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Monday, November 09, 2015

                          भारत और नेपाल के संबंध 

कल NDTV को दिए गए एक साक्षात्कार में अरुण शौरी ने यह खुलासा किया कि भारत नेपाल में मधेशियों के मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र संघ में ले गया है. उन्होंने यह भी कहा कि इससे भारत और नेपाल के बीच के सम्बन्ध ख़राब हो सकते हैं. देखा जाय तो यह कूटनीतिक दृष्टि से सही फैसला नहीं है क्योंकि नेपाल से बातचीत का रास्ता ही बेहतर था. प्रचंड और नेपाल के अन्य नेता बातचीत के लिए तैयार ही थे. अब यदि नेपाल चीन की  ओर उन्मुख होगा तो कोई विकल्प नहीं बचेगा. सुनायी दे रहा है कि चीन अब नेपाल कि मदद करने को तैयार है और नेपाल के लिए रास्ता मांग रहा है. यदि ऐसा होता है तो नेपाल से जुड़े क्षेत्र खतरे कि छाया में आ जायेंगे. दोनों देशों के बीच के तनाव को दूर करने के राजनीतिक प्रयास तुरंत प्रारंभ किये जाने चाहिए.

Friday, October 26, 2012

                          अपनी साझी संस्कृति को बचाइये





                                                                                                             रघुवंशमणि




फैज़ाबाद में दुर्गापूजा के अन्तिम चरण में जिस प्रकार की शर्मशार करने वाली घटनाएॅं घटी हैं, वे निहायत ही गंभीर हैं। दो समुदाय आपस में टकराये, मारपीट की, और दुकानंे जलायी गयीं। जैसा कि अक्सर होता है इन घटनाओं के बाद लोग एक दूसरे पर आरोप लगाएॅंगे और सारा माहौल तनावपूर्ण हो जायेगा। कुछ लोग इसमें साम्प्रदायिक हिसाब-किताब लगायेंगे और अपना उल्लू सीधा करेंगे। फिर राजनीतिक बगुले अपना कूटनीतिक ध्यान साधेंगे। लेकिन यह एक सच है कि फैज़ाबाद जैसे साम्प्रदायिक सौहार्द वाले शहर में ये घटनाएॅं बेहद दुर्भाग्यपूर्ण हैं। हमारी धर्मसमभाव और धार्मिक सहिष्णुता की संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में इस प्रकार की घटनाएॅं बेहद चिन्ता का विषय हैं।



धार्मिक त्यौहारों के ये अवसर अक्सर कुछ लापरवाही और नासमझदारी के कारण तनाव के मौकों में बदल जाते हैं। धार्मिक लोगों में इधर सहिष्णुता घटती ही जा रही है, वे किसी भी धर्म के हो सकते हैं। अब वे बिना सोचे-समझे नाराज होते हैं और उन्माद की ओर चले जाते हैं। इसलिए कुछ ऐसी जरूरी बातें जरूर हैं जिन पर ध्यान देने की आवश्यकता है।



सबसे जरूरी बात यह है कि हम एक दूसरे के धर्म का सम्मान करें और ऐसी कोई बात न करें जिनके कारण दूसरे समुदाय के लोगों को कष्ट पहुॅंचे। उदाहरण के लिए दुर्गा पूजा के पाण्डालों में अक्सर ऐसे गीत बजाये जाते हैं जो बेहद साम्प्रदायिक और दूसरों को कष्ट पहुॅंचाने वाले हैं। इन दिनों पूरी दुर्गापूजा के दौरान राम का मंदिर बनाने के संकल्प वाला गीत लोग बजाते रहे। जाहिर है कि इससे मुस्लिम धर्म मानने वाले लोगों को कष्ट पहुॅंचना ही था। जो बात विवादित है और उच्चतम न्यायालय की विषयवस्तु है, उसे लेकर गीत बजाना जरूरी नहीं। फिर एक गाना यह भी बज रहा था कि ‘जिस हिन्दू का खून न खौले’। इस तरह के गीतों को बजाना बहुत उचित नहीं है। कारण यह कि किसी धार्मिक त्यौहार में किसी राजनीतिक दल का एजेण्डा आगे बढ़ाना धर्म को संकीर्ण करना है। कहना तो यह चाहिए कि यह धर्म का अपमान है। खासतौर पर हिन्दूधर्म का जो अपने को उदार और सहिष्णु कहता है। वास्तव में यह एक तरह का परपीड़न है जिसे धर्म की श्रेणी में रखा ही नहीं जा सकता। गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा भी हैः



‘परहित सरिस धर्म नहि भाई। परपीडा सम नहिं अधमाई।।’



इस तरह के गीतों के बजने और राजनीतिक एजेण्डे के सामने लाये जाने का कारण यह है कि दुर्गापूजा समितियों पर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का प्रभुत्व है। वे अपने राजनीतिक कार्यक्रमों के एक अंग के तहत दुर्गापूजा का भी आयोजन करते हैं। दुर्गापूजा इस अर्थ में उनके लिए सिर्फ एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं है। मगर उन्हें भी कम से कम इस बात का तो ध्यान रखना चाहिए कि किस तरह की बातों से शान्ति भंग हो सकती और तनाव पैदा हो सकता है।



लेकिन सबसे बड़ी आपत्तिजनक बात यह है कि प्रशासन इन सभी मामलों में महज एक मूकदर्शक बना रहता है। न तो वह शोर-शराबे पर नियंत्रण करता है और न ही अन्य लंपटतापूर्ण व्यवहारों पर जो कि दुर्गापूजा के दौरान आम हो जाते हैं। पुलिस की उपस्थिति भी ऐसे मौकों पर लगभग शून्य रहती है। जबकि ऐसे मौकों पर उन्हें अधिक दिखायी देना चाहिए। प्रशासन की उपस्थिति के अहसास से भी बहुत सी अनहोनी घटनाएॅं नहीं हो पाती हैं। प्रशासन की इस अनुपस्थिति का फायदा शरारती और गैरसामाजिक तत्व उठाते हैं।



फिलहाल अभी आगे बहुत से त्यौहार हैं। विजयदशमी और बकरीद है। इसलिए प्रशासन, धार्मिक लोगों और प्रबुद्धजनों को अपनी महत्वपूर्ण सामाजिक और सांस्कृतिक भूमिकाओं में तत्पर हो जाना चाहिए। फैज़ाबाद शहर अपनी सांस्कृतिक सहिष्णुता के लिए जाना जाता है। इस संस्कृति का उदाहरण दूर-दूर तक दिया जाता है। इस आदर्श संस्कृति पर कोई आॅंच नहीं आनी चाहिए। यह फैजाबाद के प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है।

Tuesday, October 16, 2012

जीवन शैली की तलाश



एक ऐसी जीवन शैली की तलाश होनी चाहिए जो बहुत सरल, सहज और आर्थिक रूप से सस्ती हो. यह जीवन शैली होगी, धर्म नहीं. यानि उसमे सुविधानुसार परिवर्तन किया जा सके. वह रूढ़, कट्टर नहीं होनी चाहिए. यह प्रकृति से कन्धा मिलाकर चले. सबसे बड़ी बात यह संभव होनी चाहिए.


जीवन के सभी रूपों में आइये इसकी तलाश करें.



