<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418</id><updated>2011-12-16T12:02:29.815-08:00</updated><category term='कविता'/><category term='मेरी आलोचना  की आलोचना'/><category term='स्मृतियाँ'/><category term='साक्षात्कार'/><category term='सूचना'/><category term='लेख'/><category term='डायरी'/><category term='कबीर'/><category term='पत्र'/><category term='अनुवाद'/><category term='डॉ. रामविलास शर्मा सम्मान'/><category term='समीक्षा'/><category term='व्याख्यान'/><title type='text'>वाङ्मय</title><subtitle type='html'>साहित्य और संस्कृति</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>63</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-2101120028478924936</id><published>2011-10-18T07:54:00.000-07:00</published><updated>2011-10-18T07:55:42.886-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डायरी'/><title type='text'>फैज़ाबाद में इप्टा की इकार्इ का पुनर्गठन</title><content type='html'>फैज़ाबाद में इप्टा की इकार्इ का पुनर्गठन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फैज़ाबाद। 16 अक्टूबर। नाटक, गीत और लेखन स्वभावत: सामूहिक गतिविधियां हैं। सृजन की ये यात्राएं 'मैं से 'हम की तरफ जाती हैं। इप्टा का अर्थ जनता से जुड़ना और जनता को जोड़ना है। बाजारवाद से लेकर साम्प्रदायिकता तक के विरुद्ध प्रतिरोध को इसी प्रकार विकसित किया जा सकता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये उदगार भारतीय जन नाटय संघ इप्टा के प्रान्तीय सचिव राकेश जी ने स्थानीय तरंग सभागार में इप्टा की औपचारिक स्थापना के लिए आयोजित कार्यक्रम में व्यक्त किये। वे इस कार्यक्रम के मुख्य वक्ता और मुख्य अतिथि थे। उन्होंने यह भी कहा कि इप्टा को ग्रामीण क्षेत्रों में जाकर भी अपने कार्यक्रम करने चाहिए।अपनी सांस्कृतिक विरासत के साथ आगे बढ़ते हुए नयी पीढ़ी को अपने साथ जोड़ना चाहिए। कलाकारों और संस्कृतिकर्मियों के लिए यह जरूरी है कि वे जनता से जुड़ी नैतिकता एवं जीवनमूल्यों को अर्जित करें ताकि इस प्रकार वे अपने संस्कृतिकर्म के द्वारा जनता के हृदय को छू सकें। उन्होंने कहा कि फैज़ाबाद की सांस्कृतिक जमीन जनजागरण के लिए जरखे़ज है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे पहले डा. रघुवंश मणि ने फैज़ाबाद में इप्टा के पिछले कार्यो को याद किया और नाटकों के सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित किया। साहित्यकार आर. डी. आनन्द ने अपने वक्तव्य में आज के समय को समस्याग्रस्त और कठिन बताते हुए संस्कृतिकर्म के जोखिम और उत्तरदायित्वों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आज की परिसिथतियां इप्टा के प्रारमिभक दौर के समय की अपेक्षा अधिक कठिन और दुरूह हैं। ऐसे में संस्कृतिकर्म की भूमिका ज्यादा बड़ी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोरखपुर से पधारे इप्टा पर्यवेक्षक शहजाद रिजवी ने यह आशा व्यक्त की कि फैजाबाद की इप्टा इकार्इ भविष्य में मजबूत होगी और अपनी अलग पहचान बनाएगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे अतुल सिंह ने इप्टा के बीते दिनों को याद किया और कहा कि इप्टा का मतलब समाज की विकृतियों को सामने लाना है ताकि उन्हें समाज  से उन्मूलित किया जा सके। उन्होंने कहा कि गीत और नाटकों का किताबों या भाषणों की तुलना में सीधा प्रभाव पड़ता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कार्यक्रम के दूसरे चरण में आराधना दूबे द्वारा लिखित और निर्देशित नाटक दहेज का मंचन हुआ जिसमें आराधना दूबे, आरती वर्मा , अनीता वर्मा, पूनम वर्मा, रेनू वर्मा, सुमन निषाद, अंतिमा शर्मा, इजा अग्रहरि, पूजा अग्रहरि, सोनी यादव, सीमा यादव, नीरज कनौजिया, अंजनीराम और शालिनी तिवारी ने भाग लिया। प्रेम सागर, सुरेश तिवारी एवं बद्री प्रसाद विश्वकर्मा ने जनगीत प्रस्तुत किये।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-2101120028478924936?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/2101120028478924936/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=2101120028478924936' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/2101120028478924936'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/2101120028478924936'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2011/10/blog-post.html' title='फैज़ाबाद में इप्टा की इकार्इ का पुनर्गठन'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-3834179904033969584</id><published>2011-08-17T05:43:00.000-07:00</published><updated>2011-08-17T05:46:13.025-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डायरी'/><title type='text'>''आरक्षण के बारे में</title><content type='html'>&lt;strong&gt;''आरक्षण के बारे में&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;............... ..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''आरक्षण फिल्म के आरक्षण के बारे में कम भारत की शिक्षा व्यवस्था के बारे में अधिक है। इस फिल्म को देखने के बाद ही प्रदेश सरकारों का भ्रम दूर हुआ होगा। बौद्धिक हलकों में चल रही बहसों पर अब पटाक्षेप हो जाना चाहिए क्योंकि यह फिल्म आरक्षण के विरुद्ध तो कतर्इ नहीं। फिल्म का प्रारम्भ अवश्य मण्डल कमीशन के मामले से होता है मगर जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, मुददा बदलता जाता है। फिल्म के केन्द्र में आ जाता है शिक्षा का व्यवसायीकरण। फिल्म इस मुददे पर कुछ विकल्प भी सुझाती है। मुझे ये विकल्प तो लचर टार्इप के लगे। उपचारात्मक शिक्षा ही रामबाण नहीं है। वास्तव में शिक्षा को लेकर सरकार के दृषिटकोण को ही बदलना होगा और यह मामूली बात नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिलहाल यह फिल्म किसी भी विषय पर हो, इसे प्रतिबंधित किया जाना तो बिल्कुल ही गलत था। शायद सरकारें दंगाइयों और उनकी राजनीति से इतना घबराती है कि वे पहले किताबों, फिल्मों पर रोक लगाती है। पढ़ती, देखती या सोचती बाद में है। वास्तव में उन्हें ये कार्य पहले करने चाहिए। इस पूरे प्रकरण में फायदा तो फिल्म का ही हुआ। मुफत के प्रचार से बेहतर लाभ किसी फिल्म को क्या हो सकता है? लेकिन प्रकाश झा को कम से कम इस बात के लिए बधार्इ दी जानी चाहिए कि उन्होंने शिक्षा व्यवस्था पर एक विचारोत्तेजक बम्बर्इया फिल्म बनायी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-3834179904033969584?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/3834179904033969584/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=3834179904033969584' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/3834179904033969584'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/3834179904033969584'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2011/08/blog-post.html' title='&apos;&apos;आरक्षण के बारे में'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-6151116424552537033</id><published>2011-06-09T19:45:00.000-07:00</published><updated>2011-06-09T19:48:12.434-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डायरी'/><title type='text'></title><content type='html'>&lt;strong&gt; शस्त्र, शास्त्र और गाॅधीवाद&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                                   रघुवंशमणि&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;योगगुरु बाबा रामदेव कुछ दिनों पूर्व तक बेहद सफल व्यक्तित्व नज़र आ रहे थे। उन्होंने योगाभ्यास और आयुर्वेदिक स्वास्थ औषधियों की शानदार व्यवसायिक पैकेजिंग की थी और पूरी दुनियाॅं में अपनी सफलता के झंडे गाड़ दिये थे। फिर उन्होंने पूरे देश में यात्रा करके बाकायदा अपनी भारतीय स्वाभिमान पार्टी के लिए पृष्ठभूमि भी तैयार कर ली थी। दिल्ली में अनशन के अभियान के समय तो ऐसा लगा कि सरकार उनके सामने झुक गयी है। मगर उसके बाद की राजनीतिक गतिविधियों के दौरान बाबा रामदेव विचलित नज़र आये और उनके वक्तव्यों से यह जाहिर होने लगा कि योगाभ्यास के दौरान योगासनों पर उनका कितना भी अभ्यास क्यों न रहा हो, राजनीति के आसन पर वे अभी ठीक से बैठने का अभ्यास नहीं कर पाये हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली दिल्ली की सत्ता ने पूलिसिया बल प्रयोग के द्वारा जब उन्हें रामलीला मैदान से हटाया तो मीडिया ने बाबा को जबर्दस्त एक्सपोजर दिया। अन्ना हजारे ने अपने पुराने सहयोगी के समर्थन में और पुलिसिया गतिविधि के विरोध में गाॅंधी जी की समाधि पर आठ घंटे का अनशन रखा। आर. एस. एस. और बी.ज.ेपी. को तो स्वामी जी का समर्थन करना ही था। पूरे देश में बुद्धिजीवियों ने भी रामदेव के साथ हुई इस घटना की भूरि-भूरि निन्दा की। यह सब बाबा के समर्थन में ही हुआ। यहाॅं तक कि साम्यवादी दलों के समर्थकों ने भी बाबा का समर्थन न करते हुए भी इस घटना की निन्दा की और सरकार को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया। इस प्रकार बाबा को मिलने वाला यह बड़ा समर्थन था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर बाबा रामदेव ने हरिद्वार पहुॅंचने के बाद जिस प्रकार के वक्तव्य दिये वे किसी राजनीतिक नेता के लिए बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं कहे जायेंगे। उनकी स्थिति स्व. टिकैत या योगी आदित्यनाथ से बेहतर नहीं थी जो मौके-मौके पर कैमरे के सामने रोते रहे हैं। किसी भी नेता के पीछे चलने वाली जनता अपने नेताओं के आॅंसुओं से भावुक तो हो सकती है, मगर वास्तव में वह अपने नेताओं को विपरीत परिस्थितियों में भी मजबूत और दृढ़ देखना चाहती है। बाबा रामदेव का यह कहना कि सरकार उनकी हत्या कराना चाहती है, किसी के भी गले से नीचे उतरने वाली बात नहीं थी क्योंकि यदि सरकार उन्हें मारना-मरवाना चाहती तो उसके पास काफी वक्त था। फिर बाबा का यह कहना कि उनके 5000 कार्यकत्र्ता गायब हैं, निहायत ही अविश्वसनीय बात थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन सबसे राजनीतिक गैरसमझदारी से भरी बात उन्होंने तब कही जब उन्होंने अपने शिष्यों से शास्त्र सीखने के साथ शस्त्र उठाने की भी बात कही। अभी चार दिन पहले तक गाॅंधीवादी तरीके से अहिंसक आन्दोलन और अनशन करने वाले बाबा रामदेव का क्या अपने सिद्धान्तों से इतनी जल्दी मोहभंग हो गया? गाॅंधी जी ने अपने लगभग तीन दशकों की अहिंसात्मक लड़ाई में बहुत बार गिरफतारियाॅं दीं, उनके समर्थक मारे पीटे गये, जेल में ठूॅंसे गये, मगर उन्होंने कभी भी अपनी अहिंसा की राजनीति पर अविश्वास नहीं व्यक्त किया। उन्होंने अपने अहिंसात्मक संघर्ष के तरीके पर केवल एक बार अविश्वास जाहिर किया था। वह समय था साम्प्रदायिक दंगों के उभरने का, जब बिहार और बंगाल खून से रंग गये थे। मगर यह उनके लिए अपनों से पराजित होने जैसी स्थिति थी। किसी राजनीतिक सत्ता के अत्याचार के सामने तो वे अपने अहिंसात्मक शस्त्र के साथ हमेशा डट कर खड़े रहे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर बाबा रामदेव के समक्ष गाॅंधी जी जैसी कोई स्थिति नहीं थी। दिल्ली के रामलीला मैदान की घटना की निन्दा तो सभी ने की, मगर उन्हें जलियाॅंवाला बाग की घटनाओं के समान कहना अतिरेकपूर्ण ही होगा। तो फिर ऐसा क्या हुआ कि बाबा पूरी तरह से विचलित हो गये और अहिंसा से हिंसा के रास्तेे पर उतर आये? वे हर जिले से आने वाले 20 स्वयंसेवकों को लाठी ही नहीं जूडो-कराटे भी सिखाने का संकल्प ले  रहे हैं। यह उनके जैसे स्थपित व्यक्तित्व के लिए उचित नहीं और उनके राजनीतिक कच्चेपन का सबूत है। भारत का संविधान और उसकी मुख्यमार्गी राजनीति पार्टियाॅं परोक्षरूप से भले ही हिंसा का इस्तेमाल कर ले, वे इस प्रकार खुलेआम हिंसा का समर्थन नहीं करती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाबा रामदेव के इस प्रकार के वक्तव्यों से उन पर लगने वाले कांग्रेसी आरोपों की ही पुष्टि होती है कि वे दिल्ली में गड़बड़ी फैलाना चाहते थे। इससे यह भी प्रमाणित किया जायेगा कि वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तरह की ही राजनीति कर रहे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज के दौर में अहिंसा की राजनीति करना आसान काम नहीं। यह एक दुधारी तलवार पर चलने जैसा काम है। इसके लिए सिर्फ मीडिया का समर्थन काफी नहीं होता। गाॅंधी स्वयं दृढ़प्रतिज्ञ थे और सत्याग्रह को चलाने की बुद्धिमत्ता भी उनमें कूट कूटकर भरी हुई थी। ये सभी बातें फिलहाल तो बाबा रामदेव में नहीं हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-6151116424552537033?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/6151116424552537033/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=6151116424552537033' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/6151116424552537033'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/6151116424552537033'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2011/06/blog-post.html' title=''/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-5941697223859432768</id><published>2010-11-04T03:29:00.000-07:00</published><updated>2010-11-04T03:32:47.649-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुवाद'/><title type='text'>आर. के. सिंह की कुछ अंग्रेजी कविताओं के अनुवाद</title><content type='html'>आर. के. सिंह की कुछ अंग्रेजी कविताओं के अनुवाद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह पागल घोषित है&lt;br /&gt;पाॅंव बॅंधे हैं उसके&lt;br /&gt;गली में सरकती है&lt;br /&gt;वह आगे पीछे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नंगी भूखी वह &lt;br /&gt;ठिठुरती है दिसम्बर में &lt;br /&gt;नाली के पास सिकुड़ी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फुटपाथियों की उपेक्षिता&lt;br /&gt;कागज, लकड़ी और चीथड़ों से &lt;br /&gt;आग जलाने की कोशिश है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुल के नीचे चाय की चुस्कियाॅं लेते&lt;br /&gt;मैं राजघाट की घंटियाॅं सुनता हूॅं&lt;br /&gt;तीर्थयात्री ट्रेन पकड़ने की जल्दी में हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो सूखे वृक्षों के बीच अनन्त सौंदर्य सी खड़ी &lt;br /&gt;दुपहरी में गुजरतेे मछुवारों को देखती&lt;br /&gt;उसकी आॅंखें भी तो मछलियाॅं हैं&lt;br /&gt;पर परवाह किसे है उनकी&lt;br /&gt;गिरकर शांत होती हैं फड़फड़ाती पत्तियाॅं&lt;br /&gt;लपटों के शांत होने पर देखती है&lt;br /&gt;टीलों के उच्चावच पर अपनी टूटी चूड़ियाॅं&lt;br /&gt;और एक बिलखता गुलाब सफेद साड़ी में &lt;br /&gt;छिपा लेती है वह&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;3.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चेहरे पर जर्द पर्त&lt;br /&gt;राख में तलाशती अंगुलियाॅं&lt;br /&gt;पिछवाड़े बागान के करीब ही&lt;br /&gt;बिनती हैं जले हुए कोयले&lt;br /&gt;कल का खाना बनाने के लिए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;4.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्ंगा यमुना का संगम&lt;br /&gt;एक समलैंगिक मिलाप है&lt;br /&gt;सुन्दर परन्तु बंजर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे मित्र को पता है&lt;br /&gt;स्वर्ग का रास्ता &lt;br /&gt;इन सर्पीली नदियों से होकर नहीं जाता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;5.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सूरज के फैलते मकड़जाली चक्र मेरे&lt;br /&gt;मेरे अस्तित्व और चीजों को धुंधलाते हैं&lt;br /&gt;सुबह से शाम तक मेरे चारो तरफ&lt;br /&gt;मिथक स्वयं को दोहराता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे अंदर की उभरती रोशनी &lt;br /&gt;कागजी भगवान का आभामण्डल&lt;br /&gt;चारो तरफ सभी कुछ आन्दोलित करती&lt;br /&gt;जीवन और मृत्यु का समीकरण है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस वक्त का सशंकित सन्नाटा&lt;br /&gt;षडयन्त्र है एक गंभीर दृश्य को आभामण्डित करने का&lt;br /&gt;भावनाओं को प्रतिबिम्बित करने में&lt;br /&gt;अंधभावनाओं और लघुदृष्टियों की पूर्णता में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;6.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह नहीं कि कुछ पैसे मैं&lt;br /&gt;रिक्शे पर खर्च नहीं कर सकता&lt;br /&gt;नहीं खरीद सकता कार या स्कूटर&lt;br /&gt;मैं जुड़ा रहा चाहता हूॅं&lt;br /&gt;धरती और धूल से&lt;br /&gt;अपने भार के साथ&lt;br /&gt;अकेले चलना चाहता हूॅं&lt;br /&gt;मेरे कन्धे पर सब्जियाॅं और सामान&lt;br /&gt;चालीस साल पहले जैसी लटकी हैं&lt;br /&gt;सोचता हूॅं बिना किसी शर्म के&lt;br /&gt;स्वाभिमान और पसीने के साथ&lt;br /&gt;दूरियाॅं तय कर सकता हूॅं&lt;br /&gt;और कह सकता हूॅं खुद से &lt;br /&gt;देखो मैं उनसे जुदा हूॅं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पैसे से होने दो उनका मूल्यांकन&lt;br /&gt;जिसको वे अपनी टांॅगों के बीच या सपनोें में &lt;br /&gt;छिपाकर रखते हैं&lt;br /&gt;मुझे मेरे कामों से जाना जाय&lt;br /&gt;मेरी मेहनत से जिसने किसी का अपकार नहीं किया&lt;br /&gt;और कल जब मैं इतना बूढ़ा हो जाऊ&lt;br /&gt;कि खड़ा न रह सकूॅं अपने पैरो पर, चल न सकूॅं&lt;br /&gt;तो याद करूॅंगा कि जमा कर रखे थे मैंने&lt;br /&gt;अपने पैर जमीन पर&lt;br /&gt;और उन सबको जाना था&lt;br /&gt;जिन्होंने बेदिली से अपना हाथ बढ़ाया था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे किसी को शाप न दें अगर&lt;br /&gt;उनके गिरने पर ध्यान न दे कोई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;7.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब फूल सूख जाएॅंगे&lt;br /&gt;शहद के लिए मण्डराती &lt;br /&gt;मक्खियों को कौन जीवित रखेगा&lt;br /&gt;या उन हाथों को महसूसेगा&lt;br /&gt;जो नारंगी के बागों में लगे &lt;br /&gt;छत्तों को संवारते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे तब मिलकर &lt;br /&gt;अपने स्वर्णिम दिनों को &lt;br /&gt;याद कर सकती हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;या इस टोने को&lt;br /&gt;खत्म करने के लिए&lt;br /&gt;कोई राग गुनगुना सकती हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;या जिस भी वजह से &lt;br /&gt;धुवांसे सन्नाटे में &lt;br /&gt;उनका छत्ता जला हो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन पता है मुझे अब&lt;br /&gt;मधुमक्खियाॅं नहीं लौटेंगी&lt;br /&gt;नग्न वृक्षों की ओर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;8.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जाति बदलना संभव न था&lt;br /&gt;उसने अपना धर्म बदल डाला&lt;br /&gt;फिर भी वे न बदले&lt;br /&gt;न ही बदली उनकी संकीर्ण दुनिया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भेड़िये, लोमड़ी और कौए&lt;br /&gt;उस प्रबोधन की परेशानी को&lt;br /&gt;न बदल सके आसमान के साथ&lt;br /&gt;जो देवताओं का पर्दा है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिंजरा अभी भी भागता फिरता है&lt;br /&gt;एक पंछी की तलाश में &lt;br /&gt;और वह सूरज की आशा में &lt;br /&gt;अकेली लड़ाई लड़ता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;9.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मौन फुटपाथ है&lt;br /&gt;ध्यानियों की शरणस्थली&lt;br /&gt;दूधिया सन्नाटे में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुजरती सुन्दरियाॅं&lt;br /&gt;पानी में नग्न होतीं&lt;br /&gt;सिकुड़ती चमड़ी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कार्तिक में गंगा पर &lt;br /&gt;आदि ईश्वर हॅंसता है&lt;br /&gt;उनकी नंगी पीठ के पीछे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घायल कर देने वाली शीत में&lt;br /&gt;ऊॅं वासनाओं के लिए&lt;br /&gt;सुविधाजनक है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और अश्वपति नहीं अब बस&lt;br /&gt;दो श्वेत चन्द्रवृत्तों के पीछे&lt;br /&gt;जेट से भागते लटके हैं वे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;10.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इच्छाओं को त्याग दूॅं तो भी नहीं खत्म होता यह सब&lt;br /&gt;दुःख का न होना निर्वाण की कुंजी नहीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;व्यतीत को प्रेम न करने और वासनाओं &lt;br /&gt;और नये मानसिक भ्रमों और भयों के जंजाल में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अहसास की खुजली, बदलती गिरावट&lt;br /&gt;अस्तित्व के द्वीप की धुॅंधलाती रौशनी में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवन बस जमता जाता, रुके तालाब की दुर्गन्ध&lt;br /&gt;फिर भी खिलता है आशा का कमल&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;11.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैने उपवास नहीं रखा&lt;br /&gt;मेरे लिए नहीं है नौरोज़&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;न होली ही है &lt;br /&gt;अब मैं हिन्दू नहीं रहा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत पहले इसाइयों ने भी&lt;br /&gt;मेरी आस्था और प्रेम पर संदेह किया था&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुस्लिम इतने कट्टर हैं कि &lt;br /&gt;एक सेकुलर को अस्वीकार कर दें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब मैं अकेला देखता हूॅं&lt;br /&gt;रंगों की त्रासदी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं उत्सव मनाता हूॅं&lt;br /&gt;भिन्नता और आत्मा की स्वतंत्रता का&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पर वे मेरे जन्म पर सवाल उठाते हैं&lt;br /&gt;और मुझे ढोंगी बताते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;12.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं यीशू तो नहीं&lt;br /&gt;पर सूली पर चढ़ने की &lt;br /&gt;पीड़ा समझता हूॅं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक सामान्य आदमी की तरह&lt;br /&gt;सब झेलता जो उन्होंने झेला था&lt;br /&gt;वही जीवन जीता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कभी विनती करता और रोता&lt;br /&gt;प्रेम के अभाव में भी&lt;br /&gt;आगे अच्छे दिनों की आशा करता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घटती सामथ्र्य, असफलता&lt;br /&gt;बोरियत और अनकिये अपराधों के&lt;br /&gt;दोशारोपणों के साथ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं जीसस नहीं हूॅं&lt;br /&gt;मगर मैं सूॅघ सकता हूॅं&lt;br /&gt;हवा में जहर और धुॅंवा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनुष्यता के लिए अनुभव करता हूॅं&lt;br /&gt;उन्हीं की तरह सलीब ढोता&lt;br /&gt;अपने स्वप्नों को पुनः जीता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं यीशू तो नहीं&lt;br /&gt;पर सूली पर चढ़ने का &lt;br /&gt;दर्द समझता हूॅं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;13.