Wednesday, August 17, 2011

''आरक्षण के बारे में

''आरक्षण के बारे में

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''आरक्षण फिल्म के आरक्षण के बारे में कम भारत की शिक्षा व्यवस्था के बारे में अधिक है। इस फिल्म को देखने के बाद ही प्रदेश सरकारों का भ्रम दूर हुआ होगा। बौद्धिक हलकों में चल रही बहसों पर अब पटाक्षेप हो जाना चाहिए क्योंकि यह फिल्म आरक्षण के विरुद्ध तो कतर्इ नहीं। फिल्म का प्रारम्भ अवश्य मण्डल कमीशन के मामले से होता है मगर जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, मुददा बदलता जाता है। फिल्म के केन्द्र में आ जाता है शिक्षा का व्यवसायीकरण। फिल्म इस मुददे पर कुछ विकल्प भी सुझाती है। मुझे ये विकल्प तो लचर टार्इप के लगे। उपचारात्मक शिक्षा ही रामबाण नहीं है। वास्तव में शिक्षा को लेकर सरकार के दृषिटकोण को ही बदलना होगा और यह मामूली बात नहीं।



फिलहाल यह फिल्म किसी भी विषय पर हो, इसे प्रतिबंधित किया जाना तो बिल्कुल ही गलत था। शायद सरकारें दंगाइयों और उनकी राजनीति से इतना घबराती है कि वे पहले किताबों, फिल्मों पर रोक लगाती है। पढ़ती, देखती या सोचती बाद में है। वास्तव में उन्हें ये कार्य पहले करने चाहिए। इस पूरे प्रकरण में फायदा तो फिल्म का ही हुआ। मुफत के प्रचार से बेहतर लाभ किसी फिल्म को क्या हो सकता है? लेकिन प्रकाश झा को कम से कम इस बात के लिए बधार्इ दी जानी चाहिए कि उन्होंने शिक्षा व्यवस्था पर एक विचारोत्तेजक बम्बर्इया फिल्म बनायी है।

Thursday, June 09, 2011

शस्त्र, शास्त्र और गाॅधीवाद

रघुवंशमणि



योगगुरु बाबा रामदेव कुछ दिनों पूर्व तक बेहद सफल व्यक्तित्व नज़र आ रहे थे। उन्होंने योगाभ्यास और आयुर्वेदिक स्वास्थ औषधियों की शानदार व्यवसायिक पैकेजिंग की थी और पूरी दुनियाॅं में अपनी सफलता के झंडे गाड़ दिये थे। फिर उन्होंने पूरे देश में यात्रा करके बाकायदा अपनी भारतीय स्वाभिमान पार्टी के लिए पृष्ठभूमि भी तैयार कर ली थी। दिल्ली में अनशन के अभियान के समय तो ऐसा लगा कि सरकार उनके सामने झुक गयी है। मगर उसके बाद की राजनीतिक गतिविधियों के दौरान बाबा रामदेव विचलित नज़र आये और उनके वक्तव्यों से यह जाहिर होने लगा कि योगाभ्यास के दौरान योगासनों पर उनका कितना भी अभ्यास क्यों न रहा हो, राजनीति के आसन पर वे अभी ठीक से बैठने का अभ्यास नहीं कर पाये हैं।

कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली दिल्ली की सत्ता ने पूलिसिया बल प्रयोग के द्वारा जब उन्हें रामलीला मैदान से हटाया तो मीडिया ने बाबा को जबर्दस्त एक्सपोजर दिया। अन्ना हजारे ने अपने पुराने सहयोगी के समर्थन में और पुलिसिया गतिविधि के विरोध में गाॅंधी जी की समाधि पर आठ घंटे का अनशन रखा। आर. एस. एस. और बी.ज.ेपी. को तो स्वामी जी का समर्थन करना ही था। पूरे देश में बुद्धिजीवियों ने भी रामदेव के साथ हुई इस घटना की भूरि-भूरि निन्दा की। यह सब बाबा के समर्थन में ही हुआ। यहाॅं तक कि साम्यवादी दलों के समर्थकों ने भी बाबा का समर्थन न करते हुए भी इस घटना की निन्दा की और सरकार को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया। इस प्रकार बाबा को मिलने वाला यह बड़ा समर्थन था।

मगर बाबा रामदेव ने हरिद्वार पहुॅंचने के बाद जिस प्रकार के वक्तव्य दिये वे किसी राजनीतिक नेता के लिए बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं कहे जायेंगे। उनकी स्थिति स्व. टिकैत या योगी आदित्यनाथ से बेहतर नहीं थी जो मौके-मौके पर कैमरे के सामने रोते रहे हैं। किसी भी नेता के पीछे चलने वाली जनता अपने नेताओं के आॅंसुओं से भावुक तो हो सकती है, मगर वास्तव में वह अपने नेताओं को विपरीत परिस्थितियों में भी मजबूत और दृढ़ देखना चाहती है। बाबा रामदेव का यह कहना कि सरकार उनकी हत्या कराना चाहती है, किसी के भी गले से नीचे उतरने वाली बात नहीं थी क्योंकि यदि सरकार उन्हें मारना-मरवाना चाहती तो उसके पास काफी वक्त था। फिर बाबा का यह कहना कि उनके 5000 कार्यकत्र्ता गायब हैं, निहायत ही अविश्वसनीय बात थी।

लेकिन सबसे राजनीतिक गैरसमझदारी से भरी बात उन्होंने तब कही जब उन्होंने अपने शिष्यों से शास्त्र सीखने के साथ शस्त्र उठाने की भी बात कही। अभी चार दिन पहले तक गाॅंधीवादी तरीके से अहिंसक आन्दोलन और अनशन करने वाले बाबा रामदेव का क्या अपने सिद्धान्तों से इतनी जल्दी मोहभंग हो गया? गाॅंधी जी ने अपने लगभग तीन दशकों की अहिंसात्मक लड़ाई में बहुत बार गिरफतारियाॅं दीं, उनके समर्थक मारे पीटे गये, जेल में ठूॅंसे गये, मगर उन्होंने कभी भी अपनी अहिंसा की राजनीति पर अविश्वास नहीं व्यक्त किया। उन्होंने अपने अहिंसात्मक संघर्ष के तरीके पर केवल एक बार अविश्वास जाहिर किया था। वह समय था साम्प्रदायिक दंगों के उभरने का, जब बिहार और बंगाल खून से रंग गये थे। मगर यह उनके लिए अपनों से पराजित होने जैसी स्थिति थी। किसी राजनीतिक सत्ता के अत्याचार के सामने तो वे अपने अहिंसात्मक शस्त्र के साथ हमेशा डट कर खड़े रहे।

मगर बाबा रामदेव के समक्ष गाॅंधी जी जैसी कोई स्थिति नहीं थी। दिल्ली के रामलीला मैदान की घटना की निन्दा तो सभी ने की, मगर उन्हें जलियाॅंवाला बाग की घटनाओं के समान कहना अतिरेकपूर्ण ही होगा। तो फिर ऐसा क्या हुआ कि बाबा पूरी तरह से विचलित हो गये और अहिंसा से हिंसा के रास्तेे पर उतर आये? वे हर जिले से आने वाले 20 स्वयंसेवकों को लाठी ही नहीं जूडो-कराटे भी सिखाने का संकल्प ले रहे हैं। यह उनके जैसे स्थपित व्यक्तित्व के लिए उचित नहीं और उनके राजनीतिक कच्चेपन का सबूत है। भारत का संविधान और उसकी मुख्यमार्गी राजनीति पार्टियाॅं परोक्षरूप से भले ही हिंसा का इस्तेमाल कर ले, वे इस प्रकार खुलेआम हिंसा का समर्थन नहीं करती।

बाबा रामदेव के इस प्रकार के वक्तव्यों से उन पर लगने वाले कांग्रेसी आरोपों की ही पुष्टि होती है कि वे दिल्ली में गड़बड़ी फैलाना चाहते थे। इससे यह भी प्रमाणित किया जायेगा कि वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तरह की ही राजनीति कर रहे हैं।

आज के दौर में अहिंसा की राजनीति करना आसान काम नहीं। यह एक दुधारी तलवार पर चलने जैसा काम है। इसके लिए सिर्फ मीडिया का समर्थन काफी नहीं होता। गाॅंधी स्वयं दृढ़प्रतिज्ञ थे और सत्याग्रह को चलाने की बुद्धिमत्ता भी उनमें कूट कूटकर भरी हुई थी। ये सभी बातें फिलहाल तो बाबा रामदेव में नहीं हैं।

Thursday, November 04, 2010

आर. के. सिंह की कुछ अंग्रेजी कविताओं के अनुवाद

आर. के. सिंह की कुछ अंग्रेजी कविताओं के अनुवाद

1.

वह पागल घोषित है
पाॅंव बॅंधे हैं उसके
गली में सरकती है
वह आगे पीछे

नंगी भूखी वह
ठिठुरती है दिसम्बर में
नाली के पास सिकुड़ी

फुटपाथियों की उपेक्षिता
कागज, लकड़ी और चीथड़ों से
आग जलाने की कोशिश है

पुल के नीचे चाय की चुस्कियाॅं लेते
मैं राजघाट की घंटियाॅं सुनता हूॅं
तीर्थयात्री ट्रेन पकड़ने की जल्दी में हैं।


2.

दो सूखे वृक्षों के बीच अनन्त सौंदर्य सी खड़ी
दुपहरी में गुजरतेे मछुवारों को देखती
उसकी आॅंखें भी तो मछलियाॅं हैं
पर परवाह किसे है उनकी
गिरकर शांत होती हैं फड़फड़ाती पत्तियाॅं
लपटों के शांत होने पर देखती है
टीलों के उच्चावच पर अपनी टूटी चूड़ियाॅं
और एक बिलखता गुलाब सफेद साड़ी में
छिपा लेती है वह

3.

चेहरे पर जर्द पर्त
राख में तलाशती अंगुलियाॅं
पिछवाड़े बागान के करीब ही
बिनती हैं जले हुए कोयले
कल का खाना बनाने के लिए

4.

ग्ंगा यमुना का संगम
एक समलैंगिक मिलाप है
सुन्दर परन्तु बंजर

मेरे मित्र को पता है
स्वर्ग का रास्ता
इन सर्पीली नदियों से होकर नहीं जाता

5.

सूरज के फैलते मकड़जाली चक्र मेरे
मेरे अस्तित्व और चीजों को धुंधलाते हैं
सुबह से शाम तक मेरे चारो तरफ
मिथक स्वयं को दोहराता है

मेरे अंदर की उभरती रोशनी
कागजी भगवान का आभामण्डल
चारो तरफ सभी कुछ आन्दोलित करती
जीवन और मृत्यु का समीकरण है

इस वक्त का सशंकित सन्नाटा
षडयन्त्र है एक गंभीर दृश्य को आभामण्डित करने का
भावनाओं को प्रतिबिम्बित करने में
अंधभावनाओं और लघुदृष्टियों की पूर्णता में

6.

यह नहीं कि कुछ पैसे मैं
रिक्शे पर खर्च नहीं कर सकता
नहीं खरीद सकता कार या स्कूटर
मैं जुड़ा रहा चाहता हूॅं
धरती और धूल से
अपने भार के साथ
अकेले चलना चाहता हूॅं
मेरे कन्धे पर सब्जियाॅं और सामान
चालीस साल पहले जैसी लटकी हैं
सोचता हूॅं बिना किसी शर्म के
स्वाभिमान और पसीने के साथ
दूरियाॅं तय कर सकता हूॅं
और कह सकता हूॅं खुद से
देखो मैं उनसे जुदा हूॅं

पैसे से होने दो उनका मूल्यांकन
जिसको वे अपनी टांॅगों के बीच या सपनोें में
छिपाकर रखते हैं
मुझे मेरे कामों से जाना जाय
मेरी मेहनत से जिसने किसी का अपकार नहीं किया
और कल जब मैं इतना बूढ़ा हो जाऊ
कि खड़ा न रह सकूॅं अपने पैरो पर, चल न सकूॅं
तो याद करूॅंगा कि जमा कर रखे थे मैंने
अपने पैर जमीन पर
और उन सबको जाना था
जिन्होंने बेदिली से अपना हाथ बढ़ाया था

वे किसी को शाप न दें अगर
उनके गिरने पर ध्यान न दे कोई


7.

जब फूल सूख जाएॅंगे
शहद के लिए मण्डराती
मक्खियों को कौन जीवित रखेगा
या उन हाथों को महसूसेगा
जो नारंगी के बागों में लगे
छत्तों को संवारते हैं

वे तब मिलकर
अपने स्वर्णिम दिनों को
याद कर सकती हैं

या इस टोने को
खत्म करने के लिए
कोई राग गुनगुना सकती हैं

या जिस भी वजह से
धुवांसे सन्नाटे में
उनका छत्ता जला हो

लेकिन पता है मुझे अब
मधुमक्खियाॅं नहीं लौटेंगी
नग्न वृक्षों की ओर

8.

जाति बदलना संभव न था
उसने अपना धर्म बदल डाला
फिर भी वे न बदले
न ही बदली उनकी संकीर्ण दुनिया

भेड़िये, लोमड़ी और कौए
उस प्रबोधन की परेशानी को
न बदल सके आसमान के साथ
जो देवताओं का पर्दा है

पिंजरा अभी भी भागता फिरता है
एक पंछी की तलाश में
और वह सूरज की आशा में
अकेली लड़ाई लड़ता है

9.

मौन फुटपाथ है
ध्यानियों की शरणस्थली
दूधिया सन्नाटे में

गुजरती सुन्दरियाॅं
पानी में नग्न होतीं
सिकुड़ती चमड़ी

कार्तिक में गंगा पर
आदि ईश्वर हॅंसता है
उनकी नंगी पीठ के पीछे

घायल कर देने वाली शीत में
ऊॅं वासनाओं के लिए
सुविधाजनक है

और अश्वपति नहीं अब बस
दो श्वेत चन्द्रवृत्तों के पीछे
जेट से भागते लटके हैं वे

10.