रघुवंशमणि

Tuesday, October 18, 2011

फैज़ाबाद में इप्टा की इकार्इ का पुनर्गठन

फैज़ाबाद में इप्टा की इकार्इ का पुनर्गठन





फैज़ाबाद। 16 अक्टूबर। नाटक, गीत और लेखन स्वभावत: सामूहिक गतिविधियां हैं। सृजन की ये यात्राएं 'मैं से 'हम की तरफ जाती हैं। इप्टा का अर्थ जनता से जुड़ना और जनता को जोड़ना है। बाजारवाद से लेकर साम्प्रदायिकता तक के विरुद्ध प्रतिरोध को इसी प्रकार विकसित किया जा सकता है।



ये उदगार भारतीय जन नाटय संघ इप्टा के प्रान्तीय सचिव राकेश जी ने स्थानीय तरंग सभागार में इप्टा की औपचारिक स्थापना के लिए आयोजित कार्यक्रम में व्यक्त किये। वे इस कार्यक्रम के मुख्य वक्ता और मुख्य अतिथि थे। उन्होंने यह भी कहा कि इप्टा को ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर भी अपने कार्यक्रम करने चाहिए।अपनी सांस्कृतिक विरासत के साथ आगे बढ़ते हुए नयी पीढ़ी को अपने साथ जोड़ना चाहिए। कलाकारों और संस्कृतिकर्मियों के लिए यह जरूरी है कि वे जनता से जुड़ी नैतिकता एवं जीवनमूल्यों को अर्जित करें ताकि इस प्रकार वे अपने संस्कृतिकर्म के द्वारा जनता के हृदय को छू सकें। उन्होंने कहा कि फैज़ाबाद की सांस्कृतिक जमीन जनजागरण के लिए जरखे़ज है।



इससे पहले डा. रघुवंश मणि ने फैज़ाबाद में इप्टा के पिछले कार्यो को याद किया और नाटकों के सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित किया। साहित्यकार आर. डी. आनन्द ने अपने वक्तव्य में आज के समय को समस्याग्रस्त और कठिन बताते हुए संस्कृतिकर्म के जोखिम और उत्तरदायित्वों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज की परिसिथतियां इप्टा के प्रारमिभक दौर के समय की अपेक्षा अधिक कठिन और दुरूह हैं। ऐसे में संस्कृतिकर्म की भूमिका ज्यादा बड़ी है।



गोरखपुर से पधारे इप्टा पर्यवेक्षक शहजाद रिजवी ने यह आशा व्यक्त की कि फैजाबाद की इप्टा इकार्इ भविष्य में मजबूत होगी और अपनी अलग पहचान बनाएगी।



कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे अतुल सिंह ने इप्टा के बीते दिनों को याद किया और कहा कि इप्टा का मतलब समाज की विकृतियों को सामने लाना है ताकि उन्हें समाज से उन्मूलित किया जा सके। उन्होंने कहा कि गीत और नाटकों का किताबों या भाषणों की तुलना में सीधा प्रभाव पड़ता है।



कार्यक्रम के दूसरे चरण में आराधना दूबे द्वारा लिखित और निर्देशित नाटक दहेज का मंचन हुआ जिसमें आराधना दूबे, आरती वर्मा , अनीता वर्मा, पूनम वर्मा, रेनू वर्मा, सुमन निषाद, अंतिमा शर्मा, इजा अग्रहरि, पूजा अग्रहरि, सोनी यादव, सीमा यादव, नीरज कनौजिया, अंजनीराम और शालिनी तिवारी ने भाग लिया। प्रेम सागर, सुरेश तिवारी एवं बद्री प्रसाद विश्वकर्मा ने जनगीत प्रस्तुत किये।

Wednesday, August 17, 2011

''आरक्षण के बारे में

''आरक्षण के बारे में

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''आरक्षण फिल्म के आरक्षण के बारे में कम भारत की शिक्षा व्यवस्था के बारे में अधिक है। इस फिल्म को देखने के बाद ही प्रदेश सरकारों का भ्रम दूर हुआ होगा। बौद्धिक हलकों में चल रही बहसों पर अब पटाक्षेप हो जाना चाहिए क्योंकि यह फिल्म आरक्षण के विरुद्ध तो कतर्इ नहीं। फिल्म का प्रारम्भ अवश्य मण्डल कमीशन के मामले से होता है मगर जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, मुददा बदलता जाता है। फिल्म के केन्द्र में आ जाता है शिक्षा का व्यवसायीकरण। फिल्म इस मुददे पर कुछ विकल्प भी सुझाती है। मुझे ये विकल्प तो लचर टार्इप के लगे। उपचारात्मक शिक्षा ही रामबाण नहीं है। वास्तव में शिक्षा को लेकर सरकार के दृषिटकोण को ही बदलना होगा और यह मामूली बात नहीं।



फिलहाल यह फिल्म किसी भी विषय पर हो, इसे प्रतिबंधित किया जाना तो बिल्कुल ही गलत था। शायद सरकारें दंगाइयों और उनकी राजनीति से इतना घबराती है कि वे पहले किताबों, फिल्मों पर रोक लगाती है। पढ़ती, देखती या सोचती बाद में है। वास्तव में उन्हें ये कार्य पहले करने चाहिए। इस पूरे प्रकरण में फायदा तो फिल्म का ही हुआ। मुफत के प्रचार से बेहतर लाभ किसी फिल्म को क्या हो सकता है? लेकिन प्रकाश झा को कम से कम इस बात के लिए बधार्इ दी जानी चाहिए कि उन्होंने शिक्षा व्यवस्था पर एक विचारोत्तेजक बम्बर्इया फिल्म बनायी है।

Thursday, June 09, 2011

शस्त्र, शास्त्र और गाॅधीवाद

रघुवंशमणि



योगगुरु बाबा रामदेव कुछ दिनों पूर्व तक बेहद सफल व्यक्तित्व नज़र आ रहे थे। उन्होंने योगाभ्यास और आयुर्वेदिक स्वास्थ औषधियों की शानदार व्यवसायिक पैकेजिंग की थी और पूरी दुनियाॅं में अपनी सफलता के झंडे गाड़ दिये थे। फिर उन्होंने पूरे देश में यात्रा करके बाकायदा अपनी भारतीय स्वाभिमान पार्टी के लिए पृष्ठभूमि भी तैयार कर ली थी। दिल्ली में अनशन के अभियान के समय तो ऐसा लगा कि सरकार उनके सामने झुक गयी है। मगर उसके बाद की राजनीतिक गतिविधियों के दौरान बाबा रामदेव विचलित नज़र आये और उनके वक्तव्यों से यह जाहिर होने लगा कि योगाभ्यास के दौरान योगासनों पर उनका कितना भी अभ्यास क्यों न रहा हो, राजनीति के आसन पर वे अभी ठीक से बैठने का अभ्यास नहीं कर पाये हैं।

कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली दिल्ली की सत्ता ने पूलिसिया बल प्रयोग के द्वारा जब उन्हें रामलीला मैदान से हटाया तो मीडिया ने बाबा को जबर्दस्त एक्सपोजर दिया। अन्ना हजारे ने अपने पुराने सहयोगी के समर्थन में और पुलिसिया गतिविधि के विरोध में गाॅंधी जी की समाधि पर आठ घंटे का अनशन रखा। आर. एस. एस. और बी.ज.ेपी. को तो स्वामी जी का समर्थन करना ही था। पूरे देश में बुद्धिजीवियों ने भी रामदेव के साथ हुई इस घटना की भूरि-भूरि निन्दा की। यह सब बाबा के समर्थन में ही हुआ। यहाॅं तक कि साम्यवादी दलों के समर्थकों ने भी बाबा का समर्थन न करते हुए भी इस घटना की निन्दा की और सरकार को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया। इस प्रकार बाबा को मिलने वाला यह बड़ा समर्थन था।

