Tuesday, September 04, 2007

आगमन

कविता

आगमन

कहीं कोई रिक्ति नहीं

जमीन फोड़ झंडियाँ गाड़े
घास की हरी सेना
ईंटों के बीच बची मिट्टी में
दबी लेटी दूब दुध्दी छापामार टोलियाँ
अनजानी वनस्पतियों की मिलीशिया
कोने-अतरे, अलग-अलग वर्दियों में
और काई के कई-कई नगर

बिखरी खाली डिब्बियाँ फटे कागज
बुझी पत्रिकाएँ छत-विछत सामान
छोड़ गये जिन्हें जाने वाले गैरजरूरी
पालिथीन की खाली झिल्लियाँ

बासी कलेण्डर कमरे की दीवारों पर
समय के बोझ से लटक आये
मकड़ी के जाले कोनों में
धुएँ के निशान काले

और जहाँ कुछ नहीं था हवा थी
जिसमें चले गये लोगों की गंध

कहीं कोई रिक्ति न थी
हर कहीं से हटानी पड़ी चीजें

थोड़ी मिट्टी लेकर निकलीं घासें लहूलुहान
दूब को नोचना पडा बलपूर्वक रक्तरंजित
ढूँढ-ढूँकर निकाला गया बेनामी वनस्पतियों को
और उचारी गयीं बेरहम खुरपी से
काईयों की परतें
फिर रगड़ कर साफ हुए
जाले और धुएँ के धब्बे

बाहर फूँके गये अनुपयोगी अखबार
कलेंडर पत्रिकाओं सहित बेकार डिब्बे
कंकड़ पत्थर फेंके गये भर कर टोकरियों में

और फिर पोती गयीं दीवारें घायल
धुला गया विवश फर्श

अंत में बची हवा
जिसके लिए जलायी गयी
तेज गंध अगरबत्ती

तब आया सामान परिचित
बिठाया गया जगह-जगह

इतने के बाद और फिर भी
कहाँ जाएगा अहसास
दूसरे किसी के घर होने का



रघुवंशमणि

Monday, September 03, 2007

प्रकाश

कविता

प्रकाश

कितनी आकाश गंगाएँ
कितने नक्षत्र
कितने कितने सौरमण्डल
ग्रह-उपग्रह और
तम के अगणित प्रकाशवर्ष

सबके बीच से हम तुम तक पहुँचे
ऐसा आसान भी नहीं था
सीधे नहीं रहे हमारे रास्ते
किरणों और तरंगों के बीच जीते
हम तुम तक पहुँचे

शुक्र करो
कि हमें नहीं ग्रसा किसी काले ग्रह ने
और हम पहुँचे
तिमिराच्छन्न अनन्त को भेदते
पिण्डों से बचते
उनके गुरुत्वाकर्षण में मुड़ते

देखो हमारे परावर्तन में
सब्ज पत्तियाँ, फूल और फल
दृश्य और चीजें
इन्द्रधनुषों के रंग
धरती, समुद्र, आकाश

वैसे तो सारे रंग तुम्हारी आखों में हैं
और हमारा अपना कोई रंग नहीं


रघुवंशमणि

Sunday, September 02, 2007

प्रक्रिया

कविता

प्रक्रिया

आप कैसे हैं मैने पूछा था
तुमने कहा था कैसे हैं आप

इसी तरह हमने बातें शुरू की थी
जो कि एक कर्मकाण्डी प्रारम्भ था शब्दों को
व्यर्थ की ध्वनियों में बदलने का

आप इसे एकालाप न कहें तो आपका मन
और मन भर गरू बातों के बाद भी
मैं नहीं जान पाया आपका मन और आप मेरा

संभवत: ऐसी कोई आकांक्षा भी न थी
मैंने अपनी हाँकी और तुमने अपनी
हाँकने को ड्राइंगरूम जो था सुसज्जित

उन पति, पत्नी और बच्चों के बारे में
जिनसे हमारा कोई सम्बन्ध बनता था
या नहीं भी बनता था तो क्या

जोर-शोर से हमने चर्चाएँ की
पुस्तकें पढ़ीं और फिल्में देखीं जागकर
बड़े लोगों के बारे में बातें की उत्साहपूर्वक

अखबार हम पढ़ते रहे नियमित
पहले हम रेडियो सुनने के आदी थे
बाद में हमें दूरदर्शन का नशा हुआ

कवि, राजनेता, कलाकार और दार्शनिक
डकैत, दलाल, भ्रष्ट और उच्चके सामान्यत:
हमारी बातों में समरस आते रहे लगातार

नाश्ते के साथ चाय, पान और सिगरेट
हमें इण्टलेक्चुवल सिध्द करने को कम न थे
व्यर्थ और क्षुद्र लोगों के परिवेश में

हम अपने समय में रहे समूचे के समूचे
पत्नियों के द्वारा धुली शर्ट की कालर खड़ी किये
ऑंखों में समय की उदासी का गर्व लिए

वैसे तुम एक सीधे-सादे आदमी थे
मैं भी एक साधारण सा व्यक्ति लगता था
और अनजाने में ही हम धूर्त होते चले गये


रघुवंशमणि

Saturday, September 01, 2007

साहित्य और जीवन में फाँक नहीं होनी चाहिए

व्याख्यान

साहित्य और जीवन में फाँक नहीं होनी चाहिए

[डॉ रामविलास शर्मा आलोचना सम्मान प्राप्त करते समय दिया गया वक्तव्य]


अध्यक्ष मण्डल के सम्मानित सदस्यगण और सुधी मित्रो,

सबसे पहले मैं केदारनाथ अग्रवाल सम्मान समिति और उन्नयन पत्रिका के प्रति अपना आभार ज्ञापित करना चाहूँगा जिन्होने मुझे डॉ. रामविलास शर्मा आलोचना सम्मान के लिए उपयुक्त पात्र समझा और जिसके परिणामस्वरूप मैं आपके सामने दो शब्द कहने के लिए उपस्थित हूँ। प्रगतिशील लेखक संघ, बाँदा महेश अग्रवाल और परिमल प्रकाशन, इलाहाबाद के प्रति भी मैं आभार व्यक्त करना चाहूूंूंॅगा जिनके योगदान का इस सारस्वत उपक्रम में अपना महत्व रहा है। अपने कवि मित्र आशुतोष दूबे को मैं केदार सम्मान पाने के लिए बधाई देता हूँ। वे इस सम्मान के उपयुक्त पात्र हैं।

मित्रो,

हमारे दौर में पुरस्कार लगातार संदेह के घेरे में आते जा रहे हैं। कुछ पुरस्कार तो ऐसे हैं कि जब किसी भी लेखक को वे मिलते हैं तो वह संदिग्ध हो जाता है। अब तो साहित्य के सबसे बड़े पुरस्कार भी संदेह के घेरे में आ जा रहे हैं और वे भी विचित्र कारणों से। वीरेन डंगवाल जैसे प्रतिभाशाली कवि का मामला एक क्लासिक उदाहरण है। ऐसे में इस पुरस्कार का अपना महत्व है जो हिन्दी साहित्य के प्रसिध्द आलोचक डा.रामविलास शर्मा जी के नाम पर दिया जाता है। यह स्वाभाविक और उचित है कि डॉ रामविलास शर्मा आलोचना सम्मान, बाँदा शहर से दिया जाता है जो कवि केदारनाथ अग्रवाल जी का स्थान है। जैसा हम सभी जानते हैं, डॉ रामविलास शर्मा और केदारनाथ अग्रवाल अभिन्न मित्र थे और एक महापुरुष को याद करना दूसरे का भी स्मरण है। लेकिन सिर्फ यही बात नहीं है जो हिन्दी साहित्य की इस महान मित्रता की याद दिलाती है। जो इससे भी महत्वपूर्ण है वह यह कि केदारनाथ अग्रवाल और डॉ रामविलास शर्मा दोनों अपने लेखन के प्रति पूरी संलग्नता रखते थे। केदार जी की कविता और उनके जीवन में कोई फाँक नहीं दिखलाई पड़ती और रामविलास जी ने वही जीवन जिया जिसकी वकालत उन्होने अपने साहित्य में की थी। मैं वैचारिक सहमतियों-असहमतियों की बात नहीं कर रहा। वे अपनी जगह पर होती ही हैं। शर्मा जी के प्रबल विरोधी भी उस जीवन शैली के समक्ष झुक जाते थे जो जीवन मूल्यों पर आधारित थी। जीवन और मूल्यों की ऐसी संलग्नता अब बहुत कम देखने को मिलती है। डॉ रामविलास जी जीवन भर जिस सादगी और ईमानदारी का जीवन जीते रहे वह साहित्य और जीवन में अपने विचारों के प्रति उनके दृढ़ विश्वास की ही अभिव्यक्ति थी।

आज के साहित्य में इस प्रकार की गंभीर संलग्नता का अभाव दिखाई देता है। हमें चारो ओर अवसरवाद की छायाएँ दिखायी पड़ती हैं। शायद यह हमारी बेगैरत संसदीय राजनीति का प्रभाव हो या फिर पूँजी के भौतिकतावाद की अधिकता का परिणाम हो जो क्षुद्र स्वार्थो की ओर ही ले जाती है। यहाँ उदाहरण विशेष द्वारा विवाद पैदा करने की जस्रत नहीं क्योंकि चीजें सामान्य लोगों के लिए भी साफ होती जा रही हैं। कुमार अंबुज ने अपनी एक भविष्यवादी लगने वाली कविता में लिखा है:

रचनाकार भ्रष्ट आचरण करते हुए रहेंगे रचनाशील
और किसी संगठन में शामिल होकर
हो जाएँगे सुरक्षित

संभवत: यह भविष्य के यथार्थ का कुछ अधिक ही भयावह चित्र है। लेकिन यह यथार्थ का एक ऐसा पक्ष अवश्य है जिसे हमारे समय में अनदेखा नहीं किया जा सकता। इस प्रकार के अवसरवाद और समझौतों के पीछे लाभ का फार्मूला काम करता है। यह संभवत: हमारे समय की सभ्यता का विउम्बनापूर्ण प्रतिफलन है कि लेखन का भी उद्देश्य भौतिक लाभ या प्रसिध्दि होता जा रहा है। विडम्बनापूर्ण ढंग से मम्मट के शब्दों में 'यशसे अर्थकृत'े। मेरी बात का यह अर्थ कतई नहीं कि लेखक को सन्यासी या भिखमंगा होना चाहिये, मेरा आशय यह है कि साहित्य और जीवन में सिध्दान्त और व्यवहार की जो फाँक है वह साहित्य का नुकसान करेगी। साहित्य ही नहीं जीवन का भी। बल्कि कहना तो यह चाहिये कि भारी नुकसान हो चुका है और हो रहा है।

कहा जा सकता है कि किसी साहित्यकार के जीवन का उसके साहित्य से क्या लेना देना। इस सिलसिले में कुछ निहायत ही सीधे ढंग के सवाल खड़े किये जाते हैं कि एक बुरा आदमी भी तो अच्छा साहित्य लिख सकता है, तो फिर व्यक्तिगत जीवन का साहित्य के सृजन की गुणवत्ता से क्या लेना देना। लेकिन इस तथ्य को सामान्य पाठक भी जानता है, और एक आलोचक तो और भी अच्छी तरह से जानता है कि साहित्यकार के जीवन का उसकी रचनाओं की सचाई से सीधा मतलब होता है। निराला की महाप्राणता के पीछे सिर्फ वह साहित्य नहीं जिसका उन्होने सृजन किया था। निराला जी का जीवन उनकी रचनाओं के पक्ष में खड़ा दिखाई देता है। अभी हम सज्जाद ज़हीर की जन्मशती मना ही रहे हैं। उनका काम उनके साहित्य को रौशन करने वाला है। योरपियन साहित्य में वैन्डहम लीविस और इजरा पाउण्ड का महत्व इसलिये कम हो गया कि उन्होने फासीवाद का साथ दिया था। इस प्रकार के मूल्यांकनों से बचा नही जा सकेगा। आलोचना इसी अर्थ में रचनाकार को पुनर्जीवित करती है।

हिन्दी के सुपरिचित आलोचक विजयदेवनारायण साही ने इस विषय पर चर्चा करते हुए गुलाब और गुलकंद का उदाहरण दिया था। गुलकंद स्वास्थ के लिए अच्छा होता है मगर उसमें गुलाब की असली सुगंध नहीं होती। आजकल रचनाकारों का स्वास्थ तो अच्छा होता जा रहा है, उन्हे बड़े पुरस्कार और सुविधाएँ प्राप्त हो रही हैं । मगर साहित्य की सुगंध कम होती जा रही है।


इस प्रक्रिया को निर्मित करने में व्यावसायिकता का दबाव निर्णायक वना है। इधर व्यावसायिकता का गुणगाान कुछ ऐसा तेजी से उभरा है कि इसके गलत प्रभावों की ओर से पूरी तरह से ऑंख मूंद लेने की प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है। यह अजीब है कि हिन्दी जगत में उत्तर आधुनिकता का तो विरोध है, मगर व्यावसायिकता का व्यावहारिक समर्थन बढ़ता जा रहा है। व्यावसायिकता ने साहित्य में सिर्फ प्रतिबद्वता के प्रश्न को ही कमजोर नहीं किया है बल्कि आलोचना के क्षेत्र में सतहीपन को बढाया है। समीक्षा कर्म को लगभग प्रचार में बदलते हुए उसने आलोचकों को प्रचारकों में रिडयूस करने का प्रयास किया है। इसके प्रति सचेत होना बहुत आवश्यक है। इसके अतिरिक्त व्यावसायिकता के दूसरे रूप में साहित्य में लटके-झटके ज्यादा दिखाई देते हैं जो शीघ्र प्रसिध्दि पा्रप्त करने के रास्ते बनते जा रहे हैं। विवादए गाली-गलौज और झगड़े अधिक प्रकाशित हो जाते हैं। लोग न तो प्रतीक्षा के लिए तैयार हैं और न ही कठिन परिश्रम के लिए।

इस प्रकार के पतन का परिणाम यह है कि लोगों का साहित्य पर से विश्वास उठता जा रहा है। इसे भी तमाम सामाजिक साँस्कृतिक संस्थाओं की तरह गंभीरतापूर्वक नहीं लिया जाता। लोग इसे भी एक खेल मानने लगे हैं। यह बहुत ही दुभार्ग्यपूर्ण है क्योंकि साहित्य के लिए वह क्षण सबसे विनाशकारी क्षण होगा जब उसे लोग गंभीरतापूर्वक नहीं लेंगे। इसलिए मेरी बात को नैतिकतावादी प्रलाप न मानकर एक आसन्न संकट की ओर संकेत माना जाय।