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह मकान ढह सकता है कभी भी&lt;br /&gt;इसकी दीवारें फटी हैं&lt;br /&gt;नींव पर दरारें खुली हैं&lt;br /&gt;पर कोई परवाह नहीं करता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे चुप्पी साधे रहते हैं&lt;br /&gt;सतही चिप्पियों की सुरक्षा में &lt;br /&gt;और धीरज रखने की बात करते हैं&lt;br /&gt;स्वार्थ सिद्धि के लिए करते हैं छद्म&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपनी अधमता को रहस्यमय बनाते&lt;br /&gt;विवेक और भविष्य की चिन्ता दबाते&lt;br /&gt;चहारदीवारी के बीच मास्टरों की &lt;br /&gt;चुप्पियाॅं खरीदते&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;14.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम कहाॅं पहुॅंचेंगे आखिर&lt;br /&gt;ताबूत में यात्रा करते&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;या इन्द्रधनुषी सिंहद्वार के परे&lt;br /&gt;लंगर डालने की कल्पना करते&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुनहरी और चमकती राख&lt;br /&gt;मरजीवों को फिर जीवित नहीं करेगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मिथकों और कहानियों में खोये&lt;br /&gt;हमे वापस लाना होगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवन तत्वों का संतुलन&lt;br /&gt;नये सूरज बनाने के लिए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और चन्द्रमाओं के लिए&lt;br /&gt;गुफाओं को रौशन करेें &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो नये भविष्य की शुरुवात करें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;15.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि दुनिया नहीं हुई&lt;br /&gt;मेरी नौजवानी की सोच जैसी&lt;br /&gt;तो मैं क्या करूॅं। मैं था&lt;br /&gt;निर्भर अपने पिता पर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वनिर्मित मैं&lt;br /&gt;धाराओं के विरुद्ध पढ़ न सका&lt;br /&gt;आसमान और उसके मजबूत इलाकों को &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गंगा की बालू पर बने निशान&lt;br /&gt;इन्द्रधनुष की तरह धुॅंधला गये&lt;br /&gt;समय की बरसात&lt;br /&gt;पैरों में चुभती है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दाॅंत के खोड़र&lt;br /&gt;और अंधत्व करते हैं आक्रान्त&lt;br /&gt;और कामचिन्ताएॅं सताती हैं&lt;br /&gt;निद्रा और स्वप्नहीन रातों को&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे गंजे होते सिर के गिरते बाल&lt;br /&gt;उस हॅंसी को प्रतिबिम्बत करते हैं&lt;br /&gt;जिन पर अब ध्यान नहीं देता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब मैं नहीं करता&lt;br /&gt;चालाक और अविश्वसनीय &lt;br /&gt;मित्रों को बेपर्दा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपने अस्तित्व और भविष्य&lt;br /&gt;पर खीजता नहीं और&lt;br /&gt;प्रभाव नहीं बना पाता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर भी सुनिश्चित है जब मैं विराम लूॅंगा&lt;br /&gt;तो बहुत बुरा तो नहीं रहेगा&lt;br /&gt;मेरी दृष्टि फिर भी रहेगी ठीक&lt;br /&gt;ताजी हवा में साॅंस लेता रहूॅंगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;16.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अकेले में रहना&lt;br /&gt;द्वीप बनाता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;घुलती मिलती परछाइयों को &lt;br /&gt;पानी में देखना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुनर्मिलन की आशा जगाता&lt;br /&gt;तारों के टूटने पर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ज्वार की तरफ आॅंख मूदकर&lt;br /&gt;नया झूठ बुनना है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;17.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फौलादी बहाव के साथ &lt;br /&gt;बहता हुआ पानी&lt;br /&gt;पत्थर को भेदता है&lt;br /&gt;उन्हें सितारों की शक्ल देता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सूरज और चाॅंद भी नहीं पा सकते&lt;br /&gt;वैसा तीखापन&lt;br /&gt;चट्टानों का विलाप&lt;br /&gt;बदलता है नदी के गीत में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;18.&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;क्या वे स्वयं को या अपनी सच्चाई को&lt;br /&gt;देखते हैं अन्तर्दर्पण में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुत घृणा और क्रोध उपजाते&lt;br /&gt;मनुष्यों और घरों को जलाते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ नहीं सीखते कभी मगर&lt;br /&gt;साम्प्रदायिकता का पत्ता फेकते, अधिकारों के लिए&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो किसी ईश्वर ने नहीं दिया उन्हें। उनकी&lt;br /&gt;अधम राजनीति सन्नाटे की विकृति है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                                   अंग्रेजी से अनुवाद रघुवंशमणि&lt;br /&gt;.......................... ........................... .&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-5941697223859432768?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/5941697223859432768/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=5941697223859432768' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/5941697223859432768'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/5941697223859432768'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2010/11/blog-post.html' title='आर. के. सिंह की कुछ अंग्रेजी कविताओं के अनुवाद'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-8388558297883272125</id><published>2010-10-25T13:08:00.000-07:00</published><updated>2010-10-25T13:10:46.788-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डायरी'/><title type='text'>दिगंबरी योग</title><content type='html'>डायरी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिगंबरी योग&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सारा ज्या अण्डरवुड का नाम हिन्दुस्तान में किसे मालूम था! न तो वह कोई जानी-मानी नेत्री थी न अभिनेत्री। मगर राष्ट्ीय स्वयं सेवक संघ जैसी संस्थाओं की सत्ता ऐसी व्यापक कि जिसे चाहें रातों-रात स्टार बना दें। सारा के दिगंबरी योग के बाद उनका जो विरोध हुआ तो फिर उसकी वीडियो क्लिप के चक्कर में हिन्दुस्तान का बिगड़ैल युवा वर्ग पागल हो गया। उसे देखने के लिए लोग पूरा नेट छान मार रहे हैं और प्लेब्वाय की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है। एक जिम्मेदार सज्जन को तो यहाॅं तक कहना पड़ा कि योगासनों का धर्म से कुछ लेना देना नहीं। अब इसका धर्म से कुछ लेना देना हो या न हो, वार तो उल्टा गया। सारा की लोकप्रियता ही बढ़ी और दिगंबरी योग के विरोध में कोई बड़ी वारदात नहीं हो सकी। जो लोग कुछ विरोध कर भी रहे थे, मन में उनके उत्सुकता उस वीडियो को ठीक तरह से देख लेने की थी। वाइज की बातें कौन मानता है और फिर हर बात का जवाब हिंसक वक्तव्य तो नहीं होते। इस बात को अब तो समझ ही लेना चाहिए। चित्तवृत्ति पर नियंत्रण की जरूरत दक्षिणपंथियों को ज्यादा है। वे चाहें तो एक आॅंख झपकाने वाले योग गुरु रामदेव जी की शरण में जाॅंय, चाहे दिगंबरी सारा के। उत्सुकता यह है कि ज्यादातर लोग किसकी ओर जाना पसंद करेंगे?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-8388558297883272125?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/8388558297883272125/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=8388558297883272125' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/8388558297883272125'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/8388558297883272125'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='दिगंबरी योग'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-2990208851863601665</id><published>2010-08-13T22:15:00.000-07:00</published><updated>2010-08-13T22:20:17.728-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कबीर'/><title type='text'>क्या कबीर स्त्री विरोधी थे?</title><content type='html'>मेरे ब्लाग पर छद्म नाम से टिप्पणी लिखने वाले एक टिप्पणीकार मित्र ने मुझसे कबीर के स्त्री सम्बन्धी विचारो पर बहस चलने के लिए कहा! मुझे लगता है कि बहुत से लोगो के समान वे भी यह सोचते है कि कबीर  स्त्री विरोधी है! तो आइये इस विषय पर भी विचार करे!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या कबीर स्त्री विरोधी थे?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-2990208851863601665?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/2990208851863601665/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=2990208851863601665' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/2990208851863601665'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/2990208851863601665'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2010/08/blog-post_13.html' title='क्या कबीर स्त्री विरोधी थे?'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-751473721588461171</id><published>2010-08-07T10:38:00.000-07:00</published><updated>2010-08-13T03:24:58.618-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सूचना'/><title type='text'>टिप्पणीकारो से निवेदन</title><content type='html'>टिप्पणीकारो से निवेदन है कि छद्म नामो से टिप्पणी न भेजा करे! उन्हे प्रकाशित करना सम्भव न हो सकेगा! Chadma namo se prakashit purani tippaniya bhi dheere dheere hatayi ja rahi hain.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-751473721588461171?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/751473721588461171/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=751473721588461171' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/751473721588461171'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/751473721588461171'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2010/08/blog-post_07.html' title='टिप्पणीकारो से निवेदन'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-7793998913425835570</id><published>2010-07-25T12:51:00.000-07:00</published><updated>2010-07-25T12:58:30.138-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डायरी'/><title type='text'>क्या कबीर वर्णव्यवस्था के समर्थक थे??</title><content type='html'>डायरी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या कबीर वर्णव्यवस्था के समर्थक थे??&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;१८. ७. २१&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; फैज़ाबाद में मेरे आवास पर हुई चर्चा के दौरान डा वागीश शुक्ल  ने कबीर को वर्णव्यवस्था समर्थक का  सिद्ध करने के लिए कबीर की ही  साखी प्रस्तुत की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;॑॑ सकल बरण एकत्र् ह`वै सकति पूजि मिलि खांहि। &lt;br /&gt;हरिदर्शन की भ्रान्ति करि केवल जमपुर जॉंहि।। ॔॔&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कबीर की यह साखी अपेक्षाकृत कम प्रचलित है, इसलिए मेरे सहित वहॉं उपस्थित हिन्दी युवा कवि विशाल श्रीवास्तव, संस्कृत विद्वान महेश मिश्र, वरिठ कवि स्वप्निल श्रीवास्तव और उर्दू साहित्य की विदुषी बुशरा खातून ने उनकी बात को बिना किसी प्रतिरोध के स्वीकार कर लिया। लेकिन बाद में इस साखी का अर्थ  देखने पर पता चला कि इसका वर्णव्यवस्था से कोई मतलब ही नहीं है। वास्तव में इस साखी का अर्थ तो निम्नवत` है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;"॑॑ समस्त वर्ण् के लोग शक्तिपूजा के नाम पर इकठ`ठे होकर मॉंस भक्षण करते हैं, वे सिर्फ़ हरिभक्त होने की भ्रान्ति पैदा करते हैं। वे वास्तव में भक्त नहीं होते। वे केवल यमपुर की यात्रा करते हैं।॔॔ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                   कबीर, ग्रंथावली, संपादक रामकिशोर शर्मा, लोकभारती, २६, पृ. २२३.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कबीर की इस साखी को शक्तिपूजा या मॉंस भक्षण के सन्दर्भ में तो प्रस्तुत किया जा सकता है, मगर वर्णव्यवस्था के समर्थन के लिए इसका इस्तेमाल बिलकुल गलत है। वास्तव में इस दोहे का वर्णव्यवस्था से कोई सम्बन्ध है ही नहीं।  सवाल यह है कि दूसरों के संदेहों और अज्ञान का फायदा उठाकर उन्हें गलत जानकारी देने वाले डा वागीश शुक्ल जैसे विद्वानों का क्या किया जाय?? वे उन्हीं मध्यकालीन ब्राह`मणों के समान हैं जो वेद के नाम पर जनता को &lt;strong&gt;कुछ भी&lt;/strong&gt; समझा दिया करते थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिलहाल मेरा सवाल यह है कि क्या आपको लगता है कि कबीर वर्णव्यवस्था के समर्थक थे?? क्या आपको कबीर की कोई ऎसी प्रमाणिक पंक्ति याद आती है जिसमें वे वर्णव्यवस्था के समर्थक लगते हों?? आपके विचारों की प्रतीक्षा रहेगी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-7793998913425835570?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/7793998913425835570/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=7793998913425835570' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/7793998913425835570'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/7793998913425835570'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2010/07/blog-post.html' title='क्या कबीर वर्णव्यवस्था के समर्थक थे??'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-6664277503945053475</id><published>2010-02-28T19:21:00.000-08:00</published><updated>2010-02-28T19:23:57.408-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='स्मृतियाँ'/><title type='text'>होली की एक स्मृति</title><content type='html'>मॉरीशस में होली बहुत अच्छी तरह से मनायी जाती है। 1968 के आस पास की घटना है। जब हम मारीशस में थे तो होली मनाने के लिए बो बासें चले जाते थे जहाँ चाचा ठाकुर प्रसाद मिश्र जी रहा करते थे। एक बार होली के दिन उनके यहँा कोई बुजुर्ग मेहमान आये हुए थे। वे कुर्सी पर बैठे हुए थे तो चाचा जी कमर पर एक बड़ा सा भगोना रखे हुए अंदर से निकले। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने अतिथि महोदय से पूछा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''क्या आप चाय पियेंगे''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बुजुर्ग सज्जन थोड़ा संकोच में पड़े, पर फिर संभलकर कहा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''हाँ हाँ पी लेगे''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अतिथि जी के इतना कहते ही चाचा जी ने पूरा भगोना उनके सिर पर उड़ेल दिया। वे सिर से पैर तक रंग से भीग गये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;होली की यह रंगीनियत उसकी खास बात है। मुझे यह त्योहार सांस्कृतिक अधिक और धार्मिक कम लगता है। यही वजह है कि मुझे अपने तमाम मुस्लिम दोस्तों की भी शुभकामनाएॅ इस अवसर पर मिलती रहती हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह रंग का उत्सव प्रकृति से भी जुड़ने का उत्सव होता है। शायद बाहर की प्रकृति से उतना नहीं जितना की अंदर की प्रकृति से। इस मामले में यह त्योहार कुछ कम फा्यडियन नहीं। इस अवसर पर ढेर सारी वर्जनाएँ अलग रख दी जाती हैं। हमारी प्रकृति पर जो दबाव हैं वे इस अवसर पर कम हो जाते हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-6664277503945053475?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/6664277503945053475/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=6664277503945053475' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/6664277503945053475'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/6664277503945053475'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2010/02/blog-post_28.html' title='होली की एक स्मृति'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-3813644085053168450</id><published>2010-02-13T05:35:00.000-08:00</published><updated>2010-02-13T05:38:31.998-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सूचना'/><title type='text'>कल के लिए</title><content type='html'>सम्मान्य महोदय/महोदया,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारा समय एक कठिन दौर रहा है जिसमें समाज और संस्कृति को अनेकानेक समस्याओं से रूबरू होना पड़ रहा है। अपसंस्कृति, साम्राज्यवाद, साम्प्रदायिकता, आर्थिक और सामाजिक विसंगतियाँ लेखन को सामाजिक दायित्व समझने वाले हमारे-आप जैसें लेखकों के समक्ष कठिन चुनौतियों के रूप में रही हैं जिनसे हम लगातार जूझते रहे हैं। कल के लिए इन ज्वलंत प्रश्नों को सामने रखकर निकलने वाली अपने समय की एक महत्वपूर्ण पत्रिका रही है। इसे आप जैसे प्रबुध्द साथियों का प्यार और सहयोग लगाातार प्राप्त होता रहा है जिसके चलते इस पत्रिका ने अपने संस्थापक-सम्पादक श्री जयनारायण के कुशल नेतृत्व में सफलतापूर्वक अपने सोलह वर्ष पूरे किये हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पत्रिका आज भी अपनी इन्ही प्रतिबध्दताओं से जुड़ी रहते हुए समकालीन सृजनात्मकता को समृध्द करने के कार्य में सन्नध्द है। मगर भाई जयनारायण जी की स्वास्थ सम्बन्धी समस्याओं को देखते हुए मुझे और भाई अम्बर बहराईची को उनके द्वारा संयुक्त रूप से पत्रिका को सम्पादकीय सहयोग प्रदान करने की जिम्मेदारी सौंपी गयी है। उर्दू साहित्य से जुड़ी सामग्री का सम्पादन अम्बर बहराईची करेंगे। मुझे पत्रिका के लिए हिन्दी सामग्री का सम्पादन कार्य देखना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस गुरुतर दायित्व का निर्वहन आप जैसे शुभेच्छु मित्रों और प्रतिबध्द एवं समर्थ लेखकों के सहयोग के बिना संभव नहीं है। पत्रिका के पहले से प्रकाश्य अगले दो विशेषांक शीघ्र ही आपके हाथो में होंगे। उसके बाद प्रकाशित होने वाले सामान्य अंकों के लिए आपके सहयोग के हम आकांक्षी हैं। विश्वास है कि आप अपनी श्रेष्ठ रचनाएँ हमें प्रेषित कर पत्रिका को अपना रचनात्मक सहयोग प्रदान करेंगे।ं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                           सहयोग की आशा के साथ,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                                                   आपका&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                                                  रघुवंशमणि&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;                                                               कार्यकारी सम्पादक&lt;br /&gt;                                                                 कल के लिए&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-3813644085053168450?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/3813644085053168450/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=3813644085053168450' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/3813644085053168450'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/3813644085053168450'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2010/02/blog-post_13.html' title='कल के लिए'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-2639701784684221624</id><published>2010-02-12T08:38:00.000-08:00</published><updated>2010-02-12T08:46:13.848-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डायरी'/><title type='text'></title><content type='html'>&lt;strong&gt;बाल ठाकरे को अनायास मिली चुनौती&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह संभवत: इस समय विचार का विषय नहीं है कि शाहरुख खान की फिल्म &lt;blockquote&gt;माई नेम इज खान&lt;/blockquote&gt; किस प्रकार की फिल्म है? कला की दृष्टि से वह ठीक ठाक है या नहीं? उसकी विषयवस्तु क्या है या उसका मैसेज कैसा है? फिल्म में विषय या कहानी के साथ निर्देशक का ट्रीटमेंन्ट कैसा है? यानि कि फिल्म कैसी है यह फिलहाल महत्वपूर्ण नहीं है। हो सकता है एक सप्ताह बाद ही यह फिल्म टिकट खिड़की पर दम तोड़ दे। होने को तो इसका उल्टा भी हो सकता है, मगर इस समय इस बात का कोई मतलब नहीं है। मतलब सिर्फ इस बात का है कि यह फिल्म रिलीज हो गयी है और इसे देखने के लिए लोग बड़ी तादाद में थियेटरों में पहुँचे हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोग शिवसेना की धमकियों के बाद भी सिनेमाघरों में पहुँच रहे हैं और यह प्रदर्शित कर रहे हैं कि वे बाल ठाकरे जैसे कट्टरपंथी नेताओं से अधिक महत्व अपने सिने स्टारों को देते हैं। वे फिल्म को देखने के प्रतीकात्मक प्रतिरोध का बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं। शायद सामान्य परिस्थितियों में इस फिल्म को इतनी अच्छी शुरुवात न मिलती। दिल्ली में तो सिनेमाघरों में कई दिनों की एडवांस बुकिंग चल रही है। फिल्मों के इस पराभव के दौर में जब किसी एक शो का हाउस फुल जाना मुश्किल हो जाता है, यह वाकई जबर्दस्त बात है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाल ठाकरे और शिवसेना को यह चुनौती अनायास ही मिल गयी है। शायद स्वयं शाहरुख ने भी यह न सोचा होगा कि एक सामान्य टिप्पणी पर शिवसेना इस प्रकार प्रतिक्रिया करेगी। बात सिर्फ इतनी सी रही होगी कि उन्हे अपनी खेल सम्बन्धी सामान्य सी टिप्पणी को वापस लेना अपमानजनक लगा होगा। लेकिन यह भी उनके पक्ष में महत्वपूर्ण है क्योंकि शिवसेना की धमकी के बाद फिल्म उद्योग में शाहरुख का खुला समर्थन नहीं किया गया। कलाकारों से लेकर वितरकों तक ने संभल-संभल कर टिप्पणियाँ कीं क्योंकि उन्हे तरह-तरह के व्यावसायिक डर सता रहे थे। अभिषेक बच्चन जैसे कलाकारों ने तो साफ कहा कि वे महज कलाकार हैं और वे इस पचड़े में नहीं पड़ना चाहते। निश्चितरुप से शाहरुख ने इन परिस्थितियों में कुछ अकेलापन जरूर महसूस किया होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे भी फिल्मी दुनिया में ठाकरे का आर्शिवाद चलता था। यह दादागीरी वाला आर्शीवचन हुआ करता था। फिल्मी दुनिया ने भी सरकार और सरकार राज जैसी फिल्में बना कर बाल ठाकरे को नायक का दर्जा देने में कोई कमीं नहीं रखी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शाहरुख खान की इस प्रतिक्रिया को, जिसे बहादुरी कहना गलत न होगा, को हम बाल ठाकरे का अंत नहीं मान सकते। जनता की प्रतिक्रिया उन्हें गुड नाइट कहने जैसी भी नहीं है। बम्बई में ही उनके बहुत से समर्थक जरूर होंगे जो बदला लेने को उतावले होंगे। मगर इस घटना ने अनायास ही उनको एक बड़ी चुनौती दे दी है और जनता को एक प्रतीक नायक मिल गया है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-2639701784684221624?