इच्छाओं को त्याग दूॅं तो भी नहीं खत्म होता यह सब
दुःख का न होना निर्वाण की कुंजी नहीं

व्यतीत को प्रेम न करने और वासनाओं
और नये मानसिक भ्रमों और भयों के जंजाल में

अहसास की खुजली, बदलती गिरावट
अस्तित्व के द्वीप की धुॅंधलाती रौशनी में

जीवन बस जमता जाता, रुके तालाब की दुर्गन्ध
फिर भी खिलता है आशा का कमल

11.

मैने उपवास नहीं रखा
मेरे लिए नहीं है नौरोज़

न होली ही है
अब मैं हिन्दू नहीं रहा

बहुत पहले इसाइयों ने भी
मेरी आस्था और प्रेम पर संदेह किया था

मुस्लिम इतने कट्टर हैं कि
एक सेकुलर को अस्वीकार कर दें

अब मैं अकेला देखता हूॅं
रंगों की त्रासदी

मैं उत्सव मनाता हूॅं
भिन्नता और आत्मा की स्वतंत्रता का

पर वे मेरे जन्म पर सवाल उठाते हैं
और मुझे ढोंगी बताते हैं


12.

मैं यीशू तो नहीं
पर सूली पर चढ़ने की
पीड़ा समझता हूॅं

एक सामान्य आदमी की तरह
सब झेलता जो उन्होंने झेला था
वही जीवन जीता

कभी विनती करता और रोता
प्रेम के अभाव में भी
आगे अच्छे दिनों की आशा करता

घटती सामथ्र्य, असफलता
बोरियत और अनकिये अपराधों के
दोशारोपणों के साथ

मैं जीसस नहीं हूॅं
मगर मैं सूॅघ सकता हूॅं
हवा में जहर और धुॅंवा

मनुष्यता के लिए अनुभव करता हूॅं
उन्हीं की तरह सलीब ढोता
अपने स्वप्नों को पुनः जीता

मैं यीशू तो नहीं
पर सूली पर चढ़ने का
दर्द समझता हूॅं

13.

यह मकान ढह सकता है कभी भी
इसकी दीवारें फटी हैं
नींव पर दरारें खुली हैं
पर कोई परवाह नहीं करता

वे चुप्पी साधे रहते हैं
सतही चिप्पियों की सुरक्षा में
और धीरज रखने की बात करते हैं
स्वार्थ सिद्धि के लिए करते हैं छद्म

अपनी अधमता को रहस्यमय बनाते
विवेक और भविष्य की चिन्ता दबाते
चहारदीवारी के बीच मास्टरों की
चुप्पियाॅं खरीदते

14.

हम कहाॅं पहुॅंचेंगे आखिर
ताबूत में यात्रा करते

या इन्द्रधनुषी सिंहद्वार के परे
लंगर डालने की कल्पना करते

सुनहरी और चमकती राख
मरजीवों को फिर जीवित नहीं करेगी

मिथकों और कहानियों में खोये
हमे वापस लाना होगा

जीवन तत्वों का संतुलन
नये सूरज बनाने के लिए

और चन्द्रमाओं के लिए
गुफाओं को रौशन करेें

जो नये भविष्य की शुरुवात करें

15.

यदि दुनिया नहीं हुई
मेरी नौजवानी की सोच जैसी
तो मैं क्या करूॅं। मैं था
निर्भर अपने पिता पर

स्वनिर्मित मैं
धाराओं के विरुद्ध पढ़ न सका
आसमान और उसके मजबूत इलाकों को

गंगा की बालू पर बने निशान
इन्द्रधनुष की तरह धुॅंधला गये
समय की बरसात
पैरों में चुभती है

दाॅंत के खोड़र
और अंधत्व करते हैं आक्रान्त
और कामचिन्ताएॅं सताती हैं
निद्रा और स्वप्नहीन रातों को

मेरे गंजे होते सिर के गिरते बाल
उस हॅंसी को प्रतिबिम्बत करते हैं
जिन पर अब ध्यान नहीं देता

अब मैं नहीं करता
चालाक और अविश्वसनीय
मित्रों को बेपर्दा

अपने अस्तित्व और भविष्य
पर खीजता नहीं और
प्रभाव नहीं बना पाता

फिर भी सुनिश्चित है जब मैं विराम लूॅंगा
तो बहुत बुरा तो नहीं रहेगा
मेरी दृष्टि फिर भी रहेगी ठीक
ताजी हवा में साॅंस लेता रहूॅंगा

16.

अकेले में रहना
द्वीप बनाता है

घुलती मिलती परछाइयों को
पानी में देखना

पुनर्मिलन की आशा जगाता
तारों के टूटने पर

ज्वार की तरफ आॅंख मूदकर
नया झूठ बुनना है

17.

फौलादी बहाव के साथ
बहता हुआ पानी
पत्थर को भेदता है
उन्हें सितारों की शक्ल देता

सूरज और चाॅंद भी नहीं पा सकते
वैसा तीखापन
चट्टानों का विलाप
बदलता है नदी के गीत में

18.

क्या वे स्वयं को या अपनी सच्चाई को
देखते हैं अन्तर्दर्पण में

बहुत घृणा और क्रोध उपजाते
मनुष्यों और घरों को जलाते हैं

कुछ नहीं सीखते कभी मगर
साम्प्रदायिकता का पत्ता फेकते, अधिकारों के लिए

जो किसी ईश्वर ने नहीं दिया उन्हें। उनकी
अधम राजनीति सन्नाटे की विकृति है



अंग्रेजी से अनुवाद रघुवंशमणि
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Monday, October 25, 2010

दिगंबरी योग

डायरी

दिगंबरी योग

सारा ज्या अण्डरवुड का नाम हिन्दुस्तान में किसे मालूम था! न तो वह कोई जानी-मानी नेत्री थी न अभिनेत्री। मगर राष्ट्ीय स्वयं सेवक संघ जैसी संस्थाओं की सत्ता ऐसी व्यापक कि जिसे चाहें रातों-रात स्टार बना दें। सारा के दिगंबरी योग के बाद उनका जो विरोध हुआ तो फिर उसकी वीडियो क्लिप के चक्कर में हिन्दुस्तान का बिगड़ैल युवा वर्ग पागल हो गया। उसे देखने के लिए लोग पूरा नेट छान मार रहे हैं और प्लेब्वाय की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है। एक जिम्मेदार सज्जन को तो यहाॅं तक कहना पड़ा कि योगासनों का धर्म से कुछ लेना देना नहीं। अब इसका धर्म से कुछ लेना देना हो या न हो, वार तो उल्टा गया। सारा की लोकप्रियता ही बढ़ी और दिगंबरी योग के विरोध में कोई बड़ी वारदात नहीं हो सकी। जो लोग कुछ विरोध कर भी रहे थे, मन में उनके उत्सुकता उस वीडियो को ठीक तरह से देख लेने की थी। वाइज की बातें कौन मानता है और फिर हर बात का जवाब हिंसक वक्तव्य तो नहीं होते। इस बात को अब तो समझ ही लेना चाहिए। चित्तवृत्ति पर नियंत्रण की जरूरत दक्षिणपंथियों को ज्यादा है। वे चाहें तो एक आॅंख झपकाने वाले योग गुरु रामदेव जी की शरण में जाॅंय, चाहे दिगंबरी सारा के। उत्सुकता यह है कि ज्यादातर लोग किसकी ओर जाना पसंद करेंगे?

Friday, August 13, 2010

क्या कबीर स्त्री विरोधी थे?

मेरे ब्लाग पर छद्म नाम से टिप्पणी लिखने वाले एक टिप्पणीकार मित्र ने मुझसे कबीर के स्त्री सम्बन्धी विचारो पर बहस चलने के लिए कहा! मुझे लगता है कि बहुत से लोगो के समान वे भी यह सोचते है कि कबीर स्त्री विरोधी है! तो आइये इस विषय पर भी विचार करे!


क्या कबीर स्त्री विरोधी थे?

Saturday, August 07, 2010

टिप्पणीकारो से निवेदन

टिप्पणीकारो से निवेदन है कि छद्म नामो से टिप्पणी न भेजा करे! उन्हे प्रकाशित करना सम्भव न हो सकेगा! Chadma namo se prakashit purani tippaniya bhi dheere dheere hatayi ja rahi hain.

Sunday, July 25, 2010

क्या कबीर वर्णव्यवस्था के समर्थक थे??

डायरी

क्या कबीर वर्णव्यवस्था के समर्थक थे??

१८. ७. २१

फैज़ाबाद में मेरे आवास पर हुई चर्चा के दौरान डा वागीश शुक्ल ने कबीर को वर्णव्यवस्था समर्थक का सिद्ध करने के लिए कबीर की ही साखी प्रस्तुत की।

॑॑ सकल बरण एकत्र् ह`वै सकति पूजि मिलि खांहि।
हरिदर्शन की भ्रान्ति करि केवल जमपुर जॉंहि।। ॔॔

कबीर की यह साखी अपेक्षाकृत कम प्रचलित है, इसलिए मेरे सहित वहॉं उपस्थित हिन्दी युवा कवि विशाल श्रीवास्तव, संस्कृत विद्वान महेश मिश्र, वरिठ कवि स्वप्निल श्रीवास्तव और उर्दू साहित्य की विदुषी बुशरा खातून ने उनकी बात को बिना किसी प्रतिरोध के स्वीकार कर लिया। लेकिन बाद में इस साखी का अर्थ देखने पर पता चला कि इसका वर्णव्यवस्था से कोई मतलब ही नहीं है। वास्तव में इस साखी का अर्थ तो निम्नवत` है

"॑॑ समस्त वर्ण् के लोग शक्तिपूजा के नाम पर इकठ`ठे होकर मॉंस भक्षण करते हैं, वे सिर्फ़ हरिभक्त होने की भ्रान्ति पैदा करते हैं। वे वास्तव में भक्त नहीं होते। वे केवल यमपुर की यात्रा करते हैं।॔॔

कबीर, ग्रंथावली, संपादक रामकिशोर शर्मा, लोकभारती, २६, पृ. २२३.

कबीर की इस साखी को शक्तिपूजा या मॉंस भक्षण के सन्दर्भ में तो प्रस्तुत किया जा सकता है, मगर वर्णव्यवस्था के समर्थन के लिए इसका इस्तेमाल बिलकुल गलत है। वास्तव में इस दोहे का वर्णव्यवस्था से कोई सम्बन्ध है ही नहीं। सवाल यह है कि दूसरों के संदेहों और अज्ञान का फायदा उठाकर उन्हें गलत जानकारी देने वाले डा वागीश शुक्ल जैसे विद्वानों का क्या किया जाय?? वे उन्हीं मध्यकालीन ब्राह`मणों के समान हैं जो वेद के नाम पर जनता को कुछ भी समझा दिया करते थे।

फिलहाल मेरा सवाल यह है कि क्या आपको लगता है कि कबीर वर्णव्यवस्था के समर्थक थे?? क्या आपको कबीर की कोई ऎसी प्रमाणिक पंक्ति याद आती है जिसमें वे वर्णव्यवस्था के समर्थक लगते हों?? आपके विचारों की प्रतीक्षा रहेगी।

Sunday, February 28, 2010

होली की एक स्मृति

मॉरीशस में होली बहुत अच्छी तरह से मनायी जाती है। 1968 के आस पास की घटना है। जब हम मारीशस में थे तो होली मनाने के लिए बो बासें चले जाते थे जहाँ चाचा ठाकुर प्रसाद मिश्र जी रहा करते थे। एक बार होली के दिन उनके यहँा कोई बुजुर्ग मेहमान आये हुए थे। वे कुर्सी पर बैठे हुए थे तो चाचा जी कमर पर एक बड़ा सा भगोना रखे हुए अंदर से निकले।

उन्होंने अतिथि महोदय से पूछा

''क्या आप चाय पियेंगे''

बुजुर्ग सज्जन थोड़ा संकोच में पड़े, पर फिर संभलकर कहा

''हाँ हाँ पी लेगे''

अतिथि जी के इतना कहते ही चाचा जी ने पूरा भगोना उनके सिर पर उड़ेल दिया। वे सिर से पैर तक रंग से भीग गये।

होली की यह रंगीनियत उसकी खास बात है। मुझे यह त्योहार सांस्कृतिक अधिक और धार्मिक कम लगता है। यही वजह है कि मुझे अपने तमाम मुस्लिम दोस्तों की भी शुभकामनाएॅ इस अवसर पर मिलती रहती हैं।

यह रंग का उत्सव प्रकृति से भी जुड़ने का उत्सव होता है। शायद बाहर की प्रकृति से उतना नहीं जितना की अंदर की प्रकृति से। इस मामले में यह त्योहार कुछ कम फा्यडियन नहीं। इस अवसर पर ढेर सारी वर्जनाएँ अलग रख दी जाती हैं। हमारी प्रकृति पर जो दबाव हैं वे इस अवसर पर कम हो जाते हैं।

Saturday, February 13, 2010

कल के लिए

सम्मान्य महोदय/महोदया,


हमारा समय एक कठिन दौर रहा है जिसमें समाज और संस्कृति को अनेकानेक समस्याओं से रूबरू होना पड़ रहा है। अपसंस्कृति, साम्राज्यवाद, साम्प्रदायिकता, आर्थिक और सामाजिक विसंगतियाँ लेखन को सामाजिक दायित्व समझने वाले हमारे-आप जैसें लेखकों के समक्ष कठिन चुनौतियों के रूप में रही हैं जिनसे हम लगातार जूझते रहे हैं। कल के लिए इन ज्वलंत प्रश्नों को सामने रखकर निकलने वाली अपने समय की एक महत्वपूर्ण पत्रिका रही है। इसे आप जैसे प्रबुध्द साथियों का प्यार और सहयोग लगाातार प्राप्त होता रहा है जिसके चलते इस पत्रिका ने अपने संस्थापक-सम्पादक श्री जयनारायण के कुशल नेतृत्व में सफलतापूर्वक अपने सोलह वर्ष पूरे किये हैं।

