कश्मीर पर साहित्य
सलमान रुश्दी की पुस्तक 'सैटेनिक वर्सेज' पर प्रतिबन्ध लगने के काफी दिनों बाद उन्होंने भारत की यात्रा की जिसका उद्देश्य एक उपन्यास लिखना बताया गया. लेकिन रुश्दी ने यह स्पष्ट नहीं किया कि वे किस प्रकार का उपन्यास लिखने जा रहे हैं या उसकी विषयवस्तु क्या होगी. आमतौर पर सलमान रुश्दी अपने अधूरे या अलिखित कृतियों के बारे में बात नहीं करते या बात करने से बचते हैं. उस समय कुछ लोगों को यह भी लगा कि कश्मीर में बिताये गए पुराने दिनों का नास्टैल्जिया उन्हें खींच लाया होगा.
कुछ समय बाद उनका उपन्यास शालीमार द क्लाउन [२००५] प्रकाशित हुआ जो कश्मीर में फैले आतंकवाद को लेकर था. किस प्रकार आतंकवाद ने जन्नत जैसी घाटी को तबाह कर दिया था. सलमान रुश्दी का यह उपन्यास एक तरफ यह दिखता है कि कश्मीर की पुरानी पीढ़ी किस प्रकार आतंकवाद के खिलाफ थी मगर धीरे धीरे यह नैतिक प्रतिरोध किस प्रकार समाप्त होता गया. दूसरी तरफ यह उपन्यास कश्मीर में आतंकवादियों के बीच एक दौर की अंदरूनी लड़ाई और अंतर्विरोध को भी रेखांकित करता है. साथ ही साथ यह कृति आतंकवाद के अन्तर्राष्ट्रीय चरित्र को भी बताता है. आज यह बात आमतौर पर जानी जाती है. पेरिस हमलों ने इसे साफ़ किया है. उपन्यास का मुख्य पात्र शालीमार आतंकवाद की ट्रेनिंग फिलिपींस से पाता है.
शालीमार द क्लाउन आधा कश्मीर की पृष्ठभूमि में है तो आधा यूरोप में. वहां आतंकवाद के विरोध कि प्रवृति द्वितीय विश्वयुद्ध कि दहशतों से जुडी है . इंडिया नाम की लड़की इस उपन्यास में शालीमार के बाद सबसे महत्वपूर्ण पात्र है. उपन्यास के अंत में आतंकवाद और उसकी विरोधी शक्तियां एक दूसरे के सामने खड़ी मिलती हैं. यह उपन्यास रुश्दी के साहित्य की सारी विशेषताओं के साथ मिलता है.-खासकर उनके जादुई यथार्थवाद के साथ.

सलमान रुश्दी / शालीमार द क्लाउन/ उपन्यास
आतंकवाद की प्रवृतियाँ और धरती का स्वर्ग
कुछ समय बाद उनका उपन्यास शालीमार द क्लाउन [२००५] प्रकाशित हुआ जो कश्मीर में फैले आतंकवाद को लेकर था. किस प्रकार आतंकवाद ने जन्नत जैसी घाटी को तबाह कर दिया था. सलमान रुश्दी का यह उपन्यास एक तरफ यह दिखता है कि कश्मीर की पुरानी पीढ़ी किस प्रकार आतंकवाद के खिलाफ थी मगर धीरे धीरे यह नैतिक प्रतिरोध किस प्रकार समाप्त होता गया. दूसरी तरफ यह उपन्यास कश्मीर में आतंकवादियों के बीच एक दौर की अंदरूनी लड़ाई और अंतर्विरोध को भी रेखांकित करता है. साथ ही साथ यह कृति आतंकवाद के अन्तर्राष्ट्रीय चरित्र को भी बताता है. आज यह बात आमतौर पर जानी जाती है. पेरिस हमलों ने इसे साफ़ किया है. उपन्यास का मुख्य पात्र शालीमार आतंकवाद की ट्रेनिंग फिलिपींस से पाता है.
शालीमार द क्लाउन आधा कश्मीर की पृष्ठभूमि में है तो आधा यूरोप में. वहां आतंकवाद के विरोध कि प्रवृति द्वितीय विश्वयुद्ध कि दहशतों से जुडी है . इंडिया नाम की लड़की इस उपन्यास में शालीमार के बाद सबसे महत्वपूर्ण पात्र है. उपन्यास के अंत में आतंकवाद और उसकी विरोधी शक्तियां एक दूसरे के सामने खड़ी मिलती हैं. यह उपन्यास रुश्दी के साहित्य की सारी विशेषताओं के साथ मिलता है.-खासकर उनके जादुई यथार्थवाद के साथ.

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