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/2639701784684221624/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=2639701784684221624' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/2639701784684221624'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/2639701784684221624'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2010/02/blog-post.html' title=''/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-8366167486593867148</id><published>2009-10-15T08:17:00.000-07:00</published><updated>2009-10-15T08:36:40.300-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सूचना'/><title type='text'>पुस्तक का संपादन</title><content type='html'>ब्लाग बंधुओ,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर मैने एक पुस्तक का संपादन किया है जो पंडित प्रेमशंकर मिश्र के व्यक्तित्व और कृतित्व को लेकर है। इस पुस्तक को फैजाबाद शहर के ही भवदीय प्रकाशन ने प्रकाशित किया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पं. प्रेमशंकर मिश्र जी अपने समय के महत्वपूर्ण कवि थे। करीबन साल भर पहले उनका निधन हो गया था। इस पुस्तक का आवरण आप हाशिये पर देख सकते हैं। इस पुस्तक से सम्बन्धित कुछ सामग्री आने वाले दिनों में ब्लाग पर दूंगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-8366167486593867148?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/8366167486593867148/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=8366167486593867148' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/8366167486593867148'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/8366167486593867148'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2009/10/blog-post.html' title='पुस्तक का संपादन'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-4192554179067002736</id><published>2009-03-23T07:16:00.000-07:00</published><updated>2009-03-23T07:19:25.829-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डायरी'/><title type='text'>फ्रीडा</title><content type='html'>डायरी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                   &lt;strong&gt;फ्रीडा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;          'यह शव अभी भी साँस ले रहा है।' &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ्रीडा फिल्म के बारे में मुझे बहुत पहले हिन्दी कवि अनिल सिंह ने बताया था। उन्होने यह फिल्म किसी टीवी चैनल पर देखी थी और मुझसे इस फिल्म की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। मैं इस फिल्म को तत्काल नहीं देख पाया। मैने इसे बाद में एक डीवीडी पर देखा तो वाकई यह कमाल की फिल्म लगी। 2002 में बनी यह फिल्म वास्तव में फ्रीडा काहलो के जीवन पर बनी है जो एक मैक्सिकन अतियथार्थवादी चित्रकार थीं और जिनका वैवाहिक जीवन उथल-पुथल से भरा हुआ था। इस फिल्म में सलमा हाएक ने फ्रीडा की भूमिका निभायी है। फ्रीडा अपने युवा जीवन में एक दुर्घटना का शिकार हो जाती है और जीवनभर शारीरिक रूप से निढाल रहती है। अपने दर्द और दुखों को वह अपने चित्रों में बहुत ही मौलिक तरीके से अभिव्यक्त करती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;युवा फ्रिदा के जीवन में हुई सड़क दुर्घटना उसे निराशा में डुबो देती है। मगर उसके पिता उसे एक कैनवस लाकर देते हैं जिस पर वह चित्र बनाना प्रारम्भ करती है। फिर वह चलना शुरू कर देती है। फ्रिदा का विवाह डीयागो नाम के एक ऐसे पेन्टर से हो जाता है जो वामपंथी है, उन्मुक्त जीवन का आदी है, गैरसमझौतावादी है और फ्रिदा की कला का प्रशंसक है। उसके तमाम स्त्रियों से चले सम्बंधों का फ्रीडा के जीवन पर असर पड़ता है। वह भी प्रेम की तलाश में निकलती है और स्त्रियो तथा पुरुषों से उसके सम्बंध बनते हैं। डीयागो उसे तलाक भी दे देता है। पर बाद में वे पुन: मिलते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ्रीडा की जिजीविषा को, उसकी प्रेम की तलाश को यह फिल्म बिना किसी अतिरंजिता के प्रस्तुत करती है। उसके दुख बहुत अधिक हैं मगर वह उन्हे एक कलाकार सुलभ सर्जनात्मक प्रतिरोध के साथ जीती है। इस फिल्म के बहुत से दृश्य पेन्टिग सरीखे हैं और रंगों की उपस्थिति अद्भुत है। पता नहीं क्यों मुजफ्फर अली की फिल्म 'गमन' याद आयी जिसमें कई इस तरह के दृश्य थे। ध्यान देने की बात है कि 'गमन' काफी पुरानी फिल्म है। लेकिन इस फिल्म में बहुत से ऐसे दृश्य हैं जो अतियर्थाथवादी हैं और जो पेन्टिंग्स तक सीमित नहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस फिल्म की विशेषता इसमें रूसी नेता लियोन ट्रॉटस्की का एक पात्र के रूप में होना भी है जिनकी हत्या का चित्रण भी इस फिल्म में है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-4192554179067002736?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/4192554179067002736/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=4192554179067002736' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/4192554179067002736'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/4192554179067002736'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title='फ्रीडा'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-2419305907935831907</id><published>2009-02-22T04:34:00.000-08:00</published><updated>2009-02-22T04:44:28.693-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डायरी'/><title type='text'>कपिलदेव की आलोचना पुस्तक</title><content type='html'>डायरी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;कपिलदेव की आलोचना पुस्तक&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कपिलदेव हिन्दी साहित्य के सुपरिचित आलोचक हैं। ब्लागर मित्रों में साहित्यिक रुचि के लोग इस नाम से बखूबी परिचित होंगे। उनकी समीक्षाएँ और लेख विभिन्न पत्रि में प्रकाशित होते रहे हैं। बहुत समय से उनकी उनकी आलोचना पुस्तक की प्रतीक्षा थी। अन्तत: यह प्रतीक्षा खत्म हुई और वे अपनी पुस्तक अंतर्वस्तु का सौंदर्य लेकर मैदान में आ गये। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हाल में ही कपिलदेव के अपने ही शहर गोरखपुर में एक भीगी सुबह नामवर जी ने अपनी व्यस्तताओं के बीच समय निकाल कर अन्तर्वस्तु का सौंदर्य का लोकार्पण कर दिया। पुस्तक को विमोचित करते हुए उन्होंने कपिलदेव की समझदारी की भूरि भूरि प्रशंसा की और उनकी कृतियों में निहित आलोचकीय अन्तर्दृष्टि की चर्चा की। 'बाघ' कविता पर उनके लेख की चर्चा करते हुए उन्होंने इसे केदार जी की उक्त कविता पर महत्वपूर्ण समीक्षा माना। कुल मिलाकर नामवर जी ने हिन्दी में एक महत्वपूर्ण आलोचक की पुस्तक का जोरदार स्वागत किया। देर आयद दुरुस्त आयद।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कपिलदेव दर्शनशास्त्र से साहित्य में उतरे हैं इसलिए वे साहित्य के मुद्दों को काफी गहराई तक ले जाकर विचार करते हैं। जो पाठक इस पुस्तक में रुचि रखते हों वे उनकी पुस्तक का मुखपृष्ठ उनके ब्लाग पर देख सकते हैं और अन्य जरूरी बातें जान सकते हैं। इस पुस्तक को मानव प्रकाशन, कलकत्ता ने छापा है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-2419305907935831907?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/2419305907935831907/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=2419305907935831907' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/2419305907935831907'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/2419305907935831907'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2009/02/blog-post.html' title='कपिलदेव की आलोचना पुस्तक'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-3399517054183006685</id><published>2008-12-09T09:41:00.000-08:00</published><updated>2008-12-09T09:46:07.705-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डायरी'/><title type='text'>एक बहादुर युवती की याद</title><content type='html'>डायरी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बहादुर युवती की याद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं उस युवती को पूरी तरह से भूल चुका था। यदि शिमला जाते वक्त दिल्ली से कालका जाने वाली कालका शताब्दि ट्रेन में वह अखबार न मिला होता तो फिर याद भी न आती। कैसा दुखद है कि हम उन्हें भूल जाते हैं जो अच्छे काम करते हैं। मीडिया भी उन्हें कभी भूले भटके ही याद करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो वह अखबार था सेक्टर न्यूज और वह अखबार भी सिर्फ चण्डीगढ़ में वितरित होने वाला पाक्षिक। इसमें सूचना थी कि नीरजा भनोत सम्मान चन्दा असानी को दिया गया है। यहीं नीरजा भनोत की याद स्मृति में कौंध गयी जिसने भारत के अपहृत विमान से तमाम लोंगो को बचाया था और अन्त में दो बच्चों को बचाते हुए स्वयं अपहर्ताओं की गोलियों का शिकार हो गयी थीं। यह घटना 1986 की है। और नीरजा को अपने इस वीरता और साहस भरे कारनामें के लिए मरणोंपरांत अशोक चक्र दिया गया था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत के विमान को चार सशस्त्र आतंकियों ने अपहृत कर लिया था। 17 घंटे के तनाव भरे माहौल के बाद अपहरणकर्ताओं ने गोलियाँ चलानी शुरू कर दीं थी। नीरजा भनोत ने साहस और बुध्दिमत्ता का परिचय देते हुए विमान का आपातकालीन द्वार खोल दिया था जिससे बहुत से यात्री बच निकले थे। मगर अंत में दो बच्चों की जान बचाने में नीरजा दिवंत हुई। वे भारत की पहली महिला थ्ीं जिन्हे अशोक चक्र दिया गया था। यही नहीं पाकिस्तान की ओर से उन्हें तमगा-ए-इन्सानियत दिया गया था। अपनी वीरगति के समय नीरजा भनोत की उम्र 23 साल थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;31.10.2008&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-3399517054183006685?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/3399517054183006685/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=3399517054183006685' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/3399517054183006685'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/3399517054183006685'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2008/12/blog-post_09.html' title='एक बहादुर युवती की याद'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-1633923990351951311</id><published>2008-12-06T05:20:00.000-08:00</published><updated>2008-12-06T05:31:10.441-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लेख'/><title type='text'>कविता का परिवेश</title><content type='html'>कविता का परिवेश&lt;br /&gt;                                              रघुवंशमणि&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिस दौर में आज हम कविता की चर्चा कर रहे हैं वह सापेक्षित दृश्टि से तेज परिवर्तनों का समय है। जो परिवर्तन पहले सौ-पचास सालों में होते थे अब वे दो-चार सालों में सम्पन्न हो जाते हैं। आज हम जिस सामाजिक सांस्कृतिक परिवेश में रह रहे हैं, शयद उसकी कल्पना हम स्वयं 1970 के आसपास नहीं कर सकते थे। तकनीकी के तीव्र विकास ने जीवन में क्रान्तिकारी परिवर्तन किये है। 1970 के आसपास गॉवों तक ट्रांजिस्टर/रेडियो की भी पहॅुंच नहीं थी। आज वहीं पर विभिन्न मीडियारूप अपने विभिन्न लुभावने रूप-रंगों के साथ पहुँचे हुए हैं। सूचना क्रान्ति ने लोगों को छपे शब्दों के अतिरिक्त भी बहुत से ऐसे साधन दिये हैं जिनकें द्वारा अभिव्यक्ति और संप्रेशण संभव हुए हैं। ऐसे में निष्चित रूप से कवित की हमारे समय में अवस्थिति पर फिर से विचार करने की जरूरत है। यह मुद्दा हमें स्वाभाविक रूप से कविता की भूमिका से लेकर, कविता की आलोचना और मूल्यांकन के प्रष्नों तक ले जायेगा।&lt;br /&gt; प्रत्येक काल में लोग अपने समय में होने वाले परिवर्तनों के प्रति इस प्रकार की बातें करते रहे हैं। प्रेमचन्द ने भी अपने समय में हो रहे सापेक्षिक रूप से तेज परिवर्तनों की बात की थी। हर युग के विचारषील लोगों को अपना समय पिछले कालों से अधिक तेज परिवर्तनों वाला लगा है। लेकिन यह एक तथ्य है कि विगत बीस-तीस वर्शों में ही परिवर्तन ऐसे हो रहे हैं कि पिछले समय से गहरा अलगाव महसूस हो। यह कोई भावनात्मक बात नहीं है इसके भौतिक प्रमाण मौजूद हैं। रेडियो, ट्रांजिस्टर से टी.वी., आकाषीय चैनल, कम्प्यूटर, इण्टरनेट, टेलीफोन की भौतिक उपस्थिति इसके कुछ प्रमाण है। पारंपरिक मीडियारूपों में भी रूपगत परिवर्तन स्पश्टत: दृश्टिगोचर हुए है। इसी कारण हमारे इस दौर के परिवर्तनों को अभूतपूर्व कहा जा रहा है। यह बात दीगर कि आने वाले समय में परिवर्तन और भी तेज हों, और हमारे बाद की पीढ़ी को हमारा ही समय पिछड़ा हुआ लगे। यह भी संभव है कि ये परिवर्तन किसी ऐसी दिषा मेें फैले कि जीवन षैली पर इसका सीधा प्रभाव कम रहे और आने वाला जीवन  इतनी उथल-पुथल से  न भरा हो। कुछ लोग इस दौर को संरचनात्मक समायोजन के संक्रमण काल के रूप में भी देखते हैं जिसमें परिवर्तन तेज गति से होते हैं। इस संरचनात्मक समायोजन के बाद संभवत: इस परिवर्तन की गति थोड़ा मंद हो।&lt;br /&gt; फिलहाल विभिन्न मीडिया रूपों मेें कविता क्ी उपस्थिति का सवाल काफी परेषान करने वाला हो सकता है। विषेशकर यदि हम उस पारंपरिक रूमानी सोच के तहत कविता पर विचार करना प्रारंभ करें जिनके तहत कवि, ' भावी का द्रश्टा' और 'विप्लव का स्रश्टा' होता था; या जो 'षाष्वत मूल्यों' की सृश्टि करता था, अथवा जिसके पास 'ईष्वरीय षक्ति' या 'प्रतिभा' होती थी जो पूर्व संस्कारों से प्राप्त होती थी। लेकिन हम में से अधिकांश लोगों को इस प्रकार के भ्रम न होंगे। तथापि 1970 के दशक में कविता की भूमिका की तुलना में यदि आज की कविता को रखें तो यह भूमिका घटी हुई ही लगेगी। कविता के पाठकों की घटती हुई संख्या निरंतर चिन्ता का विशय बनी रही है। इसी सापेक्ष कविता का प्रभावक्षेत्र भी सीमित हुआ है।&lt;br /&gt; कविता को यदि 'मुफलिसों की अंजुमन' तक न भी पहुंचाया जा सके तो उसे कम से कम 'पढ़ी लिखी जनता' तक तो पहुंचाया ही जाना चाहिए। मगर सवाल यह है कि कविता का माध्यम क्या है? कविता स्वयं तो अपना माध्यम होती नहीं। कविता को यथाषक्ति पाठकों तक पहॅुंचाने का कार्य लघु पत्रिकाओं ने ही किया है। मगर हिन्दी के प्रकाशकों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं क्योंकि वे अक्सर लाभ के अर्थषास्त्र के चलते कविताओं को पाठकों तक पहुँचाने के बजाय पुस्ताकालयों तक पहुंचाते हैं। डॉ. मैनेजर पाण्डेय ने ठीक ही कहा है कि हिन्दी के प्रकाशक वास्तव में हिन्दी के अंधकारक हैं। इधर हिन्दी कवियों के कविता संग्रहों के संस्करणों की प्रतियाँ भी काफी कम होती गयीं है। कुछ संग्रहों के प्रकाशन संस्करण 500 प्रतियों तक भी सीमित रहे हैं। कहने का तात्पर्य यह कि हिन्दी में कविताओं के पाठक कई कारणों के चलते कम हुए हैं।&lt;br /&gt; मेरे एक मित्र अक्सर पूछते हैं कि यदि समकालीन हिन्दी कविता का मामला कुछ हजार लोगोें तक ही सीमित है तो फिर उसे लेकर ज्यादा उछल-कूद करने की क्या जरूरत? अगर कविता क्षेत्र में उठने वाले विवाद कुछ ही लोगों तक सीमित है तो फिर उसे ज्यादा महत्व क्यों दिया जाय? कविता को लेकर उठने वाले और उठाये जाने वाले इस प्रकार के प्रष्न अक्सर सिनिकल/नकारात्मक तरीके से सामने आते हैं और उन पर अंग्रेजी की एक कहावत के अनुसार टब के पानी के साथ-साथ बच्चे को भी फेंक देने का आरोप लगाया जायेगा क्योंकि कविता के पाठक कितनें भी कम क्यों न हुए हों, वह चर्चा का विशय बनी रहती है। समाज के एक संकुल में ही क्यों न सही वह गंभीरतापूर्वक समझी जाती है। लेकिन इस तर्क को कविता के पक्ष में आत्ममुग्ध तरीके से या 'संतोशधन' के रूप में नहीं प्रयोग किया जाना चाहिए।&lt;br /&gt; कविता की इस भौतिक स्थिति के प्रति चिन्ता ऐसा नहीं है कि हिन्दी जगत में व्यक्त नहीं हुई । आलोचकों में तो यह चर्चा रही ही, इसके प्रति कवियों में भी एक सजगता दिखाई देती है। अश्टभुजा षुक्ल और संजय चतुर्वेदी जैसे कवियों ने अपना रास्ता बदलकर नयी षैली अपनायी जो जनसामान्य के लिए ग्राह्य हो। जनगीतों के मार्ग तो प्रषस्त ही रहे। नयी कविता की कठिन और दुर्भेद्य षैली की तुलना मे समकालीन हिन्दी कविता सरलता की ओर बढ़ी है। अज्ञेयवादियों की षैली की तुलना में आज की कविता की षैली काफी सरल है। मगर कविता से कम सम्पर्क रखने वाले लोगों में कविता की कठिनाई का मिथक लगातार बना हुआ है। इसका एक बड़ा कारण यही है कि कविता को पढ़ी-लिखी हिन्दी जनता तक व्यापक रूप से पहुंचाने का कोई प्रभावी और व्यापक माध्यम नहीं है। कविता को जनता तक पहुंचा सकने वाले मंचों का अभाव है। इन प्रष्नों के खड़े होने पर हमेषा एक नवजागरण्ा की माँग की जाती है और हिन्दी जनता को कोसा जाता है। लेखक संघों और साहित्यिक संस्थाओं की गंभीर भागीदारी हो सकती है। जनसंस्कृति मंच के कुछ कवियों ने 'युध्द के विरुध्द कविता' के तहत कुछ समयपूर्व ऐसा प्रयास किया था जो सफल भी था। कई अवसरों पर कविता को लेकर जब भी जनता में जाना पड़ा है तो देखा गया है कि उसका प्रभाव अब भी काफी है। कविता को जनता के बीच ले जाने के प्रयासों को आगे बढ़ाने की जरूरत है।&lt;br /&gt;               &lt;br /&gt;                      (2)&lt;br /&gt; कविता के लिए जैसी भी भौतिक परिस्थितियां हैं उन्हीं के तहत समकालीन हिन्दी कविता को देखना होगा। कविता का यह भौतिक यथार्थ कविता की भूमिका के निर्धारण के लिए महत्वपूर्ण है। हिन्दी कविता कम लोग पढ़ते हैं इस तथ्य से ही कविता की सीमा को निर्धारित करना फिर भी खतरनाक होगा। कविता के लक्ष्य पाठकों की चर्चा में भी यह तथ्य नहीं भुलाया जाना चाहिए कि कविता के पेषेवर आलोचकों और नियमित पाठकों के अतिरिक्त एक यादृच्छिक पाठक वर्ग भी रहता है जो हमेषा महत्वपूर्ण होता है। फिर मुक्तिबोध के जनता के साहित्य के बारे में व्यक्त यह विचार नहीं भुलाया जाना  चाहिए कि जनता के बारे में लिखा गया साहित्य भी जनता का ही साहित्य है।&lt;br /&gt; इन सारे द्वन्द्वों के बीच मुख्यधारा की कविता की बात बिडम्बनापूर्ण लगती है क्योंकि समकालीन हिन्दी कविता स्वयं मुख्यधारा से अलग हैं। मुख्यधारा में तो फिल्मी गीत, ग़जलें और बाजारू संगीत आयेगा जिसका धन्धा अभी भी लाभप्रद है। हिन्दी में कविता लिखकर यष:प्रार्थी तो हुआ जा सकता है पर धनपषु नहीं। समकालीन हिन्दी कविता (जैसा कि बार-बार कहा जाता रहा है) प्रतिरोध और विकल्पों की कविता है और विकल्पों की यह तलाष जारी रहनी चाहिए क्योंकि इन विकल्पों के ठोस, सार्थक और परिवर्तनकारी रूप अभी समाज/संस्कृति में दिखलाई नहीं पड़ते। समकालीन हिन्दी कविता विभिन्न संस्तरों पर लिखी जा रही है और विभिन्नताएं ऐसी हैं कि किसी भी आलोचक को परेषानी में डाल दे। ये कविताएँ अपने वर्चस्व विरोध और सत्ताा प्रतिरोध मे ही अपनी इयत्ताा तलाषती है। पूरी कविता के लिए किया गया सामान्यीकरण 'समकालीन' स्वयं में तमाम तत्वों का एक समुच्च है जिसे पारिभाशित करने में सैकड़ों पन्ने काले किये जा चुके है। यहाँ यदि कई पीढ़ियाँ एक साथ सृजनरत हैं तो एक ही पीढ़ी के कई कवि कई-कई तरह से लिख रहे हैं। इसलिए मुख्यधारा का कोई भी सवाल अपने जवाब मे बेहद सामान्यीकृत और भोथड़ा होगा। उम्रदराज होते कवियों जैसे उदय प्रकाश, स्वप्निल श्रीवास्तव, ज्ञानेन्द्रपति, राजेश जोषी और विनोद कुमार षुक्ल मे ही समानता की तलाश कितनी कठिन होगी।&lt;br /&gt; समकालीन हिन्दी कविता का यही वह यथार्थ है जो आलोचकों के लिए एक चुनौती बनता है। कवि की अपनी अवस्थिति कविता मे अन्तर करने योग्य तत्व पैदा कर देती है। गुजरात के दंगों पर राजेश जोषी, देवी प्रसाद मिश्र और विश्णु खरे की कविताएं अपना अलग-अलग स्वभाव रखती है। यहीं पर देवीषंकर अवस्थी का यह कथन सार्थक होता है कि कविता को समाजषास्त्र या राजनीति की ही दृश्टि से नहीं देखा जाना चाहिए-उसका अन्तर्ग्रथन भी अध्ययन की विशयवस्तु है। हिन्दी आलोचना पर ऐसा न करने का आरोप नहीं लगाया जा सकता । समकालीन हिन्दी कविता की इसी विभिन्नता के चलते आलोचक अपना 'स्टांस' बदलते रहते है।&lt;br /&gt; अक्सर विचार-विमर्ष के दौरान 'मुख्यधारा' पद द्वारा वामपंथ के साहित्य की ओर संकेत होता है। हिन्दी कविता के सन्दर्भ मेंं भी 'मुख्यधारा' पद का यह एक अभिप्रेत हो सकता है। यदि ऐसा है तो यह इंगित करना जरूरी होगा कि समकालीन हिन्दी कविता को किसी 'वाद' के तहत हो रही कविता नही कहा जा सकता । यह बात दीगर की उद्देष्य की एकता के चलते समानताएँ दिखाई दे सकती है। सरोकार एक जैसे होने पर कविताओं की दिषा एक जैसी हो जाती है। अभी कुछ वर्श पहले 'सहमत' द्वारा प्रकाषित असद जैदी द्वारा सम्पादित 'दस बरस' का संदर्भ लिया जा सकता है जिसमें अषोक वाजपेयी से लेकर कुंवर नारायण तक की कविताएँ थीं जो स्वयं को वामपंथी कहना पसंद नहीं करेंगे। कुल मिलाकर यह एक प्रजातांत्रिक सहयोग ही है जिसमें तमाम दिषाओं और विचारों के कवि सरोकारों की एकता के चलते एक स्थान पर खडे दिखाई देते हैं। समकालीन हिन्दी कविता से जुड़े इस तथ्य को साम्प्रदायिकता विरोधी हिन्दी कविता के प्रसंग में प्रमाणित किया जा सकता है।&lt;br /&gt; फिर भी इस तथ्य को स्वीकार करना होगा कि आज की हिन्दी कविता अतिषय राजनीतिक है और यह उसकी पहचान का एक प्रमुख तत्व है। हिन्दी साहित्य के इतिहास में हिन्दी कविता कभी भी इतनी राजनीतिक नहीं थी जितनी की आज है। ऐसे में किसी एक राजनीतिक विचार को (वामपंथ) को मुख्यधारा मानकर कलंकित करना एक तरह का हिन्दुस्तानी मैकार्थीवाद होगा जो कोई स्वस्थ प्रजातांत्रिक बात नही। हिन्दू पुनरुत्थान के दौर मे इस प्रकार की सेंसरषिप के भगवे प्रयास हो चुके ही। यह बताना जरूरी नहीं कि ये सभी प्रयास फासीवाद के ही रूप रहे हैं।&lt;br /&gt; साम्प्रदायिकता के उभार का हिन्दी कविता पर गहरा असर पड़ा। साम्प्रदायिकता विरोधी कविता साम्प्रदायिक फासीवाद के उभार के दौर में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाषित हुई और कुछ पत्रिकाओं ने समय-समय पर इन कविताओं को विषेशरूप से स्थान दिया। चन्दौसी से प्रकाषित होनी वाली पत्रिका 'परिवेष' ने 1992 के बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद अपना साम्प्रदायिता विरोधी अंक ही प्रकाषित किया। इसके बाद से कई पत्रिकाओं ने साम्प्रदायिता विरोधी कविताओं को विषेशरूप से स्थान दिया। इन कविताओं से गुजरते हुए हम हिन्दी कविता में होने वाले कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तनों को रेखांकित कर सकते है। दिसम्बर 1992 से पहले और उसके बाद लिखी गयी तमाम कविताएँ परिवर्तन के दो तथ्यों की ओर संकेत करती है। एक तो यह कि जो कवि पहले से कविताएँ लिख रहे थे उन्होंने साम्प्रदायिकता के प्रष्न को अपने लिए महत्वपूर्ण माना और उन्होंने इस विशय पर प्रमुखता से कविताएँ लिखीं। दूसरा यह कि नये उभरते कवियों ने इस विशय को तत्काल अपनी विशयवस्तु के रूप में चुना। ये कवि इस दौर की उपज थे या थोड़ा पहले से लिख रहे थे। इस क्षोभकारी घटना और इससे जुड़ी साम्प्रदायिक हिंसा ने दोनों पीढ़ियों के कवियों की संवेदना को गहराई से झकझोरा । हिन्दी की समकालीन कविता मे यही वह बिन्दु है जहाँ  हम एक विषिश्ट प्रकार के मानववाद की वापसी देख सकते हैं। यह मानववाद, साम्प्रदायिकता का विरोध करने में व्यापक जमीन की प्राप्ति के लिए बना। राजनीति में यदि यह धर्मनिरपेक्ष षक्तियों के ढीले-ढाले गठजोड़ के रूप में दिखायी दिया तो साहित्य में हम इसे मानवीय भूमि पर समेकित होते देख सकते हैं। अषोक वाजपेयी जैसे साहित्य के स्वराज की बात करने वालों से लेकर अतिवाम समर्थकों तक ने इस मुद्दे पर लिखना जरूरी समझा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(3)&lt;br /&gt; भूमण्डलीकरण और बाजारवाद के विरोध मे हिन्दी मे बहुत सी कविताएँ लिखी गयीं मगर कविता पर उन दोनों आर्थिक परिवर्तनों का कैसा प्रभाव पड़ा यह देखना बाकी है। भूमण्डलीकरण और बाजारवाद ने जिस प्रकार के व्यवसायवाद को बढ़ावा दिया है उसका प्रभाव अब हिन्दी साहित्य पर स्पश्ट परिलक्षित होने लगा है। मूल्यों और नैतिकताओं के स्थान पर अब आर्थिक लाभ और व्यक्तिगत सम्बन्ध अधिक महत्वपूर्ण हो गये है। सर्जनात्मकता में विष्वास कम और सफलता की सीढ़ियों पर विष्वास अधिक बढ़ा है। पुरस्कार लोभ, व्यक्तिगत राजनीति और जोड़-तोड़ ने हिन्दी कविता जगत मे भी दम मारा है। बाजारवाद के दौर में अवसरवाद तेजी से बढ़ा है। कविता धन तो नहीं मगर यष कमाने का एक आसान जरिया नज़र आने लगी है। इस  सन्दर्भ में मैं अपने मित्र अश्टभुजा षुक्ल के एक महत्वपूर्ण लेख 'काव्यम् यशसे' की ओर इंगित करना चाहूंगा जो जयपुर से प्रकाषित होने वाली पत्रिका 'कृतिओर' में छपी थी।