अब यह सब जैसा भी है साहित्य को इसका प्रतिरोध करना ही चाहिए। इस प्रवाहपतित होते समय में आलोचना की प्रतिरोधी भूमिका का महत्व और अधिक हो जाता है। हिन्दी साहित्य को प्रतिरोध का साहित्य कहा भी जाता है मगर यह प्रतिरोध क्या सिर्फ शब्दों में रहेगा और जीवन में इसका कोई महत्व नहीं होगा? साहित्य की भूमिका यदि समाज के अन्त:करण जैसी है तो इस अन्त:करण को सारी समस्याओं के बाद भी दर्पण की तरह रहना चाहिये। इस दर्पण पर जितनी कम धूल जमी होगी चेहरा उतना ही साफ दिख सकेगा।

संभवत: इस समस्या की ओर किसी तरह से आचार्य शुक्ल जी की दृष्टि गई थी जब उन्होने सचाई की बात की थी। सचाई शब्द को सच्चाई शब्द से अलग करने के लिए उन्होने कोष्ठक में अंग्रेजी शब्द सिंसेरिटी का प्रयोग किया था। अंग्रेजी में यह शब्द संलग्नता के अर्थ में और ईमानदारी के भावार्थ में इस्तेमाल होता है। यही शुक्ल जी का भी तात्पर्य था। यहाँ रचना के मूल्याँकन में कवि के जीवन की महत्ता की ओर संकेत है।

यह पुरस्कार जिस महान आलोचक के नाम पर दिया जा रहा है उनका जीवन लेखकीय सचाई का एक अनुपम उदाहरण था। डॉ रामविलास शर्मा जी के विचारों से तो असहमति हो सकती थी, मगर उनकी लेखकीय ईमानदारी पर कभी संदेह नहीं किया गया। उनके ईमानदारी भरे विचारों के विरोध का भी एक अर्थ था। हिन्दी साहित्य में इस विरोध के बड़े सकारात्मक परिणाम निकले। लेकिन यदि किसी व्यक्ति को अपने लेखन पर इतना भी विश्वास नहीं कि वह उस पर कुछ कदम भी चल सके तो फिर उसके विरोध का भी क्या अर्थ हो सकता है? डा. रामविलास शर्मा और केदारनाथ अग्रवाल जी का साहित्य इसी दिशा में संकेत करता है कि साहित्य और जीवन के बीच के इस द्वैत को यथासंभव दूर करने की जरूरत है।

मैं इस मंच के माध्यम से यही बात साहित्यकारों तक पहुँचाना चाहता हूॅ। मैं स्वयं इस दुहरेपन से अपनी आलोचना को दूर रखने का प्रयास करूॅंगा।

मैं पुन: आप सभी के प्रति आभार व्यक्त करता हॅूं। धन्यवाद।





रघुवंशमणि
09.04.2006
बाँदा

Friday, August 31, 2007

लेखक और प्रकाशक

लेखक और प्रकाशक

हिन्दी जगत में लेखक और प्रकाशक के बीच बनते बिगड़ते सम्बन्धों पर अक्सर अनौपचारिक चर्चाएँ होती रही हैं। बातचीत के दौरान लेखकगण पारिश्रमिक कम मिलने या न मिलने की शिकायत करते रहे हैं। इसके विपरीत प्रकाशक पुस्तकों के न बिकने का रोना रोते रहते हैं। वे यह दलील देते रहे हैं कि पुस्तकें बिकतीं ही नहीं हैं अत: पारिश्रमिक वे दें भी तो कैसे? इधर रायल्टी के मुद्दे पर गगन गिल और महाश्वेतादेवी के वक्तव्यों को लेकर लेखकों और प्रकाशकों के बीच के सम्बन्ध पुन: बहस में आ गये हैं। इस प्रकरण को किसी एक हिन्दी प्रकाशक से जोड़कर देखने के बजाय हिन्दी जगत की सामान्य समस्या के रूप में देखा ताना चाहिए। मेरे विचार से प्रकाशकों की ओर से इस विषय पर बिना किसी पूर्वाग्रह के विचार करने की जरूरत है।

साहित्य के समुचित विकास के लिए लेखकों और प्रकाशकों के बीच सकारात्मक सम्बन्ध होना जरूरी है। साहित्य जगत में प्रकाशन एक व्यवसाय है, मगर यह अन्य व्यवसायों से थोड़ा अलग होना चाहिए क्योंकि साहित्य स्वयं में आदर्शों की वकालत करता है। यदि आदर्श शब्द थोड़ा पुरातनपंथी लगे तो मूल्य की बात की जा सकती है। जीवन मूल्यों के संवाहक साहित्य के प्रकाशकों में लेखकों के अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता जरूरी है।

यह विचित्र सी बात है कि हिन्दी की तुलना में अंग्रेजी के प्रकाशक बेहतर पारिश्रमिक देते हैं। यह तर्क दिया जा सकता है कि अंग्रेजी पुस्तकों का व्यापार अधिक लम्बा-चौड़ा है जिसके चलते वे अच्छा पारिश्रमिक दे लेते हैं। लेकिन यह कोई बहुत मतलब का तर्क नहीं क्योंकि हिन्दी पुस्तकों की खरीद कोई कम नहीं। पुस्तकालयों और सरकारी खरीद ही काफी होती है। अंग्रेजी प्रकाशकों के यहाँ पुस्तक प्रकाशन के समय जहाँ सारी बातें लिखित तौर पर होती हैं वहाँ हिन्दी में अधिकांशत: यह सारा कार्यकलाप मौखिक और आश्वासनधर्मी होता है। एक अंग्रेजी के लेखक ने बताया कि वह पहले हिन्दी में ही लिखता था लेकिन प्रकाशकों का रवैया ऐसा था कि उसने अंग्रेजी में लिखना प्रारम्भ कर दिया क्योंकि वहाँ पैसा ही नहीं सम्मान भी अधिक है।

प्रसिध्द आलोचक डॉ मैनेजर पाण्डेय ने एक बार कहा था कि हिन्दी के प्रकाशक वस्तुत: हिन्दी के अन्धकारक हैं। कारण यह कि वे बिक्री के लिए पाठकों पर बहुत निर्भर नहीं करते। इधर वितरण की एक ऐसी व्यवस्था विकसित हुई है जिसमें पाठक आनुसंगिक महत्व का रह गया है। पाठक के महत्व के घटने के साथ-साथ लेखक का महत्व भी घट गया है। इस दृष्टि से देखें तो यह एक भारी सांस्कृतिक समस्या है जिसकी ओर ध्यान देना जरूरी है। प्रकाशक यह समझता है कि जब सब काम वही कर रहा है तो फिर लेखक को पैसे क्यों दिये जाँय।

हिन्दी के एक लेखक ने जब अपने प्रकाशक से रायल्टी का हिसाब माँगा तो उसने उत्तर में लिखा कि यदि लेखक अपनी प्रकाशित पुस्तकों की सभी प्रतियाँ खरीद ले तो वह रायल्टी दे देगा। यह बेहद अपमानजनक उत्तर था जो किसी भी तरह से उचित नहीं। रायल्टी के लफड़े से तंग आकर बहुत से हिन्दी लेखक अब 'लंप सम' मांगते हैं क्योंकि पुस्तकों की बिक्री का कुछ भी पता लगा पाना लेखक के लिए संभव नहीं होता।

सवाल यह है कि जिन लेखकों को प्रकाशकगण छापते हैं, उनके अधिकारों और सम्मान का ख्याल रखना क्या उनका भी धर्म नहीं है?

डॉ. रामविलास शर्मा सम्मान

डॉ. रामविलास शर्मा सम्मान

अभिमत


डॉ. रामविलास शर्मा आलोचना सम्मान 2005

रघुवंशमणि के आलोचना सम्बन्धी लेखों में जो बात हमें विशेष रूप से आकर्षित करती है वह रचनात्मक ढंग से माक्र्सवादी दृष्टि का विकास है, जिसके आलोक में हम न केवल तत्काल लिखे जा रहे साहित्य, विशेषकर कविता को देखकर समृध्द होते हैं, बल्कि पहले के लिखे साहित्य को भी समझने का एक दृष्टि-विस्तार पाते हैं। इसी तरह चुनी हुई विदेशी आलोचना का जो अनुवाद वे प्रस्तुत करते हैं, वह हमारी दृष्टि और तर्क को बलवती बनाती है। इस तरह समकालीन आलोचना में उनका स्थान मौलिक होता नजर आता है, जो आगे और भी पुष्ट होगा और रामविलास शर्मा की आलोचना पध्दति से और गहराई से जुड़ेगा। इसी को दृष्टि में रखकर उन्हें यह डॉ. रामविलास शर्मा सम्मान 2005 प्रदान किया जा रहा है।

बाँदा, दिनांक 9 अप्रैल 2006

निर्णायक समिति

श्रीप्रकाश मिश्र
पृष्ठपोषक
रा.वि.श.आ.स.


नरेन्द्र पुण्डरीक
संयोजक
रा.वि.श.आ.स.

Tuesday, August 28, 2007

रघुवंशमणि का आलोचनाकर्म

स्वप्निल श्रीवास्तव

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल का एक बहुपठित वाक्य है जैसे-जैसे सभ्यता का विकास होता जाएगा कविकर्म कठिन होता जायेगा। यह बात आज की आलोचना पर भी लागू होती है। थोड़ा आगे चलकर कहा जा सकता है कि साहित्य की सभी विधाओं के समक्ष खतरे और चुनौतियाँ हैं। आलोचना एक गंभीर कर्म है। आलोचक, लेखक और पाठक के बीच सम्पर्क मार्ग की तरह है। हमारे समय की महत्वपूर्ण कृतियाँ आलोचकों के जरिये पाठकों तक पहुँचती रही हैं, चाहे वह मुक्तिबोध का कामायनी का पुनर्मूल्यांकन हो अथवा डॉ रामविलास शर्मा की निराला की साहित्य साधना। वस्तुत: आलोचक ही पाठकों को महत्वपूर्ण कृतियों से परिचित कराता है, आलोचक अपनी अन्तर्दृष्टि से रचना को सही परिप्रेक्ष्य में देखता है और उसका मूल्यांकन करता है।

इधर के जिन युवा आलोचकों ने हमारा ध्यान आकृष्ट किया है उनमें रघुवंशमणि प्रमुख हैं। वे ऐसे आलोचक हैं जिनके पास चीजों को देखने की एक वैचारिक दृष्टि है। वे विचार से होकर आलोचना की दुनिया में आये हैं। अभी हाल में प्रकाशित उनकी पुस्तक समय में हस्तक्षेप इस तथ्य की पुष्टि करती है। यह पुस्तक हमारे समय के महत्वपूर्ण विचारक एडोर्नो, हाबरमास, फ्रेडरिक जेम्सन एवं एजाज अहमद के महत्वपूर्ण लेखों का अनुवाद है। ये सभी हमारे समय के उन प्रसिध्द विचारकों में से हैं जिन्होने साहित्य और संस्कृति पर गहरा प्रभाव डाला है। रघुवंशमणि ने अनुवाद करते समय मूल आशय को अनूदित करने की कोशिश की है, इसलिए इन लेखों की पठनीयता बनी रहती है।

रघुवंशमणि समय और समाज के ज्वलंत प्रश्नों से टकराते हैं और अपने ढंग से व्याख्या करते हैं। साम्प्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता उनका प्रिय विषय है। आजादी के बाद इन पर इतनी बहस हो चुकी है कि ये शब्द अपना मूल अर्थ खो चुके हैं। साम्प्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता ऐसे शब्द हैं जिनकी व्याख्या पक्ष और विपक्ष के राजनीतिक अपने सीमित स्वार्थो को ध्यान में रखकर करते हैं। ये दोनो शब्द दंगों के पहले और दंगों के बाद प्रयोग किये जाने वाले शब्द हैं, इसलिए आजादी के इतने वर्षों बाद असंदिग्ध नहीं हो पाये हैं। अपने लेख धर्मनिरपेक्षता की संस्कृति में रघुवंशमणि कहते हैं किसी भी शब्द के अर्थ को नष्ट करने का सबसे कारगर तरीका है उसे गलत अर्थ प्रदान कर देना। सही अर्थ न मिलने की स्थिति में वह स्वयं बेमतलब हो जायेगा।

रघुवंशमणि धर्मनिरपेक्षता का उद्गम खोजते हैं, उसकी विभिन्न ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में विस्तृत व्याख्या करते है। वह बताते हैं कि धर्मनिरपेक्षता का अवसरवादी संसदीय राजनीति में किस तरह इस्तेमाल किया जाता है, किस तरह वोटों की राजनीति के चलते इस शब्द का सरलीकरण हुआ, कैसे धर्मनिरपेक्षता आधुनिकता से अलग है। धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्रवाद के अन्तर्सम्बंध क्या हैं। यह भी कि मुस्लिमों के हिन्दुस्तान में आने के बाद धर्मनिरपेक्षता शब्द का सर्वाधिक दुरुपयोग हुआ है।

अपने एक अन्य लेख साम्प्रदायिकता संस्कृति के वस्त्र पहनकर आती है में वे तफसील से बताते हैं कि किस प्रकार फासिस्ट शक्तियाँ हमारे सांस्कृतिक जीवन को नष्ट कर रही हैं। उनकी यह भी स्थापना है कि इराक पर अमेरिकी हमले और गुजरात के नरसंहार की घटनाओं को अलग-अलग न देखकर उन्हें एक क्रम में देखा जाना चाहिये। दोनों में नाभिनाल सम्बन्ध है।

हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था में धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता जैसे विषयों को समझने से ज्यादा विरूपित किये जाने के प्रयास किये गये हैं। ये दोनों शब्द राजनीति के अचूक उपकरण हैं।

भीष्म साहनी के उपन्यास तमस पर लिखा गया उनका लेख दास्ताने खिजर उर्फ शैतानियत की ऑंखें अत्यंत महत्वपूर्ण है। वह साम्प्रदायिकता की समस्या और उसके मूल कारणों को सम्यक परिप्रेक्ष्य में समझने का प्रयास है। उनका यह लेख आलोचना के गुरुडम को तोड़ता है और एक किस्सागो शैली में शुरू होता है। तमस पर विचार करते समय वे विभाजन की त्रासदी की भयावहता को हमारे सामने लाते हैं और उसे गुजरात के दंगों से जोड़कर तमस की प्रासंगिकता को सिध्द करते हैं। उनका मानना है कि साम्प्रदायिक उन्माद के वातावरण को जन्म देने और उसे हवा देने में सामाजिक कारक उतने महत्वपूर्ण नहीं होते जितने कि राजनीतिक।

