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Monday, October 13, 2008

झाँसी की गौरव गाथा

झाँसी की गौरव गाथा


हमारे देश के इतिहास में 1857 का स्वाधीनता संघर्ष स्वर्णाक्षरों में लिखित कालखण्ड है और इस समय की शौर्य गााथा की सबसे उज्ज्वल नक्षत्र महारानी लक्ष्मीबाई हैं। झाँसी की छोटी सी रियासत की भूमिका उस संघर्ष काल के एक दौर में केन्द्रीय हो गयी थी। हम में से अधिकतर लोग झाँसी के बारे में कम ही जानते हैं, शायद वहीं तक जहाँ तक झाँसी का इतिहास लक्ष्मीबाई से जुड़ता है। मगर झाँसी की कहानी लम्बी है और इस कहानी को झाँसी के ही निवासी और वरिष्ठ लेखक/कवि ओमशंकर खरे असर ने एक पुस्तक महारानी लक्ष्मीबाई एवं उनकी झाँसी का रूप दिया है।

यह पुस्तक वास्तव में असर साहब के लिखे गये कुछ लेखों का संकलन है जो उन्होंने जागरण अखबार के लिए एक श्रृंखला के अन्तर्गत लिखे थे। खरे साहब अपनी इस इतिहास की पुस्तक का प्रारम्भ बंगश और मराठों के बीच चल रहे संघर्ष से करते हैं जिसके चलते झाँसी एक शहर के रूप में सामने आया। पेशवा बाजीराव ने पहले-पहल इस क्षेत्र के सामरिक महत्व को देखते हुए यहाँ एक छावनी स्थापित की थी क्योंकि यहाँ से दतिया और ओरक्षा राज्य करीब पड़ते थे जिनपर नियंत्रण जरूरी था। बाद में मराठा सेनानायक मल्हारकृष्ण की हत्या के बाद नारोशंकर झाँसी के सूबेदार बने। उन्होने राज्य की सीमा को बढ़ाया और झाँसी के किले को मजबूत किया। यही नहीं उन्होने झाँसी शहर को बसाने में भी दिलचस्पी दिखायी। पेशवा द्वारा उन्हें वापस बुलाने पर माधवगोविन्द आतिया , बाबूराव कन्हाई और विश्वासराव लक्ष्मण इस के सूबेदार नियुक्त हुए। पानीपत की लड़ाई में पराजय के बाद मराठे कमजोर पड़ गये। 1762 में शुजाउद्दौला ने झाँसी के किले पर कब्जा कर लिया। लेकिन 1763 में ही मराठों ने फिर झाँसी पर कब्जा कर लिया। 1766 तक विश्वास राव लक्ष्मण यहाँ शासक रहे। 1770 में रघुनाथ हरी नेवलकर को झाँसी का शासन संभालने का अवसर मिला।

रघुनाथ हरी नेवलकर से ही वह वंश चलता है जिसकी राजबधू महारानी लक्ष्मीबाई बनी। वे एक प्रतापी शासक सिध्द हुए और उन्होने झाँसी को अवध और सिन्धिया की दुर्भावनापूर्ण गतिविधियों से बचाया। उनके समय में झाँसी ने कई हमलों और षडयन्त्रों का सामना सफलतापूर्वक किया। उन्होने अपने सुशासन द्वारा जनता में अपना प्रभाव बनाते हुए झाँसी में अपने राजवंश की नींव डाली। पच्चीस वर्षो तक शासन करने के उपरांत वे काशी चले गये। उनके छोटे भाई शिवराव भाÅ ने सन 1794 में झाँसँी के सूबेदार का पद संभाला। उनके समय में मराठों की पेशवाई कमजोर हो रही थी और अंग्रेजों का दबदबा भारत में बढ़ता जा रहा था। परिणाम स्वरूप शिवराव भाÅ को अंग्रेजों से संधि करनी पड़ी। उनकी मृत्यु के उपरांत उनका पुत्र रामचन्द्र भाÅ अपने चाचा के संरक्षण में महाराजा बने मगर अल्पायु में ही उनकी मृत्यु हो गयी। इस दौरान अंग्रेजों का सम्पर्क झाँसी से बढ़ा और यह दौर षडयंत्रों का भी था। बढ़ते दबावों के चलते 1817 की संधि के अनुसार झाँसी में अंग्रेजी फोज का रखा जाना स्वीकार किया गया। रामचन्द राव के निघन के बाद अंग्रेजों ने रघुनाथ राव को शासक बनाया जो कुख्यात और कुष्ठ रोग का शिकार था। वह शीघ्र ही कालकवलित हो गया। उत्तराधिकार के विवादों के बीच गंगाधर राव झाँसी के महाराजा बने जिनकी पत्नी महारानी लक्ष्मीबाई थीं।