&lt;br /&gt; भूमण्डलीकरण और बाजारवाद की एक विषेशता यह भी है कि वह जहाँ भी अवतरित होता है जनान्दोलनों को कमजोर करता है, उन्हें नश्ट करता है। इनके नीच प्रवाह में पतित लोग मूल्यों और विचारों से नहीं बल्कि व्यक्तिगत स्वार्थों से प्रचालित होते हैं। हिन्दी कविता में कैरियरिज्म की प्रछन्न प्रवृत्तिा बढ़ती लग रही है जो कि बेहत खतरनाक है। कविता के मूल्यांकन मेें इस ओर आलोचक की दृश्टि जानी ही चाहिए। उत्तार संरचनावादी कृति और कृतिकार को अलग-अलग करके देखने की बात करते हैं और इस सिलसिले में रोलाबार्थ के निबन्ध 'डेथ ऑफ आथर' में व्यक्त विचार सिध्दान्त सूत्र बने। &lt;br /&gt; रोलांबार्थ  अपने निबन्ध 'द डेथ ऑफ आथर' में पाठ के लिए लेखक की अनावष्यकता का जिक्र करते हैं और भाशा को अधिक महत्व देते हैं। लेकिन एक ही समय मे एक ही प्रकार की भाशा में लिखी जा रही रचनाओं की वैचारिक अवस्थितियाँ कैसे निर्धारित होगी यदि रचनाकार के अस्तित्व से इंकार कर दिया जाय। हिन्दी जगत में अभी हम इतने इतिहास विहीन या स्मृतिविहीन नहीं है। समकालीन कविता में रचनाकार के जीवन और उसकी कविता के सम्बन्धों मे प्रामाणिकता की प्राप्ति होगी। इस अर्थ मे हमें रचनाकार को पुनर्जीवित करना पड़ेगा। &lt;br /&gt; साहित्य के इतिहास में ऐसे तमाम उदाहरण हैं कि जब रचनाकार के जीवन ने उनकी कृतियों के अर्थ बदल दिये हैं। रचनाकार का जीवन किस प्रकार उसके साहित्य के मूल्यांकन के लिए एक प्रकार की कसौटी बनता है इसके उदाहरण्ा निराला, मुक्तिबोध जैसे कवि हैं। निराला की महाप्राणता उनके जीवन और कृतित्व दोनों के चलते है। मुक्तिबोध की विपन्नता में भी जाग्रत उनके स्व कें षब्द हमारी आत्मा के गुप्त स्वर्णाक्षर बन चुके है। क्या एजरा पाउण्ड और विन्डहम लीविस को पढ़ते समय उनके फासीवादी जुड़ावों को भुलाया जा सकेगा? पॉल डी मान के अपने सम्बन्ध उनकी आलोचना के छद्मों की पोल खोल देते हैं। क्या अटल विहारी वाजपेयी की कविताओं का मूल्यांकन करते समय यह भुलाया जा सकेगा कि उन्हीं के प्रधानमंत्रित्वकाल में गुजरात के भयानक दंगे हुए जिसका उन्होंने समय रहते षमन नहीं किया?&lt;br /&gt; आज के इच्छाधारी साहित्य और साहित्यकारों के दौर में मेरी बातें कुछ लोगों को थोड़ा पुरानी और घिसी-पिटी लग सकती है। उन लोगों के लिए वीरेन डंगवाल की ये पक्तियाँ छोड़ रहा हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; ''मजे का बखत है तो इसमें हैरानी क्या है?&lt;br /&gt; हमें भी कैलेन द्यो कुछ मज्जा परेसानी क्या?''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                               'कुछ कद्दू चमकाये मैंने'&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-1633923990351951311?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/1633923990351951311/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=1633923990351951311' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/1633923990351951311'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/1633923990351951311'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2008/12/blog-post.html' title='कविता का परिवेश'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-8836623015546096405</id><published>2008-10-24T10:27:00.000-07:00</published><updated>2008-10-24T10:29:00.504-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सूचना'/><title type='text'>एक पीड़ादायक परिवर्तन</title><content type='html'>सूचना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;एक पीड़ादायक परिवर्तन&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्लाग मित्रो,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप लोग मेरे ब्लाग वांगमय को लम्बे समय से पढ़ते रहे हैं। जहाँ तक मुझे जानकारी मिली है इस ब्लाग को देश-विदेश में पढा जाता रहा है। मुझे अपने लेखन पर समय-समय पर टिप्पणियाँ भी प्राप्त होती रही हैं। इस सब के लिए मैं आप सभी का आभारी हॅूं। मैंने यथासंभव यह प्रयास किया है कि यह ब्लाग गंभीर विषयों पर केन्द्रित रहे और इस पर होने वाली चर्चाएँ ऐसी हों कि उनसे कुछ सकारात्मक प्राप्त हो सके। इस बात में मैं कितना सफल रहा बता नहीं सकता। इसका मूल्यांकन आप लोग ही कर सकते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले दिनों मेरे ब्लाग पर किसी अनाम व्यक्ति ने कुछ व्यक्तिगत आक्षेपकारी और आपत्तिजनक टिप्पणियाँ कीं। इन टिप्पणियों से मुझे और मेरे मित्रों को क्लेश पहुँचा। इन्टरनेट सभी को यह सुविधा देता है कि बिना अपना परिचय बताये कोई भी टिप्पणी की जा सकती है। इसके कुछ सकारात्मक पक्ष अवश्य हैं। मगर इसका नकारात्मक पक्ष यह है कि कोई भी आपके ब्लाग पर उल्टी सीधी टिप्प्णियाँ कर सकता है, गाली-गलौज और गलत शब्दों का इस्तेमाल कर सकता है। इस तरह की बातों से आप अपरिचित नहीं होंगे। उन सज्जन ने वांगमय पर इतनी आपत्तिजनक बातें लिख दी थी कि ब्लाग की गंभीरता नष्ट हुई और यहाँ तक कि मुझे एक पोस्ट ही निकाल देनी पड़ी। इस प्रकार की कुंठित और घटिया मानसिकता के लोग अन्य ब्लागों पर भी यह काम कर रहे हैं और उनके विरुध्द लोग शिकायतें भी दर्ज कर रहे हैं। यह घटियापन वास्तव में हमारे समाज में आ रहे सांस्कृतिक पतन की ओर भी संकेत है। अब लोगों में न तो दूसरों के सम्मान का ख्याल इै और न अपनी ही इज्जत का। खुले आम नेट पर गाली-गलौज हो रहा है और इस गाली-गलौज को ही लोग अपनी वाकपटुता और चतुराई समझ रहे हैं। दूसरों को अपमानित करने में ही एक प्रकार का गर्व अनुभव किया जा रहा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वांगमय की प्रकृति एक गंभीर ब्लाग की रही है। आप इस बात से सहमत होंगे कि इस ब्लाग पर गाली गलौज और कुठाग्रस्त मानसिकता के लिए जगह नहीं होनी चाहिए। आखिर विचार-विमर्श के इस मंच को किसी कुंठित मानसिकता के मलमूत्र विसर्जन का स्थान नहीं बनने दिया जा सकता। हम वैसे भी विषाणुओं से अपना बचाव करते ही हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि अब आप जो भी टिप्पणियाँ प्रेषित करेंगे उन्हे संपादित होने के बाद ही इस ब्लाग पर प्रकाशित किया जा सकेगा। इससे निश्चितरूप से आप सभी को एक प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा जो कि सामान्यत: वांछित नहीं। लेकिन आप मेरी विवशता समझ रहे होंगे। आशा है सहयोग बनाए रखेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                                                             रघुवंशमणि&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-8836623015546096405?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/8836623015546096405/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=8836623015546096405' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/8836623015546096405'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/8836623015546096405'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2008/10/blog-post_24.html' title='एक पीड़ादायक परिवर्तन'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-4364764159856440326</id><published>2008-10-20T14:45:00.000-07:00</published><updated>2008-10-20T14:47:16.887-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डायरी'/><title type='text'>बिहारी होने का मतलब</title><content type='html'>डायरी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बिहारी होने का मतलब&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;महाराष्ट्र में राज ठाकरे के वक्तव्यों और उसके बाद की हिंसक घटनाओं से बड़ी गहरी चिन्ताएँ पैदा होती हैं। यह बड़ी ही अजीब सी बात है कि अपने ही देश में एक प्रदेश का निवासी दूसरे प्रदेश में नौकरी की तलाश में न जा सके। हाल में जो घटनाएँ घटित हुई हैं वे भारत के नागरिकों के अधिकारों को ही निरस्त करने वाली हैं। देश में बहुत सी नौकरियों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर चयन होते हैं और लोग आवेदन करते हैं। अब यदि इस तरह की हिंसात्मक पाबंदियाँ लगायी जायेंगी तो इसका बहुत ही बुरा परिणाम होगा। मान लें कि इसी प्रकार हर प्रदेश के लोग हिंसा के द्वारा दूसरे प्रदेश के लोगों को अपने यहाँ आने से रोक दें तो क्या होगा? लेकिन दिक्कत यह है कि हम सोचने के बजाय अब मारपीट पर अधिक विश्वास करने लगे हैं। समझदारी के लिए सबसे कम जगह बची है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब लगता है कि बिहारी होना एक रूपक होता जा रहा है। एक ऐसा रूपक जिसके सामाजिक निर्माण के पीछे हिंसा और वर्चस्व का बोलबाला है। हर वह आदमी बिहारी होने की नियत झेले जो अपने बेहतर भविष्य की कामना करता है, और अपने प्रदेश के बाहर जाना चाहता है। यह दुखद ही है कि हम ऐसे समय में रह रहे है जिसमें हर मुद्दे को बड़ी छुद्र दृष्टि से देखा जा रहा है। जाति, धर्म और क्षेत्रीयता ने ऐसी गहरी विभाजक रेखाएँ खीच दी हैं कि किसी व्यापक सोच की सम्भावना ही खत्म होती जा रही है। हर समस्या का इलाज हिंसा को ही माना जा रहा है और अपनी बात को बलपूर्वक सही सिध्द करने का प्रयास किया जा रहा है। यह स्थिति निश्चित रूप से ऐसी दिशा में ले जायेगी जहाँ से वापस आना बहुत मुश्किल होगा। मगर शायद इस बात को समझने मे ठाकरे जैसे लोग और उनके समर्थक सक्षम नहीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अक्सर हम अपने तात्कालिक स्वार्थों को ही सामने रख पाते हैं और व्यापक हितों को नजरन्दाज करते हैं। सही गलत के निर्णय के बजाय हम बस अपने तक ही सीमित रह जा रहे हैं। सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने लिखा है कि जो लोग छोटे दायरों से शुरू होते हैं वे अनतत: स्वयम् पर ही जाकर समाप्त होते हैं। राधाकृष्णन जी ने परोक्षरुप से ऐसी प्रवृत्ति की ओर संकेत किया था जो सर्वसत्तावाद और तानाशाही की ओर ले जाती है। इसके बरक्स समझदारी की संस्कृति ही एक मात्र रास्ता है। मगर यह रास्ता लम्बा है और इसमें  कोई शार्टकट नहीं है।                 &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हममें से बहुत लोग अपने गाँव, शहर या राज्य को छोड़कर दूसरी जगहों पर नौकरियाँ करने जाते हैं। हिन्दुस्तान के ऐसे लोगों की संख्या बहुत अधिक है जो विदेशों में रह रहे हैं। ये सभी लोग किसी न किसी अर्थ में बिहारी ही हैं। वे महाराष्ट्र के लोग भी जो बाहर कहीं काम कर रहे हैं। यदि हम महाराष्ट्र में पीटे जा रहे बेरोजगारों की जगह पर स्वयं को रखकर देख सकें तो हम सब बिहारी ही होंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-4364764159856440326?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/4364764159856440326/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=4364764159856440326' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/4364764159856440326'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/4364764159856440326'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2008/10/blog-post_20.html' title='बिहारी होने का मतलब'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-5855273131300626004</id><published>2008-10-13T13:21:00.000-07:00</published><updated>2008-10-13T13:24:02.379-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समीक्षा'/><title type='text'>झाँसी की गौरव गाथा</title><content type='html'>&lt;strong&gt;  झाँसी की गौरव गाथा&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;                                            &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमारे देश के इतिहास में 1857 का स्वाधीनता संघर्ष स्वर्णाक्षरों में लिखित कालखण्ड है और इस समय की शौर्य गााथा की सबसे उज्ज्वल नक्षत्र महारानी लक्ष्मीबाई हैं। झाँसी की छोटी सी रियासत की भूमिका उस संघर्ष काल के एक दौर में केन्द्रीय हो गयी थी। हम में से अधिकतर लोग झाँसी के बारे में कम ही जानते हैं, शायद वहीं तक जहाँ तक झाँसी का इतिहास लक्ष्मीबाई से जुड़ता है। मगर झाँसी की कहानी लम्बी है और इस कहानी को झाँसी के ही निवासी और वरिष्ठ लेखक/कवि ओमशंकर खरे असर ने एक पुस्तक महारानी लक्ष्मीबाई एवं उनकी झाँसी का रूप दिया है।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;यह पुस्तक वास्तव में असर साहब के लिखे गये कुछ लेखों का संकलन है जो उन्होंने जागरण अखबार के लिए एक श्रृंखला के अन्तर्गत लिखे थे। खरे साहब अपनी इस इतिहास की पुस्तक का प्रारम्भ बंगश और मराठों के बीच चल रहे संघर्ष से करते हैं जिसके चलते झाँसी एक शहर के रूप में सामने आया। पेशवा बाजीराव ने पहले-पहल इस क्षेत्र के सामरिक महत्व को देखते हुए यहाँ एक छावनी स्थापित की थी क्योंकि यहाँ से दतिया और ओरक्षा राज्य करीब पड़ते थे जिनपर नियंत्रण जरूरी था। बाद में मराठा सेनानायक मल्हारकृष्ण की हत्या के बाद नारोशंकर झाँसी के सूबेदार बने। उन्होने राज्य की सीमा को बढ़ाया और झाँसी के किले को मजबूत किया। यही नहीं उन्होने झाँसी शहर को बसाने में भी दिलचस्पी दिखायी। पेशवा द्वारा उन्हें वापस बुलाने पर माधवगोविन्द आतिया , बाबूराव कन्हाई और विश्वासराव लक्ष्मण इस के सूबेदार नियुक्त हुए। पानीपत की लड़ाई में पराजय के बाद मराठे कमजोर पड़ गये। 1762 में शुजाउद्दौला ने झाँसी के किले पर कब्जा कर लिया। लेकिन 1763 में ही मराठों ने फिर झाँसी पर कब्जा कर लिया। 1766 तक विश्वास राव लक्ष्मण यहाँ शासक रहे। 1770 में रघुनाथ हरी नेवलकर को झाँसी का शासन संभालने का अवसर मिला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रघुनाथ हरी नेवलकर से ही वह वंश चलता है जिसकी राजबधू महारानी लक्ष्मीबाई बनी। वे एक प्रतापी शासक सिध्द हुए और उन्होने झाँसी को अवध और सिन्धिया की दुर्भावनापूर्ण गतिविधियों से बचाया। उनके समय में झाँसी ने कई हमलों और षडयन्त्रों का सामना सफलतापूर्वक किया। उन्होने अपने सुशासन द्वारा जनता में अपना प्रभाव बनाते हुए झाँसी में अपने राजवंश की नींव डाली। पच्चीस वर्षो तक शासन करने के उपरांत वे काशी चले गये। उनके छोटे भाई शिवराव भाÅ ने सन 1794 में झाँसँी के सूबेदार का पद संभाला। उनके समय में मराठों की पेशवाई कमजोर हो रही थी और अंग्रेजों का दबदबा भारत में बढ़ता जा रहा था। परिणाम स्वरूप शिवराव भाÅ को अंग्रेजों से संधि करनी पड़ी। उनकी मृत्यु के उपरांत उनका पुत्र रामचन्द्र भाÅ अपने चाचा के संरक्षण में महाराजा बने मगर अल्पायु में ही उनकी मृत्यु हो गयी। इस दौरान अंग्रेजों का सम्पर्क झाँसी से बढ़ा और यह दौर षडयंत्रों का भी था। बढ़ते दबावों के चलते 1817 की संधि के अनुसार झाँसी में अंग्रेजी फोज का रखा जाना स्वीकार किया गया। रामचन्द राव के निघन के बाद अंग्रेजों ने रघुनाथ राव को शासक बनाया जो कुख्यात और कुष्ठ रोग का शिकार था। वह शीघ्र ही कालकवलित हो गया। उत्तराधिकार के विवादों के बीच गंगाधर राव झाँसी के महाराजा बने जिनकी पत्नी महारानी लक्ष्मीबाई थीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गंगाधर राव के समय अंग्रेजों ने झाँसी के किले में अपनी सेना स्थापित क्ी। लेकिन इस क्षेत्र में अंग्रेजों के विरुध्द छुटपुट विद्रोह शुरू हो गये थे। गंगाधर राव के समय में झाँसी का विकास हुआ क्योंकि वे एक कुशल और प्रभावशाली शसक थे। मगर वे विधुर हो गये थे उनकी पत्नी रमाबाई का निधन हो गया था। सन्तान प्राप्ति के लिए उनहोने दूसरा विवाह किया था और रानी लक्ष्मीबाई उनकी पत्नी बनकर महल में आयी थीं। असर साहब यह बताते हैं कि लक्ष्मी बाई या मनू का जीवन कितने दुखों से भरा था। इस तथ्य को अब कम ही जाना जाता है। कम ही लोग जानते हैं क्योंकि यह दुख-कथा अब महारानी लक्ष्मीबाई की ऐतिहासिक शौर्य गााथा के नीचे दब सी गयी है। चार साल की उम्र में ही लक्ष्मीबाई की माता का निधन हो गया था। विवाहोपरान्त लक्ष्मीबाई को एक पुत्र हुआ था जो तीन माह बाद चल बसा। फिर महाराजा गंगाधर राव की मृत्यु का कहर उन पर वैधव्य के रूप में टूटा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लक्ष्मीबाई बचपन से ही प्रतिभाशाली और साहसी थीं। बिठूर में निवास के दौरान उन्होंने राजशाही के कायदे कानून सीखे। व्यायाम, घुड़सवारी वगैरह वहीं से सीखी। झाँसी आने पर शासन व्यवस्था में गंगाधर राव का सक्रिय सहयोग दिया। अपने पुत्र की मृत्यु के बाद गंगाधर राव बीमार पड़ गये और उन्हें झाँसी के विलुप्त होने का भय सताने लगा। झाँसी की भीषण त्रासदी का चरण उनकी मृत्यु थी जिसने अंग्रेजों की सत्ता लोलुपता की कुदृष्टि को अवसर दिया। संग्रहणी के शिकार गंगाधर राव ने अपने अन्तिम दिनों में आनन्द राव को दत्तक पुत्र के रूप में स्वीकार किया जिसकी उम्र पाँच वर्ष की थी। दत्तक विधान के बाद उसका नाम दामोदर राव गंगाधर रखा गया। यह 19 नवम्बर 1853 की बात है। उसी के दो दिन बाद महाराजा गंगाधर राव का निधन हो गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गंगाधर राव की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने लैप्स की नीति के तहत झाँसी को हड़पने की चेष्टाएँ आरम्भ कर दीं। महारानी लक्ष्मीबाई ने इसका हर प्रकार से विरोध किया। असर साहब ने अपनी पुस्तक में बतलाया है कि किस प्रकार स्लीमन ने दत्तक पुत्र के अधिकारों के प्रश्न पर दोहरा रवैया अपनाया था। इसी मुद्दे पर दो अंग्रेज प्रशासको एलिस और मैलकम में गहरे मतभेद थे । अत: सारा कुछ अन्तत: डलहौजी की सोच पर टिक गया । गोपनीय ढंग से झाँसी को जबलपुर के कमिश्नर के आधीन कर दिया गया गया और किसी को खबर तक नहीं हुई। अंग्रेजों ने कई मामले में दत्तक पुत्र के अधिकारों को स्वीकार किया था। मगर उनहोंने झाँसी के मामले में उसे नया राज्य मानकर ऐसा करने से इनकार किया। जबकि तथ्य यह है कि पेशवाई के समय से ही झाँसी एक राज्य के रूप में वर्तमान था। झाँसी को नया राज्य बताने को असर साहब अंग्रेजों की घटिया कूटनीति का उदाहरण मानते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐतिहासिक साक्ष्यों के आधार पर असर साहब बतलाते हैं कि महारानी लक्ष्मीबाई ने इस निर्णय के विरुध्द दो प्रार्थनापत्र कम्पनी सरकार के पास भेजे। ये दो पत्र इस बात के सबूत हैं कि महारानी में गजब की तर्क क्षमता थी। मगर अंग्रेजों ने इन्हे स्वीकार नहीं किया क्योंकि लार्ड डलहौजी की मंशा देशी राज्यों को हड़पकर अंग्रेजी राज्य में मिलाने की थी। परिणामस्वरूप रानी को किला छोड़कर रानी महल में रहना पड़ा। यह उनके लिए बेहद संकटग्रस्त समय था क्योंकि अंग्रेज सेना सभी खजानों को मोहरबंद कर हस्तगत कर रही थी और अभी रानी पति के शोक से उबर भी नहीं पायी थीं कि यह बड़ा राजनीतिक संकट सामने आन पड़ा था। इन भयानक दबावों के बीच महारानी ने हैमिल्टन से बात की जिसका जिक्र असर साहब ने विस्तारपूर्वक किया है। रानी ने अंग्रेजों की पेंशन को अस्वीकार कर दिया क्योंकि उसे स्वीकार करने का अर्थ था झाँसी के राज्य की समाप्ति को स्वीकार कर लेना। इसी दौर में जॉन लैंग के वर्णनों में महारानी के व्यक्तित्व, उनकी आनबान, और उनकी लोकप्रियता का प्रमाण मिलता है। पुस्तक का यह अंश विशेष आकर्षित करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2जून 1857 को झाँसी में सैनिकों ने विद्रोह करना प्रारम्भ कर दिया। मगर रानी ने सही अवसर की प्रतीक्षा की। तेज क्रान्तिकारी गतिविधियों के बीच अपनी कुशल कार्यनीति और नेतृत्व क्षमता के चलते 12 जून को महारानी ने झाँसी का शासन संभाल लिया। महारानी ने 11 माह तक झाँसी पर शासन किया और इस दौर में उनके क्रिया कलापों ने उन्हें जनता में अतिलोकप्रिय बनाया युध्द के अन्तिम दौर में अंग्रेजों ने झाँसी को बरबाद करने का पूरा प्रयास किया। आगजनी से लेकर निर्दोष जनता की हत्या तक का काम किया गया। इस प्रकार 1744 से 1858 तक चलने वाला झाँसी का सम्ध्द राज्य अंग्रेजों की सत्ता लोलुपता का शिकार हो गया। अपनी मृत्यु के समय रानी लक्ष्मीबाई ने अपने पुत्र को विश्वासपात्र सरदार रामचन्द्र राव देशमुख को सौंपा था कि वह उसकी देखरेख करे। झाँसी के राजवंश का यह चिराग लम्बे समय तक बेतवा के धने जंगलों में कुछ विश्वासपात्र लोगों के साथ भटकता रहा। पर बाद में विश्वासघात और पैसे की कमी के चलते उसे आत्मसमर्पण करना पड़ा। दामोदर राव की मृत्यु 1906 में हुई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;झाँसी की कहानी का वर्णन ओमशंकर खरे असर ने आद्योपांत एक झाँसी के ऐसे नागरिक के रूप में किया है जिसे अपनी विरासत से गहरा लगाव है। इसका एक कारण उनके परिवार का स्वयं इतिहास के एक अंश से जुड़ा होना रहा है। झाँसी के इतिहास के कुछ पक्ष विवादों के घेरे में रहे हैं और उन पर इतिहासकारों में मतभेद रहा है। ओमशंकर खरे असर के लेखन की विशेषता यह रही है कि विवादित मुद्दों के सभी पक्षों को हाजिर कर अपना तर्क और पक्ष प्रस्तुत करते हैं। झाँसी और महारानी लक्ष्मीबाई से जुउे विवादों में वे निर्णय बड़े तार्किक ढंग से लेते हैं। इस सिलसिले में उदाहरण के लिए उन्होंने महारानी के जन्म वर्ष के बारे में उन्होने लम्बी छानबीन की है। इसी प्रकार विवाह के समय महारानी की उम्र को लेकर उन्होने गहराई से विचार-विमर्श किया है। उन्होने यह पाया है कि विवाह के समय वे सात वर्ष की नहीं अपितु 15 वर्ष की थीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओमशंकर जी झाँसी के निवासी होने के नाते इतिहास में घटित होने वाली घटनाओं के स्थानों का बखूबी वर्णन करते हैं। वे केवल इतिहास के लेखक न होकर एक साहित्यकार भी हैं। अत: उनकी भाषा में इतिहास लेखक का सूखापन नहीं है। उनकी भाषा सर्जनात्मक है। तथापि वे अपने लेखन में ऐतिहासिक तथ्यों को ही महत्व देते हैं। वे उससे परे की चीजों, जैसे लोक में प्रचलित बातों, को रेखांकित भर ही करते हैं। संक्षेप में यह कि झाँसी के गौरवपूर्ण इतिहास के बारे में रुचि रखने वालों के लिए यह एक जरूरी पुस्तक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;.................. ................................ ......................&lt;br /&gt;समीक्षित पुस्तक: महारानी लक्ष्मीबाई एवं उनकी झाँसी&lt;br /&gt;लेखक: ओम शंकर असर&lt;br /&gt;संपादक: ए. के. पाण्डेय&lt;br /&gt;प्रकाशन: राजकीय संग्रहालय, झाँसी&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-5855273131300626004?