मगर बाबा रामदेव ने हरिद्वार पहुॅंचने के बाद जिस प्रकार के वक्तव्य दिये वे किसी राजनीतिक नेता के लिए बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं कहे जायेंगे। उनकी स्थिति स्व. टिकैत या योगी आदित्यनाथ से बेहतर नहीं थी जो मौके-मौके पर कैमरे के सामने रोते रहे हैं। किसी भी नेता के पीछे चलने वाली जनता अपने नेताओं के आॅंसुओं से भावुक तो हो सकती है, मगर वास्तव में वह अपने नेताओं को विपरीत परिस्थितियों में भी मजबूत और दृढ़ देखना चाहती है। बाबा रामदेव का यह कहना कि सरकार उनकी हत्या कराना चाहती है, किसी के भी गले से नीचे उतरने वाली बात नहीं थी क्योंकि यदि सरकार उन्हें मारना-मरवाना चाहती तो उसके पास काफी वक्त था। फिर बाबा का यह कहना कि उनके 5000 कार्यकत्र्ता गायब हैं, निहायत ही अविश्वसनीय बात थी।

लेकिन सबसे राजनीतिक गैरसमझदारी से भरी बात उन्होंने तब कही जब उन्होंने अपने शिष्यों से शास्त्र सीखने के साथ शस्त्र उठाने की भी बात कही। अभी चार दिन पहले तक गाॅंधीवादी तरीके से अहिंसक आन्दोलन और अनशन करने वाले बाबा रामदेव का क्या अपने सिद्धान्तों से इतनी जल्दी मोहभंग हो गया? गाॅंधी जी ने अपने लगभग तीन दशकों की अहिंसात्मक लड़ाई में बहुत बार गिरफतारियाॅं दीं, उनके समर्थक मारे पीटे गये, जेल में ठूॅंसे गये, मगर उन्होंने कभी भी अपनी अहिंसा की राजनीति पर अविश्वास नहीं व्यक्त किया। उन्होंने अपने अहिंसात्मक संघर्ष के तरीके पर केवल एक बार अविश्वास जाहिर किया था। वह समय था साम्प्रदायिक दंगों के उभरने का, जब बिहार और बंगाल खून से रंग गये थे। मगर यह उनके लिए अपनों से पराजित होने जैसी स्थिति थी। किसी राजनीतिक सत्ता के अत्याचार के सामने तो वे अपने अहिंसात्मक शस्त्र के साथ हमेशा डट कर खड़े रहे।

मगर बाबा रामदेव के समक्ष गाॅंधी जी जैसी कोई स्थिति नहीं थी। दिल्ली के रामलीला मैदान की घटना की निन्दा तो सभी ने की, मगर उन्हें जलियाॅंवाला बाग की घटनाओं के समान कहना अतिरेकपूर्ण ही होगा। तो फिर ऐसा क्या हुआ कि बाबा पूरी तरह से विचलित हो गये और अहिंसा से हिंसा के रास्तेे पर उतर आये? वे हर जिले से आने वाले 20 स्वयंसेवकों को लाठी ही नहीं जूडो-कराटे भी सिखाने का संकल्प ले रहे हैं। यह उनके जैसे स्थपित व्यक्तित्व के लिए उचित नहीं और उनके राजनीतिक कच्चेपन का सबूत है। भारत का संविधान और उसकी मुख्यमार्गी राजनीति पार्टियाॅं परोक्षरूप से भले ही हिंसा का इस्तेमाल कर ले, वे इस प्रकार खुलेआम हिंसा का समर्थन नहीं करती।

बाबा रामदेव के इस प्रकार के वक्तव्यों से उन पर लगने वाले कांग्रेसी आरोपों की ही पुष्टि होती है कि वे दिल्ली में गड़बड़ी फैलाना चाहते थे। इससे यह भी प्रमाणित किया जायेगा कि वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तरह की ही राजनीति कर रहे हैं।

आज के दौर में अहिंसा की राजनीति करना आसान काम नहीं। यह एक दुधारी तलवार पर चलने जैसा काम है। इसके लिए सिर्फ मीडिया का समर्थन काफी नहीं होता। गाॅंधी स्वयं दृढ़प्रतिज्ञ थे और सत्याग्रह को चलाने की बुद्धिमत्ता भी उनमें कूट कूटकर भरी हुई थी। ये सभी बातें फिलहाल तो बाबा रामदेव में नहीं हैं।

Monday, October 25, 2010

दिगंबरी योग

डायरी

दिगंबरी योग

सारा ज्या अण्डरवुड का नाम हिन्दुस्तान में किसे मालूम था! न तो वह कोई जानी-मानी नेत्री थी न अभिनेत्री। मगर राष्ट्ीय स्वयं सेवक संघ जैसी संस्थाओं की सत्ता ऐसी व्यापक कि जिसे चाहें रातों-रात स्टार बना दें। सारा के दिगंबरी योग के बाद उनका जो विरोध हुआ तो फिर उसकी वीडियो क्लिप के चक्कर में हिन्दुस्तान का बिगड़ैल युवा वर्ग पागल हो गया। उसे देखने के लिए लोग पूरा नेट छान मार रहे हैं और प्लेब्वाय की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है। एक जिम्मेदार सज्जन को तो यहाॅं तक कहना पड़ा कि योगासनों का धर्म से कुछ लेना देना नहीं। अब इसका धर्म से कुछ लेना देना हो या न हो, वार तो उल्टा गया। सारा की लोकप्रियता ही बढ़ी और दिगंबरी योग के विरोध में कोई बड़ी वारदात नहीं हो सकी। जो लोग कुछ विरोध कर भी रहे थे, मन में उनके उत्सुकता उस वीडियो को ठीक तरह से देख लेने की थी। वाइज की बातें कौन मानता है और फिर हर बात का जवाब हिंसक वक्तव्य तो नहीं होते। इस बात को अब तो समझ ही लेना चाहिए। चित्तवृत्ति पर नियंत्रण की जरूरत दक्षिणपंथियों को ज्यादा है। वे चाहें तो एक आॅंख झपकाने वाले योग गुरु रामदेव जी की शरण में जाॅंय, चाहे दिगंबरी सारा के। उत्सुकता यह है कि ज्यादातर लोग किसकी ओर जाना पसंद करेंगे?

Sunday, July 25, 2010

क्या कबीर वर्णव्यवस्था के समर्थक थे??

डायरी

क्या कबीर वर्णव्यवस्था के समर्थक थे??