गंगाधर राव के समय अंग्रेजों ने झाँसी के किले में अपनी सेना स्थापित क्ी। लेकिन इस क्षेत्र में अंग्रेजों के विरुध्द छुटपुट विद्रोह शुरू हो गये थे। गंगाधर राव के समय में झाँसी का विकास हुआ क्योंकि वे एक कुशल और प्रभावशाली शसक थे। मगर वे विधुर हो गये थे उनकी पत्नी रमाबाई का निधन हो गया था। सन्तान प्राप्ति के लिए उनहोने दूसरा विवाह किया था और रानी लक्ष्मीबाई उनकी पत्नी बनकर महल में आयी थीं। असर साहब यह बताते हैं कि लक्ष्मी बाई या मनू का जीवन कितने दुखों से भरा था। इस तथ्य को अब कम ही जाना जाता है। कम ही लोग जानते हैं क्योंकि यह दुख-कथा अब महारानी लक्ष्मीबाई की ऐतिहासिक शौर्य गााथा के नीचे दब सी गयी है। चार साल की उम्र में ही लक्ष्मीबाई की माता का निधन हो गया था। विवाहोपरान्त लक्ष्मीबाई को एक पुत्र हुआ था जो तीन माह बाद चल बसा। फिर महाराजा गंगाधर राव की मृत्यु का कहर उन पर वैधव्य के रूप में टूटा।

लक्ष्मीबाई बचपन से ही प्रतिभाशाली और साहसी थीं। बिठूर में निवास के दौरान उन्होंने राजशाही के कायदे कानून सीखे। व्यायाम, घुड़सवारी वगैरह वहीं से सीखी। झाँसी आने पर शासन व्यवस्था में गंगाधर राव का सक्रिय सहयोग दिया। अपने पुत्र की मृत्यु के बाद गंगाधर राव बीमार पड़ गये और उन्हें झाँसी के विलुप्त होने का भय सताने लगा। झाँसी की भीषण त्रासदी का चरण उनकी मृत्यु थी जिसने अंग्रेजों की सत्ता लोलुपता की कुदृष्टि को अवसर दिया। संग्रहणी के शिकार गंगाधर राव ने अपने अन्तिम दिनों में आनन्द राव को दत्तक पुत्र के रूप में स्वीकार किया जिसकी उम्र पाँच वर्ष की थी। दत्तक विधान के बाद उसका नाम दामोदर राव गंगाधर रखा गया। यह 19 नवम्बर 1853 की बात है। उसी के दो दिन बाद महाराजा गंगाधर राव का निधन हो गया।

गंगाधर राव की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने लैप्स की नीति के तहत झाँसी को हड़पने की चेष्टाएँ आरम्भ कर दीं। महारानी लक्ष्मीबाई ने इसका हर प्रकार से विरोध किया। असर साहब ने अपनी पुस्तक में बतलाया है कि किस प्रकार स्लीमन ने दत्तक पुत्र के अधिकारों के प्रश्न पर दोहरा रवैया अपनाया था। इसी मुद्दे पर दो अंग्रेज प्रशासको एलिस और मैलकम में गहरे मतभेद थे । अत: सारा कुछ अन्तत: डलहौजी की सोच पर टिक गया । गोपनीय ढंग से झाँसी को जबलपुर के कमिश्नर के आधीन कर दिया गया गया और किसी को खबर तक नहीं हुई। अंग्रेजों ने कई मामले में दत्तक पुत्र के अधिकारों को स्वीकार किया था। मगर उनहोंने झाँसी के मामले में उसे नया राज्य मानकर ऐसा करने से इनकार किया। जबकि तथ्य यह है कि पेशवाई के समय से ही झाँसी एक राज्य के रूप में वर्तमान था। झाँसी को नया राज्य बताने को असर साहब अंग्रेजों की घटिया कूटनीति का उदाहरण मानते हैं।

ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर असर साहब बतलाते हैं कि महारानी लक्ष्मीबाई ने इस निर्णय के विरुध्द दो प्रार्थनापत्र कम्पनी सरकार के पास भेजे। ये दो पत्र इस बात के सबूत हैं कि महारानी में गजब की तर्क क्षमता थी। मगर अंग्रेजों ने इन्हे स्वीकार नहीं किया क्योंकि लार्ड डलहौजी की मंशा देशी राज्यों को हड़पकर अंग्रेजी राज्य में मिलाने की थी। परिणामस्वरूप रानी को किला छोड़कर रानी महल में रहना पड़ा। यह उनके लिए बेहद संकटग्रस्त समय था क्योंकि अंग्रेज सेना सभी खजानों को मोहरबंद कर हस्तगत कर रही थी और अभी रानी पति के शोक से उबर भी नहीं पायी थीं कि यह बड़ा राजनीतिक संकट सामने आन पड़ा था। इन भयानक दबावों के बीच महारानी ने हैमिल्टन से बात की जिसका जिक्र असर साहब ने विस्तारपूर्वक किया है। रानी ने अंग्रेजों की पेंशन को अस्वीकार कर दिया क्योंकि उसे स्वीकार करने का अर्थ था झाँसी के राज्य की समाप्ति को स्वीकार कर लेना। इसी दौर में जॉन लैंग के वर्णनों में महारानी के व्यक्तित्व, उनकी आनबान, और उनकी लोकप्रियता का प्रमाण मिलता है। पुस्तक का यह अंश विशेष आकर्षित करता है।

2जून 1857 को झाँसी में सैनिकों ने विद्रोह करना प्रारम्भ कर दिया। मगर रानी ने सही अवसर की प्रतीक्षा की। तेज क्रान्तिकारी गतिविधियों के बीच अपनी कुशल कार्यनीति और नेतृत्व क्षमता के चलते 12 जून को महारानी ने झाँसी का शासन संभाल लिया। महारानी ने 11 माह तक झाँसी पर शासन किया और इस दौर में उनके क्रिया कलापों ने उन्हें जनता में अतिलोकप्रिय बनाया युध्द के अन्तिम दौर में अंग्रेजों ने झाँसी को बरबाद करने का पूरा प्रयास किया। आगजनी से लेकर निर्दोष जनता की हत्या तक का काम किया गया। इस प्रकार 1744 से 1858 तक चलने वाला झाँसी का सम्ध्द राज्य अंग्रेजों की सत्ता लोलुपता का शिकार हो गया। अपनी मृत्यु के समय रानी लक्ष्मीबाई ने अपने पुत्र को विश्वासपात्र सरदार रामचन्द्र राव देशमुख को सौंपा था कि वह उसकी देखरेख करे। झाँसी के राजवंश का यह चिराग लम्बे समय तक बेतवा के धने जंगलों में कुछ विश्वासपात्र लोगों के साथ भटकता रहा। पर बाद में विश्वासघात और पैसे की कमी के चलते उसे आत्मसमर्पण करना पड़ा। दामोदर राव की मृत्यु 1906 में हुई।

झाँसी की कहानी का वर्णन ओमशंकर खरे असर ने आद्योपांत एक झाँसी के ऐसे नागरिक के रूप में किया है जिसे अपनी विरासत से गहरा लगाव है। इसका एक कारण उनके परिवार का स्वयं इतिहास के एक अंश से जुड़ा होना रहा है। झाँसी के इतिहास के कुछ पक्ष विवादों के घेरे में रहे हैं और उन पर इतिहासकारों में मतभेद रहा है। ओमशंकर खरे असर के लेखन की विशेषता यह रही है कि विवादित मुद्दों के सभी पक्षों को हाजिर कर अपना तर्क और पक्ष प्रस्तुत करते हैं। झाँसी और महारानी लक्ष्मीबाई से जुउे विवादों में वे निर्णय बड़े तार्किक ढंग से लेते हैं। इस सिलसिले में उदाहरण के लिए उन्होंने महारानी के जन्म वर्ष के बारे में उन्होने लम्बी छानबीन की है। इसी प्रकार विवाह के समय महारानी की उम्र को लेकर उन्होने गहराई से विचार-विमर्श किया है। उन्होने यह पाया है कि विवाह के समय वे सात वर्ष की नहीं अपितु 15 वर्ष की थीं।

