लिए

और चन्द्रमाओं के लिए
गुफाओं को रौशन करेें

जो नये भविष्य की शुरुवात करें

15.

यदि दुनिया नहीं हुई
मेरी नौजवानी की सोच जैसी
तो मैं क्या करूॅं। मैं था
निर्भर अपने पिता पर

स्वनिर्मित मैं
धाराओं के विरुद्ध पढ़ न सका
आसमान और उसके मजबूत इलाकों को

गंगा की बालू पर बने निशान
इन्द्रधनुष की तरह धुॅंधला गये
समय की बरसात
पैरों में चुभती है

दाॅंत के खोड़र
और अंधत्व करते हैं आक्रान्त
और कामचिन्ताएॅं सताती हैं
निद्रा और स्वप्नहीन रातों को

मेरे गंजे होते सिर के गिरते बाल
उस हॅंसी को प्रतिबिम्बत करते हैं
जिन पर अब ध्यान नहीं देता

अब मैं नहीं करता
चालाक और अविश्वसनीय
मित्रों को बेपर्दा

अपने अस्तित्व और भविष्य
पर खीजता नहीं और
प्रभाव नहीं बना पाता

फिर भी सुनिश्चित है जब मैं विराम लूॅंगा
तो बहुत बुरा तो नहीं रहेगा
मेरी दृष्टि फिर भी रहेगी ठीक
ताजी हवा में साॅंस लेता रहूॅंगा

16.

अकेले में रहना
द्वीप बनाता है

घुलती मिलती परछाइयों को
पानी में देखना

पुनर्मिलन की आशा जगाता
तारों के टूटने पर

ज्वार की तरफ आॅंख मूदकर
नया झूठ बुनना है

17.

फौलादी बहाव के साथ
बहता हुआ पानी
पत्थर को भेदता है
उन्हें सितारों की शक्ल देता

सूरज और चाॅंद भी नहीं पा सकते
वैसा तीखापन
चट्टानों का विलाप
बदलता है नदी के गीत में

18.

क्या वे स्वयं को या अपनी सच्चाई को
देखते हैं अन्तर्दर्पण में

बहुत घृणा और क्रोध उपजाते
मनुष्यों और घरों को जलाते हैं

कुछ नहीं सीखते कभी मगर
साम्प्रदायिकता का पत्ता फेकते, अधिकारों के लिए

जो किसी ईश्वर ने नहीं दिया उन्हें। उनकी
अधम राजनीति सन्नाटे की विकृति है



अंग्रेजी से अनुवाद रघुवंशमणि
.......................... ........................... .

Monday, October 25, 2010

दिगंबरी योग

डायरी

दिगंबरी योग

सारा ज्या अण्डरवुड का नाम हिन्दुस्तान में किसे मालूम था! न तो वह कोई जानी-मानी नेत्री थी न अभिनेत्री। मगर राष्ट्ीय स्वयं सेवक संघ जैसी संस्थाओं की सत्ता ऐसी व्यापक कि जिसे चाहें रातों-रात स्टार बना दें। सारा के दिगंबरी योग के बाद उनका जो विरोध हुआ तो फिर उसकी वीडियो क्लिप के चक्कर में हिन्दुस्तान का बिगड़ैल युवा वर्ग पागल हो गया। उसे देखने के लिए लोग पूरा नेट छान मार रहे हैं और प्लेब्वाय की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है। एक जिम्मेदार सज्जन को तो यहाॅं तक कहना पड़ा कि योगासनों का धर्म से कुछ लेना देना नहीं। अब इसका धर्म से कुछ लेना देना हो या न हो, वार तो उल्टा गया। सारा की लोकप्रियता ही बढ़ी और दिगंबरी योग के विरोध में कोई बड़ी वारदात नहीं हो सकी। जो लोग कुछ विरोध कर भी रहे थे, मन में उनके उत्सुकता उस वीडियो को ठीक तरह से देख लेने की थी। वाइज की बातें कौन मानता है और फिर हर बात का जवाब हिंसक वक्तव्य तो नहीं होते। इस बात को अब तो समझ ही लेना चाहिए। चित्तवृत्ति पर नियंत्रण की जरूरत दक्षिणपंथियों को ज्यादा है। वे चाहें तो एक आॅंख झपकाने वाले योग गुरु रामदेव जी की शरण में जाॅंय, चाहे दिगंबरी सारा के। उत्सुकता यह है कि ज्यादातर लोग किसकी ओर जाना पसंद करेंगे?