१८. ७. २१

फैज़ाबाद में मेरे आवास पर हुई चर्चा के दौरान डा वागीश शुक्ल ने कबीर को वर्णव्यवस्था समर्थक का सिद्ध करने के लिए कबीर की ही साखी प्रस्तुत की।

॑॑ सकल बरण एकत्र् ह`वै सकति पूजि मिलि खांहि।
हरिदर्शन की भ्रान्ति करि केवल जमपुर जॉंहि।। ॔॔

कबीर की यह साखी अपेक्षाकृत कम प्रचलित है, इसलिए मेरे सहित वहॉं उपस्थित हिन्दी युवा कवि विशाल श्रीवास्तव, संस्कृत विद्वान महेश मिश्र, वरिठ कवि स्वप्निल श्रीवास्तव और उर्दू साहित्य की विदुषी बुशरा खातून ने उनकी बात को बिना किसी प्रतिरोध के स्वीकार कर लिया। लेकिन बाद में इस साखी का अर्थ देखने पर पता चला कि इसका वर्णव्यवस्था से कोई मतलब ही नहीं है। वास्तव में इस साखी का अर्थ तो निम्नवत` है

"॑॑ समस्त वर्ण् के लोग शक्तिपूजा के नाम पर इकठ`ठे होकर मॉंस भक्षण करते हैं, वे सिर्फ़ हरिभक्त होने की भ्रान्ति पैदा करते हैं। वे वास्तव में भक्त नहीं होते। वे केवल यमपुर की यात्रा करते हैं।॔॔

कबीर, ग्रंथावली, संपादक रामकिशोर शर्मा, लोकभारती, २६, पृ. २२३.

कबीर की इस साखी को शक्तिपूजा या मॉंस भक्षण के सन्दर्भ में तो प्रस्तुत किया जा सकता है, मगर वर्णव्यवस्था के समर्थन के लिए इसका इस्तेमाल बिलकुल गलत है। वास्तव में इस दोहे का वर्णव्यवस्था से कोई सम्बन्ध है ही नहीं। सवाल यह है कि दूसरों के संदेहों और अज्ञान का फायदा उठाकर उन्हें गलत जानकारी देने वाले डा वागीश शुक्ल जैसे विद्वानों का क्या किया जाय?? वे उन्हीं मध्यकालीन ब्राह`मणों के समान हैं जो वेद के नाम पर जनता को कुछ भी समझा दिया करते थे।

फिलहाल मेरा सवाल यह है कि क्या आपको लगता है कि कबीर वर्णव्यवस्था के समर्थक थे?? क्या आपको कबीर की कोई ऎसी प्रमाणिक पंक्ति याद आती है जिसमें वे वर्णव्यवस्था के समर्थक लगते हों?? आपके विचारों की प्रतीक्षा रहेगी।

Friday, February 12, 2010

बाल ठाकरे को अनायास मिली चुनौती

यह संभवत: इस समय विचार का विषय नहीं है कि शाहरुख खान की फिल्म
माई नेम इज खान
किस प्रकार की फिल्म है? कला की दृष्टि से वह ठीक ठाक है या नहीं? उसकी विषयवस्तु क्या है या उसका मैसेज कैसा है? फिल्म में विषय या कहानी के साथ निर्देशक का ट्रीटमेंन्ट कैसा है? यानि कि फिल्म कैसी है यह फिलहाल महत्वपूर्ण नहीं है। हो सकता है एक सप्ताह बाद ही यह फिल्म टिकट खिड़की पर दम तोड़ दे। होने को तो इसका उल्टा भी हो सकता है, मगर इस समय इस बात का कोई मतलब नहीं है। मतलब सिर्फ इस बात का है कि यह फिल्म रिलीज हो गयी है और इसे देखने के लिए लोग बड़ी तादाद में थियेटरों में पहुँचे हैं।

लोग शिवसेना की धमकियों के बाद भी सिनेमाघरों में पहुँच रहे हैं और यह प्रदर्शित कर रहे हैं कि वे बाल ठाकरे जैसे कट्टरपंथी नेताओं से अधिक महत्व अपने सिने स्टारों को देते हैं। वे फिल्म को देखने के प्रतीकात्मक प्रतिरोध का बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं। शायद सामान्य परिस्थितियों में इस फिल्म को इतनी अच्छी शुरुवात न मिलती। दिल्ली में तो सिनेमाघरों में कई दिनों की एडवांस बुकिंग चल रही है। फिल्मों के इस पराभव के दौर में जब किसी एक शो का हाउस फुल जाना मुश्किल हो जाता है, यह वाकई जबर्दस्त बात है।

बाल ठाकरे और शिवसेना को यह चुनौती अनायास ही मिल गयी है। शायद स्वयं शाहरुख ने भी यह न सोचा होगा कि एक सामान्य टिप्पणी पर शिवसेना इस प्रकार प्रतिक्रिया करेगी। बात सिर्फ इतनी सी रही होगी कि उन्हे अपनी खेल सम्बन्धी सामान्य सी टिप्पणी को वापस लेना अपमानजनक लगा होगा। लेकिन यह भी उनके पक्ष में महत्वपूर्ण है क्योंकि शिवसेना की धमकी के बाद फिल्म उद्योग में शाहरुख का खुला समर्थन नहीं किया गया। कलाकारों से लेकर वितरकों तक ने संभल-संभल कर टिप्पणियाँ कीं क्योंकि उन्हे तरह-तरह के व्यावसायिक डर सता रहे थे। अभिषेक बच्चन जैसे कलाकारों ने तो साफ कहा कि वे महज कलाकार हैं और वे इस पचड़े में नहीं पड़ना चाहते। निश्चितरुप से शाहरुख ने इन परिस्थितियों में कुछ अकेलापन जरूर महसूस किया होगा।

वैसे भी फिल्मी दुनिया में ठाकरे का आर्शिवाद चलता था। यह दादागीरी वाला आर्शीवचन हुआ करता था। फिल्मी दुनिया ने भी सरकार और सरकार राज जैसी फिल्में बना कर बाल ठाकरे को नायक का दर्जा देने में कोई कमीं नहीं रखी थी।

शाहरुख खान की इस प्रतिक्रिया को, जिसे बहादुरी कहना गलत न होगा, को हम बाल ठाकरे का अंत नहीं मान सकते। जनता की प्रतिक्रिया उन्हें गुड नाइट कहने जैसी भी नहीं है। बम्बई में ही उनके बहुत से समर्थक जरूर होंगे जो बदला लेने को उतावले होंगे। मगर इस घटना ने अनायास ही उनको एक बड़ी चुनौती दे दी है और जनता को एक प्रतीक नायक मिल गया है।

Monday, March 23, 2009

फ्रीडा

डायरी



फ्रीडा


'यह शव अभी भी साँस ले रहा है।'


फ्रीडा फिल्म के बारे में मुझे बहुत पहले हिन्दी कवि अनिल सिंह ने बताया था। उन्होने यह फिल्म किसी टीवी चैनल पर देखी थी और मुझसे इस फिल्म की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। मैं इस फिल्म को तत्काल नहीं देख पाया। मैने इसे बाद में एक डीवीडी पर देखा तो वाकई यह कमाल की फिल्म लगी। 2002 में बनी यह फिल्म वास्तव में फ्रीडा काहलो के जीवन पर बनी है जो एक मैक्सिकन अतियथार्थवादी चित्रकार थीं और जिनका वैवाहिक जीवन उथल-पुथल से भरा हुआ था। इस फिल्म में सलमा हाएक ने फ्रीडा की भूमिका निभायी है। फ्रीडा अपने युवा जीवन में एक दुर्घटना का शिकार हो जाती है और जीवनभर शारीरिक रूप से निढाल रहती है। अपने दर्द और दुखों को वह अपने चित्रों में बहुत ही मौलिक तरीके से अभिव्यक्त करती है।