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/5855273131300626004/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=5855273131300626004' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/5855273131300626004'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/5855273131300626004'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2008/10/blog-post.html' title='झाँसी की गौरव गाथा'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-2693199663613068346</id><published>2008-10-09T22:44:00.000-07:00</published><updated>2008-10-09T22:47:06.887-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लेख'/><title type='text'>ईश्वर, सत्ता और कविता (4)</title><content type='html'>&lt;strong&gt;ईश्वर, सत्ता और कविता (4)&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; बदलती हुई राजनीतिक परिस्थितियों में ईश्वर के प्रति कविता में भाव बदलते गये हैं। भारतीय जनता पार्टी की धर्म को राजनीतिक हथकण्डे के रूप में अपनाने की नीति का सामान्य जीवन पर प्रभाव पड़ा । आस्तिक लोगों के ड्राइंग रूमों में आशीर्वाद देने की मुद्रा में अनामिका मोड़े खड़े राम के स्थान पर समुद्र को धमकाते धनुङ्ढ हाथ में ताने हुए राम के चित्र दिखाई देने लगे। संघी भाइयों के यहां तो ये चित्र अनिवार्यत: मिलने लगे जिसकी कलाकारी इस बात मे थी कि राम का क्रोध उनकी शक्तिशाली मांसपेसियों में झलकने लगा। भारत के सांप्रदायिक परिप्रेक्ष्य में यह बहुत स्पष्ट था कि 'जलधि जड़' मुसलामान ही थे। अभिवादन के लिए प्रयुक्त होने वाला राम का नाम आक्रामक और हिंसक  'जै श्रीराम' के भयानक उद्धोष मेंं  बदल गया। ईश्वर के इस घटिया और स्थूल राजनीतिक प्रयोग ने किसी भी प्रकार के दार्शनिक उदात्ता के लिए स्पेस नहीं छोड़ा।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; उत्पात के प्रारंभिक दौर में आयी मानबहादुर सिंह की कविता 'समकालीन ईश्वर की लाचारी' एक दूसरी अवस्थित से लिखी गयी कविता है । इस कविता का रचनाकाल वह समय है जब सांप्रदायिकता की गरज उतनी तेज नहीं थी इस कारण यह कविता  अधिक महत्व की हो जाती है । यह कम पढ़ी गयी और लगभग अचर्चित कविता ईश्वर के दुरुप्योग और हिंसा से भरे माहौल में ईश्वर की लाचारी को दर्शाती है। इस मायने में ईश्वर के साथ 'समकालीन' पद का प्रयोग वाकई अर्थपूर्ण है। बाद में लिखी गयी वीरेन डंगवाल की कविता 'दुश्चक्र में स्रष्टा' से इस कविता को मिला कर देखा जा सकता है। यह कविता ईश्वर के पक्ष से प्रस्तुत एक अंधाधुंंध मोनोलाग है या कहें कि विवश ईश्वर का प्रलाप। यहां ईश्वर के मनुष्यता के विरोध में हुए प्रयोंगों को भर्त्सनात्मक ढंग से प्रदर्शित किया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; वीरेन डंगवाल की कविता में 'दुश्चक्र में स्रष्टा' अपनी विडम्बनात्मक अभिव्यक्तियों के चलते महत्वपूर्ण है और इसी कारण उसने हिंदी के पाठकों और आलोचकों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया। कविता मे उपस्थित यह व्यंग्य और विडम्बना का स्वर कविता के अंत तक पहुंचते-पहुचते आक्रोश में बदल जाता है। 'दुश्चक्र में स्रष्टा' कविता का  प्रारंभ भगवान के कारीगरी के कमाल के जिक्र के साथ होता है। समकालीन घटनाक्रम के सापेक्ष यह जिक्र व्यंग्य और विडम्बना के स्वर के साथ है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   'अरे, कुत्ते की उस पतली गुलाबी जीभ का ही क्या कहना!&lt;br /&gt;   कैसी रसीली और चिकनी टपकदार, सृष्टि के हर &lt;br /&gt;   स्वाद की मर्मज्ञ &lt;br /&gt;   और  दुम की  तो बात ही अलग&lt;br /&gt;   गोया एक अदृश्य पंखे की मूठ&lt;br /&gt;   तुम्हारे मुखड़े पर झलती हुई'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ईश्वर के शानदार कृत्यों का यह विडम्बनापूर्ण वर्णन इस शिकायत के साथ समय के यथार्थ तक पहुंचता है कि भगवान ने अपना कामयाब कारखाना बंद कर दिया है और अब जो कुछ भी इस तथाकथित ईश्वरीय सत्ता के नाम पर है वह बुरा ही बुरा है। क्या अच्छे और आश्चर्यजनक कार्य सम्पन्न करने वाला ईश्वर कहीं विलुप्त हो गया है? आखिर समकालीन तबाहियों के बीच 'रहमानुर्रहीम' या 'करूणानिधान'ईश्वर के अस्तित्व के कोई चिन्ह क्यों नहीं दिखाई पड़ते?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   'बाढ़ें तो आयी खैर भरपूर, काफी भूकंप, तूफान&lt;br /&gt;   खून से लबालब हत्याकांड अलबत्ता हुए खूब&lt;br /&gt;   खूब अकाल, युध्द एक से एक तकनीकी चमत्कार &lt;br /&gt;   रह गयी सिर्फ एक सी भूख, लगभग एक सी फौजी&lt;br /&gt;   वर्दियां जैसे&lt;br /&gt;   मनुष्य मात्र की एकता प्रमाणित करने के लिए&lt;br /&gt;    एक जैसी हुंकार, हाहाकार!&lt;br /&gt;   प्रार्थना गृह जरूर उठाये गये एक से एक आलीशान!&lt;br /&gt;   मगर भीतर चिने हुए रक्त के गारे से &lt;br /&gt;   वे खोखले आत्माहीन शिखर-गुम्बद-मीनार&lt;br /&gt;   उंगली से छूते ही जिन्हें रिस आता है खून!&lt;br /&gt;   आखिर यह किनके हाथों सौंप दिया है ईश्वर &lt;br /&gt;   तुमने अपना इतना बड़ा करोबार?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; वीरेन डंगवाल की यह कविता ईश्वर के अस्तित्व और उसके कार्यों को लेकर प्रचलित मान्यताओं और परंपरागत विचारों से प्रारंभ होकर उन्हीं को प्रश्नांकित करती है।इयवर की अनुपस्थिति इस बात में है कि अब उसका इस विश्व पर कोई नियंत्रण नहीं रह गया है।पर सवाल यह हुआ कि यदि इस पर उसका नियंत्रण नहीं तो फिर नियंत्रण है किसका। क्या ईश्वर की कोई वास्तविक सत्ता है भी या यह महज एक परंपरागत असत्य है? क्या ईश्वर नयी क्रूर सत्ताओं सा डर कर भाग गया है? शायद उसका इन क्रूर सत्ताओं से कोई परोक्ष-अपरोक्ष समझौता हो गया हो? कुल मिलाकर कवि के लिए ईश्वर असहनीय हो गया है। यही कानण है कि कविता आक्रोश के ऐसे बिन्दु पर समाप्त होती है जहाँ ईश्वर संबंधी सारी पारंपरिक अवधारणाएँ नष्ट हो जाती हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'अपना कारखना बंद करके&lt;br /&gt;   किस घोसले में जा छिपे हो भगवान?&lt;br /&gt;   कौन सा है आखिर, वह सातवाँ आसमान?&lt;br /&gt;   हे, अरे, अबे, ओ करूणानिधान!!'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;              युवा कवि पंकज चतुर्वेदी की कविता 'ईसा, बुध्द, हज़रत मुहम्मद के लिए' ईश्वर और पैगम्बरों के नाम पर होने वाली हिंसा और मारकाट का खुलासा करती हुई उसके राजनीतिक प्रयोगों को रेखांकित करती है। भारत ने बुध्द पूर्णिमा के दिन पोकरण में परमाणु विस्फोट किया था तो संकेत का संदेश था 'बुध्द मुस्काराये'। यह विडम्बनापूर्ण संदेश इस ओर ले जाता है कि मनुष्य को नष्ट करने के ङ्ढडयंत्र में ईश्वर का इस्तेमाल हो रहा है। यहाँ ईश्वर की सत्ताा नगण्य है और महत्वपूर्ण है अमरीका, भारत ओर पाकिस्तान की शासन सत्तााएं जो बुध्द, ईसा और हजरत मोहम्मद का इस्तेमाल कर रहे है। यह यूं ही नहीं है कि हिन्दू साम्प्रदायिकता और इस्लामिक बम के साथ-साथ हटिंगटन की पुस्तक भी आ पहुंची है। धर्म और नस्ल को वैधता देने मे ईश्वर कहीं न कहीं उपस्थित होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऋतुराज के कविता संग्रह 'लीलामुखारविन्द' में ईश्वर की उपस्थिति अनेक ठोस रूपों में दिखलाई पड़ती है। यह उसका कोई भक्तियुगीन साकार रूप नहीं है, मगर है कुछ वैसा ही। वह कहीं न होते हुए भी सर्वत्र उपस्थित है। सभी प्रकार के पापाचारों में वह शरीक है। यही वह लीला है जो सत्ता और शक्ति के विभिन्न सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक क्रियाकलापों में अन्तर्निहित है। ऋतुराज सत्ता के विभिन्न प्रकार के चेहरों के खेल में उसकी उपस्थिति पाते है- यही है 'लीला मुखारविन्द'। कविता 'ईश्वर चरितम्' में ईश्वर न होते हुए भी परेशानी का कारण है, क्योंकि वह तमाम सत्ता प्रतिष्ठानों और शक्ति केन्द्रों के लिए उपकरण बन गया है। प्रात: काल में बजने वाले भजनों से लेकर रात्रि तक, हर समय उसकी उपस्थिति है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  'हत्यारा हत्या करता है ईश्वर के नाम पर&lt;br /&gt;  हत्यारे के पक्ष में ईश्वर गवाही देता है&lt;br /&gt;  क्योंकि हर अपराध में उसका हाथ होता है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह सब कुछ होते हुए भी ईश्वर नाम का यह 'मुख्य अभियुक्त अदृश्य' रहता है। इस प्रकार वह निराकार और साकार दोनों है। वास्तव मे यह सत्ता प्रतिष्ठानों का वह वर्चस्वी भ्रष्ट रूप है, जो ईश्वर का इस्तेमाल करता है। यहां ईश्वर तलवार भी है और ढाल भी। और कहीं-कहीं तो वह अदृश्य सत्ताानायक है जो स्वयं ही ईश्वर बन बैठता है। यह विडम्बना ही है। अपने समय के सांप्रदायिक और वर्चस्वी शक्तियाें को देखें तो वे ईश्वर सदृश ही हैं। यह ईश्वरत्व तो धरती पर ही साकार है और उसके ठोस रूप खूंखार और डरावने हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  ''उनके हाथों में खून सनी छडे थी'&lt;br /&gt;  चाकू तेजाब की बोतलें भी &lt;br /&gt;  अनगिनत हाथ थे जैसे तुम्हारे ही हाथ हों वे''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'श्री ईश्वरचरितम्' कविता में ईश्वर इतना अधिक है कि कवि की नींद हराम है। वह ईश्वर को कोसता है। उसकी उपस्थिति अमानवीय है। ईश्वर के नाम पर सुबह से ही धूम-धड़ाका है। यह ढोंग तो है ही। अपने कुकर्मों को वैधता प्रदान करने का शक्तिपाठ है। ईश्वर ही वह प्रत्यय है जिसके द्वारा हत्याओं को वैधता दी जा सकती है। ईश्वर अदृश्य मुख्य अभियुक्त है। कविता की विडम्बना इस बात में है कि मुख्य अभियुक्त का दो अर्थ है। एक तो ईश्वर जो दिखाई नहीं देता और चारों तरफ है और दूसरी अर्थ है वह सत्ताा जो हर जगह शक्ति के रूप में स्वयं को प्रदर्शित करता है। अपने दौर में राम के नाम पर हुए उत्पातों से जुड़ी दक्षिणपंथी शक्ति सत्ताा के सापेक्ष कविता का अर्थ बहुत साफ होता है। ईश्वर, धर्म और सत्ताा के इस क्रूर और अमानवीय गठजोड़ को यह कविता अपनी चिंता का विङ्ढय बनाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सत्तााएं सदैव प्रत्ययों की मदद से शासन करती हैं और उन्हें अपनी वैधता सिध्द करने के लिए इस प्रकार के उपादानों की सदा ही आवश्यकता रहती है। यह किसी धर्म अथवा नस्ल की श्रेष्ठता से लेकर स्वतंत्रता तक का मुद्दा हो सकता है। बुश जैसे सत्तााधीश यदि इराक की जनता को मुक्त कराने के नाम पर आक्रमण को वैधता प्रदान करते हैं तो हिन्दू राष्ट्र और हिन्दुत्व की श्रेष्ठता का मुखौटा सत्तााछद्म पर पर्दे का काम करती है। इसी प्रकार 'देयर इज नो गाड बट अल्लाह' भी अपना काम करता है। ईश्वर सत्तााओं को किस प्रकार से वैधता प्रदान करता है इसका हमारे समय में इससे बड़ा क्या उदाहरण हो सकता है कि राम के नाम पर साम्प्रदायिकता के नंगे नृत्य को भी वैधता दी जाय। गुजरात के दंगों को उदार हिन्दुओं की स्वाभाविक प्रक्रिया कह कर बच चला जाय। हिन्दुओं की उदारता भी तो इसी बात द्वारा सिध्द की जाती है कि यहाँ असंख्य देवी-देवता है। अस्ल में इन देवी-देवताओं के पीछे सत्ताा एक ही है जिसके हजारों हाथ कहीं अदृश्य से प्रकट होकर जीवन घुस आते हैं और विभिन्न स्तरों पर कार्यरत हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मानववादी कविता से अलग इस नये तौर की कविता  दृष्टि की महत्ताा इसी में है कि वह मनुष्य और ईश्वर की सत्ता को एक नहीं देखती। यह ईश्वर की अद्वितीय और सर्वशक्तिमान सत्ताा के प्रति भी मुग्ध नहीं। यह तो और पीछे की बात है। वह दरअस्ल ईश्वर को वर्चस्वी सत्ताा के एक प्रतिनिधि के रूप में देखती है जिसके विभिन्न प्रकार के प्रयोग होते रहे हैं-खासकर भरतीय राजनीति में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिन्दी कविता में ईश्वर के प्रत्यय का यह इस्तेमाल अर्तक्य के विरोध में आता है। हमारे समय में उसकी एक ऐतिहासिक उपस्थिति है जिसे सांप्रदायिकता और फासीवाद के विरुध्द खड़े होते हुए देखा जा सकता है। यही कारण्ा है कि इन कविताओं मेें ईश्वर की चर्चा महज एक दार्शनिक प्रत्यय के रूप में नहीं है। यहाँ वह धर्म के सामाजिक और सांस्कृतिक प्रतिफलनों मेें रेखांकित किया गया है। जाहिर तौर पर यह महज एक आस्था का प्रश्न नहीं बनकर रह जाता। इसके विभिन्न आयाम दिखलाई देते हैं। समाज संस्कृति में ईश्वर के प्रत्यय द्वारा एक मनुष्यता विरोधी वर्चस्वी व्यवस्था अथवा सत्ता की स्थापना का यहाँ स्पष्ट विरोध देखा जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रकृति और सामान्य जीवन की कविता लिखने वाले नरेन्द्र पुण्डरीक ईश्वर की सत्ता को नहीं स्वीकार कर पाते क्योंकि वह इश्वरीय सत्ता, आततायी सत्ता की समर्थक है ऐसे में ईश्वर की प्रार्थना के लिए शब्द कहां से आयेंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''कैसे चुपचाप रोज&lt;br /&gt;मेरे सपनों का रौंदता हुआ&lt;br /&gt;आकाश से गुजर जाता है &lt;br /&gt;इन्द्र का हाथी, &lt;br /&gt;बताओ तुम्हारी सरोकारहीन&lt;br /&gt; प्रार्थनाओं के  लिए&lt;br /&gt; कहां से जुटाऊं शब्द ईश्वर''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सत्ता और शक्ति के केन्द्र्र ईश्वर का इस्तेमाल करते हैं और राम लोगों के हृदय से बाहर कैद में रह जाते हैं- अयोध्या को लेकर चलती राजनीति की कैद में। 'कैसे छीने गये राम' कविता में ऐसे विवश और शक्तिहीन ईश्वर का क्या किया जाय। इस फालतू ईश्वर के बारे में यदि जानकारियां हों भी तो किस काम की।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''ईश्वर के पास न कोई हुनर है&lt;br /&gt;न जानकारी&lt;br /&gt;न वह रस्सी बर सकता है&lt;br /&gt;न गांठ सकता है जूते &lt;br /&gt;खटिया बुनना &lt;br /&gt;बर्तन बनाना &lt;br /&gt;मिट्टी तैयार करना &lt;br /&gt;जैसे छोटे-छोटे काम भी &lt;br /&gt;ईश्वर के बस में नहीं थे''&lt;br /&gt;               (ईश्वर के बारे में उसके पास पर्याप्त जानकारी थी।)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे ईश्वर का एक मेहनतकश के लिए क्या महत्व हो सकता है? सत्ता के लिए जो शोषण और उत्पीड़न का शस्त्र है वह आखिर एक मजलूम के लिए कितना अर्थपूर्ण होगाा। जाहिर सी बात है कि वह नकारात्मक ही होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   'ईश्वर अन्न के दाने के&lt;br /&gt;   भीतर वैठी पाई है&lt;br /&gt;  ईश्वर लकड़ी के भीतर &lt;br /&gt;  बैठी घुन है'&lt;br /&gt;                (जो इस धरती के खिलाफ है)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; वह जीवन में संघर्षरत व्यक्ति के लिए भय है जिसका प्रयोग ब्राह्मणवादी पुरोहिती व्यवस्था सदियों से करती रही है। वह सत्ता के तरफ से फैलाया गया 'राज रोग' है। नरेन्द्र पुण्डरीक द्वारा प्रयुक्त शब्द 'राज रोग' के निहितार्थ गहरे और बहुआयामी हैं। अन्तत: ईश्वर वह सब कुछ है जो मनुष्यता के विरुध्द है अर्थात 'जो इस धरती के खिलाफ है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; नरेन्द्र पुण्डरीक की ईश्वर संबंधी यह कम चर्चित कविता श्रृंखला विचारधारा के मामले में एक गंभीर हस्तक्षेप करती है। वह प्रगतिशीलता के नास्तिक दर्शन के रास्ते को वैसे ही रेखाकित करती है जैसे नागार्जुन की कविता। मगर यह बिल्कुल बदले हुए संदर्भों में ऐसा करती है। सीतामढ़ी के सांप्रदायिक दंगे का जिक्र करती उनकी कविता में ईश्वर निश्चित तौर पर हमारे समय के संदर्भ में हैं। सीतामढ़ी के सामान्य लोगों के सामान्य स्वप्न थे और उनकी इच्छाओं और संघर्षों में ईश्वर कहीं नहीं था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  'फिर भी वे मारे गये&lt;br /&gt;  ईश्वर के नाम पर&lt;br /&gt;  उनके जलाये गये घर&lt;br /&gt;  ईश्वर के नाम पर&lt;br /&gt;  ईश्वर जो कभी था ही नहीं&lt;br /&gt;  इस दुनिया में&lt;br /&gt;  केवल उसके होने को लेकर &lt;br /&gt;  क्यों मारे गये लोग''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; यहां कविता में उपस्थित सीतामढ़ी भारत का कोई भी शहर हो सकता है और साम्प्रदायिक उन्माद भड़काने वाले लोग कहीं भी ईश्वर के नाम पर दंगा करा सकते थे। ईश्वर ही उनके लिये वह माध्यम है जिसका इस्तेमाल वे मनुष्य के विरुध्द करते है, सामान्य जीवन का विध्वंस करते हुए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  'कुछ शब्द थे&lt;br /&gt;  जो ईश्वर की शक्ल से &lt;br /&gt;  बहुत कुछ मिलते जुलते थे&lt;br /&gt;  वे उतने ही घृणित &lt;br /&gt;  अपवित्र&lt;br /&gt;  और धारदार थे&lt;br /&gt;  जितना कि ईश्वर&lt;br /&gt;  इस वक्त इन शब्दाें से&lt;br /&gt;  सीतामढ़ी क्या&lt;br /&gt;  तरबूज की तरह&lt;br /&gt;  पूरी दुनिया काटी जा सकती है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिन्दी जगत अपनी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में निहायत ही परंपराग्रस्त रहा है। केवल कुछ लेखकों, संस्कृतिकर्मियों के होने से यह सिध्द नहीं होता कि सब कुछ क्रान्तिकारी है। परंपरा अभिविन्यस्त होने में सुरक्षा और मान्यता दोनों मिलती रही है। यही कारण है कि धर्म और ईश्वर की पुनरुत्थानी स्वीकृति यहां की संसदीय राजनीति में प्रतिफलित हुई। ऐसे में ईश्वर की सत्ताा को परंपरा के प्रवाह की एक महत्वपूर्ण धारा के रूप में देखा जाना चाहिए। इसके प्रति शंका, प्रश्न अथवा विद्रोह को परोक्षत: एक पूरी सत्ताा के प्रति होने वाले विद्रोह के रूप में देखा जा सकता है। हिन्दी कविता में इधर उभरते ईश्वर को सिर्फ आज की तात्कालिक सांप्रदायिकता विरोधी राजनीति से अलग एक विशिष्ट ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य मेें देखने पर उसका स्पष्ट अलगाव दिखाई पड़ता है। यह बात भी सच है कि इस प्रतिरोध की  अपनी एक परंपरा है, ठीक वैसे ही जैसे कूपमंडूकता और जाहिल परंपरावाद की परंपरा है ही। इसी विवेक से जुड़ी प्राश्निकता की यह ईश निन्दक परंपरा रेखांकित करने योग्य है, भले ही यह धारा अल्पसंख्यक और गौण ही क्यों न हो। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; ईश्वर और सत्ताा का प्रश्न हिन्दी कविता में विशिष्ब्ट तौर पर सांप्रदायिकता के सापेक्ष ही सामने आया, मगर वास्तव मेें यह सिर्फ सांप्रदायिकता के उभार भर से जुड़ा एक प्रश्न नहीं। यह उस पूरे अतार्किक के विरुध्द आवाज उठाने की बात है जो तरह-तरह से भारतीय समाज  में रचा-बसा है। संस्कृति की अनेकों दैनन्दिन की गतिविधियों में यह अतार्किक विद्यमान रहता है और तमाम महत्वपूर्ण सामाजिक प्रश्नों को पृष्ठभूमि में ढकेलता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; यदि ईश्वर का प्रत्यय हिन्दी के इन कवियों के लिए सिर्फ एक दार्शनिक प्रत्यय नहीं, तो वह राजनीतिज्ञों के लिए जिस प्रकार एक नीतिगत प्रश्न है वैसा भी नहीं। संसदीय राजनीति में धर्म और ईश्वर के कुटिल प्रयोग होते रहे हैं। सांप्रदायिक दक्षिणपंथी दल उसका सीधा इस्तेमाल अपने राजनीतिक हितो के लिए करते रहे है। यहाँ तक कि टकराव और दंगों के रास्तों को भी नहीं छोड़ा गया। राम जन्मभूमि बाबरी मस्जिद प्रकरण और गुजरात के दंगों के उदाहरण स्थूल और स्पष्टत: रेखांकित करने योग्य हैं, जिसका विरोध इस दौर की हिन्दी कविता ने जोरदार ढंग से किया। मगर धर्म निरपेक्ष राजनीति ने ईश्वर और धर्म की स्पष्ट आलोचना से बचने का ही प्रयास किया। यहॉ वोट प्राप्त करने के लिए यह एक मजबूरी थी। इस प्रकार के प्रयोग सभी राजनीतिक दलों नें किये हैं बस थोड़ा अलग अलग ढंग से।इस पगकार के 'हितसाधन' या 'स्वार्थसिध्दि' से समकालीन कवियों को कोई वास्ता नहीं रहा है हाँलांकि ऐसे कवियों की कविताएँ निहायत राजनीतिक रही है। यह तथ्य सीधी संसदीय राजनीति और नागरिक जीवन से जुड़ी राजनीति के फर्क को तो साफ रेखांकित करता ही है। कविता के सरोकार के व्यापकतर घेरे बनते हैं। यही कारण है कि कविता भक्तियुगीन सर्वशक्तिमान ईश्वर से मनुष्ब्श् में व्याप्त ईश्वर तक पहुँचकर रूक नहीं जाती। वह ईश्वर के एक छोटे से औजार के रूप् में परिवर्तित हो जाने के तथ्य कोउजागर करती है। इस अर्थ में समकालीन हिन्दी कविता हमारे हिन्दी समाज में छाये एक आध्यात्मिक रहस्यवाद का विखंडन करती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;''लोग कहते हैं कि ईश्वर ईश्वर ईश्वर &lt;br /&gt;         क्या वह बना सकता है एक ऐसा बड़ा ढोका&lt;br /&gt;         जिसे वह दाँत पीसकर स्वयं ही न उठा सके''&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-2693199663613068346?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/2693199663613068346/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=2693199663613068346' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/2693199663613068346'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/2693199663613068346'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2008/10/4.html' title='ईश्वर, सत्ता और कविता (4)'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-4866295088020301954</id><published>2008-10-08T12:04:00.000-07:00</published><updated>2008-10-08T12:07:20.163-07:00</updated><title type='text'>ईश्वर, सत्ता और कविता    3</title><content type='html'>&lt;strong&gt;ईश्वर, सत्ता और कविता    3 &lt;/strong&gt;       &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                 &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; चिन्तन की एक खास अवस्था में ईश्वर के अस्तित्व पर सवालिया निशान लगने शुरू होते हैं और नास्तिक दर्शन का प्रारंभ होता है। भारत में भगत सिंह के प्रसिध्द लेख '' मैं नास्तिक क्यों हूँ'' से अधिकांश पाठक परिचित होंगे। यह नास्तिकता एक तरह की प्रश्नाकुलता का परिणाम होती है। ऐसी प्रश्नाकुलता जिसके पीछे कई प्रकार की प्रवृत्तियाँ कार्य करती है। एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति है तार्किकता की तलाश जो एक वैज्ञानिक दृष्टि का परिणाम होती है। ईश्वर प्रत्यय को लेकर होने वाली तमाम बहसाें के पीछे इसी तार्किकता की तलाश है जो किसी तथ्य को विवके सम्मत और स्वीकृति योग्य बनाता है। आध्यात्म ने सदैव इस प्रकार की तार्किक और परीक्षणधर्मी प्रवृत्ति का विरोध किया है ओर उसे सीमाबध्द बतलाने की चेष्टा की है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; इस प्रकार की प्रश्नाकुलता के चलते ही आर्य समाज एक दौर मेें ईश्वर से जुड़े ढोंगों का विरोध करता था। मगर यह विरोध अन्तत: नये किस्म के आध्यात्म में जाकर निपट गया। फिर भी यह ध्यातव्य है कि नवजागरण के प्रारंभ की यह प्रश्नाकुलता अपना महत्व रखती है जिसके तार्किक तत्व हिन्दी कविता मे तरह-तरह से उभरते है। 'देवी चबूतरा' जैसी कविता आध्यात्म के दैवीय प्रतिफलन पर चोट करती है। देवी चबूतरा पूजा का एक स्थानीय केन्द्र है लेकिन देवी जी अपने चबूतरे पर पेशाब और संभोग करने वाले कुत्ताों को भगाने तक की सामर्थ्य नहीं रखतीं।पंकज चतुर्वेदी आर्यसमाजी कवि नहीं मगर आर्यसमाजी  खण्डन-मण्डन का ही यह विस्तार एक आधुनिक प्रगतिशीलता की ओर ले जाता है और ऐसे तत्व हिन्दी की बहुत सी कविताओं में विद्यमान है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यही प्रश्नाकुलता अपने आधुनिक शिल्प में विडंबनापूर्ण हो जाती है जब शंकाएँ अविश्वास में बदलती हैं और ढोंग का विरोघ करती हैं। संजय चतुर्वेदी की कविता 'पानी में नबूवत' धर्म और ईश्वर की विसंगतिपूर्ण स्थिति को अपने संरचना के एब्सर्ड में प्रस्तुत करती है। यह संजय चतुर्वेदी के प्रारंभिक दौर की कविताओं मेें से एक है जब वे विसंगतियों के बरक्स कविता में उलट-पुलट कर रहे थे। यह कविता इण्डिया टुडे वर्ङ्ढ 1993 की वार्ङ्ढिकी में प्राकाशित हुई थी। बाद में उन्होंने यह शैली त्याग दी ओर आसानी से संप्रेङ्ढित हो सकने वाली कविताएं लिखी। 'पानी मे नबूवत' ईश्वर और धर्म सम्बन्धी सामान्यत: प्रचलित बातों को उलट-पुलट कर उनमें बैठे अतार्किक तत्वों को सामने लाती है। अर्थात विरुपों का विरुपण। कविता अपने अतारतम्य में ईश्वर की उपस्थिति उसकी तथाकथित तारतम्यता का मजाक उड़ाती है और सब कुछ एक झकझकी सा लगता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'सृष्टिकर्ता का दूरदर्शन बूंदों से उतरता है घास पर&lt;br /&gt;सताई हुई धरती पर इलहाम बरसता है।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; खुदा को पाने का रास्ता मसखरी है, ईश्वर ने अवतार नहीं लिया मगर उस पर श्रीमद्भगवत् कृपा रही होगी। 