Thursday, November 12, 2015

कश्मीर पर साहित्य 
[इधर राजनीतिक प्रचार के अंतर्गत लेखकों पर यह गलत आरोप लगाया जा रहा है कि उन्होंने कश्मीर पर कुछ नहीं लिखा है. मैं समझता हूँ कि यह एक दुष्प्रचार है जिसे बहुधा सही मान लिया जाता है, ऐसा एक ग़लतफ़हमी के कारण भी हो सकता है जो अक्सर किसी विशिष्ट साहित्य के प्रकाश में न आ पाने की  वजह से होती है. साहित्य के एक पाठक की हैसियत से मैं समझता हूँ कि यह गलतफहमी नहीं बनी रहनी चाहिए. इसलिए कश्मीर पर रचे गए कुछ साहित्य को मित्रो के सामने रखने का प्रयास कर रहा हूँ. आशा है यह साहित्य आप लोगों को पसंद आयेगा .]

स्वप्निल श्रीवास्तव की कविताएँ


कश्मीर में सेब -1 

कश्मीर के सेब पर
दरिंदो के नज़र है
उन पर जहरीले दांत  गड़े हैं

फल संरक्षकों, सेब को बचा लो
शिकारियों तुम्हारी बंदूकें कहाँ हैं
मन को मिठास और ताजगी से
भर देने वाले सेब में
कडुवाहट आ गयी है
वे बारूद और धुएं में पक रहे हैं.

वनस्पतिशास्त्रियो, पहचानो
सेब को कौन सा रोग  लग गया  है
वही मिटटी वही हवा, वही जल
लेकिन फल को खाते समय
भीगती नहीं आत्मा
दुश्मनों के चेहरे सामने आते हैं.


कश्मीर में सेब -2

पहली बार जमीन पर गिरा
होगा सेब
धरती से धूल  उठी होगी
उड़े होंगे परिंदे
पास खड़े बच्चे के मुह में
मिठास भर गयी होगी
उसने उसे एक दुर्लभ  चीज कि तरह
ज़मीन से उठाया होगा

आज कश्मीर में गिरते हैं
जब सेब
सेब कि जड़ें कांप उठती हैं .

[ कश्मीर में सेब कविताएँ १९८७ में लिखी गयी थीं . ये कविताएँ हिंदी के प्रसिद्ध पत्र जनसत्ता में प्रकाशित हुई थीं.]





6 comments:

बलराम अग्रवाल said...

'स्वप्निल' यों भी मेरे प्रिय कवियों में एक हैं। 'कश्मीर में सेब' कविताएँ मुझे इनके लिखे जाने के समय से ही प्रिय हैं। मैं इन कविताओं से नि:संदेह प्रभावित भी रहा हूँ। सन् नब्बे-बानवे के आसपास मैंने तीन लघुकथाएँ कश्मीर पर केन्द्रित लिखी थीं जिन्हें रमेश बतरा जी ने 'संडे मेल' में स्थान दिया था। गत वर्ष कश्मीर में आई बाढ़ को केन्द्र में रखकर 12 लघुकथाओं की एक श्रृंखला 'हवाएँ बोलती हैं' शीर्षक से लिखी थीं। स्वर एकांगी न होने के कारण किसी हिन्दी पत्रिका ने उन्हें स्थान देने योग्य नहीं पाया, तथापि पंजाबी में अनूदित होकर वे प्रकाशित हो गयीं। मेरे लघुकथा संग्रह में तो आनी ही थीं। 'कश्मीर में सेब' पढ़वाने के लिए आपको साधुवाद।

रघुवंशमणि said...

धन्यवाद् बलरामजी यदि कुछ कहानियां सॉफ्ट कॉपी में हों तो मुझे मेरे ईमेल raghuvanshmani@yahoo.co.in पर भेजें.

harish thakur said...

jnaab 1994 me I completed my PhD on militancy in Kashmir. I remember the chapter of Jagmohan, "The Frighetened Pigeons" in his book "My Frozen turbulence in Kashmir". I still remember hoe Dr. ganjoo was killed to expedite the movement of Kashmiri Pandits, a well planned act by militants. Indian govt. is a big failure in rehabilitating the pandits back. poetry apart the task of rehabilitation remains, it has t b completed, lets see what happens

रघुवंशमणि said...

जगमोहन के बाद कि सरकारों ने भी कुछ नहीं किया.बीच में अटल बिहारी बाजपाई कि भी सरकार थी. अब तो कश्मीर और दिल्ली दोनों में भारतीय जनता पार्टी कि सरकार और उसके द्वारा समर्थित सरकार है. अब समझ में नहीं आता कि कश्निरी पंडितो को पुनार्स्थाप्पित क्यों नही किया जा रहा. कवि और लेखक तो बस लिख ही सकते हैं. और क्या कर सकते हैं.

Sanjay Tripathi said...

रघुवंशजी स्वप्निल सक्सेना जी की उक्त कविताएं सेब का संदर्भ रखते हुए काश्मीर की स्थिति को वास्तविकता के साथ प्रस्तुत करती हैं। एक गजल काश्मीर की तत्कालीन परिस्थितियों के संदर्भ में मैंने लिखी थी जो विभागीय पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। मुझे ढूँढनी पडेगी। चूँकि आप ऐसी रचनाएं संकलित कर रहे हैं अत: आपको प्रेषित कर दूँगा।

रघुवंशमणि said...

संजय जी ,
आप अपनी कविता अवश्य भेजें. यह भी लिखे कि वोह कब लिखी गयी थी. मैं समझता हूँ कि इस प्रकार का लेखन किया जाता रहा है. मगर कुछ लोग यह समझते हैं कि लेखकों ने अनदेखा किया.