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Saturday, September 22, 2012

प्रतिबिम्ब


प्रतिबिम्ब

                                          रघुवंशमणि




मौत की आॅंखों में

कितनी झुर्रियाॅं होंगी

क्या इन झुर्रियों की दरारों में

कहीं कोई बूॅंद भी होगी

छिपी-खोयी

पत्थरों की घाटियों में

वर्षा के बचे जल की तरह



पहाडों से रिसते

सिसकते धार की तरह



क्या वह सारे चिन्हों को

शब्दों की तरह पहचानेगी

उन्हें पढ़ेगी इतिहास की तरह

समय की कार्बन डेटिंग में



मौत कैसी होती है

होती क्या है वह



जब झाॅंकती है आॅंखों में

तो क्या देखती है वह

तरल स्थिरता की गहराई में

अपने आप को



क्या वह प्रतिबिम्ब होती है

धीरे-धीरे करीब पहुॅंचती



... ............... ..........

Friday, September 21, 2007

प्रारम्भ

कविता


प्रारम्भ

एक बच्चा
खींचता है
एक पड़ी लकीर
और एक बेंड़ी
बायीं ओर एक गोला
दायीं ओर एक पूँछ

बना देता है
'क'

यहीं से
शुरू होती है
कविता

इसी तरह
लिखा जाता है
इतिहास


रघुवंशमणि

Sunday, September 16, 2007

कुदाल

कविता

कुदाल


एक बार फिर वही सवाल
कि क्या हो इस कुदाल का

शब्दों से भर गया हूँ कुछ इस कदर
कि किसी शोक प्रस्ताव की तरह
मौन रहूँ कुछ क्षण

इस मौन के अन्तस्थल से उभरती है
एक साफ और ठोस आकृति
जो बार-बार उभरती रही है
जब बैठता रहा हूँ
किसी अनुकूलित विचारस्थली में
पड़ी रही है एक कुदाल
मेरे मस्तिष्क के अंधेरों में

बाहर सब कुछ चमकदार है
धूल रहित व्यवस्थित इतना
कि मैं हो जाता हूँ उथल-पुथल

कि क्या करूॅं मैं इस कुदाल का
जो गड़ती है मेरे दिमाग में इस कदर
कि अकेला पड़ जाता है दर्द
यह शायद समायोजन की समस्या हो
जिसका सम्बंध है व्यक्तित्व विकास से
जिसके लोहे पर लगी है गीली मिट्टी खेत की
और पसीने की गंध
उसकी बेंट पर

कैसे रखूं इस कुदाल को
विकसित मस्तिष्क की जटिल बहसों में
जिसकी अत्याधुनिक तकनीक से
हमारे सुसभ्य प्रयासों के बाद भी
रह-रह कर उभरते हैं

जटिल तारों में उलझे
हमारे कुटिल शास्त्रार्थ
संगणक की अगणित माइक्रोचिप्स से
उभरकर प्रदीप्त होती लिजलिजी इच्छाएँ
और बाजार के जालजंजाल में प्रतियोगी सी
आत्मघाती अहम्मन्यताएँ

कोई अलंकरण नहीं है कुदाल
पर यहाँ लगेगी किसी जादुई कल्पना जैसी
हालांकि यह कोई यंत्र तक नहीं
एक निखालिस हथियार भर है अप्रासंगिक
जो नहीं मुख्यधारा की परिभाषा तक में

जिन्हे हाशिये पर ढकेल रहा है समय
उन्हें विस्मृत करके ही न बनें हमारी स्मृतियाँ
ऐसी निरपेक्ष चेतना पर
उस मोंगफली के छिलके
जिसे मैने नानी जैसी बुढ़िया से खरीदे थे
और जिसने राजस्थानी में कुछ कहा था
और मैं मात्र इतना ही समझ सका
कि बेटा सर्दी बहुत तेज है

तेज ठंडक में कोई चला रहा है कुदाल
आती है कोन गोड़ने की आवाज
जिनमें से उभरती हैं
दर्द के समंदर में डूबी हजार ऑंखें
और लम्बी निरीह चुप्पियाँ


रघुवंशमणि

Tuesday, September 04, 2007

आगमन

कविता

आगमन

कहीं कोई रिक्ति नहीं

जमीन फोड़ झंडियाँ गाड़े
घास की हरी सेना
ईंटों के बीच बची मिट्टी में
दबी लेटी दूब दुध्दी छापामार टोलियाँ
अनजानी वनस्पतियों की मिलीशिया
कोने-अतरे, अलग-अलग वर्दियों में
और काई के कई-कई नगर

बिखरी खाली डिब्बियाँ फटे कागज
बुझी पत्रिकाएँ छत-विछत सामान
छोड़ गये जिन्हें जाने वाले गैरजरूरी
पालिथीन की खाली झिल्लियाँ

बासी कलेण्डर कमरे की दीवारों पर
समय के बोझ से लटक आये
मकड़ी के जाले कोनों में
धुएँ के निशान काले