पत्रिका आज भी अपनी इन्ही प्रतिबध्दताओं से जुड़ी रहते हुए समकालीन सृजनात्मकता को समृध्द करने के कार्य में सन्नध्द है। मगर भाई जयनारायण जी की स्वास्थ सम्बन्धी समस्याओं को देखते हुए मुझे और भाई अम्बर बहराईची को उनके द्वारा संयुक्त रूप से पत्रिका को सम्पादकीय सहयोग प्रदान करने की जिम्मेदारी सौंपी गयी है। उर्दू साहित्य से जुड़ी सामग्री का सम्पादन अम्बर बहराईची करेंगे। मुझे पत्रिका के लिए हिन्दी सामग्री का सम्पादन कार्य देखना है।

इस गुरुतर दायित्व का निर्वहन आप जैसे शुभेच्छु मित्रों और प्रतिबध्द एवं समर्थ लेखकों के सहयोग के बिना संभव नहीं है। पत्रिका के पहले से प्रकाश्य अगले दो विशेषांक शीघ्र ही आपके हाथो में होंगे। उसके बाद प्रकाशित होने वाले सामान्य अंकों के लिए आपके सहयोग के हम आकांक्षी हैं। विश्वास है कि आप अपनी श्रेष्ठ रचनाएँ हमें प्रेषित कर पत्रिका को अपना रचनात्मक सहयोग प्रदान करेंगे।ं

सहयोग की आशा के साथ,

आपका


रघुवंशमणि

कार्यकारी सम्पादक
कल के लिए

Friday, February 12, 2010

बाल ठाकरे को अनायास मिली चुनौती

यह संभवत: इस समय विचार का विषय नहीं है कि शाहरुख खान की फिल्म
माई नेम इज खान
किस प्रकार की फिल्म है? कला की दृष्टि से वह ठीक ठाक है या नहीं? उसकी विषयवस्तु क्या है या उसका मैसेज कैसा है? फिल्म में विषय या कहानी के साथ निर्देशक का ट्रीटमेंन्ट कैसा है? यानि कि फिल्म कैसी है यह फिलहाल महत्वपूर्ण नहीं है। हो सकता है एक सप्ताह बाद ही यह फिल्म टिकट खिड़की पर दम तोड़ दे। होने को तो इसका उल्टा भी हो सकता है, मगर इस समय इस बात का कोई मतलब नहीं है। मतलब सिर्फ इस बात का है कि यह फिल्म रिलीज हो गयी है और इसे देखने के लिए लोग बड़ी तादाद में थियेटरों में पहुँचे हैं।

लोग शिवसेना की धमकियों के बाद भी सिनेमाघरों में पहुँच रहे हैं और यह प्रदर्शित कर रहे हैं कि वे बाल ठाकरे जैसे कट्टरपंथी नेताओं से अधिक महत्व अपने सिने स्टारों को देते हैं। वे फिल्म को देखने के प्रतीकात्मक प्रतिरोध का बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं। शायद सामान्य परिस्थितियों में इस फिल्म को इतनी अच्छी शुरुवात न मिलती। दिल्ली में तो सिनेमाघरों में कई दिनों की एडवांस बुकिंग चल रही है। फिल्मों के इस पराभव के दौर में जब किसी एक शो का हाउस फुल जाना मुश्किल हो जाता है, यह वाकई जबर्दस्त बात है।

बाल ठाकरे और शिवसेना को यह चुनौती अनायास ही मिल गयी है। शायद स्वयं शाहरुख ने भी यह न सोचा होगा कि एक सामान्य टिप्पणी पर शिवसेना इस प्रकार प्रतिक्रिया करेगी। बात सिर्फ इतनी सी रही होगी कि उन्हे अपनी खेल सम्बन्धी सामान्य सी टिप्पणी को वापस लेना अपमानजनक लगा होगा। लेकिन यह भी उनके पक्ष में महत्वपूर्ण है क्योंकि शिवसेना की धमकी के बाद फिल्म उद्योग में शाहरुख का खुला समर्थन नहीं किया गया। कलाकारों से लेकर वितरकों तक ने संभल-संभल कर टिप्पणियाँ कीं क्योंकि उन्हे तरह-तरह के व्यावसायिक डर सता रहे थे। अभिषेक बच्चन जैसे कलाकारों ने तो साफ कहा कि वे महज कलाकार हैं और वे इस पचड़े में नहीं पड़ना चाहते। निश्चितरुप से शाहरुख ने इन परिस्थितियों में कुछ अकेलापन जरूर महसूस किया होगा।

वैसे भी फिल्मी दुनिया में ठाकरे का आर्शिवाद चलता था। यह दादागीरी वाला आर्शीवचन हुआ करता था। फिल्मी दुनिया ने भी सरकार और सरकार राज जैसी फिल्में बना कर बाल ठाकरे को नायक का दर्जा देने में कोई कमीं नहीं रखी थी।

शाहरुख खान की इस प्रतिक्रिया को, जिसे बहादुरी कहना गलत न होगा, को हम बाल ठाकरे का अंत नहीं मान सकते। जनता की प्रतिक्रिया उन्हें गुड नाइट कहने जैसी भी नहीं है। बम्बई में ही उनके बहुत से समर्थक जरूर होंगे जो बदला लेने को उतावले होंगे। मगर इस घटना ने अनायास ही उनको एक बड़ी चुनौती दे दी है और जनता को एक प्रतीक नायक मिल गया है।

Thursday, October 15, 2009

पुस्तक का संपादन

ब्लाग बंधुओ,

इधर मैने एक पुस्तक का संपादन किया है जो पंडित प्रेमशंकर मिश्र के व्यक्तित्व और कृतित्व को लेकर है। इस पुस्तक को फैजाबाद शहर के ही भवदीय प्रकाशन ने प्रकाशित किया है।

पं. प्रेमशंकर मिश्र जी अपने समय के महत्वपूर्ण कवि थे। करीबन साल भर पहले उनका निधन हो गया था। इस पुस्तक का आवरण आप हाशिये पर देख सकते हैं। इस पुस्तक से सम्बन्धित कुछ सामग्री आने वाले दिनों में ब्लाग पर दूंगा।

Monday, March 23, 2009

फ्रीडा

डायरी



फ्रीडा


'यह शव अभी भी साँस ले रहा है।'


फ्रीडा फिल्म के बारे में मुझे बहुत पहले हिन्दी कवि अनिल सिंह ने बताया था। उन्होने यह फिल्म किसी टीवी चैनल पर देखी थी और मुझसे इस फिल्म की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। मैं इस फिल्म को तत्काल नहीं देख पाया। मैने इसे बाद में एक डीवीडी पर देखा तो वाकई यह कमाल की फिल्म लगी। 2002 में बनी यह फिल्म वास्तव में फ्रीडा काहलो के जीवन पर बनी है जो एक मैक्सिकन अतियथार्थवादी चित्रकार थीं और जिनका वैवाहिक जीवन उथल-पुथल से भरा हुआ था। इस फिल्म में सलमा हाएक ने फ्रीडा की भूमिका निभायी है। फ्रीडा अपने युवा जीवन में एक दुर्घटना का शिकार हो जाती है और जीवनभर शारीरिक रूप से निढाल रहती है। अपने दर्द और दुखों को वह अपने चित्रों में बहुत ही मौलिक तरीके से अभिव्यक्त करती है।

युवा फ्रिदा के जीवन में हुई सड़क दुर्घटना उसे निराशा में डुबो देती है। मगर उसके पिता उसे एक कैनवस लाकर देते हैं जिस पर वह चित्र बनाना प्रारम्भ करती है। फिर वह चलना शुरू कर देती है। फ्रिदा का विवाह डीयागो नाम के एक ऐसे पेन्टर से हो जाता है जो वामपंथी है, उन्मुक्त जीवन का आदी है, गैरसमझौतावादी है और फ्रिदा की कला का प्रशंसक है। उसके तमाम स्त्रियों से चले सम्बंधों का फ्रीडा के जीवन पर असर पड़ता है। वह भी प्रेम की तलाश में निकलती है और स्त्रियो तथा पुरुषों से उसके सम्बंध बनते हैं। डीयागो उसे तलाक भी दे देता है। पर बाद में वे पुन: मिलते हैं।

फ्रीडा की जिजीविषा को, उसकी प्रेम की तलाश को यह फिल्म बिना किसी अतिरंजिता के प्रस्तुत करती है। उसके दुख बहुत अधिक हैं मगर वह उन्हे एक कलाकार सुलभ सर्जनात्मक प्रतिरोध के साथ जीती है। इस फिल्म के बहुत से दृश्य पेन्टिग सरीखे हैं और रंगों की उपस्थिति अद्भुत है। पता नहीं क्यों मुजफ्फर अली की फिल्म 'गमन' याद आयी जिसमें कई इस तरह के दृश्य थे। ध्यान देने की बात है कि 'गमन' काफी पुरानी फिल्म है। लेकिन इस फिल्म में बहुत से ऐसे दृश्य हैं जो अतियर्थाथवादी हैं और जो पेन्टिंग्स तक सीमित नहीं।

इस फिल्म की विशेषता इसमें रूसी नेता लियोन ट्रॉटस्की का एक पात्र के रूप में होना भी है जिनकी हत्या का चित्रण भी इस फिल्म में है।

Sunday, February 22, 2009

कपिलदेव की आलोचना पुस्तक

डायरी

कपिलदेव की आलोचना पुस्तक

कपिलदेव हिन्दी साहित्य के सुपरिचित आलोचक हैं। ब्लागर मित्रों में साहित्यिक रुचि के लोग इस नाम से बखूबी परिचित होंगे। उनकी समीक्षाएँ और लेख विभिन्न पत्रि में प्रकाशित होते रहे हैं। बहुत समय से उनकी उनकी आलोचना पुस्तक की प्रतीक्षा थी। अन्तत: यह प्रतीक्षा खत्म हुई और वे अपनी पुस्तक अंतर्वस्तु का सौंदर्य लेकर मैदान में आ गये।

हाल में ही कपिलदेव के अपने ही शहर गोरखपुर में एक भीगी सुबह नामवर जी ने अपनी व्यस्तताओं के बीच समय निकाल कर अन्तर्वस्तु का सौंदर्य का लोकार्पण कर दिया। पुस्तक को विमोचित करते हुए उन्होंने कपिलदेव की समझदारी की भूरि भूरि प्रशंसा की और उनकी कृतियों में निहित आलोचकीय अन्तर्दृष्टि की चर्चा की। 'बाघ' कविता पर उनके लेख की चर्चा करते हुए उन्होंने इसे केदार जी की उक्त कविता पर महत्वपूर्ण समीक्षा माना। कुल मिलाकर नामवर जी ने हिन्दी में एक महत्वपूर्ण आलोचक की पुस्तक का जोरदार स्वागत किया। देर आयद दुरुस्त आयद।

कपिलदेव दर्शनशास्त्र से साहित्य में उतरे हैं इसलिए वे साहित्य के मुद्दों को काफी गहराई तक ले जाकर विचार करते हैं। जो पाठक इस पुस्तक में रुचि रखते हों वे उनकी पुस्तक का मुखपृष्ठ उनके ब्लाग पर देख सकते हैं और अन्य जरूरी बातें जान सकते हैं। इस पुस्तक को मानव प्रकाशन, कलकत्ता ने छापा है।

Tuesday, December 09, 2008

एक बहादुर युवती की याद

डायरी

एक बहादुर युवती की याद

मैं उस युवती को पूरी तरह से भूल चुका था। यदि शिमला जाते वक्त दिल्ली से कालका जाने वाली कालका शताब्दि ट्रेन में वह अखबार न मिला होता तो फिर याद भी न आती। कैसा दुखद है कि हम उन्हें भूल जाते हैं जो अच्छे काम करते हैं। मीडिया भी उन्हें कभी भूले भटके ही याद करता है।

तो वह अखबार था सेक्टर न्यूज और वह अखबार भी सिर्फ चण्डीगढ़ में वितरित होने वाला पाक्षिक। इसमें सूचना थी कि नीरजा भनोत सम्मान चन्दा असानी को दिया गया है। यहीं नीरजा भनोत की याद स्मृति में कौंध गयी जिसने भारत के अपहृत विमान से तमाम लोंगो को बचाया था और अन्त में दो बच्चों को बचाते हुए स्वयं अपहर्ताओं की गोलियों का शिकार हो गयी थीं। यह घटना 1986 की है। और नीरजा को अपने इस वीरता और साहस भरे कारनामें के लिए मरणोंपरांत अशोक चक्र दिया गया था।

भारत के विमान को चार सशस्त्र आतंकियों ने अपहृत कर लिया था। 17 घंटे के तनाव भरे माहौल के बाद अपहरणकर्ताओं ने गोलियाँ चलानी शुरू कर दीं थी। नीरजा भनोत ने साहस और बुध्दिमत्ता का परिचय देते हुए विमान का आपातकालीन द्वार खोल दिया था जिससे बहुत से यात्री बच निकले थे। मगर अंत में दो बच्चों की जान बचाने में नीरजा दिवंत हुई। वे भारत की पहली महिला थ्ीं जिन्हे अशोक चक्र दिया गया था। यही नहीं पाकिस्तान की ओर से उन्हें तमगा-ए-इन्सानियत दिया गया था। अपनी वीरगति के समय नीरजा भनोत की उम्र 23 साल थी।