युवा फ्रिदा के जीवन में हुई सड़क दुर्घटना उसे निराशा में डुबो देती है। मगर उसके पिता उसे एक कैनवस लाकर देते हैं जिस पर वह चित्र बनाना प्रारम्भ करती है। फिर वह चलना शुरू कर देती है। फ्रिदा का विवाह डीयागो नाम के एक ऐसे पेन्टर से हो जाता है जो वामपंथी है, उन्मुक्त जीवन का आदी है, गैरसमझौतावादी है और फ्रिदा की कला का प्रशंसक है। उसके तमाम स्त्रियों से चले सम्बंधों का फ्रीडा के जीवन पर असर पड़ता है। वह भी प्रेम की तलाश में निकलती है और स्त्रियो तथा पुरुषों से उसके सम्बंध बनते हैं। डीयागो उसे तलाक भी दे देता है। पर बाद में वे पुन: मिलते हैं।

फ्रीडा की जिजीविषा को, उसकी प्रेम की तलाश को यह फिल्म बिना किसी अतिरंजिता के प्रस्तुत करती है। उसके दुख बहुत अधिक हैं मगर वह उन्हे एक कलाकार सुलभ सर्जनात्मक प्रतिरोध के साथ जीती है। इस फिल्म के बहुत से दृश्य पेन्टिग सरीखे हैं और रंगों की उपस्थिति अद्भुत है। पता नहीं क्यों मुजफ्फर अली की फिल्म 'गमन' याद आयी जिसमें कई इस तरह के दृश्य थे। ध्यान देने की बात है कि 'गमन' काफी पुरानी फिल्म है। लेकिन इस फिल्म में बहुत से ऐसे दृश्य हैं जो अतियर्थाथवादी हैं और जो पेन्टिंग्स तक सीमित नहीं।

इस फिल्म की विशेषता इसमें रूसी नेता लियोन ट्रॉटस्की का एक पात्र के रूप में होना भी है जिनकी हत्या का चित्रण भी इस फिल्म में है।

Sunday, February 22, 2009

कपिलदेव की आलोचना पुस्तक

डायरी

कपिलदेव की आलोचना पुस्तक

कपिलदेव हिन्दी साहित्य के सुपरिचित आलोचक हैं। ब्लागर मित्रों में साहित्यिक रुचि के लोग इस नाम से बखूबी परिचित होंगे। उनकी समीक्षाएँ और लेख विभिन्न पत्रि में प्रकाशित होते रहे हैं। बहुत समय से उनकी उनकी आलोचना पुस्तक की प्रतीक्षा थी। अन्तत: यह प्रतीक्षा खत्म हुई और वे अपनी पुस्तक अंतर्वस्तु का सौंदर्य लेकर मैदान में आ गये।

हाल में ही कपिलदेव के अपने ही शहर गोरखपुर में एक भीगी सुबह नामवर जी ने अपनी व्यस्तताओं के बीच समय निकाल कर अन्तर्वस्तु का सौंदर्य का लोकार्पण कर दिया। पुस्तक को विमोचित करते हुए उन्होंने कपिलदेव की समझदारी की भूरि भूरि प्रशंसा की और उनकी कृतियों में निहित आलोचकीय अन्तर्दृष्टि की चर्चा की। 'बाघ' कविता पर उनके लेख की चर्चा करते हुए उन्होंने इसे केदार जी की उक्त कविता पर महत्वपूर्ण समीक्षा माना। कुल मिलाकर नामवर जी ने हिन्दी में एक महत्वपूर्ण आलोचक की पुस्तक का जोरदार स्वागत किया। देर आयद दुरुस्त आयद।

कपिलदेव दर्शनशास्त्र से साहित्य में उतरे हैं इसलिए वे साहित्य के मुद्दों को काफी गहराई तक ले जाकर विचार करते हैं। जो पाठक इस पुस्तक में रुचि रखते हों वे उनकी पुस्तक का मुखपृष्ठ उनके ब्लाग पर देख सकते हैं और अन्य जरूरी बातें जान सकते हैं। इस पुस्तक को मानव प्रकाशन, कलकत्ता ने छापा है।

Tuesday, December 09, 2008

एक बहादुर युवती की याद

डायरी

एक बहादुर युवती की याद

मैं उस युवती को पूरी तरह से भूल चुका था। यदि शिमला जाते वक्त दिल्ली से कालका जाने वाली कालका शताब्दि ट्रेन में वह अखबार न मिला होता तो फिर याद भी न आती। कैसा दुखद है कि हम उन्हें भूल जाते हैं जो अच्छे काम करते हैं। मीडिया भी उन्हें कभी भूले भटके ही याद करता है।

तो वह अखबार था सेक्टर न्यूज और वह अखबार भी सिर्फ चण्डीगढ़ में वितरित होने वाला पाक्षिक। इसमें सूचना थी कि नीरजा भनोत सम्मान चन्दा असानी को दिया गया है। यहीं नीरजा भनोत की याद स्मृति में कौंध गयी जिसने भारत के अपहृत विमान से तमाम लोंगो को बचाया था और अन्त में दो बच्चों को बचाते हुए स्वयं अपहर्ताओं की गोलियों का शिकार हो गयी थीं। यह घटना 1986 की है। और नीरजा को अपने इस वीरता और साहस भरे कारनामें के लिए मरणोंपरांत अशोक चक्र दिया गया था।

भारत के विमान को चार सशस्त्र आतंकियों ने अपहृत कर लिया था। 17 घंटे के तनाव भरे माहौल के बाद अपहरणकर्ताओं ने गोलियाँ चलानी शुरू कर दीं थी। नीरजा भनोत ने साहस और बुध्दिमत्ता का परिचय देते हुए विमान का आपातकालीन द्वार खोल दिया था जिससे बहुत से यात्री बच निकले थे। मगर अंत में दो बच्चों की जान बचाने में नीरजा दिवंत हुई। वे भारत की पहली महिला थ्ीं जिन्हे अशोक चक्र दिया गया था। यही नहीं पाकिस्तान की ओर से उन्हें तमगा-ए-इन्सानियत दिया गया था। अपनी वीरगति के समय नीरजा भनोत की उम्र 23 साल थी।

31.10.2008

Monday, October 20, 2008

बिहारी होने का मतलब

डायरी

बिहारी होने का मतलब

महाराष्ट्र में राज ठाकरे के वक्तव्यों और उसके बाद की हिंसक घटनाओं से बड़ी गहरी चिन्ताएँ पैदा होती हैं। यह बड़ी ही अजीब सी बात है कि अपने ही देश में एक प्रदेश का निवासी दूसरे प्रदेश में नौकरी की तलाश में न जा सके। हाल में जो घटनाएँ घटित हुई हैं वे भारत के नागरिकों के अधिकारों को ही निरस्त करने वाली हैं। देश में बहुत सी नौकरियों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर चयन होते हैं और लोग आवेदन करते हैं। अब यदि इस तरह की हिंसात्मक पाबंदियाँ लगायी जायेंगी तो इसका बहुत ही बुरा परिणाम होगा। मान लें कि इसी प्रकार हर प्रदेश के लोग हिंसा के द्वारा दूसरे प्रदेश के लोगों को अपने यहाँ आने से रोक दें तो क्या होगा? लेकिन दिक्कत यह है कि हम सोचने के बजाय अब मारपीट पर अधिक विश्वास करने लगे हैं। समझदारी के लिए सबसे कम जगह बची है।