'पालक और सृष्टिपालक का समुचित सेवन/दीन और दुनिया दोनों को फिट रखता है'। फिर खुदा के होते हुए धरती पर सभी नेक लोग पीड़ित है और दुष्ट लोग सुखी तो जरूर वह खुदा अखबार नहीं पढ़ता होगा। कवि छोटा मोटा नबी होता है तो उसकी कविता में नबूवत गर्म तवे पर रखी वर्फ से निकलती भाप की तरह होती है। प्रकृति ईश्वर का काव्य है- वगैरह, वगैरह। कविता के लगभग अराजक माहौल में धार्मिक विचारों की अराजकता बेपर्दा होती है और ईश्वर को लेकर फैलायी गयी वैचारिक बाजीगीरी भूलुंठित होती है। संजय चतुर्वेदी की यह जटिल और कम पढ़ी गयी कविता धर्म और ईश्वर से जुड़ी अवधारणाओं को विखण्डित करने वाली है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-4866295088020301954?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/4866295088020301954/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=4866295088020301954' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/4866295088020301954'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/4866295088020301954'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2008/10/3.html' title='ईश्वर, सत्ता और कविता    3'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-4589539132711961589</id><published>2008-10-07T21:32:00.000-07:00</published><updated>2008-10-07T21:36:17.067-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लेख'/><title type='text'>ईश्वर, सत्ता और कविता      2</title><content type='html'>&lt;strong&gt;ईश्वर, सत्ता और कविता      2&lt;/strong&gt;   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                 &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; ईश्वर और धर्म को लेकर प्रचलित मानववादी दृष्टि का हिन्दी कविता में अभाव नहीं। गांधीवाद के दौर मेें इस व्यापक दृष्टि की राजनीति भी बड़ी व्यापक थी जिसका सैध्दान्तिक  प्रतिफलन 'सर्वधर्म समभाव' में देखा गया। धर्म निरपेक्षता का यह व्यापक तौर पर स्वीकृत रूप था और यह रूप उस समय के साहित्य मेंे पर्याप्त दृष्टिगोचर है। सांप्रदायिकता के विरुध्द लड़ने का यह भी एक शस्त्र रहा। अपने व्यापक परिप्रेक्ष्य के चलते यह एक सकारात्मक विजन भी बना रहा जिसके तहत मनुष्य को ईश्वर में और ईश्वर को मनुष्य में देख पाने की अवधारणा विकसित हुई। यह विजन इतना पुराना है कि इसकी परिपाटी भक्ति युग के सूफी और निर्गुण कवियों तक जायेगी। यदि थोड़ी जबर्दस्ती की जाय तो वेद से भी प्रारंभ किया जा सकता है - अर्थात कविता के प्रारंभ से ही प्रारंभ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;       लेकिन इन मानववादी कवियाें की तुलना वैदिक अथवा भक्ति युग के कवियो से करना गलता होगा। ईश्वर की सम्पूर्ण सत्ताा और उसके आगे निरा समर्पित रहने वाला भक्तिभाव इन कवियो में नहीं। न ही यह ईश्वर उनकी कविता का केन्द्रीय विङ्ढय बनता है जैसा कि भक्ति युग के साहित्य में है। नवजागरण पर चल रही सारी खींचा-तानी के बाद भी यह स्वीकार तो करना ही पड़ेगा कि ईश्वर प्रत्यय सम्बन्धी दार्शनिक सोच के मामले में भक्ति कवि, सन्त अगस्ताइन जैसे यूरोपियन मध्ययुगीनों से बहुत आगे नहीं। मगर ये मानवतावादी कवि तो आधुनिकता में पाँव डाले हुए हैं। भक्तियुग की अन्तिम परछायीं हिन्दी साहित्य में निराला की कविता में दिखलायी पड़ती है और वहीं से उससे मुक्त होने का मार्ग भी दृष्टिगोचर होता है। वैसे निराला स्वयं भक्ति के कवि तो कतई नहीं। भक्ति है भी तो छायावाद और आधुनिकता के फार्मे में। अत: इस पूरे विश्लेङ्ढण में निराला से पहले के समय में जाने की जरूरत नहीं महसूस होती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; इस मानववादी दृष्टि की विशेङ्ढता यह है कि इस दार्शनिक अवस्थिति में ईश्वर की सत्ता मनुष्य की सत्ता से जुड़ जाती है। हरिजन, दलित, मजदूर, किसानों में ईश्वर की प्राप्ति इसी अर्थ मे है और रवीन्द्रनाथ टैगोर ऐसी कविताएं लिखने वाले एकमात्र कवि नहीं। ऐसी कविताएं हिन्दी में कम नहीं जिनमें मनुष्य को ईश्वर का रूप बतलाया गया हो और उसकी अवहेलना करके होने वाली ईश्वर भक्ति को पाखण्ड और ढोंग बताया गया हो। ईश्वर की इस मानवीय सत्ता के दर्शन की आवश्यकता हमारे समय में साम्प्रदायिकता के बरक्स बार-बार दिखाई दी और धर्मनिरपेक्षता के समर्थकों द्वारा बार-बार पीछे जाकर इन कवियों में अपनी परंपरा तलाशने की बेचैनी इसी का प्रतिफलन है। यह देखने की बात है कि टैगोर एक तरफ ईश्वर को सामान्य जनता में तलाशते हैं तो दूसरी तरफ साम्प्रदायिकता के अंधकार को भाई-भाई के बीच हो रहे अज्ञानतापूर्ण अनुचित संघर्ङ्ढ के रूप में देखते है। ये दोनाें विचार दार्शनिक संस्तर पर नाभिनाल बध्द हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद से प्रादुर्भूत साम्प्रदायिक वैमनस्य के दौर मे इस दृष्0श्निV की ओर पुनर्वापसी स्वाभाविक थी। अनिल सिंह अपनी बहुचर्चित कविता 'अयोध्या' में उसे इस प्रकार रखते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   '' मनुष्; रहते हैं इस शहर में &lt;br /&gt;   जिनमें रहता है भगवान&lt;br /&gt;   और चूंकी भगवान मनुष्; में रहता है&lt;br /&gt;    इसलिए वह अल्लाह भी हो सकता है''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; फिर मनुष्; और उसका सामान्य नागरिक जीवन ईश्वर से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   ''इतना ही यथार्थ है यह शहर जितना यह कि&lt;br /&gt;   आदमी का कलेजा काटकर उसकी जगह &lt;br /&gt;   शिवलिंग रख देने से वह मर जायेगा''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; ईश्वर और मनुष्य की सत्ताा का एकाकार होना मानववादी कविता की एक प्रमुख विशेङ्ढता है। यह भी कहा जा सकता है कि इस कविता में मनुष्य ही ईश्वर हो जाता है। आगे चलें तो यह तथ्य सामने आता है कि मनुष्य के तिरस्कार पर ईश्वर और उसकी भक्ति ही निरर्थक हो जाती है। ऐसे में उसके प्रति भक्ति या श्रध्दा का कोई महत्व नहीं। बाह्याडम्बरों पर हुए आक्रमण इसी के चलते हैें। देखें तो ईश्वर और धर्म के प्रति यही सोच भारत मेें धर्मनिरपेक्षता का मूल बनती है और जिसके कुछ तत्व भक्ति युग में प्राप्त होते हैं। मनुष्य के कारण ही तो ईश्यर का अस्तित्व है वगर्ना धर्म का सारा ताना-बाना बेकार है। आध्यात्म के अखण्ड भाव में पूरे विश्व का समा जाना जरूरी है और मनुष्य तो वही है जो मनुष्य के लिए मरे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; इस मानववाद की अभिव्यक्ति हमारे समय की साम्प्रदायिकता विरोधी हिन्दी कविता में तरह-तरह से हुई। नवल शुक्ल स्वयं को ईश्वर से अधिक पाते है क्योंकि ईश्वर युगों में पृथ्वी की सुधि लेते हैं जबकि कवि (मनुष्य) ''किसी भी जगह जनम लेकर''  पूरे ब्रह्माण्ड के बारे में सोचता है और ''अपनी क्षमता से अधिक रहने की कोशिश करता'' है। साम्प्रदायिकता के इस विकट दौर से पहले आने वाले कवि सर्वेश्वर के लिए-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   '' इस दुनिया में&lt;br /&gt;    आदमी की जान से बड़ा कुछ भी नहीं है&lt;br /&gt;   न ईश्वर&lt;br /&gt;   न ज्ञान&lt;br /&gt;   न चुनाव&lt;br /&gt;   न संविधान&lt;br /&gt;   इसके नाम पर कागज पर लिखी कोई भी इबारत &lt;br /&gt;   फाड़ी जा सकती है&lt;br /&gt;   और जमीन के भीतर गाड़ी जा सकती है''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;               केदारनाथ सिंह की कविताओं में ईश्वर का जिक्र एक मुहावरे के रूप में आता है। ऐसा सिर्फ केदारनाथ सिंह की कविता में नहीं अपितु बहुत से अन्य कवियों की भी कविताओं में है। वहां यह 'ईश्वर' एक भाव बोधक शब्द भी है, जो कविता से बाहर जीवन में घनघोर प्रचलन रखता है। इस अर्थ में यह शब्द 'ईश्वर' के दार्शनिक अथवा धार्मिक अर्थ सन्दर्भों से बिल्कुल अलग अस्तित्वमान है। 'हे राम' या 'राम नाम सत्य है' या 'खुदा कसम' जैसे वाक्यांशाें की तरह यह भाङ्ढा में विद्यमान है। यह एक जटिल प्रश्न है कि यह सत्ताा भाङ्ढा के इस प्रकार के स्वतंत्र लगने वाले प्रयोगों मेें किस प्रकार लगातार क्रियाशील करती है? इस लगातार बरकरार भाङ्ढायी तत्व में क्या कहीं दार्शनिक प्रत्ययों को भी वैधता तो नहीं प्राप्त होती? कैन्टरबरी के एनसेल्म ने ईश्वर के अस्तित्वमान होने का प्रमाण देते हुए कहा था कि 'ईश्वर' शब्द का होना ही उसके अस्तित्वमान होने का सबूत है। यह सत्ताा शब्दों के माध्यम से बनी रहती है। मेरे एक उर्दू पढ़ाने वाले मित्र ने बताया था कि किस प्रकार प्रारंभिक कक्षाओं में भाङ्ढा ज्ञान कराते समय ही बच्चों को शब्दों के माध्यम से ईश्वर और धर्म की घुट्टी पिला दी जाती है। लेकिन ईश्वर को गंभीरतापूर्वक न लेने वालों के बीच भी ईश्वर शब्द बना रहता है और प्रयोग से बाहर नहीं होता। यही वजह है कि ईश्वर संबन्धी कविताओं के गहरे अर्थों तक पहुंचने की जरूरत महसूस होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; मुहावरे की ही तरह ही ईश्वर के प्रति प्रार्थना के शिल्प में लिखी गयीं कविताएं किस प्रकार प्रार्थना की सीमा से बाहर निकलती है उसका उदाहरण है निराला की वे अन्तिम कविताएं जो सिर्फ प्रार्थनाएं न होकर स्वातंत्रोत्तर भारत की बदलती परिस्थितियाें में एक संवेदनशील कवि के मोहभंग की विशिष्ट कोटि की अभिव्यक्ति है। इस विङ्ढय पर कवि एवं आलोचक केदारनाथ सिंह ने एक बहुत प्रभावशाली लेख लिखा है। निराला अपनी इन कविताओं में ईश्वर के संदर्भ को अपने व्यक्तिगत जीवन से जोड़कर सूक्ष्म राजनीतिक अर्थ प्रदान करते हैैं।&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;   'जय तुम्हारी देख भी ली&lt;br /&gt;   रूप की गुण की, सुरीली।&lt;br /&gt;   &lt;br /&gt;   वृध्द हूँ मैं, ऋध्दि की क्या,&lt;br /&gt;   साधना की, सिध्दि की क्या?&lt;br /&gt;   खिल चुका है फूल मेरा,&lt;br /&gt;   पखड़ियाँ हो गयीं ढीली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   चढ़ी थी जो ऑंख मेरी,&lt;br /&gt;   बज रही थी जहाँ भेरी, &lt;br /&gt;   वहाँ सिकुड़न पड़ चुकी है,&lt;br /&gt;   बढ़ रही है रेख नीली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   आग सारी फुक चुकी है, &lt;br /&gt;   रागिनी वह रुक चुकी है,&lt;br /&gt;   याद करता हुआ जीवन, &lt;br /&gt;   जीर्ण जर्जर आज तीली।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; यही प्रार्थना का  सबवर्जिव काव्य प्रारूप किस प्रकार ईश्वर के प्रति नकारात्मक रुख अख्तियार करता है यह यदि देखना हो तो सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की 'ईश्वर' पर लिखित कविता देखने योग्य होगी। 'गर्म हवाएं' संग्रह में आयी यह कविता ऐसी अन्य कविताओं से घिरी है जो कवि के अपने व्यक्तिगत दु:खों, सामाजिक मोहभंग और व्यथित चुनावों को अभिव्यक्ति प्रदान करते हैं। संग्रह 'धीरे-धीरे' जैसी राजनीतिक कविता से प्रारंभ होता है जिसमें सर्वेश्वर एक 'क्रांतियात्रा' को 'शवयात्रा' में बदलते हुए देखते हैं। पत्नी की मृत्यु पर लिखी गयी एक अत्यन्त ही भावपूर्ण कविता के बाद आती है प्रार्थना कविताओं की ऋृंखला जिनमें कवि ईश्वर से शक्ति नहीं मांगता (प्रार्थना-1) 'दुर्गम पथ' मांगता है जिस पर उसके 'थके चरण' हों (प्रार्थना-2), अपनी सीमाओं का ध्यान और दुर्बलताओं का अभियान मांगता है (प्रार्थना-3)। पर अपनी कविता 'प्रार्थना-4' में वह ईश्वर का लगभग निङ्ढेध करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   'यही प्रार्थना है प्रभु तुमसे&lt;br /&gt;   जब हारा हूं तब न आइये।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; कवि अपने शौर्य की तो सराहना चाहता है, मगर वह ईश्वर के चरणों में नहीं गिरना चाहता। वह जानता है कि संसार में दु:ख की ऑंखें बहुत बड़ी है और उसके एक अश्रु की आयु के सामने कल्पचक्र अस्वीकार्य है। और इन प्रार्थनाओं के बाद आती है कविता 'ईश्वर'। सर्वेश्वर की यह कविता निश्चित रूप से दु:ख से भीगी हुई है। व्यक्तिगत दु:ख और मोहभंग से घिरी हुई यह कविता ईश्वर को एक ठोस रूप में प्रस्तुत करती है जो एक व्यापारी या बॉस की तरह 'बहुत लम्बी जेबों वाला कोट' पहनकर आता है और कवि की माँ, पिता, पत्नी और बच्चे को खिलौनों की तरह जेब में रखकर चला जाता है। कवि के लिए दुनियाँ छोड़ जाता है, जिसमें उसे बहलाने के लिए और बहुत से खिलौने हैं। आगे कवि लिखता है,&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   'मैंने सुना है&lt;br /&gt;   उसने कहीं खोल रखी है&lt;br /&gt;                           खिलौनो की दूकान,&lt;br /&gt;   अभागे के पास&lt;br /&gt;   कितनी जरा सी पूँजी है &lt;br /&gt;   रोजगार चलाने के लिए।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; एक खिलौने के व्यापारी के रूप में ईश्वर का अवमूल्यन उसे हास्यास्पद बना देता है। ईश्वर की इतनी ठोस उपस्थिति सिर्फ उसके लम्बे कोट की वजह से बन पड़ी है, जो प्रभु की इमेज को इस कविता में सुनिश्चित करता है। यह सर्वेश्वर की प्रार्थना श्रृंखला की कविताओं में उपस्थित पारंपरिक प्रार्थनाभाव की बची-खुची संभावनाओं को भी ध्वस्त कर देता है और उनमें निहित दूसरे प्रतिरोधी भावों को आलोकित करता है। यह प्रश्न भी उठता है कि वह जो कुछ भी है- ईश्वर है भी या कोई और। सर्वेश्वर की ये कविताएं उस अस्पष्ट भूमि पर खड़ी है, जहाँ ईश्वर सत्ता का प्रतीक बनता दिखाई देता है। ईश्वर की सत्ता के प्रति प्रार्थना के ही शिल्प में व्यंगाात्मक सूक्ष्म कटाक्ष भरे प्रयोग किस प्रकार प्रभावपूर्ण हो सकते हैं इसका एक उदाहरण है शमशेर बहादुर सिेह की द्वारा भजन के शिल्प में प्रस्तुत यह कविता: &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   हरि मोरी आड़, हरि ही मोरी आड़॥&lt;br /&gt;   हरि मोरी झाँकी, हरि ही केंवाड़॥&lt;br /&gt;   हरि जमुना-मंथन मोरे, हरि ही&lt;br /&gt;थाम्हे दुख के पहाड़॥&lt;br /&gt;   हरि संग ज्ञान-ध्यान मोहे मधुऋतु&lt;br /&gt;   हरि बिन सकल उजाड़॥&lt;br /&gt;   मज्जा-भेद बसे हरि अंतर&lt;br /&gt;   हरि संबल मोरे हाड़॥&lt;br /&gt;   जग बाड़व में जनम-जनम लौं&lt;br /&gt;   झोंक्यों कितने भाड़॥&lt;br /&gt;   तब आयो समसेरु मुकति को&lt;br /&gt;   परलौ मास असाढ़॥&lt;br /&gt;   हरि मोरी आड़, हरि ही मोरी आड़॥&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; सांप्रदायिक उन्माद के भीषण दौर से पूर्वं, अर्थात 1990 से पहले के समय की समकालीन हिन्दी कविता में ईश्वर की उपस्थिति की तुलना मेें बाद की कविताओं में उसकी उपस्थिति काबिले गौर है। स्वप्निल श्रीवास्तव की कविताओं मे ईश्वर की उपस्थिति एक वैचाारिक द्वंद्व का परिणाम है। 'ईश्वर एक लाठी है' कविता इस अर्थ में ध्यातव्य है। यहां कवि अपने पिता जैसे बूढे लोगाें के लिए ईश्वर के निहितार्थ को समझने की कोशिश करता है। इस कविता में यदि पिता के ईश्वर में विश्वास के प्रति सहानुभूति है तो उस विश्वास की व्यर्थता का भी एहसास है। ईश्वर पिता के लिए एक ऐसी लाठी है जिसे वे अक्सर तान देते है। उन्होंने इस लाठी को जिन्दगी भर मजबूत रखने की कोशिश की है, मगर उन्हें लाठी में घुन के चालने की आवाज सुनायी देती है। अपनी जीवन भर की आस्था के बाद भी वे यह नहीं जान सके हैं कि ईश्वर आखिर किस कोठ की लाठी है। स्वप्निल श्रीवास्तव की इस कविता के तमाम निहितार्थ निकलते हैं, विशेषरूप से इस कारण कि कवि के काव्यानुशासन में कविता के अर्थ एक दिशा में चलते हुए भी विभिन्न संस्तरों पर खुलते है। एक आस्तिक पिता के द्वंद को यह बखूबी रेखांकित करने वाली कविता  है जिसके लिए ईश्वर एक ऐसा सहारा है जो कमजोर होता जा रहा है, मगर जिसे त्याग पाना उसके तर्क स्वभाव में कहीं दूर-दूर तक नहीं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-4589539132711961589?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/4589539132711961589/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=4589539132711961589' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/4589539132711961589'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/4589539132711961589'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2008/10/2.html' title='ईश्वर, सत्ता और कविता      2'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-5477786414303065141</id><published>2008-10-07T09:12:00.000-07:00</published><updated>2008-10-07T09:16:09.491-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लेख'/><title type='text'>ईश्वर, सत्ता और कविता    (1)</title><content type='html'>&lt;strong&gt;ईश्वर, सत्ता और कविता&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;                                        &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                       (1)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; आपातकाल के पश्चात्, प्र्रकाशित हुए अपने कविता संग्रह 'हजार हजार बाहों वाली' में जनकवि नागार्जुन की एक कविता थी 'कल्पना के पुत्र हे भगवान'। अपने शीर्ङ्ढक को सार्थक करती हुई यह कविता ईश्वर के अस्तित्व पर लिखी गयी उस कालखंड की एक महत्वपूर्ण कविता थी। कल्पनाजनित ईश्वर को संबोधित करती यह कविता कुछ इस प्रकार प्रारम्भ होती है-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  ''कल्पना के पुत्र हे भगवान &lt;br /&gt;  चाहिए मुझको नहीं वरदान &lt;br /&gt;  दे सको तो दो मुझे अभिशाप&lt;br /&gt;  प्रिय मुझे है जलन प्रिय संताप&lt;br /&gt;  चाहिए मुझको नहीं यह शान्ति&lt;br /&gt;   चाहिए संदेह उलझन भ्रांति''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; आस्था के स्थान पर संदेह की माँग करती यह कविता बेहद चुनौतीपूर्ण है। संग्रह में दिये गये विवरण के अनुसार इस कविता का रचना समय 1946 है। उस समय के पारंपरिक समाज को देखते हुए यह तथ्य इस कविता के ऐतिहासिक महत्व को और बढ़ा देता है। पारंपरिक तौर पर ईश्वर से होने वाली आस्था की माँग के बरक्स अनास्था की मॉग करने वाली यह कविता एक प्रकार का वैचारिक साहस थी। बरबस ध्यान खींच लेने वाली बाबा की यह कविता या तो आश्चर्य मिश्रित उत्साह के साथ पढ़ी गयी या फिर भयाक्रांत निन्दाभाव से। वह दौर हमारे आज के अभी-अभी गुजरे फासीवादी दौर के दु:स्वप्न से बिल्कुल अलग था, वगर्ना संघी भाई लाठी लेकर नागार्जुन को खोजते और बाबा अपनी खास मुद्रा में कोई अटपटा सा उत्तर देते। फासीवादियों को केवल गर्मी और उत्तेजना से मतलब होता है, जिसे वे विचार के लोहे में ढालकर हथियार के तौर पर जनता में ट्रांसफर कर अपना उल्लू सीधा करते है। उन्हें कविता अथवा किसी भी कला के अर्थ, भाव या अभिव्यक्ति की सूक्ष्मताओं से कुछ खास लेना देना नहीं होता। यदि ऐसा न होता तो वे बर्बर दंगाइयों में क्यों तब्दील होते और पिछले तीस वङ्र्ढों  का भारतीय इतिहास आदमीयत के खून से सराबोर न होता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; इस कविता के सिलसिले में ध्यान देने वाली बात यह है कि इसे कविता के पेशेवर पाठकों तक ने उस सूक्ष्मता में नहीं देखा जिस सूक्ष्मता मेें यह कविता अपने पाठ की अपेक्षा रखती है। इसे नागार्जुन की 'प्रतिबध्द हॅू' या फिर 'प्रतिहिंसा स्थायीभाव है' वाली सीधी कविताओं की ही तरह देखा गया। नागार्जुन की यह कविता अपनी अभिधा में ईश्वर को सम्बोधित है जिसको वह स्वयं कल्पना का पुत्र बतलाती है। जिसके अस्तित्व पर ही शंका है या जिसके न होने पर पूरा विश्वास है, उसे संबोधित करने का औचित्य सिध्द करना थोड़ा विचित्र लगेगा। इस कविता के निहितार्थ को कविता की बाद की पंक्तियों में तलाशने पर ही कविता के वास्तविक मंतव्य से मिला जा सकेगा और वह भी कविता के व्यंग्यार्थ में। कविता में 'निन्दा' और 'पाप' करने का जी खोल अभिशाप माँगा गया है। जो सुनिश्चित तौर पर किसी नैतिक वरदान की अभिलाङ्ढा रखने वालों के लिए अच्छा खासा धक्का साबित होगा, पर कविता का वास्तविक केन्द्र वह स्थान है जहांॅ कवि पारंपरिक तौर पर ईश्वर के सामने कान पकड़कर नाक नहीं रगड़ना चाहता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  ''बाप-दादों की तरह रगडू न मैं निज नाक&lt;br /&gt;  मंदिर की देहली पर पकड़ दोनों कान''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह साफ है कि यहाँ ईश्वर की सर्वशक्तिमान सत्ता से इन्कार है। नागार्जुन की यह कविता सिर्फ कल्पना सृजित ईश्वर के दार्शनिक विरोध तक ही सीमित नहीं अपितु ईश्वर की अवधारणा से जुड़ी तमाम परंपरागत और अविवेकी बातों का भी प्रतिकार थी जिन्हें आस्था, धर्म और नैतिकता के नाम पर लादा या स्वीकार किया जाता रहा है। ये सभी बातें हमारे समय के मनुष्य को उसकी वास्तविक समस्याओं से दूर ले जाती हैं, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'सड़ गमी है ऑंत &lt;br /&gt;   दिखाए जा रहे है दांत''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; नागार्जुन समाज में धर्म और ईश्वर के नाम पर पैदा किये जाने वाले भय का प्रतिकार करते है। इस धर्मभीरुता अथवा पारंपरिक कायरता के प्रतिवाद के संदर्भ मे वे धर्म के वर्चस्व को नहीं स्वीकार करते। वे धर्म के इस प्रतिगामी पक्ष की ओर संकेत करते है, जब वे लिखते है कि 'छोड़कर प्रासाद खोजूं खोह/कह रहा है पूर्वजों का मोह'।