Friday, August 13, 2010

क्या कबीर स्त्री विरोधी थे?

मेरे ब्लाग पर छद्म नाम से टिप्पणी लिखने वाले एक टिप्पणीकार मित्र ने मुझसे कबीर के स्त्री सम्बन्धी विचारो पर बहस चलने के लिए कहा! मुझे लगता है कि बहुत से लोगो के समान वे भी यह सोचते है कि कबीर स्त्री विरोधी है! तो आइये इस विषय पर भी विचार करे!


क्या कबीर स्त्री विरोधी थे?

Saturday, August 07, 2010

टिप्पणीकारो से निवेदन

टिप्पणीकारो से निवेदन है कि छद्म नामो से टिप्पणी न भेजा करे! उन्हे प्रकाशित करना सम्भव न हो सकेगा! Chadma namo se prakashit purani tippaniya bhi dheere dheere hatayi ja rahi hain.

Sunday, July 25, 2010

क्या कबीर वर्णव्यवस्था के समर्थक थे??

डायरी

क्या कबीर वर्णव्यवस्था के समर्थक थे??

१८. ७. २१

फैज़ाबाद में मेरे आवास पर हुई चर्चा के दौरान डा वागीश शुक्ल ने कबीर को वर्णव्यवस्था समर्थक का सिद्ध करने के लिए कबीर की ही साखी प्रस्तुत की।

॑॑ सकल बरण एकत्र् ह`वै सकति पूजि मिलि खांहि।
हरिदर्शन की भ्रान्ति करि केवल जमपुर जॉंहि।। ॔॔

कबीर की यह साखी अपेक्षाकृत कम प्रचलित है, इसलिए मेरे सहित वहॉं उपस्थित हिन्दी युवा कवि विशाल श्रीवास्तव, संस्कृत विद्वान महेश मिश्र, वरिठ कवि स्वप्निल श्रीवास्तव और उर्दू साहित्य की विदुषी बुशरा खातून ने उनकी बात को बिना किसी प्रतिरोध के स्वीकार कर लिया। लेकिन बाद में इस साखी का अर्थ देखने पर पता चला कि इसका वर्णव्यवस्था से कोई मतलब ही नहीं है। वास्तव में इस साखी का अर्थ तो निम्नवत` है

"॑॑ समस्त वर्ण् के लोग शक्तिपूजा के नाम पर इकठ`ठे होकर मॉंस भक्षण करते हैं, वे सिर्फ़ हरिभक्त होने की भ्रान्ति पैदा करते हैं। वे वास्तव में भक्त नहीं होते। वे केवल यमपुर की यात्रा करते हैं।॔॔

कबीर, ग्रंथावली, संपादक रामकिशोर शर्मा, लोकभारती, २६, पृ. २२३.

कबीर की इस साखी को शक्तिपूजा या मॉंस भक्षण के सन्दर्भ में तो प्रस्तुत किया जा सकता है, मगर वर्णव्यवस्था के समर्थन के लिए इसका इस्तेमाल बिलकुल गलत है। वास्तव में इस दोहे का वर्णव्यवस्था से कोई सम्बन्ध है ही नहीं। सवाल यह है कि दूसरों के संदेहों और अज्ञान का फायदा उठाकर उन्हें गलत जानकारी देने वाले डा वागीश शुक्ल जैसे विद्वानों का क्या किया जाय?? वे उन्हीं मध्यकालीन ब्राह`मणों के समान हैं जो वेद के नाम पर जनता को कुछ भी समझा दिया करते थे।

फिलहाल मेरा सवाल यह है कि क्या आपको लगता है कि कबीर वर्णव्यवस्था के समर्थक थे?? क्या आपको कबीर की कोई ऎसी प्रमाणिक पंक्ति याद आती है जिसमें वे वर्णव्यवस्था के समर्थक लगते हों?? आपके विचारों की प्रतीक्षा रहेगी।