ओमशंकर जी झाँसी के निवासी होने के नाते इतिहास में घटित होने वाली घटनाओं के स्थानों का बखूबी वर्णन करते हैं। वे केवल इतिहास के लेखक न होकर एक साहित्यकार भी हैं। अत: उनकी भाषा में इतिहास लेखक का सूखापन नहीं है। उनकी भाषा सर्जनात्मक है। तथापि वे अपने लेखन में ऐतिहासिक तथ्यों को ही महत्व देते हैं। वे उससे परे की चीजों, जैसे लोक में प्रचलित बातों, को रेखांकित भर ही करते हैं। संक्षेप में यह कि झाँसी के गौरवपूर्ण इतिहास के बारे में रुचि रखने वालों के लिए यह एक जरूरी पुस्तक है।



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समीक्षित पुस्तक: महारानी लक्ष्मीबाई एवं उनकी झाँसी
लेखक: ओम शंकर असर
संपादक: ए. के. पाण्डेय
प्रकाशन: राजकीय संग्रहालय, झाँसी

Sunday, September 30, 2007

प्रजातंत्र के पराभव की कहानी

समीक्षा



प्रजातंत्र के पराभव की कहानी

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रघुवंशमणि

हिंदी साहित्य में व्यंग लेखन की स्थिति पहले से ही बहुत अच्छी नहीं रही है। इसलिए यह क्षेत्र चुनौतियों से भरा रहा है और अक्सर व्यंग के नाम पर बेहद सतही चीजें ही सामने आती रही हैं। हिन्दी व्यंग लेखन को समृध्द करने वाले हरिशंकर परसाई और शरद जोशी के दिवंगत होने के बाद इस क्षेत्र में श्रीलाल शुक्ल निश्चित रूप से सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यंगकारों में से एक हैं। श्रीलाल शुक्ल के नाम राग दरबारी जैसा उपन्यास है जिसकी स्थिति व्यंग की उनकी अपनी भंगिमा के कारण हिन्दी उपन्यासों में बिल्कुल अलग रही है। राजकमल प्रकाशन ने हाल में उनके लेखों का एक संग्रह जहालत के पचास साल प्रकाशित किया है जिसमें शुक्ल जी के छोटे बड़े व्यंगों को इकठ्ठा छापा गया है। उनके द्वारा पिछले पचास सालों में लिखे गये इन लेखो को पढने का एक अलग ही आनन्द है। साथ ही हिन्दी के एक महत्वपूर्ण व्यंगकार के रचनात्मक विकास के विभिन्न पक्षों को देखने समझने का अवकाश भी यह संग्रह देता है। यह जरूर है कि श्रीलाल शुक्ल के पुराने पाठकों को इसमें प्रकाशित बहुत सी रचनाएँ पूर्व परिचित ही लगेंगी। अंगद के पाँव, यहाँ से वहाँ, उमराव नगर में कुछ दिन, कुछ जमीन की कुछ हवा में, आओ बैठें कुछ देर जैसी चर्चित और पठित रचनाओं के पाछकों के लिए जहालत के पचास साल व्यंगकार श्रीलाल शुक्ल का कलेक्टेड वर्क जैसा होगाा। इस अर्थ में इसका प्रकाशन वास्तव में एक घटना है।

जहालत के पचास साल के व्यंग काफी व्यापक जमीन रखते हैं। वे वाकई पिछले पचास सालों के बारे में काफी कुछ कह जाते हैं। बातें टुकड़ों में अवश्य आती हैं क्योंकि व्यंगों की साइज आम तौर पर छोटी हैं लेकिन दुकड़ों 2 में ही देश के पिछले पचास साले का अच्छा खासा लेख जोखा है। भ्रष्टाचार और कुशिक्षा अधिकतर व्यंगों के मूल में है। नौकरशाही से पूरी तरह परिचित और उसी में जीवन गुजारने वाले शुक्ल जी का यह प्रिय विषय है। जाहिर है कि इस संग्रह में ऐसे व्यंग बहुतायत में हैं जिनका नौकरशाही से किसी न किसी प्रकार लेना देना है। राजनीति तो ऐसी चीज हो गयी है कि उसपर कलम चलाए बिना किसी भी व्यंगकार को मुक्ति नहीं। श्रीलाल शुक्ल किसी राजनीतिक प्रतिबध्दता से जुड़े रचनाकार नहीं हैं मगर सामाजिक यथार्थ से वे बचने का प्रयास कतई नहीं करते। वे वस्तुस्थितियों में भ्रष्टाचार जैसी विसंगतियों की खोज करने वाले लेखक हैं, अपनी सारी विनोदप्रियता और मस्ती के बाद भी वे हिन्दी समाज के इस बुरे पक्ष को प्रस्तुत करने से बच नहीं पाते। ये विसंगतियॉ अंतत: सामान्य आदमी को ही अपना शिकार बनाती हैं। जहालत के पचास साल भारतीय प्रजातंत्र के पिछले पचास सालों की पतनगाथा है।