और जहाँ कुछ नहीं था हवा थी
जिसमें चले गये लोगों की गंध

कहीं कोई रिक्ति न थी
हर कहीं से हटानी पड़ी चीजें

थोड़ी मिट्टी लेकर निकलीं घासें लहूलुहान
दूब को नोचना पडा बलपूर्वक रक्तरंजित
ढूँढ-ढूँकर निकाला गया बेनामी वनस्पतियों को
और उचारी गयीं बेरहम खुरपी से
काईयों की परतें
फिर रगड़ कर साफ हुए
जाले और धुएँ के धब्बे

बाहर फूँके गये अनुपयोगी अखबार
कलेंडर पत्रिकाओं सहित बेकार डिब्बे
कंकड़ पत्थर फेंके गये भर कर टोकरियों में

और फिर पोती गयीं दीवारें घायल
धुला गया विवश फर्श

अंत में बची हवा
जिसके लिए जलायी गयी
तेज गंध अगरबत्ती

तब आया सामान परिचित
बिठाया गया जगह-जगह

इतने के बाद और फिर भी
कहाँ जाएगा अहसास
दूसरे किसी के घर होने का



रघुवंशमणि

Monday, September 03, 2007

प्रकाश

कविता

प्रकाश

कितनी आकाश गंगाएँ
कितने नक्षत्र
कितने कितने सौरमण्डल
ग्रह-उपग्रह और
तम के अगणित प्रकाशवर्ष

सबके बीच से हम तुम तक पहुँचे
ऐसा आसान भी नहीं था
सीधे नहीं रहे हमारे रास्ते
किरणों और तरंगों के बीच जीते
हम तुम तक पहुँचे

शुक्र करो
कि हमें नहीं ग्रसा किसी काले ग्रह ने
और हम पहुँचे
तिमिराच्छन्न अनन्त को भेदते
पिण्डों से बचते
उनके गुरुत्वाकर्षण में मुड़ते

देखो हमारे परावर्तन में
सब्ज पत्तियाँ, फूल और फल
दृश्य और चीजें
इन्द्रधनुषों के रंग
धरती, समुद्र, आकाश

वैसे तो सारे रंग तुम्हारी आखों में हैं
और हमारा अपना कोई रंग नहीं


रघुवंशमणि

Sunday, September 02, 2007

प्रक्रिया

कविता

प्रक्रिया

आप कैसे हैं मैने पूछा था
तुमने कहा था कैसे हैं आप

इसी तरह हमने बातें शुरू की थी
जो कि एक कर्मकाण्डी प्रारम्भ था शब्दों को
व्यर्थ की ध्वनियों में बदलने का

आप इसे एकालाप न कहें तो आपका मन
और मन भर गरू बातों के बाद भी
मैं नहीं जान पाया आपका मन और आप मेरा

संभवत: ऐसी कोई आकांक्षा भी न थी
मैंने अपनी हाँकी और तुमने अपनी
हाँकने को ड्राइंगरूम जो था सुसज्जित

उन पति, पत्नी और बच्चों के बारे में
जिनसे हमारा कोई सम्बन्ध बनता था
या नहीं भी बनता था तो क्या

जोर-शोर से हमने चर्चाएँ की
पुस्तकें पढ़ीं और फिल्में देखीं जागकर
बड़े लोगों के बारे में बातें की उत्साहपूर्वक

अखबार हम पढ़ते रहे नियमित
पहले हम रेडियो सुनने के आदी थे
बाद में हमें दूरदर्शन का नशा हुआ

कवि, राजनेता, कलाकार और दार्शनिक
डकैत, दलाल, भ्रष्ट और उच्चके सामान्यत:
हमारी बातों में समरस आते रहे लगातार

नाश्ते के साथ चाय, पान और सिगरेट
हमें इण्टलेक्चुवल सिध्द करने को कम न थे
व्यर्थ और क्षुद्र लोगों के परिवेश में

हम अपने समय में रहे समूचे के समूचे
पत्नियों के द्वारा धुली शर्ट की कालर खड़ी किये
ऑंखों में समय की उदासी का गर्व लिए

वैसे तुम एक सीधे-सादे आदमी थे
मैं भी एक साधारण सा व्यक्ति लगता था
और अनजाने में ही हम धूर्त होते चले गये


रघुवंशमणि

Tuesday, August 14, 2007

तितलियाँ

कविता

तितलियाँ


पंख फड़फड़ाती उड़ती हैं तितलियाँ
रोककर अपने पर एकाएक
हो जाती हैं आखों से ओझल

इन्हें पकड़ना कोई कठिन नहीं
अगर ये फूलों पर बैठी हों

मेरे कोट पर आकर बैठ जाती है
मटमैली, सफेद या चमकीली तितली
भूल से या शायद आश्वस्त भाव से