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  इस प्रतिकार भाव को ध्यान में रखें तो यह कविता हिन्दी साहित्य में अपना ऐतिहासिक महत्व रखती है। नागार्जुन की कविता के सामान्य पाठक को भी यह बात अवश्य आकर्ङ्ढित करती है कि वहां व्यर्थ के आध्यात्म के लिए स्पेस लगभग नहीं है। अपने सारे प्रकार-प्रकार के सर्जनात्मक मुद्रा-मुखौटों के उपरांत भी नागार्जुन की कविता विवेक सम्मतता की ही विजय का धर्मनिरपेक्ष उद्धोङ्ढ है। यहां मैं धर्मनिरपेक्षता को महज ईश्वर विरोध तक सीमित करने का कोई उपक्रम नहीं कर रहा। धर्मनिरपेक्षता सुनिश्चित तौर पर एक अधिक व्यापक प्रत्यय है। इतनी व्यापक कि इतिहास के प्रवाह में वह धर्म से लेकर विज्ञान तक में विकसित होती दिखायी दे। यहाँ मैं उस अवस्थिति की चर्चा कर रहा हूं, जो इधर लिखी गयी हिन्दी कविता का एक महत्वपूर्ण पक्ष है और जहां से एक पूरे कालखंड में लिखी गयी ढेर सारी कविताओं का निर्वचन संभव है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; अपनी दूसरी कविता 'थकित-चकित-भ्रमित-भग्नमन' में वे ईश्वर को एक सहारे के रूप में भी स्वीकार करने से इन्कार करते हैं। यद्यपि वे जानते है कि बहुतों के लिए ईश्वर जैसे 'समर्थ' का सहारा स्फूर्ति देता है। फिर वृध्दावस्था के डूबते के लिए तो तिनके का सहारा ही बहुत होता है। वृध्दावस्था में बहुत से प्रगतिशील तार्किकजन ईश्वर को स्वीकार कर लेते हैं, क्योकि बुढ़ापे के कमजोर तन-मन को आस्था का कोई आश्रय चाहिए होता है। इसके अतिरिक्त फिर सुविधा के भी तो अपने तर्क होते ही होते हैं जो मनुष्य को ललचाते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  'सुख-सुविधा और ऐश-आराम के साधन &lt;br /&gt;  डाल देते हैं दरार प्रखर नास्तिकता की भीत मेें &lt;br /&gt;  बड़ा ही मादक होता है, 'यथास्थिति' का शहद&lt;br /&gt;  बड़ी ही मीठी होती है 'गतानुगतिकता' की संजीवनी'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; नागार्जुन की यह कविता अपने अंतिम पड़ाव में स्वयं से और अपने जैसे तमाम तार्किकों से यह प्रश्न करती है कि क्या जीवन के अंतिम दौर में उन्हें किसी धार्मिक मठ की शरण लेनी पड़ेगी? इस प्रश्न की भाङ्ढायी नकार और व्यंग में नागार्जुन अपनी स्पष्ट अवस्थिति और दृढ़ निश्चय की ओर ही संकेत करते है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;  ' तो क्या मुझे भी बुढ़ापे में 'पुष्टई' के लिए &lt;br /&gt;  वापस नहीं जाना है किसी मठ के अन्दर '&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; यह एक रोचक प्रश्न हो सकता है कि क्या नागार्जुन अपनी इस कविता में निराला की अन्तिम कविताओं की ओर संकेत कर रहे हैं जिनमें निराला ईश्वर के प्रति प्रार्थनाभाव की कविताएं लिखते हैं। संभवत: यह नागार्जुन का संकेत नहीं, लेकिन हिन्दी के कई आलोचकाें ने निराला के इस अन्तिम दौर के भागवतवाद पर टिप्पणियाँ की हैं। लेकिन निराला के अन्तिम दौर की प्रार्थनापरक कविताएं इस तरह सरलीकृत नहीं हैं और उनकी जटिलता में निराला के जीवन, उनके नैराश्य, पत्नी प्रेम, मृत्यु छाया और उनका अपना समय परोक्ष पढ़ा जा सकता है। यहां प्रार्थना महज आस्था की अभिव्यक्ति नहीं एक रचना प्रविधि भी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; नागार्जुन की इस कविता के सापेक्ष हिन्दी की उस पहली दलित कविता का जिक्र जरूरी लगता है जिसमें ईश्वर को 'भगवनवा' कहा गया है, अथवा निराला के उस लघु उपन्यास का जिक्र जिसका नायक ईश्वर पर लाठी चला देता हैं। मगर ये दोनाें ही कृतियाँ नागार्जुन की इस कविता से थोड़ा अलग हैं। हिन्दी की प्रसिध्द ऐतिहासिक महत्व की पत्रिका 'सरस्वती' में प्रकाशित और यहां संदर्भित हीरा डोम की कविता अपने वक्तव्यों में पात्र अथवा कवि की विवशता और शिकायत को व्यक्त करती है जो अपनी जीवन स्थितियों से तंग है। यहां वर्ण व्यवस्था के प्रति आक्रोश पढ़ा जा सकता है । लेकिन देखें तो वास्तव में वही मुख्य बात है और ऐसा होना भी चाहिए, क्याेंंकि वर्ण व्यवस्था के प्रति यह आक्रोश ही उसे उद्वेलित कर ईश्वर की ओर ले जाता है और उसकी लानत-मलामत तक उतारता है। मगर वर्ण व्यवस्था की परिधि से बाहर खड़ा यह डोम ईश्वर की सत्ता से इन्कार नहीं करता। यहां ईश्वर के प्रति निङ्ढेध नहीं अपितु एक विडम्बना पूर्ण और विवश धिक्कार है। महाप्राण निराला की उपन्यासिका में यह प्रतिकिया दूसरे प्रकार की है। मगर दोनों जगह ईश्वर के प्रत्यय को सत्ता से प्रछन्नत: जोड़ा गया है- छल-छद्म और वर्ण व्यवस्था की सत्ताा। हीरा डोम की कविता में तो ईश्वर वर्ण व्यवस्था का पोङ्ढक लगता है। यहां चूकि संदर्भ कविता का है इसलिए निराला की उपन्यासिका का जिक्र छोड़ना पडेग़ा। इस लेख में हिन्दी कविता में ईश्वर के प्रत्यय का प्रयोग निराला के बाद के कवियों ने किस प्रकार किया है और उसके क्या व्यापक निहितार्थ हैं, यही मूल चर्चा का विङ्ढय है। इस प्रश्न के मौजू होने के ऐतिहासिक कारण हैं जो हिन्दी कविता के किसी भी सतर्क पाठक से छिपे नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt; हमारे समय में धर्म का सांप्रदायिक और मनुष्य विरोधी स्वरूप काफी स्पष्ट हो गया है। बीसवीं शताब्दि के आखिरी दशकों से लेकर यदि नयी शताब्दी के प्रारंभिक वङ्र्ढो तक को ध्यान मे रखें तो धर्म को लेकर हुए उत्पातों में जितने निर्दोङ्ढ लोग मारे गये उतने किसी भी प्राकृतिक आपदा अथवा अन्य किसी मानवीय त्रासदी मेें नहीं मारे गये। यह सांप्रदायिकता विभिन्न प्रकार से उभरी और हिन्दू साम्प्रदायिकता का नग्न नृत्य इसका चरमोत्कर्ङ्ढ है। पंजाब के सिख आतंकवाद, कश्मीर के मुस्लिम आतंकवाद और हिन्दू सांप्रदायिकता की आग में अपनी जान खो देने वाले निर्दोङ्ढ लोगों की संख्या का आंकड़ा रख पाना कठिन है। सिर्फ एक गुजरात के दंगों में 6000 से अधिक लोगो के मारे जाने के आंकड़े है। यह संख्या कम अथवा अधिक हो सकती है और यह बहस का मुद्दा नहीं। मुद्दा यह है कि मनुष्य को सदाचार और मानवीयता का पाठ पढ़ाने का दावा करने वाला धर्म आज राजनीतिज्ञों द्वारा किस प्रकार इस्तेमाल हो रहा है और धर्म तधा ईश्वर के ठेकेदार किस प्रकार इस अमानवीय कृत्य में लिप्त हैं और किस प्रकार इसे अपना मुद्दा बनाये हुए है। धर्म की राजनीति करने वाले लोग हत्याओं तर्क तलाशने में जुटे हुए है। स्वयं को सहिष्णु बताने वाले धर्मो के इस प्रकार सामने आने वाले हिंसक रूप किसी भी संवेदनशील व्यक्ति के लिए चिन्ता का विषय होंगें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   'किसी धर्मस्थल के &lt;br /&gt;   विवाद में&lt;br /&gt;   तीन हजार लोग बम से &lt;br /&gt;   दो हजार गोली से&lt;br /&gt;   और पाँच सौ &lt;br /&gt;   जलाकर मार डाले जाते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   चार सौ महिलाओं की&lt;br /&gt;   इज्ज़त लूटी जाती है&lt;br /&gt;   और तीन सौ शिशुओं को &lt;br /&gt;   बलि का बकरा बनाया जाता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   धर्म में &lt;br /&gt;   सहिष्णुता का&lt;br /&gt;   प्रतिशत ज्ञात कीजिए'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-अष्टभुजा शुक्ल&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; इस प्रकार की परिस्थितियाें में हिन्दी कविता में ईश्वर के प्रति विभिन्न प्रकार की प्रतिक्रियाएं दिखलाई देती हैं। यह ईश्वर ही वह दार्शनिक प्रत्यय है जिसके इर्द-गिर्द धर्म का तानाबाना बुना हुआ है। यही वह दार्शनिक केंन्द्र है जिसके चारो ओर फैला प्रपंच धर्म के नाम पर होने वाली तमाम अमानवीय गतिविधियों को वैधता प्रदान करता है। एक प्रकार से यह सांप्रदायिकता को भी वैधता प्रदान करने वाला आधार है जिसकी जन्मभूमि के विवाद को राजनीतिक सीढ़ी बनाकर भाजपा के लिए केंद्र की सत्ता पर आसीन होना संभव हुआ। यह महज एक इत्तिाफाक नहीं कि ऐसे समय में ऋतुराज अपना संग्रह 'लीला मुखारविंद' उन नास्तिकों को समर्पित करते हैं जो ईश्वर अथवा धर्म में विश्वास नहीं करते मगर जो मनुष्यता के सुखद और बेहतर भविष्य के लिए संघष्र् ारत हैं, 'जो बिना निराश हुए अपने विवेक की दृढ़ता मेंं साहसपूर्वक संघष्र् ारत है। मानव जाति का सुखमय भविष्य ही जिनका परलोक है।' वैसे भी देखे तो इधर धर्म ओर नस्ल के नाम पर पूरी दुनिया में इतने दंगे और खून खराबे हुए हैं कि नीत्शे का यह वाक्य प्रासंगिक लगता है, ' ईश्वर मर चुका है और मैंने उसे दफन होते हुए देखा है.' ऋतुराज की तरह हर संवेदनशील और विवेकवान व्यक्ति इस साम्प्रदायिक उन्माद और उसके फासीवादी विस्तार के दौर में ईश्वर प्रत्यय और उससे जुड़े धर्म के हत्यारे प्रयोगों को प्रश्न के घेरे मेें रख सकता है। यदि इस दौर का सांप्रदायिक अमानवीय धर्म ही बचा है, तो इस धर्म के रास्ते पर न चलना ही वास्तविक धर्म होगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-5477786414303065141?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/5477786414303065141/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=5477786414303065141' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/5477786414303065141'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/5477786414303065141'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2008/10/1.html' title='ईश्वर, सत्ता और कविता    (1)'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-7400896009500281659</id><published>2008-07-20T10:29:00.000-07:00</published><updated>2008-07-20T10:57:32.106-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डायरी'/><title type='text'></title><content type='html'>कविता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;हम मॉंझी हुए फटी नाव के&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;                             प्रेमशंकर मिश्र&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धूप के हुए न हुए छझांव के&lt;br /&gt;हम मॉंझी हुए फटी नाव के।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चलना फिरना हंसना बोलना&lt;br /&gt;किस्त किस्त क़रजो की वापसी&lt;br /&gt;इनकी उनकी पीली नीली बातें&lt;br /&gt;ऑंच चढ़े उड़ जाती भाप सी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसे में कैसे कोई पंक्षी पर साधे&lt;br /&gt;छिन पछुवा, छिन पछियांव के।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम मॉंझी हुए फटी नाव के।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खेतों से कटना, बोझा बनना&lt;br /&gt;दाने दाने की मजबूरी&lt;br /&gt;रेह देह लहरों का आमंत्रण&lt;br /&gt;बान बिंधी घायल कस्तूरी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बूंद बूंद रिस चुके बनमोहन&lt;br /&gt;गंध के हुए न हुए भाव के।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम मॉंझी हुए फटी नाव के।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गलती फसलें, चटके ताल हैं&lt;br /&gt;अंधा सूखा, बहरी बाढ़&lt;br /&gt;लूले को काम कुऑं खोदना&lt;br /&gt;लंगड़े को लांधना पहाड़&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धुएं धुएं धोखे के घनपॉंखी&lt;br /&gt;शहर के हुए न हुए गॉंव के।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम मॉंझी हुए फटी नाव के।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आओ रुकें क्षण दम लें &lt;br /&gt;इतना ज्यादा है थोड़ा कम लें&lt;br /&gt;पिंजरे की मैना से कुछ सीखें&lt;br /&gt;खुशियॉं बॉंटें सारा गम लें&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सििद्धहीन मंत्रों से क्या हासिल&lt;br /&gt;अर्थ के हुए न हुए भाव के।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हम मॉंझी हुए फटी नाव के।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-7400896009500281659?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/7400896009500281659/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=7400896009500281659' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/7400896009500281659'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/7400896009500281659'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2008/07/blog-post_20.html' title=''/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-1045653201181632702</id><published>2008-07-20T00:14:00.000-07:00</published><updated>2008-07-20T09:44:25.301-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डायरी'/><title type='text'>पं. प्रेमशंकर मिश्र का अवसान</title><content type='html'>&lt;strong&gt;पं. प्रेमशंकर मिश्र का अवसान&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉ. रमाशंकर तिवारी त्रिभुवन ट्रस्ट&lt;br /&gt;                           10, गंधमादन, लक्ष्मणपुरी फैज़ाबाद, उत्तर प्रदेश&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                     &lt;strong&gt;  शोक प्रस्ताव &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कल 16.07.2008 की रात हिन्दी साहित्य के महत्वपूर्ण कवि और संस्कृतिकमी पं. प्रेमशंकर मिश्र जी का 83 वषZ की अवस्था में फैज़ाबाद के जिला चिकित्सालय में एक सप्ताह की बीमारी के बाद निधन हो गया। पं. प्रेमशंकर मिश्र को कविता अपने पिता द्विजेष जी से परम्परा में प्राप्त हुई थी। प्रारिम्भक दौर की पारम्परिक कविताओं के बाद वे नयी कविता और नवगीत आन्दोलनों से जुड़े और पर्याप्त ख्याति अर्जित की। प्रसिद्ध नवगीतकार शंभुनाथ सिंह ने मिश्र जी की कविताओं को अपने नवगीत संकलन नवगीत अर्धशती में स्थान देकर आपके महत्व को दषZया था। जीवन के अन्तिम दिनों तक वे कविता और संस्कृति के प्रति समर्पित रहे। सामान्य जीवन के सुखों और दुखों को अभिव्यक्ति देने वाली प्रेमशंकर मिश्र जी की कविता में साहित्य की कई परम्पराएं एक साथ चलती दिखायी देती हैं। पं. मिश्र जी के निधन से कविता की इन धाराओं की गंभीर क्षति हुई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संस्कृतिक परिवेश के निर्माण के उद्देश के प्रति समर्पित पं. प्रेमशंकर मिश्र जी की संस्था &lt;strong&gt;सम्पर्क &lt;/strong&gt;ने फैजाबाद में साहित्य और संस्कृति से जुड़ी कई पीढ़ियों के लिए आगे बढ़ने का आधार निर्मित किया। अपनी संवादधमी प्रकृति के चलते वे विभिन्न विचारधाराओं से जुड़े लोगों से विचार-विमष करते रहे। मनोविनोद की उनकी जीवन्त प्रवृत्ति ने साहित्यजगत में ही नहीं वरन् सामान्य जीवन में भी उन्हें लोकप्रिय बनाया। फैज़ाबाद के साहित्य और संस्कृति जगत में उनका अविस्मरणीय योगदान सदा याद किया जायेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे डॉ. रमाशंकर तिवारी त्रिभुवन ट्रस्ट के प्रारिम्भक सदस्यों में से थे। उन्हें उत्तर प्रदेश हिन्दी साहित्य संस्थान के साहित्य भूषण सम्मान मिलने के अवसर पर ट्रस्ट ने भी उन्हें सम्मानित किया था। कुछ समय पूर्व ट्रस्ट के तत्वावधान में पं. प्रेमशंकर मिश्र जी का एकल काव्यपाठ आयोजित किया गया था जिसे सहित्य प्रेमियों ने बहुत सराहा था। शोकाकुल मन से हमें यह कहना पड़ रहा है कि उनके अवसान से ट्रस्ट ने अपना अतिमहत्वपूर्ण और विशष्सनीय सहयोगी खो दिया है। यह हमारे लिए एक अपूरणीय क्षति है। पं. प्रेमशंकर मिश्र जी की स्मृतियॉं हमारे लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत रहेंगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                                                           रघुवंश मणि&lt;br /&gt;                                                                          साहित्य सचिव&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-1045653201181632702?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/1045653201181632702/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=1045653201181632702' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/1045653201181632702'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/1045653201181632702'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2008/07/blog-post.html' title='पं. प्रेमशंकर मिश्र का अवसान'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-8336956268941006410</id><published>2008-04-06T12:30:00.000-07:00</published><updated>2008-04-06T12:33:27.135-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लेख'/><title type='text'>लेखक और प्रकाशक</title><content type='html'>लेखक और प्रकाशक&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिन्दी जगत में लेखक और प्रकाशक के बीच बनते बिगड़ते सम्बन्धों पर अक्सर अनौपचारिक चर्चाएँ होती रही हैं। बातचीत के दौरान लेखकगण पारिश्रमिक कम मिलने या न मिलने की शिकायत करते रहे हैं। इसके विपरीत प्रकाशक पुस्तकों के न बिकने का रोना रोते रहते हैं। वे यह दलील देते रहे हैं कि पुस्तकें बिकतीं ही नहीं हैं अत: पारिश्रमिक वे दें भी तो कैसे? इधर रायल्टी के मुद्दे पर गगन गिल और महाश्वेतादेवी के वक्तव्यों को लेकर लेखकों और प्रकाशकों के बीच के सम्बन्ध पुन: बहस में आ गये हैं। इस प्रकरण को किसी एक हिन्दी प्रकाशक से जोड़कर देखने के बजाय हिन्दी जगत की सामान्य समस्या के रूप में देखा ताना चाहिए।  मेरे विचार से प्रकाशकों की ओर से इस विषय पर बिना किसी पूर्वाग्रह के विचार करने की जरूरत है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साहित्य के समुचित विकास के लिए लेखकों और प्रकाशकों के बीच सकारात्मक सम्बन्ध होना जरूरी है। साहित्य जगत में प्रकाशन एक व्यवसाय है, मगर यह अन्य व्यवसायों से थोड़ा अलग होना चाहिए क्योंकि साहित्य स्वयं में आदर्शों की वकालत करता है। यदि आदर्श शब्द थोड़ा पुरातनपंथी लगे तो मूल्य की बात की जा सकती है। जीवन मूल्यों के संवाहक साहित्य के प्रकाशकों में लेखकों के अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता जरूरी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह विचित्र सी बात है कि  हिन्दी की तुलना में अंग्रेजी के प्रकाशक बेहतर पारिश्रमिक देते हैं। यह तर्क दिया जा सकता है कि अंग्रेजी पुस्तकों का व्यापार अधिक लम्बा-चौड़ा है जिसके चलते वे अच्छा पारिश्रमिक दे लेते हैं। लेकिन यह कोई बहुत मतलब का तर्क नहीं क्योंकि हिन्दी पुस्तकों की खरीद कोई कम नहीं। पुस्तकालयों और सरकारी खरीद ही काफी होती है। अंग्रेजी प्रकाशकों के यहाँ पुस्तक प्रकाशन के समय जहाँ सारी बातें लिखित तौर पर होती हैं वहाँ हिन्दी में अधिकांशत: यह सारा कार्यकलाप मौखिक और आश्वासनधर्मी होता है। एक अंग्रेजी के लेखक ने बताया कि वह पहले हिन्दी में ही लिखता था लेकिन प्रकाशकों का रवैया ऐसा था कि उसने अंग्रेजी में लिखना प्रारम्भ कर दिया क्योंकि वहाँ पैसा ही नहीं सम्मान भी अधिक है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉ मैनेजर पाण्डेय ने एक बार कहा था कि हिन्दी के प्रकाशक वस्तुत: हिन्दी के अन्धकारक हैं। कारण यह कि वे बिक्री के लिए पाठकों पर बहुत निर्भर नहीं करते। इधर वितरण की एक ऐसी व्यवस्था विकसित हुई है जिसमें पाठक आनुसंगिक महत्व का रह गया है। पाठक के महत्व के घटने के साथ-साथ लेखक का महत्व भी घट गया है। इस दृष्टि से देखें तो यह एक भारी सांस्कृतिक समस्या है जिसकी ओर ध्यान देना जरूरी है। प्रकाशक यह समझता है कि जब सब काम वही कर रहा है तो फिर लेखक को पैसे क्यों दिये जाँय।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिन्दी के एक लेखक ने जब अपने प्रकाशक से रायल्टी का हिसाब माँगा तो उसने उत्तर में लिखा कि यदि लेखक अपनी प्रकाशित पुस्तकों की सभी प्रतियाँ खरीद ले तो वह रायल्टी दे देगा। यह बेहद अपमानजनक उत्तर था जो किसी भी तरह से उचित नहीं। रायल्टी के लफड़े से तंग आकर बहुत से हिन्दी लेखक अब 'लंप सम' मांगते हैं क्योंकि पुस्तकों की बिक्री का कुछ भी पता लगा पाना लेखक के लिए संभव नहीं होता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल यह है कि जिन लेखकों को प्रकाशकगण छापते हैं, उनके अधिकारों और सम्मान का ख्याल रखना क्या उनका भी धर्म नहीं है?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-8336956268941006410?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/8336956268941006410/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=8336956268941006410' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/8336956268941006410'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/8336956268941006410'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2008/04/blog-post.html' title='लेखक और प्रकाशक'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-7237914887838065760</id><published>2008-01-14T09:10:00.000-08:00</published><updated>2008-01-14T09:13:22.018-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डायरी'/><title type='text'>एक स्त्रीवादी चुटकुला</title><content type='html'>&lt;strong&gt;एक स्त्रीवादी चुटकुला&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन उल्लू बहुत उदास था। वह रात भर चुप्पी साधे रहा। लक्ष्मी जी ने उससे पूछा, ''प्रिय उल्लू तुम इतने उदास क्यों हो? अपनी उदासी का कारण मुझे बतलाओ।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; उलूक महोदय ने जवाब दिया, '' लक्ष्मी जी मैं आपको रोज ढोता रहता हूँ। आपकी इतनी सेवा करता हँ। मगर मेरा कोई महत्व नहीं हो पाया है। दीपावली के दिन सारी दुनिया में आपकी पूजा होती है, मगर मुझे कोई नहीं पूँछता। अब ये क्या बात हुई? उल्टे लोग मुझे उल्लू कहकर चिढ़ाते हैं। मुझे बड़ा बुरा लगता है।''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लक्ष्मी जी ने अपने वाहन के दुख को समझा और किंचित विचार करते हुए बोलीं ,'' ठीक है प्रिय उलूक। तुम्हारी बात बिल्कुल सही है। मैं तुम्हें आशिर्वाद देती हूँ कि अब तुम्हारी पूजा मुझसे पहले हुआ करेगी। तुम्हारी पूजा दीपावली से पहले करवा चौथ के दिन हुआ करेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तभी से करवा चौथ मनाया जाने लगा।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-7237914887838065760?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/7237914887838065760/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=7237914887838065760' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/7237914887838065760'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/7237914887838065760'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2008/01/blog-post_14.html' title='एक स्त्रीवादी चुटकुला'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-8817776107474411356</id><published>2008-01-14T08:54:00.000-08:00</published><updated>2008-01-14T08:56:45.656-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डायरी'/><title type='text'>साहित्य/संस्कृतिकर्म और राजनीति</title><content type='html'>साहित्य और संस्कृतिकर्म की अवस्थिति को यदि सूक्ष्मतापूर्वक देखें तो वह राजनीति की अपनी अवस्थिति से अलग केन्द्रित मिलेगी। राजनीतिक लोगों की प्राथमिकताएँ भिन्न प्रकार की होती हैं। अपनी व्यावहारिक अपरिहार्यताओं के चलते  वे तमाम साहित्यिक/सांसकृतिक मूल्यों को अनदेखा कर देते हैं। हमारे समय में वोटों की राजनीति का यही अर्थ बनता है। वोटों के लिए सारे मूल्य और सिध्दान्त ताक पर रख दिये जाते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यदि बिल्कुल ऐसा न भी हो तो राजनीतिक संगठन अक्सर विभिन्न मौकों पर ऐसे समझौते करते हैं जो विसंगतिपूर्ण लगते हैं। समाजवाद से लेकर साम्यवाद तक की विचारसरणि में इस प्रकार के समझौते किये गये कि इन विचाारधाराओं से जुड़े मूल्यों का कोई बहुत मतलब नहीं रह गया। साम्यवाद किस प्रकार रूष में स्आलिनवाद में बदल गया इसकी कहानी बड़ी अजीब है। भारत में लोहियावाद कैसे जातिवाद में बदल गया और अम्बेडकरवाद किस प्रकार ब्राहम्ण दलित गठजोड़ में बदल गया इसे बताना बहुत कठिन नहीं। मैं यह नहीं कहता कि किसी विचार या विचारधारा को लेकर जड़ता या कट्टरता होनी चाहिये। मेरा सिर्फ यह कहना है कि ऐसे समझौते नहीं होने चाहिए जिससे विचारधारा में अन्तर्निहित मूल्य ही गायब हो जायँ। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बात को हम अनेक ऐतिहासिक सन्दर्भों में साफ रेखांकित कर सकते हैं। कुछ बर्षों पहले भाजपा सरकार के सन्दर्भ में यह देखा गया कि दक्षिणपंथी सांस्कृतिक संगठनों और राजनीतिक पार्टी के बीच का अन्तराल स्पष्ट था। सांस्कृतिक संगठन राजनीतिज्ञों से संतुष्ट न थे। इस बात को हम स्वाधीनता की लड़ाई के दौर में प्रेमचनद के लेखन और कांग्रेसी राजनीति के बीच के अन्तरों में देख सकते हैं। साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में कार्यरत लोग अक्सर परिवर्तनों को पहले देख लेते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं यहाँ यह तो नहीं कहना चाहता कि साहित्य को राजनीति से अलग देखा जाय। हमारे आज के दौर में यह विल्कुल संभव नहीं। मगर साहित्य की अपनी अस्मिता का प्रश्न इसीलिए महत्वपूर्ण है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-8817776107474411356?