ऐसा लगता है कि श्रीलाल शुक्ल इस बात का ध्यान रखते हैं कि रचना में वैचारिकता का बोझ न आने पाये, मगर अपनी सामाजिक चेतना के चलते वे विचारात्मकता को अपनी रचनाओं मेें स्थान देते हैं। वे स्वयं ऐसा मानते रहे हैं कि उनकी प्रारंभिक रचनाओं में सामग्री ऐसी थी जिससे किसी का बहुत नफा नुकसान नहीं होना था। मगर बाद की रचनाओं में व्यंग पर सान प्रखर वैचारिकता ही चढ़ा सकी है। जहालत के पचास साल की रचनाएँ इस ओर संकेत करती हैं कि श्रीलाल शुक्ल के व्यंग लेखन का रास्ता एक यात्रा की तरह है जिसमें विभिन्न पड़ाव हैं। इन पड़ावों को कोई भी सूक्ष्मपाठ रेखांकित कर सकता है। शुरू के व्यंगों का हार्स लाफ्टर बाद में गंभीर होता गया है और उमरावनगर में कुछ दिन तक पहुँचते पहुँचते रचना में एक गहरा अनुशासन झलकने लगता है। इस प्रकार दृष्ठि और शैली दोनों के फर्क लेखक के विकास की दिशा को संकेतित करते हैं

श्रीलाल शुक्ल के काफी व्यंग ऐसे हैं जिनमें विषयवस्तु साहित्य है और साहित्य में भी खासकर कविता। यह कविता का एक व्यंग लेखक द्वारा किया गया पाठ है। यदि यह कविता का उत्तरपाठ है तो इसे हास्योत्तरपाठ कहना बेहतर होगा। आधुनिक कविता का भक्तिकाल, धुड़सरी का काव्यपाठ, साहित्योद्यानसुमनगुच्छा आदि कविता की संस्कृति की बखिया उधेड़ते हैं। निराला के बहाने साहित्य चर्चा में उनका निशाना साहित्य की सत्तावादी संस्कृति है जिसका शिकार स्वयं निराला का साहित्य हो गया है। साहित्यिक सन्दर्भ श्रीलाल जी के यहाँ भरे पड़े हैं और वे उन्हे जमकर व्यंग और हास्य के स्त्रोत के रूप में करते हैं। 'स्वर्णग्रंाम और वर्षा','बया और बन्दर की कहानी','कालिदास का संक्षिप्त इतिहास' जैसे व्यंग यह बतातें हैं कि साहित्य को व्यंग के प्रहारो ंसे नहीं बचाया जा सकता क्योंकि विसंगतियाँ बहॉ कुछ कम नहीं। लेकिन यह सब उनके साहित्य के गंभीर पाठक होने के अगंभीर लगने वाले प्रमाण हैं।

व्यंग एक ऐसी चीज है जो विधाओं की सीमा को अतिक्रांत करती है यद्यपि यह एक सच है कि व्यंग अपने में गद्य की एक विधा भी है, यह उपन्यास, कहानी, कविता, नाटक आदि विधाओं में स्वतंत्रतापूर्वक विचरण करती रहती है। श्रीलाल शुक्ल का लेखन भी इसका अपवाद नहीं। लेकिन उनके किसी भी सुधी पाठक के लिए वे मुख्यत: गल्प विधा के ही दायरे में व्यंग लिखने वाले लेखक हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण तो राग दरबारी ही होगा मगर जहालत के पचास साल में भी प्रमुखता इसी प्रकार के व्यंगों की है। उनके कुछ व्यंग जरूर शोध पत्र से लेकर आलोचना और समीक्षा तक की शैली में लिखे गये हैं। तथापि इस पुस्तक में संकलित तमाम व्यंग कहानी पढने जैसा आनन्द देते हैं। 'द ग्रैंड मोटर डाइविंग स्कूल', 'अंगद के पाँव','कुत्ते और कुत्ते',और 'धोखा' जैसे व्यंगों का पाठानन्द कहानी जैसा ही है। उमरावनगर में कुछ दिन तो लगभग उपन्यासिका जैसी चीज है। 'अंगद के पाँव' जैसी रचना में लोगों की प्रतिक्षण की मानसिकता को श्रीलाल शुक्ल किसी मनोवैज्ञानिक लेखक की तरह उकेरते जाते हैं।