भीष्म साहनी का तमस हमारे आसपास मौजूद है, चाहे वह अयोध्या की घटना हो अथवा गुजरात का नरसंहार। रघुवंशमणि तमस का मूल्यांकन एक कृति के रूप में ही नहीं, एक इतिहास के रूप में भी करते हैं और बताते हैं कि तमस हमारे सामने बहुत सारे राजनीतिक प्रश्न उठाता है।

दरअस्ल एक आलोचक का सरोकार किसी कृति की समीक्षा नहीं बल्कि उसे अपने समाज में जानना है, उसकी प्रासंगिकता पर नये सिरे से विचार करना है। यदि आलोचक का विजन स्पष्ट नहीं है तो उससे यह माँग नहीं की जा सकती। रघुवंशमणि आलोचना में हस्तक्षेप करते हैं और उसे सार्थक अभीष्ट तक पहुँचाते हैं।

रघुवंशमणि ने हावर्ड फास्ट, वी.एस. नायपाल और राही मासूम रज़ा पर अपने ढंग से विचार किया है। नायपाल पर लिखते समय वे एन एरिया ऑफ डार्कनेस में मुस्लिम और ब्राहमण सम्बन्धी अवधारणाओं पर ज्यादा उलझते नहीं हैं, बल्कि अपना ध्यान नायपाल के साहित्यिक अवदान पर ही केन्द्रित करते हैं। वे नायपाल का मूल्यांकन करते हुए यह बताते हैं कि नायपाल के भारत सम्बन्धी लेखन को उनकी स्वयम् की वैचारिक अवस्थिति के सापेक्ष देखते हुए सही परिप्रेक्ष्य में समझा जा सकता है। आग्रहों और अवस्थिति के तमाम उलझे सवालों के बीच नायपाल की भारत सम्बंधी कृतियों को सच के रूप में स्वीकार करने के अपने खतरे होंगे।

इसी तरह राही मासूम रजा के अत्यंत विवादास्पद उपन्यास टोपी शुक्ला के नायक के जीवन की त्रासद और विडंबनापूर्ण स्थिति की समीक्षा करते हुए वे साम्प्रदायिक सवालों से टकराते हैं। वे बताते हैं कि टोपी शुक्ला न हिन्दू बन पाता है और न मुसलमान। समाज में उसके मनुष्य रह कर जीने की सम्भावना भी नहीं रह जाती।

किसी आलोचक के काम का मूल्यांकन करते हुए यह जानना जरूरी है कि वह किस प्रकार की कृतियों और लेखकों का चुनाव करता है। रघुवंशमणि यदि नायपाल भीष्म साहनी , राही मासूम रज़ा का चुनाव करते हैं तो उनकी प्रतिबध्दता में सन्देह नहीं रह जाता।

रघुवंशमणि ने समकालीन कविता पर अपनी आलोचना को केन्द्रित किया है। समकालीन कविता को समझने के लिए उनकी प्रस्थापनाएँ काम आ सकती हैं। अपने लेख क्यों नहीं समझ में आती कविता में कविता के उत्स, पाठक संसार और सम्प्रेषणीयता पर वे सम्यक विचार करते हैं। आज की कविता को ठीक से जानने बूझने के लिए इस लेख में विचार सूत्र मिल सकते हैं। वे मानते हैं, 'हिन्दी कविता अपने सूक्ष्म अर्थो में अतिशय राजनीतिक है और संसदीय राजनीति की आक्रामक और हिंसक मानव विरोधी भाषा के स्थान पर एक विनम्र मगर सघन मानवीय प्रयास में लगी है। यह सब कुछ कविता के उपलब्ध सामाजिक, साँकृतिक क्रिया कलापों की सीमा में हो रहा है।'

हम जिस तरह के खतरनाक समय में रह रहे हैं, उसमें राजनीति से बचा नहीं जा सकता है, वह जीवन हो या कविता, आज के समय में लिखी जा रही कविताओं में नक्सलबाड़ी के दौर की कविताओं से ज्यादा स्पष्ट राजनीतिक आशय हैं। 1980 के आसपास माँ, चिड़िया, बच्चे, घर, व फूल जैसी कविताओं में राजनीतिक विचार सूत्र दिखाई देते हैं।

हमारे सामने फासिज्म के खतरे हैं। साँस्कृतिक साम्राज्यवाद अपने पंख फैला रहा है। मीडिया का प्रभामंडल लगातार विस्तृत हो रहा है। चीजों का मूलस्वभाव बदल रहा है। जीवन में बाजार का प्रवेश हो गया है। किताबों की दुनिया से पाठक अनुपस्थित हो रहे हैं। साहित्य के स्थान पर सूचना का एक प्रतिसंसार निर्मित हो रहा है। इधर उत्तरआधुनिकता का भी हो हल्ला है। केवल समय ने छलांग नहीं लगाायी है, साहित्य की दुनिया भी बदली है। कुरू कुरू स्वाहा, दीवार में एक खिड़की थी, आखिरी कलाम, कलिकथा वाया बाइपास जैसे उपन्यासों का मूल्यांकन क्या आलोचना की पुरानी रीति पर किया जायेगा या उसके उपकरण बदले जायेंगे? कुल मिलाकर यह सोचना कि क्या आलोचना के सौदर्यशास्त्र को बदलना जरूरी है?

मेरी जिज्ञासाओं का कुछ जवाब रघुवंशमणि के लेख सौन्दर्यशास्त्र की समस्याग्रस्तता से मिल जाता है। लेकिन बहुत सारे सवाल फिर भी जीवित रहते हैं। दरअस्ल यह हम जैसे पाठकों के सवाल हैं जिसका जवाब रघुवंशमणि जैसे युवा आलोचकों के पास खोजा जाना चाहिये।

अयोध्या काण्ड और गुजरात के नरसंहार के बाद बहुत सारा पानी और खून सरजू नदी में बह चुका है। सत्ताएँ मृतकों के ढेर पर अपना सिंहासन रखकर सत्ता का संचालन कर रही हैं। यह एक जादुई यथार्थ है कि कुछ लोग भजन कीर्तन करते हुए आये और सत्ता बदल गयी।

इस प्रश्नगत दौर में सत्ता और ईश्वर के बारे में अत्यंत गंभीर विमर्श हुए हैं। मंदिरों में रहने वाले ईश्वर को बाजार में खड़ा कर दिया गया है। राजनीति ने ईश्वर को एक वस्तु में बदल दिया है। इस संदर्भ में रघुवंशमणि के विचारोत्तेजक लेख ईश्वर सत्ता और कविता को पढ़ना एक दिलचस्प अनुभव हो सकता है। इस लेख में नागार्जुन, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, केदारनाथ सिंह, ऋतुराज, अष्टभुजा शुक्ल और अनिल कुमार सिंह के ईश्वर विषयक कविताओं की चर्चा की गयी है। हिन्दी कविता में ईश्वर की उपस्थितियाँ अनेक रूपों में प्रकट होती हैं। यह भी पता चलता है कि किस तरह सत्ताएँ अपने हित के लिए ईश्वर का इस्तेमाल करती हैं।

रघुवंशमणि ने विष्णु खरे, पंकज सिंह, ऋतुराज जैसे कवियों पर भी लिखा है। वे विष्णु खरे की कविता में गद्यात्मकता को अपरंपरागत काव्यविषयों की स्वीकृति मानते हैं। लेकिन अभी विष्णु खरे जैसे कवियों की कविता की प्रयोगधर्मिता पर विस्तृत चर्चा की जानी है भले ही यह उत्कट यथार्थ का मामला हो। लेकिन कविता में जब सम्प्रेषणीयता का सवाल उठेगा बहुत सारे सवालों के जवाब दिये जाने होंगे।

पंकज सिंह के संग्रह पर विचार करते समय वे पंकज सिंह की कविता के उत्स नक्सलबाड़ी आन्दोलन में खोजते हैं और उनके समकालीनों के काव्य सरोकारों का जायजा लेते हैं। दरअस्ल नक्सलबाड़ी की वैचारिक पृष्ठभूमि और इस आन्दोलन से जुड़े हुए कवियों के सरोकारों पर अभी तक सम्यक विचार नहीं हो पाया है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि रघुवंशमणि किसी कृति की आलोचना करते वक्त उसके समय और संस्कृति के बारे में भी गंभीर टिप्पणी करते हैं, इससे एकांगी आलोचना का खतरा नहीं रहता है। उनकी समग्र आलोचना की पद्वति उन्हें अपने समकालीनों से अलग करती है। आलोचना उनके लिए तात्कालिक कर्म नहीं एक उत्तरदायित्व है।

आज के आलोचक के लिए अतिक्रमण औंर हस्तक्षेप बहुत आवश्यक है, लेकिन इसे सार्थक रूप में ही संभव किया जाना चाहिए ताकि अराजक स्थिति न पैदा हो। आलोचक यदि अभिव्यक्ति के खतरे नहीं उठाता है तो उसकी साहित्य में मुक्ति संभव नहीं है।

मुझे उम्मीद है रघुवंशमणि अभिव्यक्ति के खतरे उठायेंगे और अपने आलोचनात्मक विमर्श को विस्तृत करेंगे।




बाँदा
9.4.2006

Tuesday, August 21, 2007

शान्ति की मीनार पर मंडराती चीलें

डायरी

शान्ति की मीनार पर मंडराती चीलें

इधर फिल्म परजानियाँ देखने का अवसर मिला। यह फिल्म तो काफी पहले आ चुकी थी, मगर मैं इसे देख नहीं सका। कुछ तो इस कारण की मेरे नन्हे शहर फैज़ाबाद में यह फिल्म लगी नहीं। फिर इसका काम्पैट डिस्क उपलब्ध नहीं हुआ। हिन्दी के युवा कवि और मेरे मित्र भाई विशाल श्रीवास्तव के सौजन्य से जब इस फिल्म की डी.वी.डी. प्राप्त हुई तो देखने का मौका मिल ही गया। इधर आयी तमाम फिल्मों की तरह यह फिल्म भी अंग्रेजी और भारतीय भाषाओं का मिला जुला काम है।

यह फिल्म गुजरात के दंगों पर आधारित होने के नाते चर्चा में रही और जब इसे देखने का उपक्रम कर रहा था तो यह बात दिमाग में थी कि कहीं बाम्बे जैसी मसालेदार फिल्म न देखने को मिल जाय जिसमें दंगों की कुछ क्लिप्स का इस्तेमाल करके राट्रीय एकता का पाठ पढ़ा दिया गया हो। मगर आखिर मणिरत्नम और इस फिल्म के निर्देशक राहुल ढोलकिया में कुछ तो फर्क होगा ही। फिल्म ने निराश नहीं किया। फिल्म की कहानी इसे मेलोड्रामेटिक होने से बचा लेती है। कहानी के केन्द्र में मुस्लिम समुदाय न होकर पारसी समुदाय है जो मुस्लिम लोगों के बीच रहता है। यह परिवार चार सदस्यीय है जिसमें परजान नाम का एक बच्चा भी है। उसके पिता सायरस यानि नसीरुद्दीन शाह हैं जो सिनेमा चलाते हैं। उसकी माँ शहनाज/सारिका है जो घर का काम करती है। परजान की एक मासूम बहन भी है जिसे वह परजानियाँ नाम के जगह के बारे में बताकर खेल खेलता है।

एक बुजुर्ग गाँधीवादी हैं जिनके पास एलन नाम का एक अमेरिकी गाँधी पर शोध करने आता है। वह जबर्दस्त शराब पीता है और गालियाँ बकता है। छोटू अखबार बेचनेवाला। चाय बेचनेवाला आसिफ मुस्लिम है जो कहता है कि बिगड़े नौजवान देश के मुसलमानों का नाम खराब कर रहे हैं।

ये सारे लोग गुजरात में होने वाले दंगे से प्रभावित होते हैं। जब दंगा होता है तो सायरस फिल्म चला रहा होता है। वह वापस लौटता है तो पूरा मोहल्ला नष्ट हो चुकता है। भागदौड़ में परजान नहीं मिलता। बाकी सारी फिल्म भर बाप, माँ और बहन परजान को खोजते रहते हैं। उन्हें विश्वास है कि परजान उन्हें जरूर मिलेगा। मगर बाद में यह विश्वास टूटने लगता है। अंत में अपने ख्याल में पिता अपने पुत्र की लाश को टावर आफ साइलेंस पर पड़ा देखता है जिसकी ओर चीलें उतर रही हैं।

फिल्म का एक प्रभावशाली दृश्य वह है जिसमें दंगों के पीड़ित लोग दंगाइयों के डर के मारे बयान नहीं देते। मगर एक बार जब डर टूटता है तो सभी अपने-अपने कष्ट बताने लगते हैं।

फिल्म में नसीरुद्दीन शाह का अभिनय तो प्रभावकारी है ही, मगर ध्यान आकृष्ट करती है सारिका जो लम्बे समय बाद इस फिल्म में दिखाई दी है। भावप्रवण अभिनेत्री होने के बाद भी बम्बई ने सारिका के लिए खराब फिल्में ही दीं। कुछ फिल्मों में तो उसे अंग प्रदर्शन के लिए ही रखा जाता था। कमाल हसन से विवाह के बाद तो वह फिल्म जगत से गायब ही हो गयी थी। मगर लगता है कि अपनी दूसरी पारी में वे कुछ अच्छी फिल्में देंगी। फिल्म की कहानी और कहानी के साथ निर्देशक का वर्ताव ऐसा है कि यह एक सीधी सपाट प्रचार फिल्म न बन कर मानवीय पीड़ा का एक वृत्तांत बन जाती है।

Tuesday, August 14, 2007

बाल ठाकरे की सींगें

डायरी

बाल ठाकरे की सींगें

आजादी प्राप्त होने की साठवीं वर्ष गााँठ की पूर्वसन्ध्या पर शिवसेना के सिपाहियों ने आउटलुक के दफ्तर पर हमला किया और काफी नुकसान पहुँचाया। यानि कि स्वतंत्रता के साथ बलात्कार। बात केवल इतनी थी कि इस साप्ताहिक पत्रिका ने खलनायक नाम से छपे एक लेख में शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे का जिक्र किया था। उसमें एक कार्टून भी था जिसमें बाल ठाकरे को हिटलरी अंदाज में दिखाया गया था। बस लगता है कि पुराने कार्टूनिष्ट को अपना यह कार्टून पसंद नहीं आया। उनके गणों ने आउटलुक आफिस में पहुँच कर हंगामा किया और तोड़फोड़ की। लगता है तिनका कहीं दाढ़ी में उलझ गया था।

फिलहाल आउटलुक में प्रकाशित बाल ठाकरे की नन्ही सी प्रोफाइल देखिये:

''इस पूर्व व्यंगचित्रकार और शिवसेना प्रमुख ने लोकतांत्रिक राजनीति को अपने कामकाज की शैली और बड़बोलेपन से एक बेहूदा मजाक बनाकर रख दिया है। सबसे पहले मुम्बई में रहने वाला दक्षिण भारतीय उनकी नफरत का पात्र बना, उसके बाद उनकी यह नफरत मुसलमानों के लिए हो गई।''

इत्यलम्।

पर इतना भी किसी को बर्दाश्त कैसे हो सकता है। विशेषकर जब वह सत्ता और शक्ति के मद में चूर हो। अब यह तो पूछा ही जा सकता है कि क्या हिटलर के सींगें थी?