Sunday, February 28, 2010

होली की एक स्मृति

मॉरीशस में होली बहुत अच्छी तरह से मनायी जाती है। 1968 के आस पास की घटना है। जब हम मारीशस में थे तो होली मनाने के लिए बो बासें चले जाते थे जहाँ चाचा ठाकुर प्रसाद मिश्र जी रहा करते थे। एक बार होली के दिन उनके यहँा कोई बुजुर्ग मेहमान आये हुए थे। वे कुर्सी पर बैठे हुए थे तो चाचा जी कमर पर एक बड़ा सा भगोना रखे हुए अंदर से निकले।

उन्होंने अतिथि महोदय से पूछा

''क्या आप चाय पियेंगे''

बुजुर्ग सज्जन थोड़ा संकोच में पड़े, पर फिर संभलकर कहा

''हाँ हाँ पी लेगे''

अतिथि जी के इतना कहते ही चाचा जी ने पूरा भगोना उनके सिर पर उड़ेल दिया। वे सिर से पैर तक रंग से भीग गये।

होली की यह रंगीनियत उसकी खास बात है। मुझे यह त्योहार सांस्कृतिक अधिक और धार्मिक कम लगता है। यही वजह है कि मुझे अपने तमाम मुस्लिम दोस्तों की भी शुभकामनाएॅ इस अवसर पर मिलती रहती हैं।

यह रंग का उत्सव प्रकृति से भी जुड़ने का उत्सव होता है। शायद बाहर की प्रकृति से उतना नहीं जितना की अंदर की प्रकृति से। इस मामले में यह त्योहार कुछ कम फा्यडियन नहीं। इस अवसर पर ढेर सारी वर्जनाएँ अलग रख दी जाती हैं। हमारी प्रकृति पर जो दबाव हैं वे इस अवसर पर कम हो जाते हैं।

Saturday, February 13, 2010

कल के लिए

सम्मान्य महोदय/महोदया,


हमारा समय एक कठिन दौर रहा है जिसमें समाज और संस्कृति को अनेकानेक समस्याओं से रूबरू होना पड़ रहा है। अपसंस्कृति, साम्राज्यवाद, साम्प्रदायिकता, आर्थिक और सामाजिक विसंगतियाँ लेखन को सामाजिक दायित्व समझने वाले हमारे-आप जैसें लेखकों के समक्ष कठिन चुनौतियों के रूप में रही हैं जिनसे हम लगातार जूझते रहे हैं। कल के लिए इन ज्वलंत प्रश्नों को सामने रखकर निकलने वाली अपने समय की एक महत्वपूर्ण पत्रिका रही है। इसे आप जैसे प्रबुध्द साथियों का प्यार और सहयोग लगाातार प्राप्त होता रहा है जिसके चलते इस पत्रिका ने अपने संस्थापक-सम्पादक श्री जयनारायण के कुशल नेतृत्व में सफलतापूर्वक अपने सोलह वर्ष पूरे किये हैं।

पत्रिका आज भी अपनी इन्ही प्रतिबध्दताओं से जुड़ी रहते हुए समकालीन सृजनात्मकता को समृध्द करने के कार्य में सन्नध्द है। मगर भाई जयनारायण जी की स्वास्थ सम्बन्धी समस्याओं को देखते हुए मुझे और भाई अम्बर बहराईची को उनके द्वारा संयुक्त रूप से पत्रिका को सम्पादकीय सहयोग प्रदान करने की जिम्मेदारी सौंपी गयी है। उर्दू साहित्य से जुड़ी सामग्री का सम्पादन अम्बर बहराईची करेंगे। मुझे पत्रिका के लिए हिन्दी सामग्री का सम्पादन कार्य देखना है।

इस गुरुतर दायित्व का निर्वहन आप जैसे शुभेच्छु मित्रों और प्रतिबध्द एवं समर्थ लेखकों के सहयोग के बिना संभव नहीं है। पत्रिका के पहले से प्रकाश्य अगले दो विशेषांक शीघ्र ही आपके हाथो में होंगे। उसके बाद प्रकाशित होने वाले सामान्य अंकों के लिए आपके सहयोग के हम आकांक्षी हैं। विश्वास है कि आप अपनी श्रेष्ठ रचनाएँ हमें प्रेषित कर पत्रिका को अपना रचनात्मक सहयोग प्रदान करेंगे।ं