31.10.2008

Saturday, December 06, 2008

कविता का परिवेश

कविता का परिवेश
रघुवंशमणि

जिस दौर में आज हम कविता की चर्चा कर रहे हैं वह सापेक्षित दृश्टि से तेज परिवर्तनों का समय है। जो परिवर्तन पहले सौ-पचास सालों में होते थे अब वे दो-चार सालों में सम्पन्न हो जाते हैं। आज हम जिस सामाजिक सांस्कृतिक परिवेश में रह रहे हैं, शयद उसकी कल्पना हम स्वयं 1970 के आसपास नहीं कर सकते थे। तकनीकी के तीव्र विकास ने जीवन में क्रान्तिकारी परिवर्तन किये है। 1970 के आसपास गॉवों तक ट्रांजिस्टर/रेडियो की भी पहॅुंच नहीं थी। आज वहीं पर विभिन्न मीडियारूप अपने विभिन्न लुभावने रूप-रंगों के साथ पहुँचे हुए हैं। सूचना क्रान्ति ने लोगों को छपे शब्दों के अतिरिक्त भी बहुत से ऐसे साधन दिये हैं जिनकें द्वारा अभिव्यक्ति और संप्रेशण संभव हुए हैं। ऐसे में निष्चित रूप से कवित की हमारे समय में अवस्थिति पर फिर से विचार करने की जरूरत है। यह मुद्दा हमें स्वाभाविक रूप से कविता की भूमिका से लेकर, कविता की आलोचना और मूल्यांकन के प्रष्नों तक ले जायेगा।
प्रत्येक काल में लोग अपने समय में होने वाले परिवर्तनों के प्रति इस प्रकार की बातें करते रहे हैं। प्रेमचन्द ने भी अपने समय में हो रहे सापेक्षिक रूप से तेज परिवर्तनों की बात की थी। हर युग के विचारषील लोगों को अपना समय पिछले कालों से अधिक तेज परिवर्तनों वाला लगा है। लेकिन यह एक तथ्य है कि विगत बीस-तीस वर्शों में ही परिवर्तन ऐसे हो रहे हैं कि पिछले समय से गहरा अलगाव महसूस हो। यह कोई भावनात्मक बात नहीं है इसके भौतिक प्रमाण मौजूद हैं। रेडियो, ट्रांजिस्टर से टी.वी., आकाषीय चैनल, कम्प्यूटर, इण्टरनेट, टेलीफोन की भौतिक उपस्थिति इसके कुछ प्रमाण है। पारंपरिक मीडियारूपों में भी रूपगत परिवर्तन स्पश्टत: दृश्टिगोचर हुए है। इसी कारण हमारे इस दौर के परिवर्तनों को अभूतपूर्व कहा जा रहा है। यह बात दीगर कि आने वाले समय में परिवर्तन और भी तेज हों, और हमारे बाद की पीढ़ी को हमारा ही समय पिछड़ा हुआ लगे। यह भी संभव है कि ये परिवर्तन किसी ऐसी दिषा मेें फैले कि जीवन षैली पर इसका सीधा प्रभाव कम रहे और आने वाला जीवन इतनी उथल-पुथल से न भरा हो। कुछ लोग इस दौर को संरचनात्मक समायोजन के संक्रमण काल के रूप में भी देखते हैं जिसमें परिवर्तन तेज गति से होते हैं। इस संरचनात्मक समायोजन के बाद संभवत: इस परिवर्तन की गति थोड़ा मंद हो।
फिलहाल विभिन्न मीडिया रूपों मेें कविता क्ी उपस्थिति का सवाल काफी परेषान करने वाला हो सकता है। विषेशकर यदि हम उस पारंपरिक रूमानी सोच के तहत कविता पर विचार करना प्रारंभ करें जिनके तहत कवि, ' भावी का द्रश्टा' और 'विप्लव का स्रश्टा' होता था; या जो 'षाष्वत मूल्यों' की सृश्टि करता था, अथवा जिसके पास 'ईष्वरीय षक्ति' या 'प्रतिभा' होती थी जो पूर्व संस्कारों से प्राप्त होती थी। लेकिन हम में से अधिकांश लोगों को इस प्रकार के भ्रम न होंगे। तथापि 1970 के दशक में कविता की भूमिका की तुलना में यदि आज की कविता को रखें तो यह भूमिका घटी हुई ही लगेगी। कविता के पाठकों की घटती हुई संख्या निरंतर चिन्ता का विशय बनी रही है। इसी सापेक्ष कविता का प्रभावक्षेत्र भी सीमित हुआ है।
कविता को यदि 'मुफलिसों की अंजुमन' तक न भी पहुंचाया जा सके तो उसे कम से कम 'पढ़ी लिखी जनता' तक तो पहुंचाया ही जाना चाहिए। मगर सवाल यह है कि कविता का माध्यम क्या है? कविता स्वयं तो अपना माध्यम होती नहीं। कविता को यथाषक्ति पाठकों तक पहॅुंचाने का कार्य लघु पत्रिकाओं ने ही किया है। मगर हिन्दी के प्रकाशकों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं क्योंकि वे अक्सर लाभ के अर्थषास्त्र के चलते कविताओं को पाठकों तक पहुँचाने के बजाय पुस्ताकालयों तक पहुंचाते हैं। डॉ. मैनेजर पाण्डेय ने ठीक ही कहा है कि हिन्दी के प्रकाशक वास्तव में हिन्दी के अंधकारक हैं। इधर हिन्दी कवियों के कविता संग्रहों के संस्करणों की प्रतियाँ भी काफी कम होती गयीं है। कुछ संग्रहों के प्रकाशन संस्करण 500 प्रतियों तक भी सीमित रहे हैं। कहने का तात्पर्य यह कि हिन्दी में कविताओं के पाठक कई कारणों के चलते कम हुए हैं।
मेरे एक मित्र अक्सर पूछते हैं कि यदि समकालीन हिन्दी कविता का मामला कुछ हजार लोगोें तक ही सीमित है तो फिर उसे लेकर ज्यादा उछल-कूद करने की क्या जरूरत? अगर कविता क्षेत्र में उठने वाले विवाद कुछ ही लोगों तक सीमित है तो फिर उसे ज्यादा महत्व क्यों दिया जाय? कविता को लेकर उठने वाले और उठाये जाने वाले इस प्रकार के प्रष्न अक्सर सिनिकल/नकारात्मक तरीके से सामने आते हैं और उन पर अंग्रेजी की एक कहावत के अनुसार टब के पानी के साथ-साथ बच्चे को भी फेंक देने का आरोप लगाया जायेगा क्योंकि कविता के पाठक कितनें भी कम क्यों न हुए हों, वह चर्चा का विशय बनी रहती है। समाज के एक संकुल में ही क्यों न सही वह गंभीरतापूर्वक समझी जाती है। लेकिन इस तर्क को कविता के पक्ष में आत्ममुग्ध तरीके से या 'संतोशधन' के रूप में नहीं प्रयोग किया जाना चाहिए।
कविता की इस भौतिक स्थिति के प्रति चिन्ता ऐसा नहीं है कि हिन्दी जगत में व्यक्त नहीं हुई । आलोचकों में तो यह चर्चा रही ही, इसके प्रति कवियों में भी एक सजगता दिखाई देती है। अश्टभुजा षुक्ल और संजय चतुर्वेदी जैसे कवियों ने अपना रास्ता बदलकर नयी षैली अपनायी जो जनसामान्य के लिए ग्राह्य हो। जनगीतों के मार्ग तो प्रषस्त ही रहे। नयी कविता की कठिन और दुर्भेद्य षैली की तुलना मे समकालीन हिन्दी कविता सरलता की ओर बढ़ी है। अज्ञेयवादियों की षैली की तुलना में आज की कविता की षैली काफी सरल है। मगर कविता से कम सम्पर्क रखने वाले लोगों में कविता की कठिनाई का मिथक लगातार बना हुआ है। इसका एक बड़ा कारण यही है कि कविता को पढ़ी-लिखी हिन्दी जनता तक व्यापक रूप से पहुंचाने का कोई प्रभावी और व्यापक माध्यम नहीं है। कविता को जनता तक पहुंचा सकने वाले मंचों का अभाव है। इन प्रष्नों के खड़े होने पर हमेषा एक नवजागरण्ा की माँग की जाती है और हिन्दी जनता को कोसा जाता है। लेखक संघों और साहित्यिक संस्थाओं की गंभीर भागीदारी हो सकती है। जनसंस्कृति मंच के कुछ कवियों ने 'युध्द के विरुध्द कविता' के तहत कुछ समयपूर्व ऐसा प्रयास किया था जो सफल भी था। कई अवसरों पर कविता को लेकर जब भी जनता में जाना पड़ा है तो देखा गया है कि उसका प्रभाव अब भी काफी है। कविता को जनता के बीच ले जाने के प्रयासों को आगे बढ़ाने की जरूरत है।

(2)
कविता के लिए जैसी भी भौतिक परिस्थितियां हैं उन्हीं के तहत समकालीन हिन्दी कविता को देखना होगा। कविता का यह भौतिक यथार्थ कविता की भूमिका के निर्धारण के लिए महत्वपूर्ण है। हिन्दी कविता कम लोग पढ़ते हैं इस तथ्य से ही कविता की सीमा को निर्धारित करना फिर भी खतरनाक होगा। कविता के लक्ष्य पाठकों की चर्चा में भी यह तथ्य नहीं भुलाया जाना चाहिए कि कविता के पेषेवर आलोचकों और नियमित पाठकों के अतिरिक्त एक यादृच्छिक पाठक वर्ग भी रहता है जो हमेषा महत्वपूर्ण होता है। फिर मुक्तिबोध के जनता के साहित्य के बारे में व्यक्त यह विचार नहीं भुलाया जाना चाहिए कि जनता के बारे में लिखा गया साहित्य भी जनता का ही साहित्य है।
इन सारे द्वन्द्वों के बीच मुख्यधारा की कविता की बात बिडम्बनापूर्ण लगती है क्योंकि समकालीन हिन्दी कविता स्वयं मुख्यधारा से अलग हैं। मुख्यधारा में तो फिल्मी गीत, ग़जलें और बाजारू संगीत आयेगा जिसका धन्धा अभी भी लाभप्रद है। हिन्दी में कविता लिखकर यष:प्रार्थी तो हुआ जा सकता है पर धनपषु नहीं। समकालीन हिन्दी कविता (जैसा कि बार-बार कहा जाता रहा है) प्रतिरोध और विकल्पों की कविता है और विकल्पों की यह तलाष जारी रहनी चाहिए क्योंकि इन विकल्पों के ठोस, सार्थक और परिवर्तनकारी रूप अभी समाज/संस्कृति में दिखलाई नहीं पड़ते। समकालीन हिन्दी कविता विभिन्न संस्तरों पर लिखी जा रही है और विभिन्नताएं ऐसी हैं कि किसी भी आलोचक को परेषानी में डाल दे। ये कविताएँ अपने वर्चस्व विरोध और सत्ताा प्रतिरोध मे ही अपनी इयत्ताा तलाषती है। पूरी कविता के लिए किया गया सामान्यीकरण 'समकालीन' स्वयं में तमाम तत्वों का एक समुच्च है जिसे पारिभाशित करने में सैकड़ों पन्ने काले किये जा चुके है। यहाँ यदि कई पीढ़ियाँ एक साथ सृजनरत हैं तो एक ही पीढ़ी के कई कवि कई-कई तरह से लिख रहे हैं। इसलिए मुख्यधारा का कोई भी सवाल अपने जवाब मे बेहद सामान्यीकृत और भोथड़ा होगा। उम्रदराज होते कवियों जैसे उदय प्रकाश, स्वप्निल श्रीवास्तव, ज्ञानेन्द्रपति, राजेश जोषी और विनोद कुमार षुक्ल मे ही समानता की तलाश कितनी कठिन होगी।
समकालीन हिन्दी कविता का यही वह यथार्थ है जो आलोचकों के लिए एक चुनौती बनता है। कवि की अपनी अवस्थिति कविता मे अन्तर करने योग्य तत्व पैदा कर देती है। गुजरात के दंगों पर राजेश जोषी, देवी प्रसाद मिश्र और विश्णु खरे की कविताएं अपना अलग-अलग स्वभाव रखती है। यहीं पर देवीषंकर अवस्थी का यह कथन सार्थक होता है कि कविता को समाजषास्त्र या राजनीति की ही दृश्टि से नहीं देखा जाना चाहिए-उसका अन्तर्ग्रथन भी अध्ययन की विशयवस्तु है। हिन्दी आलोचना पर ऐसा न करने का आरोप नहीं लगाया जा सकता । समकालीन हिन्दी कविता की इसी विभिन्नता के चलते आलोचक अपना 'स्टांस' बदलते रहते है।
अक्सर विचार-विमर्ष के दौरान 'मुख्यधारा' पद द्वारा वामपंथ के साहित्य की ओर संकेत होता है। हिन्दी कविता के सन्दर्भ मेंं भी 'मुख्यधारा' पद का यह एक अभिप्रेत हो सकता है। यदि ऐसा है तो यह इंगित करना जरूरी होगा कि समकालीन हिन्दी कविता को किसी 'वाद' के तहत हो रही कविता नही कहा जा सकता । यह बात दीगर की उद्देष्य की एकता के चलते समानताएँ दिखाई दे सकती है। सरोकार एक जैसे होने पर कविताओं की दिषा एक जैसी हो जाती है। अभी कुछ वर्श पहले 'सहमत' द्वारा प्रकाषित असद जैदी द्वारा सम्पादित 'दस बरस' का संदर्भ लिया जा सकता है जिसमें अषोक वाजपेयी से लेकर कुंवर नारायण तक की कविताएँ थीं जो स्वयं को वामपंथी कहना पसंद नहीं करेंगे। कुल मिलाकर यह एक प्रजातांत्रिक सहयोग ही है जिसमें तमाम दिषाओं और विचारों के कवि सरोकारों की एकता के चलते एक स्थान पर खडे दिखाई देते हैं। समकालीन हिन्दी कविता से जुड़े इस तथ्य को साम्प्रदायिकता विरोधी हिन्दी कविता के प्रसंग में प्रमाणित किया जा सकता है।
फिर भी इस तथ्य को स्वीकार करना होगा कि आज की हिन्दी कविता अतिषय राजनीतिक है और यह उसकी पहचान का एक प्रमुख तत्व है। हिन्दी साहित्य के इतिहास में हिन्दी कविता कभी भी इतनी राजनीतिक नहीं थी जितनी की आज है। ऐसे में किसी एक राजनीतिक विचार को (वामपंथ) को मुख्यधारा मानकर कलंकित करना एक तरह का हिन्दुस्तानी मैकार्थीवाद होगा जो कोई स्वस्थ प्रजातांत्रिक बात नही। हिन्दू पुनरुत्थान के दौर मे इस प्रकार की सेंसरषिप के भगवे प्रयास हो चुके ही। यह बताना जरूरी नहीं कि ये सभी प्रयास फासीवाद के ही रूप रहे हैं।
साम्प्रदायिकता के उभार का हिन्दी कविता पर गहरा असर पड़ा। साम्प्रदायिकता विरोधी कविता साम्प्रदायिक फासीवाद के उभार के दौर में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाषित हुई और कुछ पत्रिकाओं ने समय-समय पर इन कविताओं को विषेशरूप से स्थान दिया। चन्दौसी से प्रकाषित होनी वाली पत्रिका 'परिवेष' ने 1992 के बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद अपना साम्प्रदायिता विरोधी अंक ही प्रकाषित किया। इसके बाद से कई पत्रिकाओं ने साम्प्रदायिता विरोधी कविताओं को विषेशरूप से स्थान दिया। इन कविताओं से गुजरते हुए हम हिन्दी कविता में होने वाले कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तनों को रेखांकित कर सकते है। दिसम्बर 1992 से पहले और उसके बाद लिखी गयी तमाम कविताएँ परिवर्तन के दो तथ्यों की ओर संकेत करती है। एक तो यह कि जो कवि पहले से कविताएँ लिख रहे थे उन्होंने साम्प्रदायिकता के प्रष्न को अपने लिए महत्वपूर्ण माना और उन्होंने इस विशय पर प्रमुखता से कविताएँ लिखीं। दूसरा यह कि नये उभरते कवियों ने इस विशय को तत्काल अपनी विशयवस्तु के रूप में चुना। ये कवि इस दौर की उपज थे या थोड़ा पहले से लिख रहे थे। इस क्षोभकारी घटना और इससे जुड़ी साम्प्रदायिक हिंसा ने दोनों पीढ़ियों के कवियों की संवेदना को गहराई से झकझोरा । हिन्दी की समकालीन कविता मे यही वह बिन्दु है जहाँ हम एक विषिश्ट प्रकार के मानववाद की वापसी देख सकते हैं। यह मानववाद, साम्प्रदायिकता का विरोध करने में व्यापक जमीन की प्राप्ति के लिए बना। राजनीति में यदि यह धर्मनिरपेक्ष षक्तियों के ढीले-ढाले गठजोड़ के रूप में दिखायी दिया तो साहित्य में हम इसे मानवीय भूमि पर समेकित होते देख सकते हैं। अषोक वाजपेयी जैसे साहित्य के स्वराज की बात करने वालों से लेकर अतिवाम समर्थकों तक ने इस मुद्दे पर लिखना जरूरी समझा।