जी नहीं साहब। उसकी भी पहचान अपने सैनिकों की कारस्तानियों से होती थी।

तितलियाँ

कविता

तितलियाँ


पंख फड़फड़ाती उड़ती हैं तितलियाँ
रोककर अपने पर एकाएक
हो जाती हैं आखों से ओझल

इन्हें पकड़ना कोई कठिन नहीं
अगर ये फूलों पर बैठी हों

मेरे कोट पर आकर बैठ जाती है
मटमैली, सफेद या चमकीली तितली
भूल से या शायद आश्वस्त भाव से

घर नहीं होते तितलियों के
वे फूलों पर ही सो जाती हैं
छत्ते नहीं बनाती हैं शहद के

खुली वादियों में अक्सर
श्रंग बिखेरती हैं तितलियाँ
वतावरएा को खुशनुमा बनातीं


रघुवंशमणि

Sunday, August 12, 2007

यह सब बेहद शर्मनाक है

डायरी

यह सब बेहद शर्मनाक है

हैदराबाद में मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन की कारस्तानियों ने पूरे देश को शर्र्मसार कर दिया है। उनके विवेकहीन नेताओं और कार्यकर्ताओं ने जिस तरह से तसलीमा पर आक्रमण करने की कोशिश की और एक विमोचन कार्यक्रम में उत्पात मचाया वह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। इस कार्यक्रम में अयोजकों और पत्रकारों ने किसी प्रकार लेखिका को सुरक्षित स्थान पर पहुँचाया। इस सब में हाल के शीशे फोड़ दिये गये और कई फोटोग्राफर और पत्रकार घायल हुए।

लेकिन यह सब काफी नहीं था। इस्लाम को बदनाम करने वाले इन हिंसक लोगों ने बंगला लेखिका पर हमला करने की घटना के बाद लेखिका का सर कलम करने की धमकी भी दी है। इस को क्या कहा जाय? इसे बर्बर, धर्मांध, असहिष्णु और विवेकहीन ही कहा जा सकता है। संभवत: ये शब्द भी कम कड़े ही कहे जायेंगे। सबसे शर्मसार करने वाली बात यह है कि ये लोग कानून बनाने वाले राजनेता हैं।

सबसे अजीब बात यह है कि कांग्रेस सरकार के साथ इनका गठजोड़ है।

अकबरुद्दीन ओवैसी जैसे लोगों की बुध्दि पर तरस ही खाया जा सकता है। उनके अनुसार मुसलमानों को राजनेताओं और कार्यकर्ताओं के कृत्यों पर गर्व है। ये मियाँ पूरे मुस्लिम समुदाय के स्वयम्भू नेता बन बैठे हैं। अब इन्हें कौन समझाये की भाई आप इतने ही बड़े नेता होते तो आपको 294 सीटों की असेम्बली में 5 सीटें ही क्यों मिलती? फिलहाल अपने मुँह मियाँ मिठ्ठू बनने में क्या परेशानी है। जिन तीन विधायकों ने यह काम किया था उन्हें कानून ने जमानत पर छोड़ दिया। और उनका स्वागत धर्मधुरन्धरों ने मालाओं के साथ किया। कानून ने औपचारिकताएँ पूरी कीं।

मगर देश भर के मुस्लिम नेताओं ने इस कृत्य का अपनी-अपनी तरह से विरोध किया। जमायते उलेमा-ए-हिन्द के जनरल सेक्रेटरी मौलाना महमूद मदानी ने कहा कि यह विरोध प्रकट करने का सही तरीका नहीं है। उन्होने कहा कि इस्लाम इस प्रकार के प्रदर्शनों की इजाजत नहीं देता। लेकिन उन्होने यह भी कहा कि जमायत के अनुसार तसलीमा नसरीन और सलमान रश्दी जैसे लोंगों को देश में रहने की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए क्योंकि उन्होंने हमेशा इस्लाम और मुस्लिमों को बदनाम करने की चेष्टा की है। एक दूसरे देवबंदी विद्वान मौलाना वारिस मजहरी ने भी इस घटनाकी निन्दा की है और कहा है कि यह सब इस्लाम की शिक्षाओं के प्रतिकूल है।

मुस्लिम बुध्दिजीवियों का एक बड़ा समूह भी तस्लीमा पर हुए हमले की निन्दा करने के लिए आगे आया। हबीब तनवीर और असगर वजाहत ने इसकी घोर निन्दा की। शबनम हाशमी ने कहा कि इन मजलिस इत्तेहादुल मुसलिमीन के नेताओं को क्षमा माँगनी चाहिए। मुसलिम सोशल फोरम ने भी इस घटनाकी आलोचना की।

विभिन्न राजनीतिक दलों ने भी इस घटना की भर्त्सना की।



तस्लीमा को 1994 में लज्जा के प्रकाशन के बाद हुए कट्टरतावादी विरोध और हत्या की धमकियों के बाद बंगलादेश छोड़ना पड़ा था। लेखन समूह पेन और एमनेस्टी इण्टरनेशनल की मदद से वे बाहर जा सकीं। उन्हे स्वीडन में शरण मिली। तब से वे जर्मनी फ्रांस और अमेरिका में बतौर शरणार्थी रह चुकी हैं। भारत में तस्लीमा को दो वर्ष पहले अस्थायी शरण दी गयी है और इस प्रकार वे हिन्दुस्तान में एक शरणार्थी या अतिथि के रूप में हैं। इस तथ्य को देखते हुए यह घटना और भी शर्मनाक लगती है।

सरकार ने कहा है कि वह उनके वीजा पर पुनर्विचार करेगी। अब यदि तस्लीमा को विश्व की सबसे बड़ी डेमोक्रेसी में शरण नहीं मिलेगी तो कहाँ मिलेगी। तस्लीमा ने यह कहा कि वह भारत में एक प्रजातंत्रवादी अर्थात डेमोक्रेट के रूप में रहना चाहती हैं जिसका सीधा अर्थ यह है कि वे भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ रहना चाहती हैं। फिलहाल वे पूरे विश्व भर में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रतीक बन गयी हैं जिनकी तमाम पुस्तकों पर बैन है और उन्हे अनेक अवसरों पर मौत की धमकियाँ मिलती रही हैं। लखनउ के ही कुछ कट्टरपंथियों ने उनकी हत्या करने वाले के लिए 12000 अमेरिकी डालर का इनाम घोषित किया था। लेकिन वे कभी भी कट्टरपंथियों के सामने झुकी नहीं हैं और कट्टरतावाद के विरुध्द लगाातार लिखती रही हैं।

भारत में मुस्लिमों का एक बड़ा समुदाय है जो कट्टरतावादियों के क्रिया कलापों के विरुध्द है और यह मानता है कि इस प्रकार की हिंसक गतिविधियाँ गलत हैं। मगर वहाँ भी तस्लीमा के लेखन को स्वीकार नहीं किया जाता। उनका मानना है कि तसलीमा के भारत में रहने से समस्याएँ बरकरार रहेंगी। उदाहरण के लिए कलकत्ता के इमाम नूरुल रहमान बरकती का यह कहना है कि तस्लीमा को मारा नहीं जाना चाहिए मगर वह भारत में एक परेशानी का कारण हैं। उनके अनुसार वह एक भयानक महिला हैं और उनका भारत से बाहर निकल जाना ही देश के लिए बेहतर होगा।

यह एक ऐसा विचार बिन्दु है जहाँ इस्लाम के प्रति कट्टरतावादी हिन्दुओं को आलोचना का अवसर मिलता है। भाजपा जैसे दल यही कहते हैं कि भारत के मुसलमान किसी भी कीमत पर अपने धर्म की आलोचना सुनने को तैयार नहीं। तस्लीमा ने हिन्दू धर्म के विरुध्द भी काफी कुछ लिखा है।

यह बड़ी अजीब और विडम्बना से भरी बात है कि वे कट्टर मुस्लिम जो लोग आर. एस. एस. और बी. जे.पी. की आलोचना करते हैं, वे अपने व्यवहार में वैसे ही हैं और प्रजातांत्रिक तत्वों का समर्थन नहीं करते। वे तभी तक सेकुलर हैं जब तक वह उनकी सुरक्षा का मामला रहता है। जब मामला दूसरे की सुरक्षा का हो तो वे अपने विरोधियों जितने ही कट्टर दिखाई पड़ते हैं। इसलिए उदारवादी मुस्लिमों को इन कट्टरपंथियों का विरोध करना ही होगा।

इधर यह देखा जा रहा है कि राजनीतिक दल थोड़े से राजनीतिक लाभ के लिए कट्टरपंथी ताकतों के साथ हो लेते हैं। मगर इस के परिणाम भारतीय लोकतंत्र के लिए घातक सिध्द होते हैं क्योंकि ये ताकतें प्रगतिशील मानसिकता वाले लोगों पर हावी हो जाती हैं। पिछले कुछ वर्षें में किसी प्रगतिशील मुस्लिम को प्रतिनिधि मुस्लिम के रूप में प्रस्तुत न करके मुस्लिम धार्मिक नेताओं को ही मुस्लिमों के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा है जिसका दुष्परिणाम हमारे सामने है। ऐसा करने के पीछे वोट बटोरने की राजनीति रही है। इस तरह की तदर्थ राजनीति की जरूरत राजनीति में कमजोर विचारों और कमजोर नैतिक प्रतिबध्दताओं की वजह से रही है। राजनीतिक दलों की स्थिति यह है कि वे ऐसी परंपरावादी विचारधारा वाले लोगों का विरोध करने के बजाय वे उनका समर्थन ही करते हैं। हिन्दू कट्टरता के विरुध्द जिन लोगों को आगे किया जाता रहा है वे सही अर्थों में धर्मनिरपेक्ष नहीं रहे हैं। कुछ अर्थों में वे असहिष्णु भी हो जाते हैं। राजनीतिक दल ऐसा करते हैं तो सिर्फ तात्कालिक लाभ के लिए।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बगैर किसी प्रकार के लोकतंत्र की कल्पना करना ही संभव नहीं। जहाँ स्वतंत्ररूप से विचार की अभिव्यक्ति संभव नहीं होगी, वहाँ लोकतंत्र कैसे आगे बढ़ सकेगा। तस्लीमा पर आक्रमण का प्रयास करने वालों को भारत के संविधान में विश्वास नहीं । वे कहते हैं कि वे पहले मुसलमान हैं और फिर विधायक। वास्तव में वे मुसलमान भी नहीं हैं वे कट्टरतावादी और आतंक के समर्थक हैं। यदि आप इंसा नही नही ंतो फिर मुसलमान कैसे हो सकते हैं। उनसे सरकार को कानूनी ढंग से निपटना चाहिए। भारत में मुस्लिम कट्टरता को निरुत्साहित करना जरूरी है। केवल हिन्दू कट्टरता का सामना ही काफी नहीं। इस प्रकार के कट्टर मुस्लिम संगठनों से हिन्दू कट्टरतावादियों को वैचारिक समर्थन मिलता है।

मगर कानून का इस्तेमाल हमारे देश में कौन करता है। इस पूरे प्रकरण में कानून का इस्तेमाल सिर्फ औपचारिकता निभाने के लिए किया गया। दूसरी तरफ कट्टरतावादियों ने कानून का इस्तेमाल करते हुए तस्लीमा पर मुकदमा दायर कर दिया जिसे पुलिस ने तत्परता से स्वीकार कर लिया। इसके पीछे भी राजनीतिक दबाव और स्वार्थ ही काम कर रहा है।

भारत सरकार को इस मामले में स्पष्टत: तस्लीमा का समर्थन करना चाहिए। ऐसे तमाम अवसरों पर कमजोरी का प्रर्दशन कट्टरवादियों के समर्थन में गया है। हम शाहबानों और सलमान रुश्दी के मामलों को याद कर सकते हैं जिसमें भारत सरकार द्वारा दिखलायी गयी कमजोरी का लाभ हिन्दू कट्टरपंथियों को मिला था। मुसलमानो का एक बड़ा वर्ग उदारवादी है सरकार को उस वर्ग को आगे आने देने का अवसर देना चाहिये। लेकिन लगता है कि सरकार कट्टरतावादियों को ही संतुष्ट करना चाहती है। कम से कम कांग्रेस सरकार का मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन से गठजोड़ यही दर्शाता है। कांग्रेस को ऐसे कट्टरतावादी संगठनों से तुरंत सम्पर्क खत्म करना चाहिए और उनके खिलाफ कानूनी कारर्वाही करनी चाहिए।


रघुवंशमणि
12/8/2007


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Friday, August 10, 2007

समकालीन कविता की भाषा

व्याख्यान

समकालीन कविता की भाषा


सम्मानित अध्यक्ष मंडल के सदस्यगण और दोस्तो,


सबसे पहले मैं केदारनाथ अग्रवाल सम्मान समिति के प्रति, और विशेष तौर पर भाई श्रीप्रकाश मिश्र और नरेन्द्र पुण्डरीक के प्रति, अपना आभार व्यक्त करना चाहॅूंगा जिन्होंने मुझे यहाँ बाँदा के प्रबुध्द श्रोताओं के समक्ष अपने विचार रखने का एक अवसर प्रदान किया है. नीलेश रघुवंशी को केदारनाथ अग्रवाल सम्मान और श्रीराम त्रिपाठी को डाँ रामविलास शर्मा सम्मान प्रदान किये जाने के अवसर पर मैं उन्हें हार्दिक बधाई देना चाहूँगा.