सहयोग की आशा के साथ,

आपका


रघुवंशमणि

कार्यकारी सम्पादक
कल के लिए

Friday, February 12, 2010

बाल ठाकरे को अनायास मिली चुनौती

यह संभवत: इस समय विचार का विषय नहीं है कि शाहरुख खान की फिल्म
माई नेम इज खान
किस प्रकार की फिल्म है? कला की दृष्टि से वह ठीक ठाक है या नहीं? उसकी विषयवस्तु क्या है या उसका मैसेज कैसा है? फिल्म में विषय या कहानी के साथ निर्देशक का ट्रीटमेंन्ट कैसा है? यानि कि फिल्म कैसी है यह फिलहाल महत्वपूर्ण नहीं है। हो सकता है एक सप्ताह बाद ही यह फिल्म टिकट खिड़की पर दम तोड़ दे। होने को तो इसका उल्टा भी हो सकता है, मगर इस समय इस बात का कोई मतलब नहीं है। मतलब सिर्फ इस बात का है कि यह फिल्म रिलीज हो गयी है और इसे देखने के लिए लोग बड़ी तादाद में थियेटरों में पहुँचे हैं।

लोग शिवसेना की धमकियों के बाद भी सिनेमाघरों में पहुँच रहे हैं और यह प्रदर्शित कर रहे हैं कि वे बाल ठाकरे जैसे कट्टरपंथी नेताओं से अधिक महत्व अपने सिने स्टारों को देते हैं। वे फिल्म को देखने के प्रतीकात्मक प्रतिरोध का बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं। शायद सामान्य परिस्थितियों में इस फिल्म को इतनी अच्छी शुरुवात न मिलती। दिल्ली में तो सिनेमाघरों में कई दिनों की एडवांस बुकिंग चल रही है। फिल्मों के इस पराभव के दौर में जब किसी एक शो का हाउस फुल जाना मुश्किल हो जाता है, यह वाकई जबर्दस्त बात है।

बाल ठाकरे और शिवसेना को यह चुनौती अनायास ही मिल गयी है। शायद स्वयं शाहरुख ने भी यह न सोचा होगा कि एक सामान्य टिप्पणी पर शिवसेना इस प्रकार प्रतिक्रिया करेगी। बात सिर्फ इतनी सी रही होगी कि उन्हे अपनी खेल सम्बन्धी सामान्य सी टिप्पणी को वापस लेना अपमानजनक लगा होगा। लेकिन यह भी उनके पक्ष में महत्वपूर्ण है क्योंकि शिवसेना की धमकी के बाद फिल्म उद्योग में शाहरुख का खुला समर्थन नहीं किया गया। कलाकारों से लेकर वितरकों तक ने संभल-संभल कर टिप्पणियाँ कीं क्योंकि उन्हे तरह-तरह के व्यावसायिक डर सता रहे थे। अभिषेक बच्चन जैसे कलाकारों ने तो साफ कहा कि वे महज कलाकार हैं और वे इस पचड़े में नहीं पड़ना चाहते। निश्चितरुप से शाहरुख ने इन परिस्थितियों में कुछ अकेलापन जरूर महसूस किया होगा।

वैसे भी फिल्मी दुनिया में ठाकरे का आर्शिवाद चलता था। यह दादागीरी वाला आर्शीवचन हुआ करता था। फिल्मी दुनिया ने भी सरकार और सरकार राज जैसी फिल्में बना कर बाल ठाकरे को नायक का दर्जा देने में कोई कमीं नहीं रखी थी।

शाहरुख खान की इस प्रतिक्रिया को, जिसे बहादुरी कहना गलत न होगा, को हम बाल ठाकरे का अंत नहीं मान सकते। जनता की प्रतिक्रिया उन्हें गुड नाइट कहने जैसी भी नहीं है। बम्बई में ही उनके बहुत से समर्थक जरूर होंगे जो बदला लेने को उतावले होंगे। मगर इस घटना ने अनायास ही उनको एक बड़ी चुनौती दे दी है और जनता को एक प्रतीक नायक मिल गया है।