घर नहीं होते तितलियों के
वे फूलों पर ही सो जाती हैं
छत्ते नहीं बनाती हैं शहद के

खुली वादियों में अक्सर
श्रंग बिखेरती हैं तितलियाँ
वतावरएा को खुशनुमा बनातीं


रघुवंशमणि

Thursday, August 02, 2007

बस-4

कविता


बस-4

नानी देखती थी बस
फूटे चश्में से

नाना देखते थे
ऑंखों पर हाथ छा कर

बच्चे दौड़ते थे
बस के साथ-साथ

नाना हो गये खाक
नानी गयीं मर
बच्चे हो गये बड़े

जाने कहाँ खो गयी
वह धूल उड़ाती बस




रघुवंशमणि

बस-3

कविता


बस-3



पीछे की सवारियाँ
ध्यान से सुनें

पीछे की सवारियाँ
टिकट खरीद लें
पैसे आगे बढ़ा दें

पीछे की सवारियाँ
अपना सामान पीछे ले जाँय

पीछे की सवारियाँ
झटकों के लिए तैयार रहें
हिचकोले खाती है बस

बाद की सवारियाँ
पीछे जाकर बैठें

पीछे की सवारियाँ
पीछे की सवारियों की तरह रहें।


रघुवंशमणि

बस-2

कविता


बस-2


''बड़ी भीड़ है
साँस लेना भी
कठिन है

गाड़ी मत रोको
तेज़ चलने पर
लगती है हवा''

कड़ी है धूप
हिलता है राह में
एक बेचारा हाथ

रुकती है बस
चढ़ता है एक
गरियाते हैं सौ

बस में होने
और बाहर होने में
यही फर्क है।



रघुवंशमणि

Wednesday, August 01, 2007

बस-1

कविता

बस-1


बिगड़ गयी है बस
खड़ी है किनारे

ठुक-ठुक
लगाए है ड्राइवर
गाड़ी के नीचे
उत्सुकता से झुके हैं
कुछ लोग

चाय की दुकान
की तलाश में
दस-पाँच

करीब की सवारियाँ
सड़क पर
दो-चार
रोकती हैं आते
जाते वाहन

बाकी कुछ अंदर
झल रहे हैं
उबाउ अखबार

बता गया है परिचालक
टिकट का पैसा
वापस नहीं होगा।



रघुवंशमणि

Sunday, July 29, 2007

कंक्रीट में गुलाब

कविता

कंक्रीट में गुलाब


साफ धुली ठण्डी फर्श पर
उससे भी कठोर कंक्रीट का गमला
जिसमें भूमि का भ्रम पैदा करती थोड़ी सी मिट्टी
जंगल का भ्रम पैदा करती हरी पत्तियाँ और टहनी
उसकी चोटी पर एक गुलाब

घर के बाहर है गुलाब
मगर सड़क की असुरक्षा में नहीं
हवाओं के विरुध्द जीवन बीमा है चहारदीवारी
पशुओं के विरुध्द जी. पी. एफ. है गेट
थोड़ी सी खाद मिलती है मंहगाई भत्ते की तरह
हल्का सा पानी ओवरटाइम की तरह
जरूरत के मुताबिक

इसी के लिए बनाया गया है दो कमरे का फ्लैट
एक में सोते हैं बच्चे
दूसरे में पति-पत्नी
दिन में जो हो जाता है ड्राइंगरूम
इसी गुलाब की खातिर
पति रोज भीड़ चीरता जाता है आफिस
पत्नी करती है दिन भर काम
बच्चों को भेजा जाता है स्कूल

पति, पत्नी और बच्चे के बीच उगा
यह गुलाब चमकता है
आफिस से लौटे थके पति की मुस्कान में
बोर हुई पत्नी की औपचारिकताओं में
किताबों में दबे बच्चे की अस्वाभाविक हँसी में

हफ्ते में सण्डे की तरह है यह गुलाब
दीवारों पर टंगे इच्छाओं के चित्र की तरह
थकान के बाद साथ चाय पीते मित्र की तरह
समय निकाल कर देखे गये मैटिनी शो जैसा
गर्मी में बच्चे की एक आइसक्रीम की तरह

मित्रों के सामने मुस्काता है
अतिथि के सामने खिसियाता है
अफसर के आगे बिछ जाता है
तेज हवा चलने पर
मगर थोड़ा सा हिलता है

पुलिस के डण्डे की तरह है यह
हमारे और पागल कर देने वाली वानस्पतिक गंध के बीच
जो जंगलों की सघनता में ही जनमती है
जिसकी एक छाया भर नहीं है यह

हमारे और इन्द्रधनुषी रंगों के बीच
किसी शासनादेश की तरह टंकित है
धरती की सोंधी प्रफुल्लित बरसाती महक के
विस्तार के चारो ओर काँटेदार
बाड़े की तरह

एक डायवर्जन भर है
कंक्रीट में उगा
लगभग कंक्रीट सा
यह गुलाब



रघुवंशमणि