(3)
भूमण्डलीकरण और बाजारवाद के विरोध मे हिन्दी मे बहुत सी कविताएँ लिखी गयीं मगर कविता पर उन दोनों आर्थिक परिवर्तनों का कैसा प्रभाव पड़ा यह देखना बाकी है। भूमण्डलीकरण और बाजारवाद ने जिस प्रकार के व्यवसायवाद को बढ़ावा दिया है उसका प्रभाव अब हिन्दी साहित्य पर स्पश्ट परिलक्षित होने लगा है। मूल्यों और नैतिकताओं के स्थान पर अब आर्थिक लाभ और व्यक्तिगत सम्बन्ध अधिक महत्वपूर्ण हो गये है। सर्जनात्मकता में विष्वास कम और सफलता की सीढ़ियों पर विष्वास अधिक बढ़ा है। पुरस्कार लोभ, व्यक्तिगत राजनीति और जोड़-तोड़ ने हिन्दी कविता जगत मे भी दम मारा है। बाजारवाद के दौर में अवसरवाद तेजी से बढ़ा है। कविता धन तो नहीं मगर यष कमाने का एक आसान जरिया नज़र आने लगी है। इस सन्दर्भ में मैं अपने मित्र अश्टभुजा षुक्ल के एक महत्वपूर्ण लेख 'काव्यम् यशसे' की ओर इंगित करना चाहूंगा जो जयपुर से प्रकाषित होने वाली पत्रिका 'कृतिओर' में छपी थी।
भूमण्डलीकरण और बाजारवाद की एक विषेशता यह भी है कि वह जहाँ भी अवतरित होता है जनान्दोलनों को कमजोर करता है, उन्हें नश्ट करता है। इनके नीच प्रवाह में पतित लोग मूल्यों और विचारों से नहीं बल्कि व्यक्तिगत स्वार्थों से प्रचालित होते हैं। हिन्दी कविता में कैरियरिज्म की प्रछन्न प्रवृत्तिा बढ़ती लग रही है जो कि बेहत खतरनाक है। कविता के मूल्यांकन मेें इस ओर आलोचक की दृश्टि जानी ही चाहिए। उत्तार संरचनावादी कृति और कृतिकार को अलग-अलग करके देखने की बात करते हैं और इस सिलसिले में रोलाबार्थ के निबन्ध 'डेथ ऑफ आथर' में व्यक्त विचार सिध्दान्त सूत्र बने।
रोलांबार्थ अपने निबन्ध 'द डेथ ऑफ आथर' में पाठ के लिए लेखक की अनावष्यकता का जिक्र करते हैं और भाशा को अधिक महत्व देते हैं। लेकिन एक ही समय मे एक ही प्रकार की भाशा में लिखी जा रही रचनाओं की वैचारिक अवस्थितियाँ कैसे निर्धारित होगी यदि रचनाकार के अस्तित्व से इंकार कर दिया जाय। हिन्दी जगत में अभी हम इतने इतिहास विहीन या स्मृतिविहीन नहीं है। समकालीन कविता में रचनाकार के जीवन और उसकी कविता के सम्बन्धों मे प्रामाणिकता की प्राप्ति होगी। इस अर्थ मे हमें रचनाकार को पुनर्जीवित करना पड़ेगा।
साहित्य के इतिहास में ऐसे तमाम उदाहरण हैं कि जब रचनाकार के जीवन ने उनकी कृतियों के अर्थ बदल दिये हैं। रचनाकार का जीवन किस प्रकार उसके साहित्य के मूल्यांकन के लिए एक प्रकार की कसौटी बनता है इसके उदाहरण्ा निराला, मुक्तिबोध जैसे कवि हैं। निराला की महाप्राणता उनके जीवन और कृतित्व दोनों के चलते है। मुक्तिबोध की विपन्नता में भी जाग्रत उनके स्व कें षब्द हमारी आत्मा के गुप्त स्वर्णाक्षर बन चुके है। क्या एजरा पाउण्ड और विन्डहम लीविस को पढ़ते समय उनके फासीवादी जुड़ावों को भुलाया जा सकेगा? पॉल डी मान के अपने सम्बन्ध उनकी आलोचना के छद्मों की पोल खोल देते हैं। क्या अटल विहारी वाजपेयी की कविताओं का मूल्यांकन करते समय यह भुलाया जा सकेगा कि उन्हीं के प्रधानमंत्रित्वकाल में गुजरात के भयानक दंगे हुए जिसका उन्होंने समय रहते षमन नहीं किया?
आज के इच्छाधारी साहित्य और साहित्यकारों के दौर में मेरी बातें कुछ लोगों को थोड़ा पुरानी और घिसी-पिटी लग सकती है। उन लोगों के लिए वीरेन डंगवाल की ये पक्तियाँ छोड़ रहा हूँ।

''मजे का बखत है तो इसमें हैरानी क्या है?
हमें भी कैलेन द्यो कुछ मज्जा परेसानी क्या?''

'कुछ कद्दू चमकाये मैंने'

Friday, October 24, 2008

एक पीड़ादायक परिवर्तन

सूचना

एक पीड़ादायक परिवर्तन

ब्लाग मित्रो,

आप लोग मेरे ब्लाग वांगमय को लम्बे समय से पढ़ते रहे हैं। जहाँ तक मुझे जानकारी मिली है इस ब्लाग को देश-विदेश में पढा जाता रहा है। मुझे अपने लेखन पर समय-समय पर टिप्पणियाँ भी प्राप्त होती रही हैं। इस सब के लिए मैं आप सभी का आभारी हॅूं। मैंने यथासंभव यह प्रयास किया है कि यह ब्लाग गंभीर विषयों पर केन्द्रित रहे और इस पर होने वाली चर्चाएँ ऐसी हों कि उनसे कुछ सकारात्मक प्राप्त हो सके। इस बात में मैं कितना सफल रहा बता नहीं सकता। इसका मूल्यांकन आप लोग ही कर सकते हैं।

पिछले दिनों मेरे ब्लाग पर किसी अनाम व्यक्ति ने कुछ व्यक्तिगत आक्षेपकारी और आपत्तिजनक टिप्पणियाँ कीं। इन टिप्पणियों से मुझे और मेरे मित्रों को क्लेश पहुँचा। इन्टरनेट सभी को यह सुविधा देता है कि बिना अपना परिचय बताये कोई भी टिप्पणी की जा सकती है। इसके कुछ सकारात्मक पक्ष अवश्य हैं। मगर इसका नकारात्मक पक्ष यह है कि कोई भी आपके ब्लाग पर उल्टी सीधी टिप्प्णियाँ कर सकता है, गाली-गलौज और गलत शब्दों का इस्तेमाल कर सकता है। इस तरह की बातों से आप अपरिचित नहीं होंगे। उन सज्जन ने वांगमय पर इतनी आपत्तिजनक बातें लिख दी थी कि ब्लाग की गंभीरता नष्ट हुई और यहाँ तक कि मुझे एक पोस्ट ही निकाल देनी पड़ी। इस प्रकार की कुंठित और घटिया मानसिकता के लोग अन्य ब्लागों पर भी यह काम कर रहे हैं और उनके विरुध्द लोग शिकायतें भी दर्ज कर रहे हैं। यह घटियापन वास्तव में हमारे समाज में आ रहे सांस्कृतिक पतन की ओर भी संकेत है। अब लोगों में न तो दूसरों के सम्मान का ख्याल इै और न अपनी ही इज्जत का। खुले आम नेट पर गाली-गलौज हो रहा है और इस गाली-गलौज को ही लोग अपनी वाकपटुता और चतुराई समझ रहे हैं। दूसरों को अपमानित करने में ही एक प्रकार का गर्व अनुभव किया जा रहा है।

वांगमय की प्रकृति एक गंभीर ब्लाग की रही है। आप इस बात से सहमत होंगे कि इस ब्लाग पर गाली गलौज और कुठाग्रस्त मानसिकता के लिए जगह नहीं होनी चाहिए। आखिर विचार-विमर्श के इस मंच को किसी कुंठित मानसिकता के मलमूत्र विसर्जन का स्थान नहीं बनने दिया जा सकता। हम वैसे भी विषाणुओं से अपना बचाव करते ही हैं।

इसलिए दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि अब आप जो भी टिप्पणियाँ प्रेषित करेंगे उन्हे संपादित होने के बाद ही इस ब्लाग पर प्रकाशित किया जा सकेगा। इससे निश्चितरूप से आप सभी को एक प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा जो कि सामान्यत: वांछित नहीं। लेकिन आप मेरी विवशता समझ रहे होंगे। आशा है सहयोग बनाए रखेंगे।


रघुवंशमणि

Monday, October 20, 2008

बिहारी होने का मतलब

डायरी

बिहारी होने का मतलब

महाराष्ट्र में राज ठाकरे के वक्तव्यों और उसके बाद की हिंसक घटनाओं से बड़ी गहरी चिन्ताएँ पैदा होती हैं। यह बड़ी ही अजीब सी बात है कि अपने ही देश में एक प्रदेश का निवासी दूसरे प्रदेश में नौकरी की तलाश में न जा सके। हाल में जो घटनाएँ घटित हुई हैं वे भारत के नागरिकों के अधिकारों को ही निरस्त करने वाली हैं। देश में बहुत सी नौकरियों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर चयन होते हैं और लोग आवेदन करते हैं। अब यदि इस तरह की हिंसात्मक पाबंदियाँ लगायी जायेंगी तो इसका बहुत ही बुरा परिणाम होगा। मान लें कि इसी प्रकार हर प्रदेश के लोग हिंसा के द्वारा दूसरे प्रदेश के लोगों को अपने यहाँ आने से रोक दें तो क्या होगा? लेकिन दिक्कत यह है कि हम सोचने के बजाय अब मारपीट पर अधिक विश्वास करने लगे हैं। समझदारी के लिए सबसे कम जगह बची है।

अब लगता है कि बिहारी होना एक रूपक होता जा रहा है। एक ऐसा रूपक जिसके सामाजिक निर्माण के पीछे हिंसा और वर्चस्व का बोलबाला है। हर वह आदमी बिहारी होने की नियत झेले जो अपने बेहतर भविष्य की कामना करता है, और अपने प्रदेश के बाहर जाना चाहता है। यह दुखद ही है कि हम ऐसे समय में रह रहे है जिसमें हर मुद्दे को बड़ी छुद्र दृष्टि से देखा जा रहा है। जाति, धर्म और क्षेत्रीयता ने ऐसी गहरी विभाजक रेखाएँ खीच दी हैं कि किसी व्यापक सोच की सम्भावना ही खत्म होती जा रही है। हर समस्या का इलाज हिंसा को ही माना जा रहा है और अपनी बात को बलपूर्वक सही सिध्द करने का प्रयास किया जा रहा है। यह स्थिति निश्चित रूप से ऐसी दिशा में ले जायेगी जहाँ से वापस आना बहुत मुश्किल होगा। मगर शायद इस बात को समझने मे ठाकरे जैसे लोग और उनके समर्थक सक्षम नहीं।

अक्सर हम अपने तात्कालिक स्वार्थों को ही सामने रख पाते हैं और व्यापक हितों को नजरन्दाज करते हैं। सही गलत के निर्णय के बजाय हम बस अपने तक ही सीमित रह जा रहे हैं। सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने लिखा है कि जो लोग छोटे दायरों से शुरू होते हैं वे अनतत: स्वयम् पर ही जाकर समाप्त होते हैं। राधाकृष्णन जी ने परोक्षरुप से ऐसी प्रवृत्ति की ओर संकेत किया था जो सर्वसत्तावाद और तानाशाही की ओर ले जाती है। इसके बरक्स समझदारी की संस्कृति ही एक मात्र रास्ता है। मगर यह रास्ता लम्बा है और इसमें कोई शार्टकट नहीं है।

हममें से बहुत लोग अपने गाँव, शहर या राज्य को छोड़कर दूसरी जगहों पर नौकरियाँ करने जाते हैं। हिन्दुस्तान के ऐसे लोगों की संख्या बहुत अधिक है जो विदेशों में रह रहे हैं। ये सभी लोग किसी न किसी अर्थ में बिहारी ही हैं। वे महाराष्ट्र के लोग भी जो बाहर कहीं काम कर रहे हैं। यदि हम महाराष्ट्र में पीटे जा रहे बेरोजगारों की जगह पर स्वयं को रखकर देख सकें तो हम सब बिहारी ही होंगे।