काव्यभाषा कविता का एक तत्व है, मगर एक मात्र तत्व नहीं। ठीक वैसे ही जैसे भाषा का एक तत्व है भाषा, मगर वह भाषा का एक मात्र तत्व नहीं। जिस प्रकार भाषा के ऐतिहासिक, सामाजिक,और सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य हैं, वैसे ही काव्यभाषा के भी हैं।

अरस्तू ने साहित्य को शब्दों के माध्यम से होने वाला अनुकरण कहा था तो वह जिसकी अनुकृति है वह भाषा के बाहर ही है, भले ही उसकी अभिव्यक्ति साहित्य में मात्र भाषा में ही होती हो। यह बात समकालीन कविता के बारे में भी उतनी ही सही है जितनी कि अरस्तू के युग की कविता के बारे में अथवा किसी भी युग की कविता के परिप्रेक्ष्य में। परिप्रेक्ष्य के अभाव में कविता कहाँ खड़ी होगी? शून्य की भीत्ति कोई भी लिखावट संभव नहीं, यह एक कल्पित अवधारणा मात्र हो सकती है।

शास्त्रीय शब्दावली में यह सवाल इस तरह पूछा जा सकता है कि कविता के मामले में काव्यार्थ कहाँ से प्राप्त होता है? निश्चित रूप से समय के परिप्रेक्ष्य ही कविता को अर्थ देते हैं और भाषा का अस्तित्व भी इतिहास और समय सापेक्ष ही है। कविता के सामान्य पाठकों से लेकर विदग्ध आलोचकों तक को 'वाक्' और 'अर्थ' को मिलाकर जिस वस्तु की प्रतिपत्ति होती है उसकी प्रक्रिया का सम्बन्ध इतिहास और समय से अवश्य होता है। 'वाक्' और 'अर्थ' के बीच होता क्या है? किसी पृष्ठ पर अंकित काले अक्षर समकालीन कविता में बदलते ही क्यों हैं? वे किसी और युग की कविता क्यों नहीं हो जाते? ये सब ऐसे प्रश्न हैं जो हमें कविता की भाषा से सम्बन्धित ठोस प्रश्नों की ओर ले जायेंगे। शब्द और अर्थ के बीच ढेर सा व्यापार वह है जिसकी जानकारी हमें कविता की समझ की ओर ले जाती है। अपने समय की घटनाएं, उनका संदर्भ, कवि की उपस्थिति, समाज संस्कृति, राजनीति वगैरह। और यह विश्व परिप्रेक्ष्य हमें कविता का अर्थ अर्जित कराता है।

काव्यभाषा ही वह अन्तिम या सर्वाधिक महत्वपूर्ण आधार नहीं जिसके द्वारा कविता के संघटन को समझने की चेष्टा की जा सकती हो। ऐसे और भी बहुत से तत्व हैं- ऐतिहासिक, सामाजिक, सांस्कृतिक इत्यादि जिनके अभाव में कविता का संघटन को नहीं समझा जा सकेगा। कम से कम समकालीन कविता के संघटन को तो बिलकुल नहीं। अत: र्सिॅ भाषा के आधार पर कविता के बारे में कुछ कहना उपयुक्त न होगा। काव्य भाषा के अध्ययन को लेकर भी आलोचकीय सतर्कता जरूरी हैं क्योंकि महज भाषा का अध्ययन संभव है कि समकालीन कविता के काव्यार्थ के तमाम महत्वपूर्ण पक्षों से वंचित कर दे। लेकिन इससे भी बड़ा खतरा इस बात का है कि ऐसा अध्ययन किसी गहरे आलोचकीय पूर्वाग्रहों की ओर लेजाय जो कविता को समझने के सामान्य विवेक को ही धुंधला करे या नष्ट ही कर दे।

इसी कारण काव्य भाषा पर विचार करते समय कविता के अन्य तत्वों का भी ध्यान बना रहना चाहिए जो कविता के अर्थ को अनुकूलित करते हों। इस इतिहासबध्दता से आलोचक का सरोकार होना ही चाहिए खासकर समकालीन कविता के अध्ययन के सिलसिले में बीते हुए समय की कविता का निर्वचन इस इतिहासबद्वतासे परे जाता है तो इसका कारण सीधा यह है कि आज वह अपने तात्कालिक समय से अलग हटकर पढ़ी जा रही है। कविताओं की बदलती व्याख्याएँ स्वयं इस इतिहास बद्वता का प्रमाण हैं।

काव्यभाषा के अध्ययन के सिलसिले में भी यह ऐतिहासिकता देखनें योग्य है। भाषा के अध्ययन के तरीके बदलते रहे हैं। भारतीय काव्यशास्त्र में गुण, अलंकार, वक्रोक्ति और ध्वनि कुल मिलाकर भाषा को ही देखने के तरीके रहे हैं। आज की कविता के लिए, उसके अध्ययन के लिए यदि ये शस्त्र बहुत कारगर नहीं बचे तो उसके ऐतिहासिक कारण हैं। काव्यभाषा के संदर्भ में व्यक्तिगत अभिरूचि के भी तत्व किसी पाठक अथवा आलोचक के लिए महत्वपूण्र् ा हो सकते हैं जिसके उदाहरण मिलते ही हैं। मगर इन तत्वों को एक सीमा से आगे खींचने के अपने आलोचकीय खतरे हैं।

इसी संदर्भ में हम काव्यभाषा के निर्वचन की सापेक्षिक स्वतंत्रता का सवाल उठा सकते हैं। किसी कवि की विशिष्ट भाषा को लेकर विभिन्न समयों या एक ही समय में भिन्न भिन्न प्रकार के विचार बन ही सकते हैं। कबीर की काव्यभाषा को लेकर आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेदी के विचार अलग अलग थे ही।हमारे समय में भी एक ही प्रकार की काव्यभाषा को लेकर अलग अलग विचार दिखाई दे सकते हैं।

कविता की सापेक्षिक स्वतंत्रता के साथ कविता के मूल्यांकन की भी सापेक्षिकता दुर्निवार है। यह ऐतिहासिक अनिवार्यता किसी भी प्रकार के काव्य मूल्यांकन की सीमा होगी। सवाल यह उठता है कि ऐसे में एक आलोचक की क्या भूमिका होगी? ऐसे में कविता की आलोचना क्या एक प्रकार का 'डिटर्मिनिज्म' होगी ? मूल्यांकन की सापेक्षिकता मूल्यांकन की सीमा भी होगी । आलोचक की महत्तर भूमिका इस बात मे निहित होती है कि वह कविता के साथ चलते चलते कितना वस्तुनिष्ठ हो सकता है । यहाँ वस्तुनिष्ठता का मतलब उस प्रयोगिक वस्तुनिष्ठता से कतई नहीं जो वैज्ञानिक प्रयोगों में वांक्षित होती है। यह 'डिसइन्टरेस्टेड इन्डिवर' इस बात में है कि आलोचक किसी कृति के पाठ के सिलसिले में उसकी जो पुर्नरचना करता है वह मूल के कितनी करीब है। यह एक आदर्श ही है क्योंकि अक्सर विचारकों / आलोचकों की अपनी अवस्थिति भी उसके पाठ और मूल्यांकन को गहराई से प्रभावित करती है। अक्सर वह रचनाके मूल से निर्वचन की दूरी भी तय करती है।

इस प्रकार विषय और माध्यम के साथ निर्वचन भी उपस्थित होता है और माध्यम की मीमांसा दरकार होती है। भाषा और कथ्य के बीच बनते संबन्ध निश्चित तौर पर अघ्ययन की विषय वस्तु हैं । अत: भाषा का प्रश्न अपनी महत्ता बनाये रखता है। भाषा कविता में सिर्फ विषयवस्तु को पाठक तक पहुँचाने का साधन भर नहीं रहती वह और भी बहुत कुछ उद्धाटित करती है। आलोचक द्वारा काव्यभाषा के अध्ययन का महत्व इसमें निहित है कि वह कविता की रचनाप्रक्रिया और सम्प्रेषण प्रक्रिया में भाषा की भूमिका को रेखांकित कर सके। ऐसी आलोचना प्रक्रिया विश्लेषणात्मक होने के साथ साथ सर्जनात्मक होने के लिए मजबूर है।

समकालीन कविता के संदर्भ में यह मजबूरी ज्यादा बड़ी है क्योंकि यह कविता किसी अखंडता अथवा ऐकांतिकता की अवधारणा में निर्मित न होकर समय के साथ होते संवाद और टकराहट की प्रक्रिया का परिणाम है। इसलिए समकालीन कविता के आलोचक के लिए यह एक बड़ी चुनौती है कि वह अपनी व्याख्याओं के लिए मूल कृति के निकटतम रहे। आलोचनात्मक अतियों क िबीच उसे कविता के साथ रहना होगा। जाहिर है कि यह भी आलोचना की स्वायत्तता न होकर उसकी सापेक्षिक स्वायत्तता है। यह अतियों के बीच संतुलन की चेष्टा है जो किसी संवाद की ओर ले जा सकती है। उदाहरण के लिए स्त्री विमर्श और दलित विमर्श की अतियों के बीच आलोचना की एक सार्थक भूमिका हो सकती है?

भाषा वह माध्यम है जिसके द्वारा किसी भाव, विचार अथवा सामाजिक स्थिति की अभिव्यक्ति होती है। लेकिन इस भाषा के माध्यम को कथ्य से बिल्कुल काटकर अलग नहीं किया जा सकता। जिस प्रकार कथ्य अथवा विषयवस्तु को माघ्यम से के बिना नहीं जाना जा सकता है, उसी प्रकार माध्यम की उपलब्धि भी बिना विषयवस्तु के कैसे होगी? भषा यदि कविता का फार्म बनाती है तो कन्टेन्ट के बग़ैर वह अमूर्त ही रहेगी। कविता के निर्वचन के लिए दोनों की आवश्यकता होगी। दोनों को एक दूसरे द्वारा ही समझा जा सकता है और हम उन दोनों के द्वारा तीसरे तक पहुँचते हैं। यह तीसरा क्या है? संभवत: यही सारी आलोचना का उद्देश्य है।

आलोचना में विसंगतियाँ अक्सर इसी त्रिकोणीय असंतुलन के कारण होती है। जिन पर कुछ प्रकाश डॉ नामवर सिंह ने अपनी पुस्तक 'कविता के नये प्रतिमान' में डाला था। (देखें पृष्ठ 102)। नामवर जी का यह ऐतिहासिक विवेचन बहुत महत्वपूर्ण है। लेकिन यह उनका बहुत पहले का विमर्श है। इतने समय बाद उसमें काफी कुछ और जोड़ने की आवश्यकता है।

फैज़ाबाद में रहने वाले हिन्दी के प्रसिध्द आलोचक डॉ रमाशंकर तिवारी कहा करते थे कि हिन्दी के अधिकांश आलोचक कविता के चारो तरफ तलवार भाँजते हैं। वे कविता के भीतर प्रवेश करने का साहस नहीं करते हैं। वास्तव में अपने रूपकात्मक वक्तव्य के द्वारा वे इस ओर इंगित करना चाहते थे कि हिन्दी के आलोचक कविता की अंदरूनी संरचना और उसकी भाषिक प्रकृति से दो चार नहीं होना चाहते। यह एक महत्वपूर्ण बात है। भाषा के अध्ययन के द्वारा हम ऐसी चीजों तक पहुँच सकते है, जिन तक कवि के जीवन चरित, उसके परिवेश, और सरोकारों के अध्ययन द्वारा नहीं पहुँचा जा सकता। इन बाह्य साक्ष्यों का अघ्ययन सरल भी है और इस कारण आलोचकगण सुविधापूर्वक स्वयं को वहीं तक सीमित कर देते हैं। वास्तव में भाषा और कविता के बाह्य साक्ष्यों को एक साथ रखकर ही कविता की एक पूरी समझ विकसित हो सकती है।

कविता के बारे में कोई भी संतुलित निर्णय तभी दिया जा सकता है जब हम भाषा, कथ्य और संदर्भ को एक साथ प्रस्तुत कर सकें। यह निश्चित है कि भाषा के माध्यम से हम कविता के प्रभावशाली होने अथवा न होने का मूल्यांकन कर सकते हैं। भाषा के तत्वों द्वारा ही हम कविता में उपस्थित कवि के अनुभव की सही व्याख्या कर सकते हैं। उसकी शक्ति को भी सही-सही माप सकते हैं। कवि की अवस्थिति को भी इसी प्रकार पुष्ट किया जा सकता है। मगर यदि यह सब कथ्य और सन्दर्भ को त्याग कर भाषा अध्ययन की ऐकांतिकता में होता है तो उसके खतरे बने रहते हैं।


अज्ञेय ने तारसप्तक में अपना एक प्रसिद्व वक्तव्य दिया था कि कविता ही कवि का परम वक्तव्य है। कवियों के लिए इसका कुछ भी अर्थ रहा हो, आलोचना के लिए इसका सीधा अर्थ यह निकलेगा कि कविता से ही कवि की ओर यात्रा होनी चाहिए, न कि कवि से कविता की ओर। अर्थात कविता के अध्ययन में भाषा की सर्जनात्मकता महत्वपूर्ण है क्योंकि अर्थनिष्पत्ति का वह प्रस्थान बिन्दु है। लेकिन इस सिध्दान्त की अति ने रचना के क्षेत्र में रहस्यवादी भाषा को प्रश्रय दिया। आलोचना में इसकी अति ने रूपवाद की ओर उन्मुख किया जिसके अन्तर्गत 'कविता का व्योम' और 'व्योम की कविता' जैसी संरचनावादी टीपें प्रचलित हुईं। रचना के मामले में भाषा के अभिनव प्रयोगों का महत्व कम नहीं होता क्योंकि अक्सर रहस्यवादी लगने वाली भाषा यथार्थोन्मुखी होती है और यह तथ्य आलोचना के सामने चुनौती बनती है। केदारनाथ सिंह, राजेश जोशी और यहाँ तक कि देवीप्रसाद मिश्र तक की कुछ कविताएँ भाषा के स्तर पर सरलीकृत आलोचना के लिए खतरा पैदा करतीं हैं। मुक्तिबोध की कविताओं को लेकर तो आलोचकीय गलतफहमियों ने जोरदार बहसों को जन्म दिया ही था।