अब लगता है कि बिहारी होना एक रूपक होता जा रहा है। एक ऐसा रूपक जिसके सामाजिक निर्माण के पीछे हिंसा और वर्चस्व का बोलबाला है। हर वह आदमी बिहारी होने की नियत झेले जो अपने बेहतर भविष्य की कामना करता है, और अपने प्रदेश के बाहर जाना चाहता है। यह दुखद ही है कि हम ऐसे समय में रह रहे है जिसमें हर मुद्दे को बड़ी छुद्र दृष्टि से देखा जा रहा है। जाति, धर्म और क्षेत्रीयता ने ऐसी गहरी विभाजक रेखाएँ खीच दी हैं कि किसी व्यापक सोच की सम्भावना ही खत्म होती जा रही है। हर समस्या का इलाज हिंसा को ही माना जा रहा है और अपनी बात को बलपूर्वक सही सिध्द करने का प्रयास किया जा रहा है। यह स्थिति निश्चित रूप से ऐसी दिशा में ले जायेगी जहाँ से वापस आना बहुत मुश्किल होगा। मगर शायद इस बात को समझने मे ठाकरे जैसे लोग और उनके समर्थक सक्षम नहीं।

अक्सर हम अपने तात्कालिक स्वार्थों को ही सामने रख पाते हैं और व्यापक हितों को नजरन्दाज करते हैं। सही गलत के निर्णय के बजाय हम बस अपने तक ही सीमित रह जा रहे हैं। सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने लिखा है कि जो लोग छोटे दायरों से शुरू होते हैं वे अनतत: स्वयम् पर ही जाकर समाप्त होते हैं। राधाकृष्णन जी ने परोक्षरुप से ऐसी प्रवृत्ति की ओर संकेत किया था जो सर्वसत्तावाद और तानाशाही की ओर ले जाती है। इसके बरक्स समझदारी की संस्कृति ही एक मात्र रास्ता है। मगर यह रास्ता लम्बा है और इसमें कोई शार्टकट नहीं है।

हममें से बहुत लोग अपने गाँव, शहर या राज्य को छोड़कर दूसरी जगहों पर नौकरियाँ करने जाते हैं। हिन्दुस्तान के ऐसे लोगों की संख्या बहुत अधिक है जो विदेशों में रह रहे हैं। ये सभी लोग किसी न किसी अर्थ में बिहारी ही हैं। वे महाराष्ट्र के लोग भी जो बाहर कहीं काम कर रहे हैं। यदि हम महाराष्ट्र में पीटे जा रहे बेरोजगारों की जगह पर स्वयं को रखकर देख सकें तो हम सब बिहारी ही होंगे।

Sunday, July 20, 2008

कविता

हम मॉंझी हुए फटी नाव के
प्रेमशंकर मिश्र

धूप के हुए न हुए छझांव के
हम मॉंझी हुए फटी नाव के।

चलना फिरना हंसना बोलना
किस्त किस्त क़रजो की वापसी
इनकी उनकी पीली नीली बातें
ऑंच चढ़े उड़ जाती भाप सी

ऐसे में कैसे कोई पंक्षी पर साधे
छिन पछुवा, छिन पछियांव के।

हम मॉंझी हुए फटी नाव के।




खेतों से कटना, बोझा बनना
दाने दाने की मजबूरी
रेह देह लहरों का आमंत्रण
बान बिंधी घायल कस्तूरी

बूंद बूंद रिस चुके बनमोहन
गंध के हुए न हुए भाव के।

हम मॉंझी हुए फटी नाव के।




गलती फसलें, चटके ताल हैं
अंधा सूखा, बहरी बाढ़
लूले को काम कुऑं खोदना
लंगड़े को लांधना पहाड़

धुएं धुएं धोखे के घनपॉंखी
शहर के हुए न हुए गॉंव के।

हम मॉंझी हुए फटी नाव के।



आओ रुकें क्षण दम लें
इतना ज्यादा है थोड़ा कम लें
पिंजरे की मैना से कुछ सीखें
खुशियॉं बॉंटें सारा गम लें

सििद्धहीन मंत्रों से क्या हासिल
अर्थ के हुए न हुए भाव के।

हम मॉंझी हुए फटी नाव के।

पं. प्रेमशंकर मिश्र का अवसान

पं. प्रेमशंकर मिश्र का अवसान

डॉ. रमाशंकर तिवारी त्रिभुवन ट्रस्ट
10, गंधमादन, लक्ष्मणपुरी फैज़ाबाद, उत्तर प्रदेश



शोक प्रस्ताव



कल 16.07.2008 की रात हिन्दी साहित्य के महत्वपूर्ण कवि और संस्कृतिकमी पं. प्रेमशंकर मिश्र जी का 83 वषZ की अवस्था में फैज़ाबाद के जिला चिकित्सालय में एक सप्ताह की बीमारी के बाद निधन हो गया। पं. प्रेमशंकर मिश्र को कविता अपने पिता द्विजेष जी से परम्परा में प्राप्त हुई थी। प्रारिम्भक दौर की पारम्परिक कविताओं के बाद वे नयी कविता और नवगीत आन्दोलनों से जुड़े और पर्याप्त ख्याति अर्जित की। प्रसिद्ध नवगीतकार शंभुनाथ सिंह ने मिश्र जी की कविताओं को अपने नवगीत संकलन नवगीत अर्धशती में स्थान देकर आपके महत्व को दषZया था। जीवन के अन्तिम दिनों तक वे कविता और संस्कृति के प्रति समर्पित रहे। सामान्य जीवन के सुखों और दुखों को अभिव्यक्ति देने वाली प्रेमशंकर मिश्र जी की कविता में साहित्य की कई परम्पराएं एक साथ चलती दिखायी देती हैं। पं. मिश्र जी के निधन से कविता की इन धाराओं की गंभीर क्षति हुई है।

संस्कृतिक परिवेश के निर्माण के उद्देश के प्रति समर्पित पं. प्रेमशंकर मिश्र जी की संस्था सम्पर्क ने फैजाबाद में साहित्य और संस्कृति से जुड़ी कई पीढ़ियों के लिए आगे बढ़ने का आधार निर्मित किया। अपनी संवादधमी प्रकृति के चलते वे विभिन्न विचारधाराओं से जुड़े लोगों से विचार-विमष करते रहे। मनोविनोद की उनकी जीवन्त प्रवृत्ति ने साहित्यजगत में ही नहीं वरन् सामान्य जीवन में भी उन्हें लोकप्रिय बनाया। फैज़ाबाद के साहित्य और संस्कृति जगत में उनका अविस्मरणीय योगदान सदा याद किया जायेगा।

वे डॉ. रमाशंकर तिवारी त्रिभुवन ट्रस्ट के प्रारिम्भक सदस्यों में से थे। उन्हें उत्तर प्रदेश हिन्दी साहित्य संस्थान के साहित्य भूषण सम्मान मिलने के अवसर पर ट्रस्ट ने भी उन्हें सम्मानित किया था। कुछ समय पूर्व ट्रस्ट के तत्वावधान में पं. प्रेमशंकर मिश्र जी का एकल काव्यपाठ आयोजित किया गया था जिसे सहित्य प्रेमियों ने बहुत सराहा था। शोकाकुल मन से हमें यह कहना पड़ रहा है कि उनके अवसान से ट्रस्ट ने अपना अतिमहत्वपूर्ण और विशष्सनीय सहयोगी खो दिया है। यह हमारे लिए एक अपूरणीय क्षति है। पं. प्रेमशंकर मिश्र जी की स्मृतियॉं हमारे लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत रहेंगी।