Monday, October 13, 2008

झाँसी की गौरव गाथा

झाँसी की गौरव गाथा


हमारे देश के इतिहास में 1857 का स्वाधीनता संघर्ष स्वर्णाक्षरों में लिखित कालखण्ड है और इस समय की शौर्य गााथा की सबसे उज्ज्वल नक्षत्र महारानी लक्ष्मीबाई हैं। झाँसी की छोटी सी रियासत की भूमिका उस संघर्ष काल के एक दौर में केन्द्रीय हो गयी थी। हम में से अधिकतर लोग झाँसी के बारे में कम ही जानते हैं, शायद वहीं तक जहाँ तक झाँसी का इतिहास लक्ष्मीबाई से जुड़ता है। मगर झाँसी की कहानी लम्बी है और इस कहानी को झाँसी के ही निवासी और वरिष्ठ लेखक/कवि ओमशंकर खरे असर ने एक पुस्तक महारानी लक्ष्मीबाई एवं उनकी झाँसी का रूप दिया है।

यह पुस्तक वास्तव में असर साहब के लिखे गये कुछ लेखों का संकलन है जो उन्होंने जागरण अखबार के लिए एक श्रृंखला के अन्तर्गत लिखे थे। खरे साहब अपनी इस इतिहास की पुस्तक का प्रारम्भ बंगश और मराठों के बीच चल रहे संघर्ष से करते हैं जिसके चलते झाँसी एक शहर के रूप में सामने आया। पेशवा बाजीराव ने पहले-पहल इस क्षेत्र के सामरिक महत्व को देखते हुए यहाँ एक छावनी स्थापित की थी क्योंकि यहाँ से दतिया और ओरक्षा राज्य करीब पड़ते थे जिनपर नियंत्रण जरूरी था। बाद में मराठा सेनानायक मल्हारकृष्ण की हत्या के बाद नारोशंकर झाँसी के सूबेदार बने। उन्होने राज्य की सीमा को बढ़ाया और झाँसी के किले को मजबूत किया। यही नहीं उन्होने झाँसी शहर को बसाने में भी दिलचस्पी दिखायी। पेशवा द्वारा उन्हें वापस बुलाने पर माधवगोविन्द आतिया , बाबूराव कन्हाई और विश्वासराव लक्ष्मण इस के सूबेदार नियुक्त हुए। पानीपत की लड़ाई में पराजय के बाद मराठे कमजोर पड़ गये। 1762 में शुजाउद्दौला ने झाँसी के किले पर कब्जा कर लिया। लेकिन 1763 में ही मराठों ने फिर झाँसी पर कब्जा कर लिया। 1766 तक विश्वास राव लक्ष्मण यहाँ शासक रहे। 1770 में रघुनाथ हरी नेवलकर को झाँसी का शासन संभालने का अवसर मिला।

रघुनाथ हरी नेवलकर से ही वह वंश चलता है जिसकी राजबधू महारानी लक्ष्मीबाई बनी। वे एक प्रतापी शासक सिध्द हुए और उन्होने झाँसी को अवध और सिन्धिया की दुर्भावनापूर्ण गतिविधियों से बचाया। उनके समय में झाँसी ने कई हमलों और षडयन्त्रों का सामना सफलतापूर्वक किया। उन्होने अपने सुशासन द्वारा जनता में अपना प्रभाव बनाते हुए झाँसी में अपने राजवंश की नींव डाली। पच्चीस वर्षो तक शासन करने के उपरांत वे काशी चले गये। उनके छोटे भाई शिवराव भाÅ ने सन 1794 में झाँसँी के सूबेदार का पद संभाला। उनके समय में मराठों की पेशवाई कमजोर हो रही थी और अंग्रेजों का दबदबा भारत में बढ़ता जा रहा था। परिणाम स्वरूप शिवराव भाÅ को अंग्रेजों से संधि करनी पड़ी। उनकी मृत्यु के उपरांत उनका पुत्र रामचन्द्र भाÅ अपने चाचा के संरक्षण में महाराजा बने मगर अल्पायु में ही उनकी मृत्यु हो गयी। इस दौरान अंग्रेजों का सम्पर्क झाँसी से बढ़ा और यह दौर षडयंत्रों का भी था। बढ़ते दबावों के चलते 1817 की संधि के अनुसार झाँसी में अंग्रेजी फोज का रखा जाना स्वीकार किया गया। रामचन्द राव के निघन के बाद अंग्रेजों ने रघुनाथ राव को शासक बनाया जो कुख्यात और कुष्ठ रोग का शिकार था। वह शीघ्र ही कालकवलित हो गया। उत्तराधिकार के विवादों के बीच गंगाधर राव झाँसी के महाराजा बने जिनकी पत्नी महारानी लक्ष्मीबाई थीं।

गंगाधर राव के समय अंग्रेजों ने झाँसी के किले में अपनी सेना स्थापित क्ी। लेकिन इस क्षेत्र में अंग्रेजों के विरुध्द छुटपुट विद्रोह शुरू हो गये थे। गंगाधर राव के समय में झाँसी का विकास हुआ क्योंकि वे एक कुशल और प्रभावशाली शसक थे। मगर वे विधुर हो गये थे उनकी पत्नी रमाबाई का निधन हो गया था। सन्तान प्राप्ति के लिए उनहोने दूसरा विवाह किया था और रानी लक्ष्मीबाई उनकी पत्नी बनकर महल में आयी थीं। असर साहब यह बताते हैं कि लक्ष्मी बाई या मनू का जीवन कितने दुखों से भरा था। इस तथ्य को अब कम ही जाना जाता है। कम ही लोग जानते हैं क्योंकि यह दुख-कथा अब महारानी लक्ष्मीबाई की ऐतिहासिक शौर्य गााथा के नीचे दब सी गयी है। चार साल की उम्र में ही लक्ष्मीबाई की माता का निधन हो गया था। विवाहोपरान्त लक्ष्मीबाई को एक पुत्र हुआ था जो तीन माह बाद चल बसा। फिर महाराजा गंगाधर राव की मृत्यु का कहर उन पर वैधव्य के रूप में टूटा।

लक्ष्मीबाई बचपन से ही प्रतिभाशाली और साहसी थीं। बिठूर में निवास के दौरान उन्होंने राजशाही के कायदे कानून सीखे। व्यायाम, घुड़सवारी वगैरह वहीं से सीखी। झाँसी आने पर शासन व्यवस्था में गंगाधर राव का सक्रिय सहयोग दिया। अपने पुत्र की मृत्यु के बाद गंगाधर राव बीमार पड़ गये और उन्हें झाँसी के विलुप्त होने का भय सताने लगा। झाँसी की भीषण त्रासदी का चरण उनकी मृत्यु थी जिसने अंग्रेजों की सत्ता लोलुपता की कुदृष्टि को अवसर दिया। संग्रहणी के शिकार गंगाधर राव ने अपने अन्तिम दिनों में आनन्द राव को दत्तक पुत्र के रूप में स्वीकार किया जिसकी उम्र पाँच वर्ष की थी। दत्तक विधान के बाद उसका नाम दामोदर राव गंगाधर रखा गया। यह 19 नवम्बर 1853 की बात है। उसी के दो दिन बाद महाराजा गंगाधर राव का निधन हो गया।

गंगाधर राव की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने लैप्स की नीति के तहत झाँसी को हड़पने की चेष्टाएँ आरम्भ कर दीं। महारानी लक्ष्मीबाई ने इसका हर प्रकार से विरोध किया। असर साहब ने अपनी पुस्तक में बतलाया है कि किस प्रकार स्लीमन ने दत्तक पुत्र के अधिकारों के प्रश्न पर दोहरा रवैया अपनाया था। इसी मुद्दे पर दो अंग्रेज प्रशासको एलिस और मैलकम में गहरे मतभेद थे । अत: सारा कुछ अन्तत: डलहौजी की सोच पर टिक गया । गोपनीय ढंग से झाँसी को जबलपुर के कमिश्नर के आधीन कर दिया गया गया और किसी को खबर तक नहीं हुई। अंग्रेजों ने कई मामले में दत्तक पुत्र के अधिकारों को स्वीकार किया था। मगर उनहोंने झाँसी के मामले में उसे नया राज्य मानकर ऐसा करने से इनकार किया। जबकि तथ्य यह है कि पेशवाई के समय से ही झाँसी एक राज्य के रूप में वर्तमान था। झाँसी को नया राज्य बताने को असर साहब अंग्रेजों की घटिया कूटनीति का उदाहरण मानते हैं।

ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर असर साहब बतलाते हैं कि महारानी लक्ष्मीबाई ने इस निर्णय के विरुध्द दो प्रार्थनापत्र कम्पनी सरकार के पास भेजे। ये दो पत्र इस बात के सबूत हैं कि महारानी में गजब की तर्क क्षमता थी। मगर अंग्रेजों ने इन्हे स्वीकार नहीं किया क्योंकि लार्ड डलहौजी की मंशा देशी राज्यों को हड़पकर अंग्रेजी राज्य में मिलाने की थी। परिणामस्वरूप रानी को किला छोड़कर रानी महल में रहना पड़ा। यह उनके लिए बेहद संकटग्रस्त समय था क्योंकि अंग्रेज सेना सभी खजानों को मोहरबंद कर हस्तगत कर रही थी और अभी रानी पति के शोक से उबर भी नहीं पायी थीं कि यह बड़ा राजनीतिक संकट सामने आन पड़ा था। इन भयानक दबावों के बीच महारानी ने हैमिल्टन से बात की जिसका जिक्र असर साहब ने विस्तारपूर्वक किया है। रानी ने अंग्रेजों की पेंशन को अस्वीकार कर दिया क्योंकि उसे स्वीकार करने का अर्थ था झाँसी के राज्य की समाप्ति को स्वीकार कर लेना। इसी दौर में जॉन लैंग के वर्णनों में महारानी के व्यक्तित्व, उनकी आनबान, और उनकी लोकप्रियता का प्रमाण मिलता है। पुस्तक का यह अंश विशेष आकर्षित करता है।

2जून 1857 को झाँसी में सैनिकों ने विद्रोह करना प्रारम्भ कर दिया। मगर रानी ने सही अवसर की प्रतीक्षा की। तेज क्रान्तिकारी गतिविधियों के बीच अपनी कुशल कार्यनीति और नेतृत्व क्षमता के चलते 12 जून को महारानी ने झाँसी का शासन संभाल लिया। महारानी ने 11 माह तक झाँसी पर शासन किया और इस दौर में उनके क्रिया कलापों ने उन्हें जनता में अतिलोकप्रिय बनाया युध्द के अन्तिम दौर में अंग्रेजों ने झाँसी को बरबाद करने का पूरा प्रयास किया। आगजनी से लेकर निर्दोष जनता की हत्या तक का काम किया गया। इस प्रकार 1744 से 1858 तक चलने वाला झाँसी का सम्ध्द राज्य अंग्रेजों की सत्ता लोलुपता का शिकार हो गया। अपनी मृत्यु के समय रानी लक्ष्मीबाई ने अपने पुत्र को विश्वासपात्र सरदार रामचन्द्र राव देशमुख को सौंपा था कि वह उसकी देखरेख करे। झाँसी के राजवंश का यह चिराग लम्बे समय तक बेतवा के धने जंगलों में कुछ विश्वासपात्र लोगों के साथ भटकता रहा। पर बाद में विश्वासघात और पैसे की कमी के चलते उसे आत्मसमर्पण करना पड़ा। दामोदर राव की मृत्यु 1906 में हुई।

झाँसी की कहानी का वर्णन ओमशंकर खरे असर ने आद्योपांत एक झाँसी के ऐसे नागरिक के रूप में किया है जिसे अपनी विरासत से गहरा लगाव है। इसका एक कारण उनके परिवार का स्वयं इतिहास के एक अंश से जुड़ा होना रहा है। झाँसी के इतिहास के कुछ पक्ष विवादों के घेरे में रहे हैं और उन पर इतिहासकारों में मतभेद रहा है। ओमशंकर खरे असर के लेखन की विशेषता यह रही है कि विवादित मुद्दों के सभी पक्षों को हाजिर कर अपना तर्क और पक्ष प्रस्तुत करते हैं। झाँसी और महारानी लक्ष्मीबाई से जुउे विवादों में वे निर्णय बड़े तार्किक ढंग से लेते हैं। इस सिलसिले में उदाहरण के लिए उन्होंने महारानी के जन्म वर्ष के बारे में उन्होने लम्बी छानबीन की है। इसी प्रकार विवाह के समय महारानी की उम्र को लेकर उन्होने गहराई से विचार-विमर्श किया है। उन्होने यह पाया है कि विवाह के समय वे सात वर्ष की नहीं अपितु 15 वर्ष की थीं।

ओमशंकर जी झाँसी के निवासी होने के नाते इतिहास में घटित होने वाली घटनाओं के स्थानों का बखूबी वर्णन करते हैं। वे केवल इतिहास के लेखक न होकर एक साहित्यकार भी हैं। अत: उनकी भाषा में इतिहास लेखक का सूखापन नहीं है। उनकी भाषा सर्जनात्मक है। तथापि वे अपने लेखन में ऐतिहासिक तथ्यों को ही महत्व देते हैं। वे उससे परे की चीजों, जैसे लोक में प्रचलित बातों, को रेखांकित भर ही करते हैं। संक्षेप में यह कि झाँसी के गौरवपूर्ण इतिहास के बारे में रुचि रखने वालों के लिए यह एक जरूरी पुस्तक है।



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समीक्षित पुस्तक: महारानी लक्ष्मीबाई एवं उनकी झाँसी
लेखक: ओम शंकर असर
संपादक: ए. के. पाण्डेय
प्रकाशन: राजकीय संग्रहालय, झाँसी

Thursday, October 09, 2008

ईश्वर, सत्ता और कविता (4)

ईश्वर, सत्ता और कविता (4)