आलोचना का भाषा से जूझना एक बात है और भाषा तक सीमित रहना बिल्कुल दूसरी बात। पहली क्रिया द्वन्द्वात्मकता कि ओर ले जाती है और दूसरी स्वांतर्ग्रथित सरंचनावाद, कलावाद अथवा रूपवाद की ओर। हिन्दी आलोचना का यह सौभाग्य ही है कि मदन सोनी और वगीश शुक्ल जैसे चन्द आलोचकों को छोडकर हमें ऐसे कम ही आलोचक मिलते हैं जो इस दिशा में प्रवृत्त हुए। रचना के संदर्भ में यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि नयी भाषा का अन्वेषण, नये अनुभवों या नई वास्जविकताओं की ओर जाना भी होता है और नये गीतों को नये वाद्ययंत्रों की आवश्यकता होती है। समकालीन कविता की एक सीमा यह है कि अक्सर पुराने अनुभवों को दुहराकर सुविधाजनक कविता बना ली जाती है और कवियों की भाषा एक जैसी लगती है। अक्सर कोई विषय या कोई खास तरह का फार्म अथवा किसी खास तरह की भाषा प्रचलन की तरह आती है और परिदृश्य को उबाउ बना देती है।


काव्यसंदर्भ अक्सर काव्यभाषा के साथ मिलकर नया अर्थालोक पैदा करते हैं। यह बात सिर्फ भाषा को पकड़ने से नहीं समझ में आती। उदाहरण के लिए स्वप्निल श्रीवास्तव की कविता साधु में भाषा के प्रयोग को शब्दों की प्रकृति में नहीं पकड़ा जा सकता क्योंकी भाषासीधी खड़ी बोली ही है। मगर परिप्रेक्ष्य का आश्रय लें ता ेयह ऐसी अभिव्यक्ति भंगिमा को लेकर आती है जो आध्यात्मिकों की है जो संसार को मायाजाल समझते हैं। मगर कविता की विषयवस्तु है विस्थापन और यह स्वयं में ऐसे काव्य संदर्भों को लेकर चलती है जिसके चलते भाषा में नया रंग उभरता है। इस कविता की संरचना अपने संदर्भ के चलते दूसरी तरह से पाठक में उतरती चलती है। कविता का अलग प्रभाव इस प्रकार का है कि विस्थापन की विषयवस्तु से आगे निकलकर कविता व्यापक प्रश्नों को घेरती है।

'साधु
पृथ्वी से विदा हो रही
है शान्ति
आसमान से रंग
जमीन से गंध
-----------
बुरे लोग प्रतिष्ठित हैं
अच्छे लोग दुखी और संतप्त'

बेहद राजनीतिक कविताओं के इस दौर में यह ध्यातव्य है कि किस प्रकार एक कवि अपनी कविता की भाषिक संरचना से एक जैसी लगने वाली भाषा को बिल्कुल ही नया शेड देता है और प्रभावशाली शिल्प निकाल लेता है। 'साधु' कविता में न केवल संतों की भाषा है बल्कि डामेटिक मोनोलॉगके शिल्प में दूसरे भावों का भी आत्मभाव है जिसके लिए कभी परकाया प्रवेश जैसे रहस्यमय पद प्रयुक्त होता था। यदि स्वप्निल की कविताओं में जड़ से उखड़े और गायब होते लोगों की दुनियॉ के पीड़ाजनक अनुभव हैं तो वे दूसरे के दर्द को आत्मसात कर पाने के कारण है जो कवि में 'सफरर' अर्थात दुख झेलने वाले को सर्जक से अलग करती है। ऐसा अलग होना गहरी संपृक्ति के बाद ही संभव है।

इसी प्रकार की सर्जनात्मक दूरी को हम एक दूसरी कविता के परिप्रेक्ष्य में देख सकते हैं जिसकी भाषा दिखने में समकालीन कविता में सामान्यत: प्रयुक्त होने वाली भाषा से बिल्कुल अलग न होते हुए भी अपना अलग प्रभाव रखती है। यह कविता भी डामेटिक मोनोलॉग के शिल्प में है लेकिन यह एक बच्चे को जन्म देती मजदूरनी को संबोधित है। 'बाई दरद ले' शीर्षक इस कविता में कवि ऐसी मजदूरनी को संबोधित करता है जिसके नसीब में 'पत्थर तोड़ने वाले दिन थे' अब वह वलात्कार के बाद माँ बनने जा रही है।

'बाई! तुझे दरद लेना है
जिन्दगी भर पहाड़ ढोये तूने
मुश्किल नहीं है तेरे लिए
दरद लेना
जल्दीकर होश में आ
वरना उसके सिर पर जोर पड़ेगा
पता नहीं कितनी देर बाद रोए
या न भी रोए
फटी ऑंख से मत देख
भूल जा जोर जबर्दस्ती की रात
अंधेरे के हमले को भूल जा बाई'

आगे यह कविता बताती है कि स्त्री का धर्म बरदाश्त करना है। पृथ्वी कितना दर्द सहती है, तभी सब कुछ हरा भरा रहता है। 'आकास पाताल में अट नहीं सकता / इतना है औरत जात का दुख'। स्त्री जाति की सीता ने कहा था कि धरती फट जाय। कविता की भाषा में खड़ी बोली के बीच बीच में देशज शब्दों के प्रयोग बेहद प्रभावशाली हैं। वे हमें शिष्ट और सामान्य स्त्री दोनों के अनुभव जगत में ले जाते हैं। सीता का संदर्भ स्त्री के दुख को ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य प्रदान करता है। यहाँ सिर्फ भाषा ही नहीं बल्कि उसका परिप्रेक्ष्य भी 'भावार्थ' की ओर ले जाता है। आलोचकगण इस घिसे पिटे शब्द के प्रयोग के लिए मुझे क्षमा करेंगे। फिलहाल कविता की अंतिम पंक्तियाँ :

'बाई! दरद ले
सुन बहते पानी की आवाज
हाँ ऐसे ही देख उपर हरी पत्तियाँ
सुन उसके रोने की आवाज़
जो अभी होने को है
जिन्दा हो जायेगी तेरी देह
झरने लगेगा दूध
दो नन्हे होठों के लिए

बाई! दरद ले'

चन्द्रकांत देवताले की इस कविता में व्यंग्यार्थों के इतने शेड्स हैं कि गिनना कठिन। क्या यह कविता सिर्फ को सम्बोधित है? फिर कविता की भाषा में कुछ शब्दों का प्रयोग भर कितने संस्तरों पर अथोत्पत्ति करता है? धरती पर जीव का आना सृष्टि है और असके लिए कवि स्त्री को दुख भूल कर तैयार होने के लिए कहता है। मगर क्या इस नये आने वाले से दुख कम होगा? पीड़ा और दुख में सीझी यह कविता किसी भी स्त्री विमर्श की तेज तर्रार कविता से अधिक प्रभावकारी है। 'बाई ! दरद ले' की पुनरावृत्ति में ही पूरी कविता नयी अर्थकान्ति प्राप्त करती है जिसके कई संस्तर हैं। विवशता है तो रुदन और आक्रोश भी। 'दरद' शब्द भर पूरी कविता को अलग अर्थालोक से भर देता है। यह सब भाषा के उस परिप्रेक्ष्य से संभव होता दिखाई देता है जिसे जीवन में भाषा के प्रयोगों से ही प्राप्त किया जा सकता है।

कविता में भाषा के अभिनव प्रयोगों का यह अर्थ नहीं कि बिल्कुल अलग दिखाई देने वाली भाषा का उपयोग किया जाय, जबर्दस्ती गाँव देहात के शब्द ठॅँस कर नवीनता का बोध कराया जाय। कोई एक शब्द भी कविता को नये भावान्वेषण की ओर ले जा सकता है बशर्ते कवि को उस शब्द के परिप्रेक्ष्य का भान हो और वह उसे सर्जनात्मक रुप देने में समर्थ हो।

Sunday, August 05, 2007

आई.आई.टी. में क्या न करें

डायरी

आई.आई.टी. में क्या न करें

इधर चेतन भगत का अंग्रेजी उपन्यास पढ़ने का अवसर प्राप्त हुआ। उपन्यास का शीर्षक है फाइव प्वाइंट समवन और उपशीर्षक है व्हाट नॉट टू डू एट आई आई टी। पुस्तक की भूमिका में ही चेतावनी दी हुई है कि यह पुस्तक आई. आई. टी. में प्रवेश पाने की कोई गाईड नहीं है। आई. आई. टी. दिल्ली एक ऐसी संस्था है जिसमें इन्जीनियरिंग के विद्यार्थी प्रवेश पाने की होड़ लगाये रहते हैं, अत: यह लिखना लेखक को जरूरी लगा होगा।

फिलहाल यह उपन्यास तीन मित्रों की कहानी है जो एक साथ भारत की इस लब्धप्रतिष्ठ संस्था में प्रवेश पाते हैं। तीनों अलग-अलग पारिवारिक पृष्ठभूमि से आये हैं। आलोक एक गरीब परिवार से है जिसके पिता बीमार हैं, माँ किसी तरह घर का काम चलाती है और उसे एक बहन की शादी करनी है। हरी अर्थात कहानी का नैरेटर मध्यवर्गीय है और उसमें पारिवारिक कारणों से आत्मविश्वास का अभाव है। रियान सम्पन्न घर का है और थोड़ा विद्रोही है।

रियान दोनों को रैगिंग से बचाता है और यहीं से एक मित्रता शुरू होती है जिसका नतीजा अच्छा नहीं निकलता दिखता। मौज मास्ती में तीनों मित्रों के ग्रेड खराब होने लगते हैं और वे उसे बचाने के लिए उल्टे सीधे काम करने लगते हैं। बीच में प्रोफेसर चेरियन की बेटी नेहा है जिसके प्रेमपाश में फंस कर हरी प्रोफेयर के क्रोध का शिकार होता है। कुल मिलाकर मामला बंटाधार।

फाइव प्वाईट समवन का सबसे जोरदार पक्ष है उसका कथानक जो अंत तक बाँधे रहता है। घटनाएँ उटपटांग ढंग से घटित होती हैं और इसका परिणाम है हास्य ही हास्य। हाशिए पर शिक्षा व्यवस्था पर टिप्पणी भी है जो है तो आई. आई. टी. पर मगर लागू होंगी पूरी शिक्षा व्यवस्था पर। उपन्यास में प्रोफेसर चेरियन का काल्पनिक भाषण लेखक के अपने विचारों की अभिव्यक्ति है। उपन्यास की अंग्रेजी एकदम टटकी है।

इस उपन्यास को रूपा प्रकाशन ने छापा है।


रघुवंशमणि

05/08/2007

Saturday, August 04, 2007

इंगमार बर्गमान और छोटा शहर

डायरी

इंगमार बर्गमान और छोटा शहर

इंगमार बर्गमान के बड़े फिल्म निर्देशक होने में तो कोई सन्देह नहीं। उनके निधन पर अखबारों ने यह बात और पक्की कर दी। परिणामत: उनके निधन पर गहरा दुख हुआ। पूरी दुनिया ने यह स्वीकार किया कि वे फिल्म जगत की एक बहुत बड़ी शख्सियत थे। फिल्म जगत को उनका योगदान अनूठा था। फिल्म तकनीक के विकास में यदि बर्गमान न होते तो काफी कुछ अधूरा रह जाता। बर्गमान के बारे में ये सारी बातें कही-सुनी जा रही हैं। और ये सब बातें क्या गलत है? गलत क्यों होगी? लेकिन मेरा दुख दूसरी तरह का है।

बर्गमैन महोदय के बारे में कम उम्र से ही सुनता रहा हूँ। पढ़ता भी रहा हूँ। एक बार सत्यजीत राय के साथ उनका ठहाके लगाता चित्र भी देखा था। अभी भी याद है कि वह जेन्टिलमैन नामक अंग्रेजी पत्रिका में छपा था। उन पर कुछ लेख भी पढ़े। उनकी प्रसिध्द फिल्म का नाम भी जानता हूँ 'द सेवेन्थ सील'। आप चाहें तो इसकी कहानी पर भी कुछ प्रकाश डाल सकता हूँ। इतनी जानकारी कुछ कम नहीं होती। मगर...........

मगर उत्तर प्रदेश के फैज़ाबाद जैसे छोटे शहर में रहने का दुख यह है कि मै बर्गमान महोदय की कोई भी फिल्म न देख सका। ये फिल्में मेरे बेचारे छोटे शहर के किसी थियेटर में लगेंगी इसकी तो कोई उम्मीद ही नहीं। उनको बॉलीवुड से फुर्सत ही नहीं। यहाँ तो केवल व्यावसायिक फिल्में ही जगह पाती हैं। वैसे भी ये टूटते टाकीज खतरे में हैं और कभी भी बन्द हो सकते हैं। ज्यादातर थियेटर बंद ही पडे हैं। यहाँ कोई मल्टीप्लेक्स भी नहीं। यद्यपि कभी किसी मल्टीप्लेक्स में किसी कला फिल्म के चलने की बात थोड़ा अजीब है। वैसे मैने अभी तक मल्टीप्लेक्स में एक मात्र फिल्म देखी है सरकार। वह भी कानपुर में अपने मित्र कवि पंकज चतुर्वेदी और संध्या के साथ। कानपुर को भी फिलहाल फैजाबाद जैसे शहर की तुलना में महानगर ही समझें।

किसी चैनल पर हो सकता हो कभी बर्गमान की कोई फिल्म आयी हो। कह नहीं सकता क्योंकि टीवी के सामने ज्यादा देर तक नहीं बैठता। अब पहले से पता हो कि फलां फिल्म आ रही है तो बात ही कुछ और है। यहाँ के सी.डी. कैसेट विक्रेता भी कुल मारधाड़ की ही फिल्में रखते हैं। नेट की खरीदारी पर पूरा भरोसा नही ंजम सका है अभी तक।

ऐसे में कोई क्या करे?

मैं समझता हॅूं कि मेरा यह दुख नितांत व्यक्तिगत नहीं। बहुत से नेटी मित्र इस दुख से प्रताड़ित होंगे। इसीलिए मैं इसे अपनी इस सार्वजनिक डायरी में जगह दे रहा हूँ। इस प्रकार अब मेरा दुख आपके हवाले है। दुख कहने से दुख कम हो जाता है, ऐसा लोगों का कहना है। कभी-कभी तो इसका निदान भी हो जाता है। बहरहाल यदि आप में से किसी खुशनसीब ने बर्गमान की फिल्में देखी हों तो मदद करें। क्या आप में से किसी के पास वह काम्पेक्ट डिस्क है जिसकी मुझे तलाश है?