श्रीलाल शुक्ल के व्यंगों में अक्सर हास्य के तत्व अधिक प्रबल हो जाते हैं। हास्य और व्यंग का मिश्रण तो सामान्य बात है और अक्सर इनमे फर्क कर पाना भी बहुत सरल नहीं होता। दोनों के लक्ष्य भी लगभग एक जैसे होते हैं। हास्य का पुट रचना को ज्यादा स्वीकृति योग्य बनाता है और लेखक के विरोधियों तक के लिए वह पठनीय हो जाती है। ऐसे में मनोरंजन के चलते जनसामान्य तक के लिए शुक्ल जी के निबन्ध अधिक ग्राह्य होजाते हैं। मगर इससे कहीं कहीं लेखन में गंभीरता की क्षति भी होती है। यही कारण है कि परसाई जैसे लेखक की ऊॅंचाई बनी रहती है। श्रीलाल शुक्ल में हर जगह ऐसा भी नहीं, वे गंभीर भी हैं जैसे अपने 'पंडित, ठाकुर, लाला, बाबू, मुशी आदि' जैसे व्यंग में, मगर इधर के हिन्दी व्यंगकारों को पढ़ते समय एक कमी सी महसूस होती है जिसका नाम हरिशंकर परसाई है।

लेकिन ऐसा नहीं है कि व्यंग की धार नहीं बनी है। वह लगातार बनी रहती है और समाज की विसंगतियों पर लगाातार प्रहार करती रहती है। पिछले पचास वर्षें के भारतीय समाज की विसंगतियों की पूरी खोज खबर लेने वाले व्यंग, मूल्यों के लिए ही एक सीधा संघर्ष हैं। 'दि ग्रैंड मोटर ड्राइविंग स्कूल' जैसी रचना का निरंतर हास्य, अंत में निहायत ही राजनीतिक हो जाता है जिसमें उस्ताद ट्रेनर कार के बोनट पर झुककर एक झटकू व्याख्यान दे डालते है कि हर जगह गलत आदमी है तो फिर उनके गलत होने पर आपत्ति क्यों? वाकई यथार्थ भी तो यही है। यह व्यंग यथार्थ का अन्वेषण कहाँ तक, किस तरह और कितने प्रभावी ढंग से कर पाता है, यही महत्वपूर्ण है। कहीं कहीं व्यंग की धार जोनाथन स्विफ्ट जैसे व्यंगकारों की याद दिला देती है। अगली शताब्दि का शहर का आफिसर अध्यक्ष रिहाइशी कालोनी में सुअरों की अनिवार्यता पर टिप्पणी करते हुए कहता है कि रिटायरमेंट के बाद वे कालोनी में रहेंगे तो सुअरों की कमी पूरी हो जायेगी।

हास्य व्यंग की एक शैली के रूप में श्रीलाल शुक्ल कैरीकेचरिंग का इस्तेमाल करते हैं। वे पात्रों को विरुपित करते हैं और उनके अवगुणों को प्रस्तुत करने के लिए उन्हें इसी तरह सामने करते हैं। वे चीजों को कुछ इसतरह बढ़ा चढ़ा कर प्रस्तुत करते हैं कि पाठकों के समक्ष विद्रूप स्पष्ट हो जाते हैं। यह एक तरह से वास्तविकता का यथातथ्य चित्रण नहीं है अपितु उसे अपनी अवस्थिति से प्रस्तुत करना है। श्रीलाल शुक्ल के लेखन की एक विशेषता या गड़बडी यह होगी कि वे वस्तुस्थ्िति को इस परिहासप्रियता के साथ प्रस्तुत करते हैं कि साहित्य की आलोचनात्मक रूढ़ियों से परे वे समाज के पात्रों के साथ खडे होकर वर्चस्वी व्यवस्था की आलोचना करनें का प्रयास करते लगते हैं। इस कार्य में अक्सर उनकी परिहासप्रियता उन्हें इनसाइडर जैसा बनाये रखती है। परिणामत: पाठकों में व्यवस्था के प्रति विरक्ति के स्थान पर आनन्दभाव आ जाता है। मगर यदि पाठक विचारशील है तो वह हँसने के बाद सोचेगाा कि वह किस बात पर हंस रहा है। संभव है कि वह ऐसा न भी करे।