बदलती हुई राजनीतिक परिस्थितियों में ईश्वर के प्रति कविता में भाव बदलते गये हैं। भारतीय जनता पार्टी की धर्म को राजनीतिक हथकण्डे के रूप में अपनाने की नीति का सामान्य जीवन पर प्रभाव पड़ा । आस्तिक लोगों के ड्राइंग रूमों में आशीर्वाद देने की मुद्रा में अनामिका मोड़े खड़े राम के स्थान पर समुद्र को धमकाते धनुङ्ढ हाथ में ताने हुए राम के चित्र दिखाई देने लगे। संघी भाइयों के यहां तो ये चित्र अनिवार्यत: मिलने लगे जिसकी कलाकारी इस बात मे थी कि राम का क्रोध उनकी शक्तिशाली मांसपेसियों में झलकने लगा। भारत के सांप्रदायिक परिप्रेक्ष्य में यह बहुत स्पष्ट था कि 'जलधि जड़' मुसलामान ही थे। अभिवादन के लिए प्रयुक्त होने वाला राम का नाम आक्रामक और हिंसक 'जै श्रीराम' के भयानक उद्धोष मेंं बदल गया। ईश्वर के इस घटिया और स्थूल राजनीतिक प्रयोग ने किसी भी प्रकार के दार्शनिक उदात्ता के लिए स्पेस नहीं छोड़ा।

उत्पात के प्रारंभिक दौर में आयी मानबहादुर सिंह की कविता 'समकालीन ईश्वर की लाचारी' एक दूसरी अवस्थित से लिखी गयी कविता है । इस कविता का रचनाकाल वह समय है जब सांप्रदायिकता की गरज उतनी तेज नहीं थी इस कारण यह कविता अधिक महत्व की हो जाती है । यह कम पढ़ी गयी और लगभग अचर्चित कविता ईश्वर के दुरुप्योग और हिंसा से भरे माहौल में ईश्वर की लाचारी को दर्शाती है। इस मायने में ईश्वर के साथ 'समकालीन' पद का प्रयोग वाकई अर्थपूर्ण है। बाद में लिखी गयी वीरेन डंगवाल की कविता 'दुश्चक्र में स्रष्टा' से इस कविता को मिला कर देखा जा सकता है। यह कविता ईश्वर के पक्ष से प्रस्तुत एक अंधाधुंंध मोनोलाग है या कहें कि विवश ईश्वर का प्रलाप। यहां ईश्वर के मनुष्यता के विरोध में हुए प्रयोंगों को भर्त्सनात्मक ढंग से प्रदर्शित किया गया है।

वीरेन डंगवाल की कविता में 'दुश्चक्र में स्रष्टा' अपनी विडम्बनात्मक अभिव्यक्तियों के चलते महत्वपूर्ण है और इसी कारण उसने हिंदी के पाठकों और आलोचकों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया। कविता मे उपस्थित यह व्यंग्य और विडम्बना का स्वर कविता के अंत तक पहुंचते-पहुचते आक्रोश में बदल जाता है। 'दुश्चक्र में स्रष्टा' कविता का प्रारंभ भगवान के कारीगरी के कमाल के जिक्र के साथ होता है। समकालीन घटनाक्रम के सापेक्ष यह जिक्र व्यंग्य और विडम्बना के स्वर के साथ है।

'अरे, कुत्ते की उस पतली गुलाबी जीभ का ही क्या कहना!
कैसी रसीली और चिकनी टपकदार, सृष्टि के हर
स्वाद की मर्मज्ञ
और दुम की तो बात ही अलग
गोया एक अदृश्य पंखे की मूठ
तुम्हारे मुखड़े पर झलती हुई'

ईश्वर के शानदार कृत्यों का यह विडम्बनापूर्ण वर्णन इस शिकायत के साथ समय के यथार्थ तक पहुंचता है कि भगवान ने अपना कामयाब कारखाना बंद कर दिया है और अब जो कुछ भी इस तथाकथित ईश्वरीय सत्ता के नाम पर है वह बुरा ही बुरा है। क्या अच्छे और आश्चर्यजनक कार्य सम्पन्न करने वाला ईश्वर कहीं विलुप्त हो गया है? आखिर समकालीन तबाहियों के बीच 'रहमानुर्रहीम' या 'करूणानिधान'ईश्वर के अस्तित्व के कोई चिन्ह क्यों नहीं दिखाई पड़ते?

'बाढ़ें तो आयी खैर भरपूर, काफी भूकंप, तूफान
खून से लबालब हत्याकांड अलबत्ता हुए खूब
खूब अकाल, युध्द एक से एक तकनीकी चमत्कार
रह गयी सिर्फ एक सी भूख, लगभग एक सी फौजी
वर्दियां जैसे
मनुष्य मात्र की एकता प्रमाणित करने के लिए
एक जैसी हुंकार, हाहाकार!
प्रार्थना गृह जरूर उठाये गये एक से एक आलीशान!
मगर भीतर चिने हुए रक्त के गारे से
वे खोखले आत्माहीन शिखर-गुम्बद-मीनार
उंगली से छूते ही जिन्हें रिस आता है खून!
आखिर यह किनके हाथों सौंप दिया है ईश्वर
तुमने अपना इतना बड़ा करोबार?'

वीरेन डंगवाल की यह कविता ईश्वर के अस्तित्व और उसके कार्यों को लेकर प्रचलित मान्यताओं और परंपरागत विचारों से प्रारंभ होकर उन्हीं को प्रश्नांकित करती है।इयवर की अनुपस्थिति इस बात में है कि अब उसका इस विश्व पर कोई नियंत्रण नहीं रह गया है।पर सवाल यह हुआ कि यदि इस पर उसका नियंत्रण नहीं तो फिर नियंत्रण है किसका। क्या ईश्वर की कोई वास्तविक सत्ता है भी या यह महज एक परंपरागत असत्य है? क्या ईश्वर नयी क्रूर सत्ताओं सा डर कर भाग गया है? शायद उसका इन क्रूर सत्ताओं से कोई परोक्ष-अपरोक्ष समझौता हो गया हो? कुल मिलाकर कवि के लिए ईश्वर असहनीय हो गया है। यही कानण है कि कविता आक्रोश के ऐसे बिन्दु पर समाप्त होती है जहाँ ईश्वर संबंधी सारी पारंपरिक अवधारणाएँ नष्ट हो जाती हैं।

'अपना कारखना बंद करके
किस घोसले में जा छिपे हो भगवान?
कौन सा है आखिर, वह सातवाँ आसमान?
हे, अरे, अबे, ओ करूणानिधान!!'

युवा कवि पंकज चतुर्वेदी की कविता 'ईसा, बुध्द, हज़रत मुहम्मद के लिए' ईश्वर और पैगम्बरों के नाम पर होने वाली हिंसा और मारकाट का खुलासा करती हुई उसके राजनीतिक प्रयोगों को रेखांकित करती है। भारत ने बुध्द पूर्णिमा के दिन पोकरण में परमाणु विस्फोट किया था तो संकेत का संदेश था 'बुध्द मुस्काराये'। यह विडम्बनापूर्ण संदेश इस ओर ले जाता है कि मनुष्य को नष्ट करने के ङ्ढडयंत्र में ईश्वर का इस्तेमाल हो रहा है। यहाँ ईश्वर की सत्ताा नगण्य है और महत्वपूर्ण है अमरीका, भारत ओर पाकिस्तान की शासन सत्तााएं जो बुध्द, ईसा और हजरत मोहम्मद का इस्तेमाल कर रहे है। यह यूं ही नहीं है कि हिन्दू साम्प्रदायिकता और इस्लामिक बम के साथ-साथ हटिंगटन की पुस्तक भी आ पहुंची है। धर्म और नस्ल को वैधता देने मे ईश्वर कहीं न कहीं उपस्थित होता है।

ऋतुराज के कविता संग्रह 'लीलामुखारविन्द' में ईश्वर की उपस्थिति अनेक ठोस रूपों में दिखलाई पड़ती है। यह उसका कोई भक्तियुगीन साकार रूप नहीं है, मगर है कुछ वैसा ही। वह कहीं न होते हुए भी सर्वत्र उपस्थित है। सभी प्रकार के पापाचारों में वह शरीक है। यही वह लीला है जो सत्ता और शक्ति के विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक क्रियाकलापों में अन्तर्निहित है। ऋतुराज सत्ता के विभिन्न प्रकार के चेहरों के खेल में उसकी उपस्थिति पाते है- यही है 'लीला मुखारविन्द'। कविता 'ईश्वर चरितम्' में ईश्वर न होते हुए भी परेशानी का कारण है, क्योंकि वह तमाम सत्ता प्रतिष्ठानों और शक्ति केन्द्रों के लिए उपकरण बन गया है। प्रात: काल में बजने वाले भजनों से लेकर रात्रि तक, हर समय उसकी उपस्थिति है।

'हत्यारा हत्या करता है ईश्वर के नाम पर
हत्यारे के पक्ष में ईश्वर गवाही देता है
क्योंकि हर अपराध में उसका हाथ होता है।'

यह सब कुछ होते हुए भी ईश्वर नाम का यह 'मुख्य अभियुक्त अदृश्य' रहता है। इस प्रकार वह निराकार और साकार दोनों है। वास्तव मे यह सत्ता प्रतिष्ठानों का वह वर्चस्वी भ्रष्ट रूप है, जो ईश्वर का इस्तेमाल करता है। यहां ईश्वर तलवार भी है और ढाल भी। और कहीं-कहीं तो वह अदृश्य सत्ताानायक है जो स्वयं ही ईश्वर बन बैठता है। यह विडम्बना ही है। अपने समय के सांप्रदायिक और वर्चस्वी शक्तियाें को देखें तो वे ईश्वर सदृश ही हैं। यह ईश्वरत्व तो धरती पर ही साकार है और उसके ठोस रूप खूंखार और डरावने हैं।

''उनके हाथों में खून सनी छडे थी'
चाकू तेजाब की बोतलें भी
अनगिनत हाथ थे जैसे तुम्हारे ही हाथ हों वे''

'श्री ईश्वरचरितम्' कविता में ईश्वर इतना अधिक है कि कवि की नींद हराम है। वह ईश्वर को कोसता है। उसकी उपस्थिति अमानवीय है। ईश्वर के नाम पर सुबह से ही धूम-धड़ाका है। यह ढोंग तो है ही। अपने कुकर्मों को वैधता प्रदान करने का शक्तिपाठ है। ईश्वर ही वह प्रत्यय है जिसके द्वारा हत्याओं को वैधता दी जा सकती है। ईश्वर अदृश्य मुख्य अभियुक्त है। कविता की विडम्बना इस बात में है कि मुख्य अभियुक्त का दो अर्थ है। एक तो ईश्वर जो दिखाई नहीं देता और चारों तरफ है और दूसरी अर्थ है वह सत्ताा जो हर जगह शक्ति के रूप में स्वयं को प्रदर्शित करता है। अपने दौर में राम के नाम पर हुए उत्पातों से जुड़ी दक्षिणपंथी शक्ति सत्ताा के सापेक्ष कविता का अर्थ बहुत साफ होता है। ईश्वर, धर्म और सत्ताा के इस क्रूर और अमानवीय गठजोड़ को यह कविता अपनी चिंता का विङ्ढय बनाती है।

सत्तााएं सदैव प्रत्ययों की मदद से शासन करती हैं और उन्हें अपनी वैधता सिध्द करने के लिए इस प्रकार के उपादानों की सदा ही आवश्यकता रहती है। यह किसी धर्म अथवा नस्ल की श्रेष्ठता से लेकर स्वतंत्रता तक का मुद्दा हो सकता है। बुश जैसे सत्तााधीश यदि इराक की जनता को मुक्त कराने के नाम पर आक्रमण को वैधता प्रदान करते हैं तो हिन्दू राष्ट्र और हिन्दुत्व की श्रेष्ठता का मुखौटा सत्तााछद्म पर पर्दे का काम करती है। इसी प्रकार 'देयर इज नो गाड बट अल्लाह' भी अपना काम करता है। ईश्वर सत्तााओं को किस प्रकार से वैधता प्रदान करता है इसका हमारे समय में इससे बड़ा क्या उदाहरण हो सकता है कि राम के नाम पर साम्प्रदायिकता के नंगे नृत्य को भी वैधता दी जाय। गुजरात के दंगों को उदार हिन्दुओं की स्वाभाविक प्रक्रिया कह कर बच चला जाय। हिन्दुओं की उदारता भी तो इसी बात द्वारा सिध्द की जाती है कि यहाँ असंख्य देवी-देवता है। अस्ल में इन देवी-देवताओं के पीछे सत्ताा एक ही है जिसके हजारों हाथ कहीं अदृश्य से प्रकट होकर जीवन घुस आते हैं और विभिन्न स्तरों पर कार्यरत हैं।

मानववादी कविता से अलग इस नये तौर की कविता दृष्टि की महत्ताा इसी में है कि वह मनुष्य और ईश्वर की सत्ता को एक नहीं देखती। यह ईश्वर की अद्वितीय और सर्वशक्तिमान सत्ताा के प्रति भी मुग्ध नहीं। यह तो और पीछे की बात है। वह दरअस्ल ईश्वर को वर्चस्वी सत्ताा के एक प्रतिनिधि के रूप में देखती है जिसके विभिन्न प्रकार के प्रयोग होते रहे हैं-खासकर भरतीय राजनीति में।

हिन्दी कविता में ईश्वर के प्रत्यय का यह इस्तेमाल अर्तक्य के विरोध में आता है। हमारे समय में उसकी एक ऐतिहासिक उपस्थिति है जिसे सांप्रदायिकता और फासीवाद के विरुध्द खड़े होते हुए देखा जा सकता है। यही कारण्ा है कि इन कविताओं मेें ईश्वर की चर्चा महज एक दार्शनिक प्रत्यय के रूप में नहीं है। यहाँ वह धर्म के सामाजिक और सांस्कृतिक प्रतिफलनों मेें रेखांकित किया गया है। जाहिर तौर पर यह महज एक आस्था का प्रश्न नहीं बनकर रह जाता। इसके विभिन्न आयाम दिखलाई देते हैं। समाज संस्कृति में ईश्वर के प्रत्यय द्वारा एक मनुष्यता विरोधी वर्चस्वी व्यवस्था अथवा सत्ता की स्थापना का यहाँ स्पष्ट विरोध देखा जा सकता है।