रघुवंशमणि

Thursday, August 02, 2007

बस-4

कविता


बस-4

नानी देखती थी बस
फूटे चश्में से

नाना देखते थे
ऑंखों पर हाथ छा कर

बच्चे दौड़ते थे
बस के साथ-साथ

नाना हो गये खाक
नानी गयीं मर
बच्चे हो गये बड़े

जाने कहाँ खो गयी
वह धूल उड़ाती बस




रघुवंशमणि

बस-3

कविता


बस-3



पीछे की सवारियाँ
ध्यान से सुनें

पीछे की सवारियाँ
टिकट खरीद लें
पैसे आगे बढ़ा दें

पीछे की सवारियाँ
अपना सामान पीछे ले जाँय

पीछे की सवारियाँ
झटकों के लिए तैयार रहें
हिचकोले खाती है बस

बाद की सवारियाँ
पीछे जाकर बैठें

पीछे की सवारियाँ
पीछे की सवारियों की तरह रहें।


रघुवंशमणि

बस-2

कविता


बस-2


''बड़ी भीड़ है
साँस लेना भी
कठिन है

गाड़ी मत रोको
तेज़ चलने पर
लगती है हवा''

कड़ी है धूप
हिलता है राह में
एक बेचारा हाथ

रुकती है बस
चढ़ता है एक
गरियाते हैं सौ

बस में होने
और बाहर होने में
यही फर्क है।



रघुवंशमणि

Wednesday, August 01, 2007

बस-1

कविता

बस-1


बिगड़ गयी है बस
खड़ी है किनारे

ठुक-ठुक
लगाए है ड्राइवर
गाड़ी के नीचे
उत्सुकता से झुके हैं
कुछ लोग

चाय की दुकान
की तलाश में
दस-पाँच

करीब की सवारियाँ
सड़क पर
दो-चार
रोकती हैं आते
जाते वाहन

बाकी कुछ अंदर
झल रहे हैं
उबाउ अखबार

बता गया है परिचालक
टिकट का पैसा
वापस नहीं होगा।



रघुवंशमणि

Sunday, July 29, 2007

कंक्रीट में गुलाब

कविता

कंक्रीट में गुलाब


साफ धुली ठण्डी फर्श पर
उससे भी कठोर कंक्रीट का गमला
जिसमें भूमि का भ्रम पैदा करती थोड़ी सी मिट्टी
जंगल का भ्रम पैदा करती हरी पत्तियाँ और टहनी
उसकी चोटी पर एक गुलाब

घर के बाहर है गुलाब
मगर सड़क की असुरक्षा में नहीं
हवाओं के विरुध्द जीवन बीमा है चहारदीवारी
पशुओं के विरुध्द जी. पी. एफ. है गेट
थोड़ी सी खाद मिलती है मंहगाई भत्ते की तरह
हल्का सा पानी ओवरटाइम की तरह
जरूरत के मुताबिक

इसी के लिए बनाया गया है दो कमरे का फ्लैट
एक में सोते हैं बच्चे
दूसरे में पति-पत्नी
दिन में जो हो जाता है ड्राइंगरूम
इसी गुलाब की खातिर
पति रोज भीड़ चीरता जाता है आफिस
पत्नी करती है दिन भर काम
बच्चों को भेजा जाता है स्कूल

पति, पत्नी और बच्चे के बीच उगा
यह गुलाब चमकता है
आफिस से लौटे थके पति की मुस्कान में
बोर हुई पत्नी की औपचारिकताओं में
किताबों में दबे बच्चे की अस्वाभाविक हँसी में

हफ्ते में सण्डे की तरह है यह गुलाब
दीवारों पर टंगे इच्छाओं के चित्र की तरह
थकान के बाद साथ चाय पीते मित्र की तरह
समय निकाल कर देखे गये मैटिनी शो जैसा
गर्मी में बच्चे की एक आइसक्रीम की तरह

मित्रों के सामने मुस्काता है
अतिथि के सामने खिसियाता है
अफसर के आगे बिछ जाता है
तेज हवा चलने पर
मगर थोड़ा सा हिलता है

पुलिस के डण्डे की तरह है यह
हमारे और पागल कर देने वाली वानस्पतिक गंध के बीच
जो जंगलों की सघनता में ही जनमती है
जिसकी एक छाया भर नहीं है यह

हमारे और इन्द्रधनुषी रंगों के बीच
किसी शासनादेश की तरह टंकित है
धरती की सोंधी प्रफुल्लित बरसाती महक के
विस्तार के चारो ओर काँटेदार
बाड़े की तरह

एक डायवर्जन भर है
कंक्रीट में उगा
लगभग कंक्रीट सा
यह गुलाब



रघुवंशमणि

Monday, July 23, 2007

व्याख्यान

एक कदम पीछे


सम्मानित अध्यक्ष मंडल के सदस्यगण और दोस्तो,


सबसे पहले मैं केदारनाथ अग्रवाल सम्मान समिति के प्रति, और विशेष तौर पर भाई नरेन्द्र पुण्डरीक के प्रति, अपना आभार व्यक्त करना चाहॅूंगा जिन्होंने मुझे यहाँ बाँदा के प्रबुध्द श्रोताओं के समक्ष अपने विचार रखने का एक अवसर प्रदान किया है.भाई हेमन्त कुकरेती को केदारनाथ अग्रवाल सम्मान प्रदान किये जाने के अवसर पर मैं उन्हें हार्दिक बधाई देना चाहूँगा.वे मेरे इधर के कुछ पसंदीदा कवियों मे से एक रहे हैं.ऐसा इसलिये कि जिस विशिष्ट मानववाद की ओर वापसी की बात मैं सांप्रदायिकता के बरक्स करता रहा हॅू, वही मानववाद उनकी कविताओं में अपने पूरे ताब के साथ उपस्थित दिखाई देता है.मै समझता हॅूं कि केदार बाबू के नाम से जुड़ा यह पुरस्कार पाकर वे स्वयं को सच्चे अर्थो मे सम्मानित अनुभव कर रहे होंगे.

आज जब हत्यारों और गद्दारों के नाम पर पुरस्कार वितरित हो रहे हैं और लोग उन्हें ग्रहण कर रहे हैं तो बाँदा जैसी जगह से दिया जाने वाला यह छोटी राशि का सम्मान और भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यह सम्मान हिन्दी के एक ऐसे अविस्मरणीय कवि के नाम पर दिया जाता है जिसने कभी अपने अवाम को धोखा नहीं दिया. केदार बाबू अपनी सचाई और सरलता के लिए जाने जाते रहे. आपकी कविता तथा आपके जीवन में कोई फाँक नहीं थी.यहाँ वह अवसरवादी द्वैत नहीं था जो आज के तमाम कवियों औेर उनकी कविताओं के बीच साफ दिखलाई देता है. हिन्दी साहित्य के ऐसे अप्रतिम सर्जक बाबू केदारनाथ अग्रवाल जी का स्मरण करते हुए मैं समकालीन हिन्दी कविता पर विनम्रतापूर्वक अपने कुछ विचार आप सबके समक्ष रखने का उपक्रम कर रहा हूँ. आप सभी का ध्यान चाहॅूंगा.

विषय तो है 'कविता की दशा और दिशा', पर इस व्यापक विषय पर एक छोटे से व्याख्यान का कोई फोकस नहीं बन सकेगा. इस कारण कविता के किसी एक पक्ष पर ही केन्द्रित करना चाहॅूगा. आज का यह परिप्रेक्ष्य चूंकि हेमन्त कुकरेती के चलते बना है, इस कारण उनकी कविता में बैठे उस मानववाद से ही प्रारंभ करता हूँ जिसको मेरे विचार से इधर की लिखी जा रही हिन्दी कविता के एक महत्वपूर्ण तत्व के रूप में देखा जा सकता है. ऐसा नहीं कि यह मानववाद एकाएक कहीं आसमान से टपक पड़ा है.यह हिन्दी कविता में पहले भी किसी न किसी रूप में अस्तित्वमान था. लेकिन इसकी उपस्थिति और अवस्थिति आज के दौर में मार्के की है- पहले के दौर से सर्वथा अलग. हेमन्त कुकरेती की एक कविता के उदाहरण से बात को पुष्ट करना चाहूँगा;


'जो रक्त मुझमें बह रहा है
खूब भटकने के बाद यहाँ बसा है

प्रेम का जन्म
और घृणा के विकास के बीच संघर्ष की सदियाँ गुजरती गईं
यहाँ वहाँ जाने कहाँ गिरकर उठा मेरा रक्त
मै यह नहीं कहता कि यह सदा संत रहा
हिंसा की हद तक विनम्र यह उद्दाम भी हुआ
और मानव शरीर की बैचैन शिराओं से
यह पारे की तरह गिरा

जिन्हें लोहा खाने की आदत थी उन्हें भी इसने तृप्त किया
जुल्म ने इसे लड़ाकू बनाया दुखों ने सहनशील'


यह कविता स्पष्टत: उस मानववादी पक्ष के प्रति स्वयं को समर्पित करती है जो मनुष्य को केन्द्र में रखता है.यहॉ बाँदा के प्रबुद्व श्रोताओं के समक्ष मैं इस सैध्दान्तिक विवेचन की कोई आवश्यकता नहीं समझता कि मानवतावाद और मानववाद में क्या फर्क है और कहाँ पर ये दोनों चीजें एकाकार होती हैं्र.इस कविता के लिए यही काफी है कि कवि स्वयं को सबसे पहले एक मनुष्य मानता है और यह बात उसे अनश्वर बनाती है.'सबसे पहले' कविता की कुछ पंक्तियाँ बात को साफ करेंगी:


'मै एक मनुष्य हूँ
शरीर के लिए मेरा जन्म नहीं हुआ
. . . . . . . . .
मै मनुष्य से मनुष्य की तरह मिलता हूँ
उस शरीर के साथ जो मेरे बाद भी दूसरों मं जीवित रहेगा'

यहाँ जो बात कही गयी है वह मनुष्यता की चरम उपलब्धि का रहस्य है.लेकिन यही नहीं, वे 'मैं धरती की साँस' कविता में लिखते हैं:

'मुझे बनाने में बहुत समय लगा है
कई आदमी खर्च हुए हैं मुझे पूरा करने में
ऐसे ही कैसे नष्ट कर सकते हैं आप'

हेमंत कुकरेती की इस मनुष्यता के प्रति प्रतिबध्दता की तुलना यदि हम दशकों पहले की नागार्जुन द्वारा वाम के प्रति की गयी प्रतिबध्दता-घोषणा से करें तो परिस्थितियों का अंतर स्पष्ट हो जाता है. नागार्जुन स्वयं को वामपंथ के प्रति प्रतिबध्द घोषित करते हैं पर हेमंत मनुष्यता के प्रति.यह विचार करने योग्य बात है कि आखिर इसकी वजह क्या है? नागार्जुन और हेमंत के समय के बीच ऐसा क्या बड़ा फर्क आ गया है कि इतनी व्यापक प्रतिबध्दता की घोषणा आवश्यक लगे.जाहिर तौर पर इसके पीछे उस साम्प्रदायिकता की काली छाया ही है जिसने लगभग ढाई दशकों से इस देश को डस रखा है.

हेमंत कुकरेती की कविता को लेकर एक बात घ्यान देने लायक है कि गुजरात के दंगों के बाद उनकी कविता का साम्प्रदायिकताविरोधी स्वर मुखर हुआ है.यह सिर्फ उन्हीं की कविता की विशेषता नहीं, इसे गुजरात के दंगों के बाद की हिन्दी कविता का एक महत्वपूर्ण तथ्य स्वीकार किया जाना चाहिये.बद्रीनारायण जैसे रागात्मकता के कवियों ने भी स्पष्ट साम्प्रदायिकताविरोधी कविताएँ लिखीं. हिन्दी कविता में साम्प्रदायिकता के इस विरोध को दो चरणों में बाँट कर देख सकते हैं.एक तो मंडल-कमंडल आन्दोलन के बाद बढ़ी उस साम्प्रदायिकता के सापेक्ष लिखी गयी कविता, जिसकी चरम परिणति बाबरी मस्जिद ध्वंस में हुई. इस दौर की कविताएं साम्प्रदायिकता के प्रति विभिन्न प्रकार की गंभीर प्रतिक्रियाएं प्रस्तुत करती हैं.दूसरा चरण गुजरात के दंगों के बाद आयी कविताएँ हैं जो साम्प्रदायिकता के विरोध में हैं लेकिन थोड़ी दूसरी अवस्थिति से लिखी गयीं हैं.


अपने अग्रज, मित्र और 'उन्नयन' पत्रिका के सम्पादक श्रीप्रकाश मिश्र जी के अनुरोध पर मैने गुजरात के दंगों से काफी पहले एक लेख प्रस्तुत किया था जिसका शीर्षक था 'जब मैने लिखना शुरू किया'.यह लेख एक प्रकार से समकालीन कविता पर एक संक्षिप्त टिप्पणी था.वहाँ मैने इस बात को रेखांकित किया था कि साम्प्रदायिकता के विरुध्द खड़ा होना हिन्दी कविता में प्रतिरोध का एक अन्यतम उदाहरण था क्योंकि भारत विभाजन के समय उभरी साम्प्रदायिकता का नंगा नाच बहुत स्थूल था.उस समय के साहित्यकारों ने इस विषय पर काफी कुछ लिखा था.लेकिन हमारे समय में साम्प्रदायिकता बड़े सूक्ष्म और कुटिल रूप में उभरकर आयी है.इस अर्थ में हिन्दी कविता की प्रतिरोधी परंपरा का अपना अलग ही महत्व है.