जहालत के पचास साल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें संकलित व्यंगों को यदि एक तरफ से पढ़ा जाय तो हमें गुजरे पचास सालों की कुछ छायाएँ दिखाई देंगी। ये छायाएँ बीते हुए समय से इन व्यंगों में उतरती हैं। व्यंग लेखन वैसे भी ऐकांतिक नहीं होते मगर श्रीलाल के इन व्यंगों में इतिहास के निशान सीधे मिल जाते हैं। चन्द ख़तूत-जो हसीनों के नही हैं में सलमान रुश्दी के सैटनिक वर्सेज का हवाला आता है तो होरी और उन्नीस सौ चौरासी में जार्ज ऑरवेल के उपन्यास का जिक्र है जिसकी चर्चा 1984 में बड़े पैमाने पर हुई थी। लकीर का साँप में फैजाबाद के सहमत प्रदशर्नी का हवाला है जिसमें धर्मिक कट्टरतावादियों नें प्रदर्शनी पर हल्ला बोल दिया था। राजीव गााँधी, हर्षद मेहता, मंदिर आन्दोलन की सब्जी पूड़ी आदि का जिक्र श्री लाल शुक्ल के व्यंगों को समय की पृष्ठभूमि प्रदान करता है।


श्रीलाल शुक्ल की भाषा को लेकर काफी चर्चा होती रही है, विशेषकर उनके उपन्यास राग दरबारी की भाषा को लेकर। उनके वाक्य अक्सर सीधी गति में न चलकर सर्पीले रास्ते अख्तियार करते हैं। मगर कहीं सादगी भी पाठकों को लुभा जाती है। कहीं कहीं तो पूरी नाटकीयता वाक्य संरचना में ही दिखती है जिसकी तिर्यकता पाठकों को प्रभावित करती है। भाषा का प्रवाह कई जगह गल्पकारों जैसा सफल है और यह व्यंग की पठनीयता का प्रमुख कारण है। अलग अलग व्यंगों में भाषा का वैभिन्य होते हुए भी यहाँ अभिव्यक्ति का चुटीलापन प्रभावोत्पादक है। यह हिन्दी के उस पुष्ट गद्य का उदाहरण है जिसमें प्रयोगधर्मिता की कोई कमी नहीं। यह निहायत ही आश्चर्यजनक है कि इस पुस्तक में वर्तनी की बहुत सी अशुध्दियाँ रह गयी हैं। आखिर एक व्यंगकार की कुति में इतनी विडंबना के लिए स्थान बचना ही चाहिए वगर्ना बाकी लिखे पढ़े से फर्क ही कैसा?


आज के दौर में व्यंग लेखन एक बहुत बड़ी चुनौती है क्योंकि परिस्थितियाँ कुछ ऐसी हो गयीं हैं कि व्यंग का प्रभाव कम होता जा रहा है। समाज में वास्तविक परिस्थितियाँ ही इतनी विडंबनापूर्ण हो गयी हैं कि व्यंग की धार को बनाये रखना बहुत कठिन होता जा रहा है। बार बार यह बात दिमाग में आती है कि अब नये शस्त्रों की जरूरत है। मगर यदि सामाजिक परिथितियाँ ही ऐसी हैं तो उसके लिए व्यंगकार को कितना जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। श्रीलाल शुक्ल के पिछले पचास सालों के दौरान लिखे गये ये व्यंग इसी ओर संकेत करते हैं कि समाज में जो सुधार होने चाहिए थे, वे नहीं हो पाये हैं। यह हमारे प्रजातंत्र का पराभव है, हमारे लेखक का नहीं।





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समीक्षित कृति: जहालत के पचास साल
रचनाकार: श्रीलाल शुक्ल
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन
मूल्य: 395 रूपये मात्र
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