रघुवंश मणि
साहित्य सचिव

Monday, January 14, 2008

एक स्त्रीवादी चुटकुला

एक स्त्रीवादी चुटकुला

एक दिन उल्लू बहुत उदास था। वह रात भर चुप्पी साधे रहा। लक्ष्मी जी ने उससे पूछा, ''प्रिय उल्लू तुम इतने उदास क्यों हो? अपनी उदासी का कारण मुझे बतलाओ।''

उलूक महोदय ने जवाब दिया, '' लक्ष्मी जी मैं आपको रोज ढोता रहता हूँ। आपकी इतनी सेवा करता हँ। मगर मेरा कोई महत्व नहीं हो पाया है। दीपावली के दिन सारी दुनिया में आपकी पूजा होती है, मगर मुझे कोई नहीं पूँछता। अब ये क्या बात हुई? उल्टे लोग मुझे उल्लू कहकर चिढ़ाते हैं। मुझे बड़ा बुरा लगता है।''

लक्ष्मी जी ने अपने वाहन के दुख को समझा और किंचित विचार करते हुए बोलीं ,'' ठीक है प्रिय उलूक। तुम्हारी बात बिल्कुल सही है। मैं तुम्हें आशिर्वाद देती हूँ कि अब तुम्हारी पूजा मुझसे पहले हुआ करेगी। तुम्हारी पूजा दीपावली से पहले करवा चौथ के दिन हुआ करेगी।

तभी से करवा चौथ मनाया जाने लगा।

साहित्य/संस्कृतिकर्म और राजनीति

साहित्य और संस्कृतिकर्म की अवस्थिति को यदि सूक्ष्मतापूर्वक देखें तो वह राजनीति की अपनी अवस्थिति से अलग केन्द्रित मिलेगी। राजनीतिक लोगों की प्राथमिकताएँ भिन्न प्रकार की होती हैं। अपनी व्यावहारिक अपरिहार्यताओं के चलते वे तमाम साहित्यिक/सांसकृतिक मूल्यों को अनदेखा कर देते हैं। हमारे समय में वोटों की राजनीति का यही अर्थ बनता है। वोटों के लिए सारे मूल्य और सिध्दान्त ताक पर रख दिये जाते हैं।

यदि बिल्कुल ऐसा न भी हो तो राजनीतिक संगठन अक्सर विभिन्न मौकों पर ऐसे समझौते करते हैं जो विसंगतिपूर्ण लगते हैं। समाजवाद से लेकर साम्यवाद तक की विचारसरणि में इस प्रकार के समझौते किये गये कि इन विचाारधाराओं से जुड़े मूल्यों का कोई बहुत मतलब नहीं रह गया। साम्यवाद किस प्रकार रूष में स्आलिनवाद में बदल गया इसकी कहानी बड़ी अजीब है। भारत में लोहियावाद कैसे जातिवाद में बदल गया और अम्बेडकरवाद किस प्रकार ब्राहम्ण दलित गठजोड़ में बदल गया इसे बताना बहुत कठिन नहीं। मैं यह नहीं कहता कि किसी विचार या विचारधारा को लेकर जड़ता या कट्टरता होनी चाहिये। मेरा सिर्फ यह कहना है कि ऐसे समझौते नहीं होने चाहिए जिससे विचारधारा में अन्तर्निहित मूल्य ही गायब हो जायँ।

इस बात को हम अनेक ऐतिहासिक सन्दर्भों में साफ रेखांकित कर सकते हैं। कुछ बर्षों पहले भाजपा सरकार के सन्दर्भ में यह देखा गया कि दक्षिणपंथी सांस्कृतिक संगठनों और राजनीतिक पार्टी के बीच का अन्तराल स्पष्ट था। सांस्कृतिक संगठन राजनीतिज्ञों से संतुष्ट न थे। इस बात को हम स्वाधीनता की लड़ाई के दौर में प्रेमचनद के लेखन और कांग्रेसी राजनीति के बीच के अन्तरों में देख सकते हैं। साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में कार्यरत लोग अक्सर परिवर्तनों को पहले देख लेते हैं।

मैं यहाँ यह तो नहीं कहना चाहता कि साहित्य को राजनीति से अलग देखा जाय। हमारे आज के दौर में यह विल्कुल संभव नहीं। मगर साहित्य की अपनी अस्मिता का प्रश्न इसीलिए महत्वपूर्ण है।

Saturday, December 22, 2007

मंदी और मसीहा

डायरी

मंदी और मसीहा

19.12.2007 को विकास परिषद को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने वैश्विक मंदी की संभावना व्यक्त की और आगाह किया कि आने वाले समय में भारत भी इससे प्रभावित हो सकता है। अमेरिका और दूसरे बड़े विकसित देशों में अर्थव्यवस्था की मंदी है जिसका प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। ऐसे में कीमतें बढ़ सकती हैं। इन परिस्थितियों में निर्यातकों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा है कि खाद्य संरक्षा पर बल दिया जाना चाहिए। अनाज, दाल, और खाद्य तेलों का भंडारण होना चाहिए। लेकिन उन्होने यह भी कहा कि इस वैश्विक मंदी के डर से निराश नहीं होना चाहिए। विकास और वृध्दि के लक्ष्यों को लेकर कम महत्वाकांक्षी होने की जरूरत नहीं है। उन्होने कहा कि इस संकट से देश को आगाह करना उनका कर्तव्य है।

डॉ. मनमोहन सिंह सिर्फ देश के प्रघानमंत्री ही नहीं है बल्कि एक विद्वान अर्थशास्त्री भी हैं। उनकी छवि एक इमानदार व्यक्ति की है। अत: उनके द्वारा कही गयी ये बातें ऐसी है कि उन्हें बहुत गंभीरतापूर्वक लिया जाय। वैसे भी पश्चिमी देशों में घटती विकास दर कोई ऐसी बात नहीं जो छिपी हुई हो। इस घटती विकास दर के ही चलते विकसित देश अपनी पूँजी को कम विकसित देशों के बाजार में लगााना चाहते हैं। इसी कारण वे विश्वबैंक जैसी संस्थाओं के माध्यम से विकासशील देशों की नीतियों को बदलने का प्रयास करते रहे हैं। इस काम में उन्हें सफलता भी मिलती रही है। इस प्रयास में वे कभी एशियन टाइगर्स को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्सहित करते रहे हैं, तो कभी भारत और चीन जैसे देशों को जिनके यहाँ पूॅजी के निवेश और विस्तार की संभावनाएँ बनी हुई हैं।

वैश्विक मंदी से तात्पर्य किसी देश के सकल घरेलू उत्पाद में कमी या वास्तविक आर्थिक प्रगति की नकारात्मकता है। यह वास्तविक आर्थिक गतिविधियों का घटना या गिरना है। इससे रोजगार निवेश और कारपोरेट क्षेत्र के लाभों में गिरावट आ सकती है। इसमें दाम बड़ी तेजी से बढ़ते या घटते हैं जिसे स्फीति या विस्फीति कहते हैं। इस प्रक्रिया को निष्पंदन कहते हैं। सामान्य शब्दों में यह एक प्रकार का आर्थिक अवरोध है जिसमें रोजगाार के अवसर कम होते हैं और सामान्य जनता के लिए जीवन दूभर हो जाता है। याद करने की बात है कि अमेरिका की प्रसिध्द मंदी के सन्दर्भ में ही जॉन मेनयार्ड केन्स का कल्याणकारी राज्य का सिध्दांत आया था जिसमें उन्होने राज्य के हस्तक्षेप की वकालत की थी। उन्होने यहाँ तक लिखा था कि यदि राज्य के पास कोई काम न हो तो उसे चाहिए कि वह दिन में गङ्ढा खोदने का कार्य करावे और रात में उसे पटवा दे। तात्पर्य यह कि हर प्रकार से राज्य को आर्थिक गतिविधियों में अपनी कल्याणकारी भूमिका निभानी चाहिए।

मगर आज हमारे देश में राज्य अपनी कल्याणकारी भूमिका लगातार कम करता जा रहा है। अब तो शिक्षा जैसे क्षेत्र से भी वह पल्ला झाड़ने जा रहा है। तो फिर मंदी आने पर क्या होगा? किसको आयेगी मसीहाई?