लेकिन तब से अब तक काफी कुछ बदल चुका है. बाबरी मस्जिद ध्वंस और गुजरात के दंगों के बीच का समय भारत में साम्प्रदायिक शक्तियों के बढ़ने और फासीवाद की सीमा तक पहँचने का समय रहा है.इस कालावधि में साम्प्रदायिक राष्टवाद के समर्थकों ने तमाम लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बलपूर्वक कब्जा जमाया और सांस्कृतिक संस्थाओं को भगवा पहनाने का प्रयत्न किया.इस प्रयत्न में वे राजनीतिक प्रतिरोध की कमी के चलते सफल भी रहे. जनता में साम्प्रदायिक तत्वों के प्रभाव के बढ़ने का यह एक बड़ा कारण था. शिक्षा और राजनीति में सफलता पाने के बाद अब वे साहित्य में भी अपना दबदबा बनाने की कोशिश कर रहे हैं.लेकिन साहित्य जगत में मानवीय मूल्यों के विरोध मे कुछ कह पाना सरल नहीं, अत: यहाँ पर राजनीति जैसा प्रभाव बना पाना संभव नहीं हुआ है.राजनीति, समाज और संस्कृति के विभिन्न क्षेत्रों में सीधा समर्पण देखा गया है.ऐसा अक्सर स्वार्थवश या भयवश हुआ है.मगर हिन्दी साहित्य में अधिकांश साहित्यकारों ने ऐसा समर्पण नहीं किया है.


दिसंबर, 1992 के आसपास लिखी गयी तमाम कविताएँ दो तथ्यों को रेखांकित करती हैं.एक तो यह कि जो कवि पहले से कविताएँ लिख रहे थे, उन्होंने इस विषय पर प्रमुखता से कविताएँ लिखीं. दूसरा यह कि नये कवियों के लिए, जो इस दौर की ही उपज थे या थोड़ा पहले से लिख रहे थे, बाबरी मस्जिद ध्वंस के दौर का साम्प्रदायिक उभार एक महत्वपूर्ण विषय बना,इतना महत्वपूर्ण कि लगभग सभी जानेमाने कवियों ने इस मुद्दे पर कविताएँ लिखीं.इसर् दुघटना ने दोनों पीढ़ियों के कवियों की संवेदना को गहराई से झकझोरा.यहीं पर हम मानववाद की ओर होने वाली वापसी को देख सकते हैं जिसने साम्प्रदायिकता के विरोध में एक व्यापक जमीन की तलाश प्रारंभ की.


गुजरात के दंगों के बाद लिखी गयी कविताएँ अधिक विचलित करने वाली हैं.यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि राजनीति में यह दौर धर्मनिरपेक्षता के प्रवक्ताओं के पतन का दौर था और एक गहरा अवसरवाद यहाँ साफ परिलक्षित हुआ.जो नेता साम्प्रदायिकता का जमकर विरोध करते थे, वे पतित होकर धर्म की राजनीति करने वालों के खेमें मे शामिल हो गये. केन्द्र मे बनी राजग सरकार में तमाम सहायक और मंत्री वही बने जो जोर-शोर से साम्प्रदायिकता का विरोध करते हुए संसद मे आये थे.अपनी घोर अवसरवादी राजनीति के चलते वे कुर्सियाँ पकड़े रहे और गुजरात के मुद्दे पर एक मुर्दा चुप्पी साधे रहे.पत्रकारिता से लेकर अन्य मीडिया रूपों तक में साम्प्रदायिकता का भारी मात्रा में आभ्यन्तरीकरण हुआ.लेकिन हिन्दी कविता ने इस साम्प्रदायिकता का अधिक संवेदनात्मक प्रबलता से विरोध किया.यह नोट करने लायक तथ्य है कि 1992 के आसपास जिन कवियों ने साम्प्रदायिकता का विरोध किया था उनमें से अधिकांश आज भी साम्प्रदायिकता के विरोध में खड़े हैं. उम्होने अपने स्तर पर साम्प्रदायिकता और फासीवाद को कोई स्वीकृति प्रदान नहीं की है.इस दौर में ऐसी कविताएँ लिखी गयीं जिन्हें लम्बे समय तक नहीं भुलाया जा सकेगा.

संवेदना को हिला देने वाले गुजरात के दंगों के बाद हिन्दी कविता के मुखर होते स्वरों के पीछे स्पष्ट कारण था, इस बात का बिल्कुल स्पष्ट हो जाना कि सत्ता का नया चरित्र और उसकी गतिविधि क्रूर और मनुष्यविरोधी हो चुकी है.यही कारण है कि गुजरात के भीषण नरसंहार के बाद हेमन्त को स्पष्टत: अपनी मनुष्यता के प्रति प्रतिबध्दता को उच्च स्वरो में घोषित करना पड़ता है.ऋतुराज से लेकर नरेन्द्र पुण्डरीक तक की ईश्वरविरोधी कविताएँ इसी दौर में आती हैं, बस थोड़ा आगे-पीछे होकर. पूरे बीस चौबीस साल के इस दौर में साम्प्रदायिकता विरोधी कविताओं और कवियों की संख्या इतनी अधिक है कि उनके नाम गिनाने में ही सारा समय गुजर जाएगा इसलिये सिर्फ दिशावाहक रचनाओं का ही जिक्र करूंगा.

यदि इन दोनों समयों की कविताओं के बीच के फर्क को रेखांकित करना हो तो देवीप्रसाद मिश्र की दो कविताओं को आमने-सामने रखा जा सकता है.एक कविता है 'मुसलमान' और दूसरी है 'जनगणमन बेगाना'.'मुसलमान' कविता में यदि रेटारिक का बल कविता के अंत तक जारी रहता है तो 'जनगणमन बेगाना' टूटे और बिखरे स्वरों का एक मार्मिक कोलाज है.'मुसलमान' कविता भारत में मुसलमानों के आने से लेकर उनके जीवन के विभिन्न मक्षों के बारे मे अपवादों का निषेध करती हुई इस निष्कर्ष पर पहुँचती है कि वे कोई ढेले-पत्थर नहीं कि उन्हें देश से बाहर किया जा सके.ध्यातव्य है कि यह कविता गुजरात के दंगों से पहले की लिखी हुई है. लेकिन गुजरात के दंगों के बाद लिखी गयी 'जनगणमन बेगाना' की भूमि बेहद विचलित करने वाली और बिखरे शिल्प वाली है.देवीप्रसाद मिश्र की दस भागों में विभक्त यह कविता कई दिशाओं से गुजरात के भयावह दंगों को देखने का प्रयास करती है.कवि की संवेदनशीलता,घटती हुई घटनाएँ,राजनीतिक वक्तव्य,स्वयं की ओर लौटते विचार और बेचारगी सब मिलकर एक साथ कविता में उभरते डूबते हैं:

'अन्यायी जूतों
के नीचे
कमजोरों का दाना देखा

जयहिंद जयहिंद
थाने भर में
हत्यारों का गाना देखा

खद्दर औ'
खादी से होकर
लोकतंत्र का
जाना देखा

रोती स्त्री
और रो पड़ी
जनगणमन बे-
गाना देखा'

अपने प्रचलित मुहावरों से अलग देवीप्रसाद मिश्र की यह कविता पाठकों को एक ऐसे कविता जगत से गुजारती है जहाँ सब कुछ टूटा-फूटा है और संवेदना की किरचियाँ बटोरे बिना काम पूरा नहीं होता. हाहाकारी अमानवीय घटनाओं के कवि के संवेदनशील चिटकते मन पर पड़ते प्रभावों को यह कविता कई आयामों से प्रस्तुत करती है.


इधर दो दशकों की हिंदी कविता के लिए साम्प्रदायिकता का प्रतिरोध एक बड़ी सीमा तक पहचान करने का तत्व बन गया है. यह बात भी सही है कि बहुत से कवि कैरियर बनाने के लिए और पत्रिकाओं मे स्थान पाने के लिए भी ऐसी कविताएँ लिखते रहे हैं. मगर गहराई और सच्चाई से भरे स्वर कम नहीं रहे.ये स्वर सतही नारेबाजी से परे एक ऐसी जमीन तलाशते हैं जहाँ मनुष्य केन्द्र में रहे.
इस सिलसिले में विमल कुमार जैसे वरिष्ठ होते कवियों और पवन करण,सर्वेन्द्र विक्रम जैसे युवा कवियों की कविताएँ भी द्रष्टव्य हैं.डॉ परमानन्द श्रीवास्तव के नवीनतम कविता संग्रह 'एक अ-नायक का वृत्तांत' का तो मूलस्वर ही साम्प्रदायिकता विरोधी है.इन सभी कवियों के संदर्भों को ग्रहण करें तो पायेंगे कि हिन्दी कविता का यह मानववाद बेहद आलोचनात्मक है और मानववाद की पिछली परम्पराओं से अलग है.उदाहरण के लिए जब हेमंत कुकरेती मनुष्य की बात करते है तो वह अमूर्त मनुष्य न होकर आज का साम्प्रदायिकता के विरुध्द खड़ा मनुष्य है.अपने प्रतिरोध के तत्व के चलते यह मानववाद अपनी प्रकृति में क्रान्तिकारी भी है.


देखें तो विष्णु खरे की कविताएँ इस अर्थ में किसी दस्तावेज से कम नहीं. विष्णु खरे की कविता 'शिविर में शिशु' एक अतिचर्चित कविता रही है जो गुजरात के दंगों के दौरान जन्मे कुछ शिशुओं के एक फोटोग्राफ को लेकर प्रारंभ होती है और विभिन्न मोड़ों पर अलग-अलग सवाल उठाती-बढ़ती है.सद्य:प्रसूत इन बच्चों को देखकर उनके हिन्दू अथवा मुस्लिम होने को नहीं जाना जा सकता है.लेकिन यह तथ्य जिस ओर संकेत करता है, उसे इस जंगल समय में समझाना बहुत कठिन है. आदमी को बचाने के जज्बे का इस कदर संकटग्रस्त हो जाना कि उसे कहने में भी असहजता जैसी व्यर्थता लगे, हमारे समय की एक गहरी विडंबना है.

विष्णु खरे अपनी कविताओं में साम्प्रदायिकता का एक व्यावहारिक विकल्प भी तलाशने का प्रयास करते हैं. 'नेहरू-गाँघी परिवार के साथ मेरे रिश्ते' कविता अपनी लम्बी यात्रा के बाद साम्प्रदायिकता की समस्या पर आकर टिकती है कि 'हिटलर के हिन्दुस्तानी वंशज' बढ़े आ रहे हैं.ऐसे में सर्वाधिक महत्व का मुद्दा यह है कि इन बर्बरों का कुछ करना चाहिये. इस बडे सवाल के सामने कवि बाकी सवालों को छोड़ने को तैयार है. उन पर बाद में विचार किया जायेगा.यह कविता हमारे खतरनाक और विकल्पहीन लगते समय में विकल्प की एक राजनीतिक अवस्थिति बनाने का उपक्रम है जिसको कांग्रेस की अन्यथा तारीफ के रूप में भी ग्रहण किया गया है.यह सही बात नहीं है.

उन्हीं की कविता 'चुनौती' सामान्य अभिवादन में घुस आये फासीवाद को रेखांकित करती है.दैनंदिन में उतरने वाली और अक्सर अदृश्य रहने वाली इस फासीवादी प्रवृत्ति को यह कविता बखूबी सामने लाती है.देख जाय तो समाज में बहुत-सी ऐसी रिक्तियॉ और चोर दरवाजे हैं जहॉ साम्प्रदायिकता निवास करती और पोषण पाती है.'हिटलर की वापसी' नाजीवाद के बहाने फासीवाद के अपने समय में संस्कृति के उद्योग के रूप में बदलने की ओर संकेत है जो खतरनाक है.विष्णु खरे शिल्प के स्तर पर कविता को एक लम्बी चिंतनवर्णना में ढालते हैं जिसका विचार विमर्श अक्सर किसी महत्वपूर्ण पड़ाव पर ले जाता है.'न हन्यते' जैसी कविता तो एक साम्प्रदायिक हत्यारे की ईश्वर भक्ति की ओर वापसी का भयानक वर्णन है क्योंकि यहाँ हत्याओं और अपराधों के प्रति कोई पछतावा नहीं है और साम्प्रदायिकता के प्रति निष्ठा ऐसी है कि अपराध स्वयं में अपराध नहीं लगता और उसका अपराधबोध तो दूर दूर तक कहीं नहीं.देखा जाय तो विष्णु खरे अपनी कविता की आलोचनात्मकता में एक ऐसी मानववादी जमीन की तलाश में रहते हैं जिसकी अपनी एक राजनीति तक संभव हो.

इस सिलसिले में राजनीति से सीथे जुड़ी कवि कात्यायनी की कविता 'गुजरात 2002' का जिक्र जरूरी होगा.इस कविता में कात्यायनी का यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि 'क्या अहिंसा से कायल किये जा सके हैं कभी लुटेरे और आततायी'.इस प्रश्न को वे आगे बढ़ाते हुए लिखती हैं:

'यदि ऐसा हो पाता तो दुनिया में आज
फिलिस्तीन,अफगानिस्तान और इराक की तबाहियों की जगह
हवा में लहराते उड़ते रुमाल,रंगीन पन्नियाँ और पतंगें होतीं'


कात्यायनी साम्प्रदायिकता के इस विरोध को रस्मी मानती हैं जब तक कि राजनीतिक तैयारी को ठोस रूप से सम्पन्न करने का प्रयास न हो.बात सही है.साम्प्रदायिकता हमारे दौर में महज एक विचार नहीं, वह एक ठोस और मूर्त वास्तविकता है.इसका सामना सिर्फ विचार या कविता से संभव नहीं.


फिलहाल हिन्दी कविता साम्प्रदायिकता के परिप्रेक्ष्य में अपनी अवस्थिति को एक कदम पीछे करती है.वह एक ऐसे मानववाद की ओर बढ़ती है जिससे उसे व्यापक वैचारिक और संवेदनात्मक भूमि प्राप्त हो सके.इस तत्व के चलते कविताओं में द्वंद्वात्मकता बढ़ती गयी है जिसने कविता की भूमि को उर्वर बनाया है. यह जमीन वास्तव में एक दौर में विवेक और तर्क की जननी रही है.वही तर्क और विवेक जिससे धर्मान्धता और अमानवीयता सदैव डरती रही हैं.यहाँ लोकतंत्र और समाजवाद से लेकर माक्र्सवाद तक के लिए स्पेस है और ये तत्व निकले भी तो इसी पृष्ठभूमि से हैं.हेमन्त कुकरेती की कविताओं में आने वाली उनकी मनपसंद क्रिकेट की इमेजरी का सहारा लेना हो तो हम कह सकते हैं कि हिन्दी कविता साम्प्रदायिकता के परिप्रेक्ष्य मे बैकफुट पर जाती है ताकि साम्प्रदायिकता की गेद पर आखिरी समय तक निगाह रख सके और उसे सही दिशा में जोर से हिट कर सके.




रघुवंशमणि
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