प्रकृति और सामान्य जीवन की कविता लिखने वाले नरेन्द्र पुण्डरीक ईश्वर की सत्ता को नहीं स्वीकार कर पाते क्योंकि वह इश्वरीय सत्ता, आततायी सत्ता की समर्थक है ऐसे में ईश्वर की प्रार्थना के लिए शब्द कहां से आयेंगे।

''कैसे चुपचाप रोज
मेरे सपनों का रौंदता हुआ
आकाश से गुजर जाता है
इन्द्र का हाथी,
बताओ तुम्हारी सरोकारहीन
प्रार्थनाओं के लिए
कहां से जुटाऊं शब्द ईश्वर''

सत्ता और शक्ति के केन्द्र्र ईश्वर का इस्तेमाल करते हैं और राम लोगों के हृदय से बाहर कैद में रह जाते हैं- अयोध्या को लेकर चलती राजनीति की कैद में। 'कैसे छीने गये राम' कविता में ऐसे विवश और शक्तिहीन ईश्वर का क्या किया जाय। इस फालतू ईश्वर के बारे में यदि जानकारियां हों भी तो किस काम की।

''ईश्वर के पास न कोई हुनर है
न जानकारी
न वह रस्सी बर सकता है
न गांठ सकता है जूते
खटिया बुनना
बर्तन बनाना
मिट्टी तैयार करना
जैसे छोटे-छोटे काम भी
ईश्वर के बस में नहीं थे''
(ईश्वर के बारे में उसके पास पर्याप्त जानकारी थी।)

ऐसे ईश्वर का एक मेहनतकश के लिए क्या महत्व हो सकता है? सत्ता के लिए जो शोषण और उत्पीड़न का शस्त्र है वह आखिर एक मजलूम के लिए कितना अर्थपूर्ण होगाा। जाहिर सी बात है कि वह नकारात्मक ही होगा।

'ईश्वर अन्न के दाने के
भीतर वैठी पाई है
ईश्वर लकड़ी के भीतर
बैठी घुन है'
(जो इस धरती के खिलाफ है)

वह जीवन में संघर्षरत व्यक्ति के लिए भय है जिसका प्रयोग ब्राह्मणवादी पुरोहिती व्यवस्था सदियों से करती रही है। वह सत्ता के तरफ से फैलाया गया 'राज रोग' है। नरेन्द्र पुण्डरीक द्वारा प्रयुक्त शब्द 'राज रोग' के निहितार्थ गहरे और बहुआयामी हैं। अन्तत: ईश्वर वह सब कुछ है जो मनुष्यता के विरुध्द है अर्थात 'जो इस धरती के खिलाफ है।'

नरेन्द्र पुण्डरीक की ईश्वर संबंधी यह कम चर्चित कविता श्रृंखला विचारधारा के मामले में एक गंभीर हस्तक्षेप करती है। वह प्रगतिशीलता के नास्तिक दर्शन के रास्ते को वैसे ही रेखाकित करती है जैसे नागार्जुन की कविता। मगर यह बिल्कुल बदले हुए संदर्भों में ऐसा करती है। सीतामढ़ी के सांप्रदायिक दंगे का जिक्र करती उनकी कविता में ईश्वर निश्चित तौर पर हमारे समय के संदर्भ में हैं। सीतामढ़ी के सामान्य लोगों के सामान्य स्वप्न थे और उनकी इच्छाओं और संघर्षों में ईश्वर कहीं नहीं था।

'फिर भी वे मारे गये
ईश्वर के नाम पर
उनके जलाये गये घर
ईश्वर के नाम पर
ईश्वर जो कभी था ही नहीं
इस दुनिया में
केवल उसके होने को लेकर
क्यों मारे गये लोग''

यहां कविता में उपस्थित सीतामढ़ी भारत का कोई भी शहर हो सकता है और साम्प्रदायिक उन्माद भड़काने वाले लोग कहीं भी ईश्वर के नाम पर दंगा करा सकते थे। ईश्वर ही उनके लिये वह माध्यम है जिसका इस्तेमाल वे मनुष्य के विरुध्द करते है, सामान्य जीवन का विध्वंस करते हुए।

'कुछ शब्द थे
जो ईश्वर की शक्ल से
बहुत कुछ मिलते जुलते थे
वे उतने ही घृणित
अपवित्र
और धारदार थे
जितना कि ईश्वर
इस वक्त इन शब्दाें से
सीतामढ़ी क्या
तरबूज की तरह
पूरी दुनिया काटी जा सकती है।'

हिन्दी जगत अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में निहायत ही परंपराग्रस्त रहा है। केवल कुछ लेखकों, संस्कृतिकर्मियों के होने से यह सिध्द नहीं होता कि सब कुछ क्रान्तिकारी है। परंपरा अभिविन्यस्त होने में सुरक्षा और मान्यता दोनों मिलती रही है। यही कारण है कि धर्म और ईश्वर की पुनरुत्थानी स्वीकृति यहां की संसदीय राजनीति में प्रतिफलित हुई। ऐसे में ईश्वर की सत्ताा को परंपरा के प्रवाह की एक महत्वपूर्ण धारा के रूप में देखा जाना चाहिए। इसके प्रति शंका, प्रश्न अथवा विद्रोह को परोक्षत: एक पूरी सत्ताा के प्रति होने वाले विद्रोह के रूप में देखा जा सकता है। हिन्दी कविता में इधर उभरते ईश्वर को सिर्फ आज की तात्कालिक सांप्रदायिकता विरोधी राजनीति से अलग एक विशिष्ट ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य मेें देखने पर उसका स्पष्ट अलगाव दिखाई पड़ता है। यह बात भी सच है कि इस प्रतिरोध की अपनी एक परंपरा है, ठीक वैसे ही जैसे कूपमंडूकता और जाहिल परंपरावाद की परंपरा है ही। इसी विवेक से जुड़ी प्राश्निकता की यह ईश निन्दक परंपरा रेखांकित करने योग्य है, भले ही यह धारा अल्पसंख्यक और गौण ही क्यों न हो।

ईश्वर और सत्ताा का प्रश्न हिन्दी कविता में विशिष्ब्ट तौर पर सांप्रदायिकता के सापेक्ष ही सामने आया, मगर वास्तव मेें यह सिर्फ सांप्रदायिकता के उभार भर से जुड़ा एक प्रश्न नहीं। यह उस पूरे अतार्किक के विरुध्द आवाज उठाने की बात है जो तरह-तरह से भारतीय समाज में रचा-बसा है। संस्कृति की अनेकों दैनन्दिन की गतिविधियों में यह अतार्किक विद्यमान रहता है और तमाम महत्वपूर्ण सामाजिक प्रश्नों को पृष्ठभूमि में ढकेलता है।

यदि ईश्वर का प्रत्यय हिन्दी के इन कवियों के लिए सिर्फ एक दार्शनिक प्रत्यय नहीं, तो वह राजनीतिज्ञों के लिए जिस प्रकार एक नीतिगत प्रश्न है वैसा भी नहीं। संसदीय राजनीति में धर्म और ईश्वर के कुटिल प्रयोग होते रहे हैं। सांप्रदायिक दक्षिणपंथी दल उसका सीधा इस्तेमाल अपने राजनीतिक हितो के लिए करते रहे है। यहाँ तक कि टकराव और दंगों के रास्तों को भी नहीं छोड़ा गया। राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद प्रकरण और गुजरात के दंगों के उदाहरण स्थूल और स्पष्टत: रेखांकित करने योग्य हैं, जिसका विरोध इस दौर की हिन्दी कविता ने जोरदार ढंग से किया। मगर धर्म निरपेक्ष राजनीति ने ईश्वर और धर्म की स्पष्ट आलोचना से बचने का ही प्रयास किया। यहॉ वोट प्राप्त करने के लिए यह एक मजबूरी थी। इस प्रकार के प्रयोग सभी राजनीतिक दलों नें किये हैं बस थोड़ा अलग अलग ढंग से।इस पगकार के 'हितसाधन' या 'स्वार्थसिध्दि' से समकालीन कवियों को कोई वास्ता नहीं रहा है हाँलांकि ऐसे कवियों की कविताएँ निहायत राजनीतिक रही है। यह तथ्य सीधी संसदीय राजनीति और नागरिक जीवन से जुड़ी राजनीति के फर्क को तो साफ रेखांकित करता ही है। कविता के सरोकार के व्यापकतर घेरे बनते हैं। यही कारण है कि कविता भक्तियुगीन सर्वशक्तिमान ईश्वर से मनुष्ब्श् में व्याप्त ईश्वर तक पहुँचकर रूक नहीं जाती। वह ईश्वर के एक छोटे से औजार के रूप् में परिवर्तित हो जाने के तथ्य कोउजागर करती है। इस अर्थ में समकालीन हिन्दी कविता हमारे हिन्दी समाज में छाये एक आध्यात्मिक रहस्यवाद का विखंडन करती है।

''लोग कहते हैं कि ईश्वर ईश्वर ईश्वर
क्या वह बना सकता है एक ऐसा बड़ा ढोका
जिसे वह दाँत पीसकर स्वयं ही न उठा सके''

Wednesday, October 08, 2008

ईश्वर, सत्ता और कविता 3

ईश्वर, सत्ता और कविता 3




चिन्तन की एक खास अवस्था में ईश्वर के अस्तित्व पर सवालिया निशान लगने शुरू होते हैं और नास्तिक दर्शन का प्रारंभ होता है। भारत में भगत सिंह के प्रसिध्द लेख '' मैं नास्तिक क्यों हूँ'' से अधिकांश पाठक परिचित होंगे। यह नास्तिकता एक तरह की प्रश्नाकुलता का परिणाम होती है। ऐसी प्रश्नाकुलता जिसके पीछे कई प्रकार की प्रवृत्तियाँ कार्य करती है। एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति है तार्किकता की तलाश जो एक वैज्ञानिक दृष्टि का परिणाम होती है। ईश्वर प्रत्यय को लेकर होने वाली तमाम बहसाें के पीछे इसी तार्किकता की तलाश है जो किसी तथ्य को विवके सम्मत और स्वीकृति योग्य बनाता है। आध्यात्म ने सदैव इस प्रकार की तार्किक और परीक्षणधर्मी प्रवृत्ति का विरोध किया है ओर उसे सीमाबध्द बतलाने की चेष्टा की है।

इस प्रकार की प्रश्नाकुलता के चलते ही आर्य समाज एक दौर मेें ईश्वर से जुड़े ढोंगों का विरोध करता था। मगर यह विरोध अन्तत: नये किस्म के आध्यात्म में जाकर निपट गया। फिर भी यह ध्यातव्य है कि नवजागरण के प्रारंभ की यह प्रश्नाकुलता अपना महत्व रखती है जिसके तार्किक तत्व हिन्दी कविता मे तरह-तरह से उभरते है। 'देवी चबूतरा' जैसी कविता आध्यात्म के दैवीय प्रतिफलन पर चोट करती है। देवी चबूतरा पूजा का एक स्थानीय केन्द्र है लेकिन देवी जी अपने चबूतरे पर पेशाब और संभोग करने वाले कुत्ताों को भगाने तक की सामर्थ्य नहीं रखतीं।पंकज चतुर्वेदी आर्यसमाजी कवि नहीं मगर आर्यसमाजी खण्डन-मण्डन का ही यह विस्तार एक आधुनिक प्रगतिशीलता की ओर ले जाता है और ऐसे तत्व हिन्दी की बहुत सी कविताओं में विद्यमान है।

यही प्रश्नाकुलता अपने आधुनिक शिल्प में विडंबनापूर्ण हो जाती है जब शंकाएँ अविश्वास में बदलती हैं और ढोंग का विरोघ करती हैं। संजय चतुर्वेदी की कविता 'पानी में नबूवत' धर्म और ईश्वर की विसंगतिपूर्ण स्थिति को अपने संरचना के एब्सर्ड में प्रस्तुत करती है। यह संजय चतुर्वेदी के प्रारंभिक दौर की कविताओं मेें से एक है जब वे विसंगतियों के बरक्स कविता में उलट-पुलट कर रहे थे। यह कविता इण्डिया टुडे वर्ङ्ढ 1993 की वार्ङ्ढिकी में प्राकाशित हुई थी। बाद में उन्होंने यह शैली त्याग दी ओर आसानी से संप्रेङ्ढित हो सकने वाली कविताएं लिखी। 'पानी मे नबूवत' ईश्वर और धर्म सम्बन्धी सामान्यत: प्रचलित बातों को उलट-पुलट कर उनमें बैठे अतार्किक तत्वों को सामने लाती है। अर्थात विरुपों का विरुपण। कविता अपने अतारतम्य में ईश्वर की उपस्थिति उसकी तथाकथित तारतम्यता का मजाक उड़ाती है और सब कुछ एक झकझकी सा लगता है।

'सृष्टिकर्ता का दूरदर्शन बूंदों से उतरता है घास पर
सताई हुई धरती पर इलहाम बरसता है।''

खुदा को पाने का रास्ता मसखरी है, ईश्वर ने अवतार नहीं लिया मगर उस पर श्रीमद्भगवत् कृपा रही होगी। 'पालक और सृष्टिपालक का समुचित सेवन/दीन और दुनिया दोनों को फिट रखता है'। फिर खुदा के होते हुए धरती पर सभी नेक लोग पीड़ित है और दुष्ट लोग सुखी तो जरूर वह खुदा अखबार नहीं पढ़ता होगा। कवि छोटा मोटा नबी होता है तो उसकी कविता में नबूवत गर्म तवे पर रखी वर्फ से निकलती भाप की तरह होती है। प्रकृति ईश्वर का काव्य है- वगैरह, वगैरह। कविता के लगभग अराजक माहौल में धार्मिक विचारों की अराजकता बेपर्दा होती है और ईश्वर को लेकर फैलायी गयी वैचारिक बाजीगीरी भूलुंठित होती है। संजय चतुर्वेदी की यह जटिल और कम पढ़ी गयी कविता धर्म और ईश्वर से जुड़ी अवधारणाओं को विखण्डित करने वाली है।