Thursday, October 15, 2009

पुस्तक का संपादन

ब्लाग बंधुओ,

इधर मैने एक पुस्तक का संपादन किया है जो पंडित प्रेमशंकर मिश्र के व्यक्तित्व और कृतित्व को लेकर है। इस पुस्तक को फैजाबाद शहर के ही भवदीय प्रकाशन ने प्रकाशित किया है।

पं. प्रेमशंकर मिश्र जी अपने समय के महत्वपूर्ण कवि थे। करीबन साल भर पहले उनका निधन हो गया था। इस पुस्तक का आवरण आप हाशिये पर देख सकते हैं। इस पुस्तक से सम्बन्धित कुछ सामग्री आने वाले दिनों में ब्लाग पर दूंगा।

Monday, March 23, 2009

फ्रीडा

डायरी



फ्रीडा


'यह शव अभी भी साँस ले रहा है।'


फ्रीडा फिल्म के बारे में मुझे बहुत पहले हिन्दी कवि अनिल सिंह ने बताया था। उन्होने यह फिल्म किसी टीवी चैनल पर देखी थी और मुझसे इस फिल्म की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। मैं इस फिल्म को तत्काल नहीं देख पाया। मैने इसे बाद में एक डीवीडी पर देखा तो वाकई यह कमाल की फिल्म लगी। 2002 में बनी यह फिल्म वास्तव में फ्रीडा काहलो के जीवन पर बनी है जो एक मैक्सिकन अतियथार्थवादी चित्रकार थीं और जिनका वैवाहिक जीवन उथल-पुथल से भरा हुआ था। इस फिल्म में सलमा हाएक ने फ्रीडा की भूमिका निभायी है। फ्रीडा अपने युवा जीवन में एक दुर्घटना का शिकार हो जाती है और जीवनभर शारीरिक रूप से निढाल रहती है। अपने दर्द और दुखों को वह अपने चित्रों में बहुत ही मौलिक तरीके से अभिव्यक्त करती है।

युवा फ्रिदा के जीवन में हुई सड़क दुर्घटना उसे निराशा में डुबो देती है। मगर उसके पिता उसे एक कैनवस लाकर देते हैं जिस पर वह चित्र बनाना प्रारम्भ करती है। फिर वह चलना शुरू कर देती है। फ्रिदा का विवाह डीयागो नाम के एक ऐसे पेन्टर से हो जाता है जो वामपंथी है, उन्मुक्त जीवन का आदी है, गैरसमझौतावादी है और फ्रिदा की कला का प्रशंसक है। उसके तमाम स्त्रियों से चले सम्बंधों का फ्रीडा के जीवन पर असर पड़ता है। वह भी प्रेम की तलाश में निकलती है और स्त्रियो तथा पुरुषों से उसके सम्बंध बनते हैं। डीयागो उसे तलाक भी दे देता है। पर बाद में वे पुन: मिलते हैं।

फ्रीडा की जिजीविषा को, उसकी प्रेम की तलाश को यह फिल्म बिना किसी अतिरंजिता के प्रस्तुत करती है। उसके दुख बहुत अधिक हैं मगर वह उन्हे एक कलाकार सुलभ सर्जनात्मक प्रतिरोध के साथ जीती है। इस फिल्म के बहुत से दृश्य पेन्टिग सरीखे हैं और रंगों की उपस्थिति अद्भुत है। पता नहीं क्यों मुजफ्फर अली की फिल्म 'गमन' याद आयी जिसमें कई इस तरह के दृश्य थे। ध्यान देने की बात है कि 'गमन' काफी पुरानी फिल्म है। लेकिन इस फिल्म में बहुत से ऐसे दृश्य हैं जो अतियर्थाथवादी हैं और जो पेन्टिंग्स तक सीमित नहीं।

इस फिल्म की विशेषता इसमें रूसी नेता लियोन ट्रॉटस्की का एक पात्र के रूप में होना भी है जिनकी हत्या का चित्रण भी इस फिल्म में है।