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Saturday, August 07, 2010

टिप्पणीकारो से निवेदन

टिप्पणीकारो से निवेदन है कि छद्म नामो से टिप्पणी न भेजा करे! उन्हे प्रकाशित करना सम्भव न हो सकेगा! Chadma namo se prakashit purani tippaniya bhi dheere dheere hatayi ja rahi hain.

Saturday, February 13, 2010

कल के लिए

सम्मान्य महोदय/महोदया,


हमारा समय एक कठिन दौर रहा है जिसमें समाज और संस्कृति को अनेकानेक समस्याओं से रूबरू होना पड़ रहा है। अपसंस्कृति, साम्राज्यवाद, साम्प्रदायिकता, आर्थिक और सामाजिक विसंगतियाँ लेखन को सामाजिक दायित्व समझने वाले हमारे-आप जैसें लेखकों के समक्ष कठिन चुनौतियों के रूप में रही हैं जिनसे हम लगातार जूझते रहे हैं। कल के लिए इन ज्वलंत प्रश्नों को सामने रखकर निकलने वाली अपने समय की एक महत्वपूर्ण पत्रिका रही है। इसे आप जैसे प्रबुध्द साथियों का प्यार और सहयोग लगाातार प्राप्त होता रहा है जिसके चलते इस पत्रिका ने अपने संस्थापक-सम्पादक श्री जयनारायण के कुशल नेतृत्व में सफलतापूर्वक अपने सोलह वर्ष पूरे किये हैं।

पत्रिका आज भी अपनी इन्ही प्रतिबध्दताओं से जुड़ी रहते हुए समकालीन सृजनात्मकता को समृध्द करने के कार्य में सन्नध्द है। मगर भाई जयनारायण जी की स्वास्थ सम्बन्धी समस्याओं को देखते हुए मुझे और भाई अम्बर बहराईची को उनके द्वारा संयुक्त रूप से पत्रिका को सम्पादकीय सहयोग प्रदान करने की जिम्मेदारी सौंपी गयी है। उर्दू साहित्य से जुड़ी सामग्री का सम्पादन अम्बर बहराईची करेंगे। मुझे पत्रिका के लिए हिन्दी सामग्री का सम्पादन कार्य देखना है।

इस गुरुतर दायित्व का निर्वहन आप जैसे शुभेच्छु मित्रों और प्रतिबध्द एवं समर्थ लेखकों के सहयोग के बिना संभव नहीं है। पत्रिका के पहले से प्रकाश्य अगले दो विशेषांक शीघ्र ही आपके हाथो में होंगे। उसके बाद प्रकाशित होने वाले सामान्य अंकों के लिए आपके सहयोग के हम आकांक्षी हैं। विश्वास है कि आप अपनी श्रेष्ठ रचनाएँ हमें प्रेषित कर पत्रिका को अपना रचनात्मक सहयोग प्रदान करेंगे।ं

सहयोग की आशा के साथ,

आपका


रघुवंशमणि

कार्यकारी सम्पादक
कल के लिए

Thursday, October 15, 2009

पुस्तक का संपादन

ब्लाग बंधुओ,

इधर मैने एक पुस्तक का संपादन किया है जो पंडित प्रेमशंकर मिश्र के व्यक्तित्व और कृतित्व को लेकर है। इस पुस्तक को फैजाबाद शहर के ही भवदीय प्रकाशन ने प्रकाशित किया है।

पं. प्रेमशंकर मिश्र जी अपने समय के महत्वपूर्ण कवि थे। करीबन साल भर पहले उनका निधन हो गया था। इस पुस्तक का आवरण आप हाशिये पर देख सकते हैं। इस पुस्तक से सम्बन्धित कुछ सामग्री आने वाले दिनों में ब्लाग पर दूंगा।

Friday, October 24, 2008

एक पीड़ादायक परिवर्तन

सूचना

एक पीड़ादायक परिवर्तन

ब्लाग मित्रो,

आप लोग मेरे ब्लाग वांगमय को लम्बे समय से पढ़ते रहे हैं। जहाँ तक मुझे जानकारी मिली है इस ब्लाग को देश-विदेश में पढा जाता रहा है। मुझे अपने लेखन पर समय-समय पर टिप्पणियाँ भी प्राप्त होती रही हैं। इस सब के लिए मैं आप सभी का आभारी हॅूं। मैंने यथासंभव यह प्रयास किया है कि यह ब्लाग गंभीर विषयों पर केन्द्रित रहे और इस पर होने वाली चर्चाएँ ऐसी हों कि उनसे कुछ सकारात्मक प्राप्त हो सके। इस बात में मैं कितना सफल रहा बता नहीं सकता। इसका मूल्यांकन आप लोग ही कर सकते हैं।

पिछले दिनों मेरे ब्लाग पर किसी अनाम व्यक्ति ने कुछ व्यक्तिगत आक्षेपकारी और आपत्तिजनक टिप्पणियाँ कीं। इन टिप्पणियों से मुझे और मेरे मित्रों को क्लेश पहुँचा। इन्टरनेट सभी को यह सुविधा देता है कि बिना अपना परिचय बताये कोई भी टिप्पणी की जा सकती है। इसके कुछ सकारात्मक पक्ष अवश्य हैं। मगर इसका नकारात्मक पक्ष यह है कि कोई भी आपके ब्लाग पर उल्टी सीधी टिप्प्णियाँ कर सकता है, गाली-गलौज और गलत शब्दों का इस्तेमाल कर सकता है। इस तरह की बातों से आप अपरिचित नहीं होंगे। उन सज्जन ने वांगमय पर इतनी आपत्तिजनक बातें लिख दी थी कि ब्लाग की गंभीरता नष्ट हुई और यहाँ तक कि मुझे एक पोस्ट ही निकाल देनी पड़ी। इस प्रकार की कुंठित और घटिया मानसिकता के लोग अन्य ब्लागों पर भी यह काम कर रहे हैं और उनके विरुध्द लोग शिकायतें भी दर्ज कर रहे हैं। यह घटियापन वास्तव में हमारे समाज में आ रहे सांस्कृतिक पतन की ओर भी संकेत है। अब लोगों में न तो दूसरों के सम्मान का ख्याल इै और न अपनी ही इज्जत का। खुले आम नेट पर गाली-गलौज हो रहा है और इस गाली-गलौज को ही लोग अपनी वाकपटुता और चतुराई समझ रहे हैं। दूसरों को अपमानित करने में ही एक प्रकार का गर्व अनुभव किया जा रहा है।

वांगमय की प्रकृति एक गंभीर ब्लाग की रही है। आप इस बात से सहमत होंगे कि इस ब्लाग पर गाली गलौज और कुठाग्रस्त मानसिकता के लिए जगह नहीं होनी चाहिए। आखिर विचार-विमर्श के इस मंच को किसी कुंठित मानसिकता के मलमूत्र विसर्जन का स्थान नहीं बनने दिया जा सकता। हम वैसे भी विषाणुओं से अपना बचाव करते ही हैं।

इसलिए दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि अब आप जो भी टिप्पणियाँ प्रेषित करेंगे उन्हे संपादित होने के बाद ही इस ब्लाग पर प्रकाशित किया जा सकेगा। इससे निश्चितरूप से आप सभी को एक प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा जो कि सामान्यत: वांछित नहीं। लेकिन आप मेरी विवशता समझ रहे होंगे। आशा है सहयोग बनाए रखेंगे।


रघुवंशमणि