Sunday, October 28, 2007

मुग़ल-ए-आजम और साधू

डायरी

मुग़ल-ए-आजम और साधू

बात बहुत पुरानी नहीं है, मगर बहुत नयी भी नहीं।

मुगले-ए-आजम फिल्म रंगीन होकर आ रही थी और यह फिल्म प्रेमियों के बीच काफी चर्चा का मामला था। हमारे परम मित्र स्वप्निल श्रीवास्तव हैं जो मनोरंजनकर अधिकारी हैं। वे हिन्दी के जाने-माने कवि हैं और साहित्य जगत में उन्हे इसी रूप में जाना जाता है। उनके साथ ही मैं फैजाबाद के पैराडाइज सिनेमा हाल के मैनेजर के कमरे में बैठा था। दूसरे ही दिन रंगीन मुग़ल-ए-आजम प्रदर्शित होने वाली थी। पोस्टर पहले से ही चिपका दिये गये थे जिससे लोगों को यह भ्रम हो रहा था कि शायद यह फिल्म पहले से ही उस सिनेमाघर में लगी है। लोग पूछ रहे थे कि आखिर फिल्म लग कब रही है। एक सुखद आश्चर्य था कि फिल्मों के इस पतन काल में भी दर्शक इस पुरानी फिल्म के नये रूप को देखने के लिए बेताब थे। आखिर कहा ही गया है कि ओल्ड इज गोल्ड।

इतने में एक साधू महाराज वहाँ पधारे। सभी को आश्चर्य हुआ कि ये महोदय गेरुवा वस्त्रधारी, चिमटाहस्त यहाँ क्या कर रहे हैं। दाढ़ी पूरी बढी हुई थी और लग रहा था कि सीधे अयोध्या के किसी मंदिर से आ रहे हैं। वे कमरे में घुस आये और जब उन्होंने भी पूछा कि मुग़ल-ए-आजम कब लग रही है तो सभी लोग बिना हल्के से मुस्कराए न रह सके। स्वप्निल जी ने सिनेमाघर के मालिक होने के अंदाज में सप्रेम कहा, 'बाबा कल लग रही है।'

साधू ने प्रसन्न होकर सिर हिलाया।

उन्होने फिर मुस्कराते हुए पूछा, 'क्या आप देखेंगे?'

'हाँ' साधू ने जवाब दिया।

फिर कुछ देर तक वैसे ही खड़े रहने के बाद उसने कहा, 'फिल्म बहुत अच्छी है।'

अब तो चारो तरफ से टिप्पणियाँ शुरू हो गयीं।

'इसमें क्या दो राय। अपने जमाने की सबसे मशहूर फिल्म रही है।'

'जब भी कहीं लगती थी हाउस फुल जाती थी।'

'संवाद गजब के हैं।'

'अभिनय का तो कोई जवाब नहीं।'

'मैने यह फिल्म बहुत पहले देखी थी।' साधू ने कहा।

'अच्छा!'

'तब मैं साधू नही ंथा। गृहस्थ था।'

'हूॅ।'

'यह फिल्म मैने अपनी पत्नी के साथ देखी थी।' साधू ने कहा और थोड़ा उदास हो गया।

एक बेवजह सी चुप छा गयी।

वह फिर बोला, कुछ इस तरह जैसे किसी ने उससे पूछा हो, 'अब वह इस दुनिया में नहीं है। मैं यह फिल्म जरूर देखूँगा।'

वह अकेला सा मुड़ा और चला गया।

उसने दूसरे दिन जरूर वह फिल्म देखी होगी। उसे साधू भेष में फिल्म देखते हुए लोगों ने क्या सोचा होगा? कुछ लोग हँसे होंगे। कुछ लोगों ने सोचा होगा कि इस देश में भी क्या गजब-गजब के फिल्म प्रेमी पड़े हैं।

लेकिन मैं सोचता हॅँ कि हम चीजों को किन-किन कारणों से पसंद करते हैं, इसे सुनिश्चित कर पाना कितना कठिन है? हमारे जीवन का इतिहास भी हमारी अभिरुचि के साथ जुड़ा होता है। घटनाएँ और भावनाएँ तक कभी-कभी हमारी पसंद और नापसंद का कारण बनती हैं।



रघुवंशमणि

Saturday, October 06, 2007

बौध्दिक घृणा के दौर में गाँधी जी

डायरी

बौध्दिक घृणा के दौर में गाँधी जी

अंग्रेजी के प्रसिध्द कवि डब्लू. बी. यीट्स ने लिखा है कि बौध्दिक घृणा सबसे बुरी चीज होती है। इसमें कोई दो राय नहीं कि इस बात की प्रासंगिकता हमारे आतंकवादग्रस्त समय में यीट्स के समय से थोड़ा ज्यादा ही है। हालांकि हम यह नहीं भूल सकते कि यीट्स का समय द्वितीय विश्वयुध्द और नाजीवाद से ग्रस्त समय था। शायद हम अपने समय को ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं क्योंकि हम स्वयं उसमें अस्तित्वमान होते हैं। एक विचारक के रूप में मैं भी इस नियम का अपवाद नहीं।


यह बात इधर गाँधी जी के विचारों के सिलसिले में ज्यादा समझ में आयी। श्रीमती सोनिया गाँधी ने संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में विश्व अहिंसा दिवस के सिलसिले में बोलते हुए कहा कि महात्मा गाँधी ने हमें एक दूसरे के विचारों का सम्मान करना सिखलाया। पता नहीं क्यों अब लगता है कि समय बीतने के साथ-साथ गाँधी के विचाार नये तरह से प्रासंगिकता प्राप्त करने लगे हैं। हम चाहे जितना कहें कि चारो तरफ हिंसा ही हिंसा है, भ्रष्टाचार का बोलबाला है, प्रजातांत्रिक मूल्यों का रास्ता हर हाल में गाँधी जी के विचारों से होता हुआ ही गुजरता है। पश्चिम द्वारा अब उन्हें महज एक राष्ट्रवादी नेता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र द्वारा उनको दिया गया सम्मान यही दर्शाता है।

गाँधी जी के लिए बौध्दिक सहिष्णुता का महत्व बहुत अधिक था। आज हमने इस मूल्य को पूरी तरह से खो दिया है। धर्म और जाति के झगड़े हमें किस दिया में ले जा रहे हैं? इस बारे में कट्टरतावादियों की क्या सोच है? इस विषय पर खुले मन से विचार नहीं ही हो पा रहा।

लेकिन सबसे बड़ी बात तो साधन की पवित्रता की है जिसकी ओर गाँधी जी ने संकेत किया था। संकेत ही नहीं व्यवहार भी। इस बात के महत्व को अभी हम नहीं समझ सके हैं। सम्भवत: अभी और नुकसान उठाने के बाद ही हम इस बात के महत्व को ठीक से समझ सकेंगे।