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/8817776107474411356/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=8817776107474411356' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/8817776107474411356'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/8817776107474411356'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2008/01/blog-post.html' title='साहित्य/संस्कृतिकर्म और राजनीति'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-4192665406625569761</id><published>2007-12-22T08:57:00.000-08:00</published><updated>2007-12-22T08:59:16.084-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डायरी'/><title type='text'>मंदी और मसीहा</title><content type='html'>डायरी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;              मंदी और मसीहा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;19.12.2007 को विकास परिषद को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने वैश्विक मंदी की संभावना व्यक्त की और आगाह किया कि आने वाले समय में भारत भी इससे प्रभावित हो सकता है। अमेरिका और दूसरे बड़े विकसित देशों में अर्थव्यवस्था की मंदी है जिसका प्रभाव देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है। ऐसे में कीमतें बढ़ सकती हैं। इन परिस्थितियों में  निर्यातकों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा है कि खाद्य संरक्षा पर बल दिया जाना चाहिए। अनाज, दाल, और खाद्य तेलों का भंडारण होना चाहिए। लेकिन उन्होने यह भी कहा कि इस वैश्विक मंदी के डर से निराश नहीं होना चाहिए। विकास और वृध्दि के लक्ष्यों को लेकर कम महत्वाकांक्षी होने की जरूरत नहीं है। उन्होने कहा कि इस संकट से देश को आगाह करना उनका कर्तव्य है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डॉ. मनमोहन सिंह सिर्फ देश के प्रघानमंत्री ही नहीं है बल्कि एक विद्वान अर्थशास्त्री भी हैं। उनकी छवि एक इमानदार व्यक्ति की है। अत: उनके द्वारा कही गयी ये बातें ऐसी है कि उन्हें बहुत गंभीरतापूर्वक लिया जाय। वैसे भी पश्चिमी देशों में घटती विकास दर कोई ऐसी बात नहीं जो छिपी हुई हो। इस घटती विकास दर के ही चलते विकसित देश अपनी पूँजी को कम विकसित देशों के बाजार में लगााना चाहते हैं। इसी कारण वे विश्वबैंक जैसी संस्थाओं के माध्यम से विकासशील देशों की नीतियों को बदलने का प्रयास करते रहे हैं। इस काम में उन्हें सफलता भी मिलती रही है। इस प्रयास में वे कभी एशियन टाइगर्स को आगे बढ़ने के लिए प्रोत्सहित करते रहे हैं, तो कभी भारत और चीन जैसे देशों को जिनके यहाँ पूॅजी के निवेश और विस्तार की संभावनाएँ बनी हुई हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैश्विक मंदी से तात्पर्य किसी देश के सकल घरेलू उत्पाद में कमी या वास्तविक आर्थिक प्रगति की नकारात्मकता है। यह वास्तविक आर्थिक गतिविधियों का घटना या गिरना है। इससे रोजगार निवेश और कारपोरेट क्षेत्र के लाभों में गिरावट आ सकती है। इसमें दाम बड़ी तेजी से बढ़ते या घटते हैं जिसे स्फीति या विस्फीति कहते हैं। इस प्रक्रिया को निष्पंदन कहते हैं। सामान्य शब्दों में यह एक प्रकार का आर्थिक अवरोध है जिसमें रोजगाार के अवसर कम होते हैं और सामान्य जनता के लिए जीवन दूभर हो जाता है। याद करने की बात है कि अमेरिका की प्रसिध्द मंदी के सन्दर्भ में ही जॉन मेनयार्ड केन्स का कल्याणकारी राज्य का सिध्दांत आया था जिसमें उन्होने राज्य के हस्तक्षेप की वकालत की थी। उन्होने यहाँ तक लिखा था कि यदि राज्य के पास कोई काम न हो तो उसे चाहिए कि वह दिन में गङ्ढा खोदने का कार्य करावे और रात में उसे पटवा दे। तात्पर्य यह कि हर प्रकार से राज्य को आर्थिक गतिविधियों में अपनी कल्याणकारी भूमिका निभानी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर आज हमारे देश में राज्य अपनी कल्याणकारी भूमिका लगातार कम करता जा रहा है। अब तो शिक्षा जैसे क्षेत्र से भी वह पल्ला झाड़ने जा रहा है। तो फिर मंदी आने पर क्या होगा? किसको आयेगी मसीहाई?&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-4192665406625569761?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/4192665406625569761/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=4192665406625569761' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/4192665406625569761'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/4192665406625569761'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2007/12/blog-post.html' title='मंदी और मसीहा'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-1274287537677118005</id><published>2007-10-28T06:54:00.000-07:00</published><updated>2007-10-28T06:56:14.422-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डायरी'/><title type='text'>मुग़ल-ए-आजम और साधू</title><content type='html'>डायरी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;मुग़ल-ए-आजम और साधू&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बात बहुत पुरानी नहीं है, मगर बहुत नयी भी नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुगले-ए-आजम फिल्म रंगीन होकर आ रही थी और यह फिल्म प्रेमियों के बीच काफी चर्चा का मामला था। हमारे परम मित्र स्वप्निल श्रीवास्तव हैं जो मनोरंजनकर अधिकारी हैं। वे हिन्दी के जाने-माने कवि हैं और साहित्य जगत में उन्हे इसी रूप में जाना जाता है। उनके साथ ही मैं फैजाबाद के पैराडाइज सिनेमा हाल के मैनेजर के कमरे में बैठा था। दूसरे ही दिन रंगीन मुग़ल-ए-आजम प्रदर्शित होने वाली थी। पोस्टर पहले से ही चिपका दिये गये थे जिससे लोगों को यह भ्रम हो रहा था कि शायद यह फिल्म पहले से ही उस सिनेमाघर में लगी है। लोग पूछ रहे थे कि आखिर फिल्म लग कब रही है। एक सुखद आश्चर्य था कि फिल्मों के इस पतन काल में भी दर्शक इस पुरानी फिल्म के नये रूप को देखने के लिए बेताब थे। आखिर कहा ही गया है कि ओल्ड इज गोल्ड।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतने में एक साधू महाराज वहाँ पधारे। सभी को आश्चर्य हुआ कि ये महोदय गेरुवा वस्त्रधारी, चिमटाहस्त यहाँ क्या कर रहे हैं। दाढ़ी पूरी बढी हुई थी और लग रहा था कि सीधे अयोध्या के किसी मंदिर से आ रहे हैं। वे कमरे में घुस आये और जब उन्होंने भी पूछा कि मुग़ल-ए-आजम कब लग रही है तो सभी लोग बिना हल्के से मुस्कराए न रह सके। स्वप्निल जी ने सिनेमाघर के मालिक होने के अंदाज में सप्रेम कहा, 'बाबा कल लग रही है।' &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साधू ने प्रसन्न होकर सिर हिलाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होने फिर मुस्कराते हुए पूछा, 'क्या आप देखेंगे?'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'हाँ' साधू ने जवाब दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर कुछ देर तक वैसे ही खड़े रहने के बाद उसने कहा, 'फिल्म बहुत अच्छी है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तो चारो तरफ से टिप्पणियाँ शुरू हो गयीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'इसमें क्या दो राय। अपने जमाने की सबसे मशहूर फिल्म रही है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'जब भी कहीं लगती थी हाउस फुल जाती थी।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'संवाद गजब के हैं।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'अभिनय का तो कोई जवाब नहीं।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'मैने यह फिल्म बहुत पहले देखी थी।' साधू ने कहा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'अच्छा!'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'तब मैं साधू नही ंथा। गृहस्थ था।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'हूॅ।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'यह फिल्म मैने अपनी पत्नी के साथ देखी थी।' साधू ने कहा और थोड़ा उदास हो गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बेवजह सी चुप छा गयी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह फिर बोला, कुछ इस तरह जैसे किसी ने उससे पूछा हो, 'अब वह इस दुनिया में नहीं है। मैं यह फिल्म जरूर देखूँगा।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह अकेला सा मुड़ा और चला गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसने दूसरे दिन जरूर वह फिल्म देखी होगी। उसे साधू भेष में फिल्म देखते हुए लोगों ने क्या सोचा होगा? कुछ लोग हँसे होंगे। कुछ लोगों ने सोचा होगा कि इस देश में भी क्या गजब-गजब के फिल्म प्रेमी पड़े हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन मैं सोचता हॅँ कि हम चीजों को किन-किन कारणों से पसंद करते हैं, इसे सुनिश्चित कर पाना कितना कठिन है? हमारे जीवन का इतिहास भी हमारी अभिरुचि के साथ जुड़ा होता है। घटनाएँ और भावनाएँ तक कभी-कभी हमारी पसंद और नापसंद का कारण बनती हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                                  &lt;br /&gt;                                                &lt;br /&gt;                                                           रघुवंशमणि&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-1274287537677118005?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/1274287537677118005/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=1274287537677118005' title='3 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/1274287537677118005'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/1274287537677118005'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2007/10/blog-post_28.html' title='मुग़ल-ए-आजम और साधू'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>3</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-8230450296585888275</id><published>2007-10-09T08:06:00.000-07:00</published><updated>2007-10-09T08:08:49.412-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अनुवाद'/><title type='text'>चे ग्वेरा की अन्तिम यात्रा</title><content type='html'>अनुवाद&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;चे ग्वेरा की अन्तिम यात्रा&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;[&lt;em&gt;गार्जियन के लिए रिचर्ड गॉट की रिर्पोट का हिन्दी अनुवाद&lt;/em&gt;]&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वेलेग्राण्ड, 10 अक्टूबर 1967&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछली रात पाँच बजे चे ग्वेरा का पार्थिव शरीर दक्षिणी-पश्चिमी बोलीविया के इस पहाड़ी कस्बे में लाया गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हेलिकाप्टर से स्ट्रेचर पर बंधे छोटे शरीर के लैंडिंग रेलिंग पर उतरने के साथ ही बाद की सारी कार्रवाही का दायित्व एक सैनिक वर्दी वाले व्यक्ति को सौंप दिया गया जिसके बारे में सभी पत्रकारों का मत है कि वह नि:सन्देह अमेरिका की किसी गुप्तचर एजेन्सी का प्रतिनिधि है। वह सम्भवत: कोई क्यूबन निर्वासित है और इस प्रकार जीवन भर अकेले ही संयुक्त राज्य अमेरिका के विरुध्द युध्द छेड़ने वाले चे ग्वेरा ने मृत्यु के पश्चात स्वयम् को अपने प्रमुख शत्रु के सामने पाया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हेलिकाप्टर को जानबूझ कर उस जगह से दूर उतारा गया जहाँ भीड़ एकत्रित थी और मृत गोरिल्ला युध्द के नायक के शरीर को जल्दी से एक वैन में पहुँचाया गया। हमने एक जीप से उसका पीछा करने को कहा और ड्राइवर उस हास्पिटल के गेट से निकलने में सफल रहा जहाँ उनके शरीर को  एक छोटे से रंगीन वाश हट में ले जाया गया जो शवगृह के रूप में इस्तेमाल होता था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैन के दरवाजे खुले और अमेरिकी एजेन्ट चीखते हुए बाहर कूदा और चिल्लाया 'इसे जल्दी से बाहर करो।' एक पत्रकार ने उससे पूछा कि वह कहाँ से आया है। उसने गुस्से में जवाब दिया, 'कहीं से नहीं।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओलिव हरे रंग की फैटिग और जिपर्ड जैकेट पहने पार्थिव शरीर को उस झोपड़ी में ले जाया गया। यह सुनिश्चित तौर पर चे ग्वेरा का ही पार्थिव शरीर था। जब पहली बार मैने जनवरी में उनके बोलिविया में होने की बात अपनी रिर्पोट में लिखी थी, तभी से मैं लोगों की इस बात पर यकीन नहीं करता था कि वे कहीं और हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं सम्भवत: उन कतिपय लोगों में से हूँ जिन्होने उन्हें जीवित देखा था। मैने उन्हे क्यूबा में 1963 में एम्बेसी के एक रिसेप्शन पर देखा था और मुझे कोई सन्देह नहीं कि यह चे ग्वेरा का ही पार्थिव शरीर है। काली घुंघराली दाढ़ी, उलझे बाल और दायीं कनपटी पर एक घाव है जो शायद जुलाई की एक दुर्घटना का परिणाम है जब उन्हें एक राइफल की गोली छूकर निकल गयी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनके पैरों मे मोकासिन्स थीं मानों जंगल में तेजी से दौड़ते समय उन्हे गोली मारी गयी हो। उनके गर्दन के निचले हिस्से में दो गोलियों के लगने के निशान थे और शायद एक गोली उनके पेट में भी मारी गयी थी। ऐसा विश्वास है कि उन्हे तब पकड़ा गया जब वे गंभीर रूप से घायल थे, लेकिन उन्हे युध्द क्षेत्र से बाहर निकालने वाले हेलिकाप्टर के आने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गयी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुझे केवल एक बात को लेकर उनकी पहचान पर संदेह था। मेरी स्मृति की तुलना में चे पहले से काफी दुबले हो गये थे, लेकिन इसमें कोई आश्चर्य नहीं क्योंकि महीनों जंगल में रहने के कारण उनके पहले के भारी शरीर में यह बदलाव आया होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जैसे ही पार्थिव शरीर शवगृह में पहुँचा डाक्टरों ने उसमें प्रिजर्वेटिवस डालने और अमेरिकन एजेन्ट ने लोगों को दूर रखने के निष्फल प्रयास करने प्रारम्भ किये। वह बहुत परेशान था और जब भी उसकी ओर कैमरा होता था, वह क्रुध्द हो जाता था। उसे पता था कि मैं जानता हॅॅूं कि वह कौन है। उसे यह भी पता था कि मैं जानता हॅॅूं कि उसे यहाँ नहीं होना चाहिए क्योंकि यह एक ऐसा युध्द था जिसमें अमेरिकी लोगों के होने की आशा नहीं की जाती था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर भी यह शख्स उपस्थित था जो वेलेग्राण्ड में सेना के साथ था और अफसरों से परिचितों की तरह बातें कर रहा था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शायद ही कोई यह कहे कि चे को ये बातें मालूम न थीं क्योंकि उनका उद्देश्य ही अमेरिका को लाटिन अमेरिका में हस्तक्षेप के लिए उत्तेजित करना था ताकि युध्द पीड़ित वियतनाम को मदद मिल सके। लेकिन वे निश्चित रूप से महाद्वीप में अमेरिकी गुप्तचर एजेसियों की ताकत और पहुँच का ठीक-ठीक अंदाजा लगाने में चूक गये और यही उनके और वोलीवियायी गुरिल्लाओं की असफलता का प्रमुख कारण बना।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब उनकी मृत्यु हो चुकी है। जब उनके शरीर में प्रिजवेटिव्स भरे जा रहे हैं और भीड़ अन्दर आने के लिए चीख रही है, यह सोचना कठिन है कि यह व्यक्ति एक समय लाटिन अमेरिका के महान लोगों में से एक था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह मात्र एक महान गुरिल्ला नायक नहीं थे, वे क्रान्तिकारियों और राष्ट्रपति के मित्र भी थे। उनकी आवाज को अन्तर-अमेरिकी कौंसिल्स के अतिरिक्त जंगलों में भी सुना-समझा जाता था। वे एक डाक्टर, गैरपेशेवर अर्थशास्त्री, क्रान्तिकारी क्यूबा में उद्योग मंत्री और फिडल कास्त्रो के दाये हाथ थे। सम्भवत: उन्हे इतिहास में बोलिवर के बाद का सबसे महत्वपूर्ण महाद्वीपीय व्यक्तित्व माना जाय। उनके नाम के चारो ओर गाथाएँ रची जानी हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वे चीनियों और रूसियों के बीच चल रहे सैध्दान्तिक झगड़ों से परेशान र्माक्सवादी थे। वे सम्भवत: अन्तिम व्यक्ति थे जिन्होने दोनों के बीच का रास्ता खोजने की कोशिश की और सभी जगहों पर संयुक्त राज्य के विरुध्द क्रान्तिकारी ताकतों को एकत्र करने की मुहिम चलायी। वे अब मृत हैं लेकिन यह सोचना कठिन है कि उनके विचार भी उनके साथ मर जायेंगे।  &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                                                अनुवाद: रघुवंशमणि&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-8230450296585888275?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/8230450296585888275/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=8230450296585888275' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/8230450296585888275'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/8230450296585888275'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2007/10/blog-post_09.html' title='चे ग्वेरा की अन्तिम यात्रा'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-1936828923555416396</id><published>2007-10-06T16:03:00.000-07:00</published><updated>2007-10-06T16:06:21.387-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='डायरी'/><title type='text'>बौध्दिक घृणा के दौर में गाँधी जी</title><content type='html'>डायरी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;             बौध्दिक घृणा के दौर में गाँधी जी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंग्रेजी के प्रसिध्द कवि डब्लू. बी. यीट्स ने लिखा है कि बौध्दिक घृणा सबसे बुरी चीज होती है। इसमें कोई दो राय नहीं कि इस बात की प्रासंगिकता हमारे आतंकवादग्रस्त समय में यीट्स के समय से थोड़ा ज्यादा ही है। हालांकि हम यह नहीं भूल सकते कि यीट्स का समय द्वितीय विश्वयुध्द और नाजीवाद से ग्रस्त समय था। शायद हम अपने समय को ज्यादा महत्वपूर्ण मानते हैं क्योंकि हम स्वयं उसमें अस्तित्वमान होते हैं। एक विचारक के रूप में मैं भी इस नियम का अपवाद नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह बात इधर गाँधी जी के विचारों के सिलसिले में ज्यादा समझ में आयी। श्रीमती सोनिया गाँधी ने संयुक्त राष्ट्र के तत्वावधान में विश्व अहिंसा दिवस के सिलसिले में बोलते हुए कहा कि महात्मा गाँधी ने हमें एक दूसरे के विचारों का सम्मान करना सिखलाया। पता नहीं क्यों अब लगता है कि समय बीतने के साथ-साथ गाँधी के विचाार नये तरह से प्रासंगिकता प्राप्त करने लगे हैं। हम चाहे जितना कहें कि चारो तरफ हिंसा ही हिंसा है, भ्रष्टाचार का बोलबाला है, प्रजातांत्रिक मूल्यों का रास्ता हर हाल में गाँधी जी के विचारों से होता हुआ ही गुजरता है। पश्चिम द्वारा अब उन्हें महज एक राष्ट्रवादी नेता के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र द्वारा उनको दिया गया सम्मान यही दर्शाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाँधी जी के लिए बौध्दिक सहिष्णुता का महत्व बहुत अधिक था। आज हमने इस मूल्य को पूरी तरह से खो दिया है। धर्म और जाति के झगड़े हमें किस दिया में ले जा रहे हैं? इस बारे में कट्टरतावादियों की क्या सोच है? इस विषय पर खुले मन से विचार नहीं ही हो पा रहा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन सबसे बड़ी बात तो साधन की पवित्रता की है जिसकी ओर गाँधी जी ने संकेत किया था। संकेत ही नहीं व्यवहार भी। इस बात के महत्व को अभी हम नहीं समझ सके हैं। सम्भवत: अभी और नुकसान उठाने के बाद ही हम इस बात के महत्व को ठीक से समझ सकेंगे।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-1936828923555416396?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/1936828923555416396/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=1936828923555416396' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/1936828923555416396'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/1936828923555416396'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2007/10/blog-post.html' title='बौध्दिक घृणा के दौर में गाँधी जी'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-8683429347637568633</id><published>2007-09-30T11:07:00.000-07:00</published><updated>2007-09-30T11:09:58.737-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समीक्षा'/><title type='text'>प्रजातंत्र के पराभव की कहानी</title><content type='html'>समीक्षा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;   &lt;strong&gt;प्रजातंत्र के पराभव की कहानी&lt;/strong&gt;                                                     &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-&lt;br /&gt;रघुवंशमणि&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिंदी साहित्य में व्यंग लेखन की स्थिति पहले से ही बहुत अच्छी नहीं रही है। इसलिए यह क्षेत्र चुनौतियों से भरा रहा है और अक्सर व्यंग के नाम पर बेहद सतही चीजें ही सामने आती रही हैं। हिन्दी व्यंग लेखन को समृध्द करने वाले हरिशंकर परसाई और शरद जोशी के दिवंगत होने के बाद इस क्षेत्र में श्रीलाल शुक्ल निश्चित रूप से सर्वाधिक महत्वपूर्ण व्यंगकारों में से एक हैं। श्रीलाल शुक्ल के नाम राग दरबारी जैसा उपन्यास है जिसकी स्थिति व्यंग की उनकी अपनी भंगिमा के कारण हिन्दी उपन्यासों में बिल्कुल अलग रही है। राजकमल प्रकाशन ने हाल में उनके लेखों का एक संग्रह जहालत के पचास साल प्रकाशित किया है जिसमें शुक्ल जी के छोटे बड़े व्यंगों को इकठ्ठा छापा गया है। उनके द्वारा पिछले पचास सालों में लिखे गये इन लेखो को पढने का एक अलग ही आनन्द है। साथ ही हिन्दी के एक महत्वपूर्ण व्यंगकार के रचनात्मक विकास के विभिन्न पक्षों को देखने समझने का अवकाश भी यह संग्रह देता है। यह जरूर है कि श्रीलाल शुक्ल के पुराने पाठकों को इसमें प्रकाशित बहुत सी रचनाएँ पूर्व परिचित ही लगेंगी। अंगद के पाँव, यहाँ से वहाँ, उमराव नगर में कुछ दिन, कुछ जमीन की कुछ हवा में, आओ बैठें कुछ देर जैसी चर्चित और पठित रचनाओं के पाछकों के लिए जहालत के पचास साल व्यंगकार श्रीलाल शुक्ल का कलेक्टेड वर्क जैसा होगाा। इस अर्थ में इसका प्रकाशन वास्तव में एक घटना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहालत के पचास साल के व्यंग काफी व्यापक जमीन रखते हैं। वे वाकई पिछले पचास सालों के बारे में काफी कुछ कह जाते हैं। बातें टुकड़ों में अवश्य आती हैं क्योंकि व्यंगों की साइज आम तौर पर छोटी हैं लेकिन दुकड़ों 2 में ही देश के पिछले पचास साले का अच्छा खासा लेख जोखा है। भ्रष्टाचार और कुशिक्षा अधिकतर व्यंगों के मूल में है। नौकरशाही से पूरी तरह परिचित और उसी में जीवन गुजारने वाले शुक्ल जी का यह प्रिय विषय है। जाहिर है कि इस संग्रह में ऐसे व्यंग बहुतायत में हैं जिनका नौकरशाही से किसी न किसी प्रकार लेना देना है। राजनीति तो ऐसी चीज हो गयी है कि उसपर कलम चलाए बिना किसी भी व्यंगकार को मुक्ति नहीं। श्रीलाल शुक्ल किसी राजनीतिक प्रतिबध्दता से जुड़े रचनाकार नहीं हैं मगर सामाजिक यथार्थ से वे बचने का प्रयास कतई नहीं करते। वे वस्तुस्थितियों में भ्रष्टाचार जैसी विसंगतियों की खोज करने वाले लेखक हैं, अपनी सारी विनोदप्रियता और मस्ती के बाद भी वे हिन्दी समाज के इस बुरे पक्ष को प्रस्तुत करने से बच नहीं पाते। ये विसंगतियॉ अंतत: सामान्य आदमी को ही अपना शिकार बनाती हैं। जहालत के पचास साल भारतीय प्रजातंत्र के पिछले पचास सालों की पतनगाथा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ऐसा लगता है कि श्रीलाल शुक्ल इस बात का ध्यान रखते हैं कि रचना में वैचारिकता का बोझ न आने पाये, मगर अपनी सामाजिक चेतना के चलते वे विचारात्मकता को अपनी रचनाओं मेें स्थान देते हैं। वे स्वयं ऐसा मानते रहे हैं कि उनकी प्रारंभिक रचनाओं में सामग्री ऐसी थी जिससे किसी का बहुत नफा नुकसान नहीं होना था। मगर बाद की रचनाओं में व्यंग पर सान प्रखर वैचारिकता ही चढ़ा सकी है। जहालत के पचास साल की रचनाएँ इस ओर संकेत करती हैं कि श्रीलाल शुक्ल के व्यंग लेखन का रास्ता एक यात्रा की तरह है जिसमें विभिन्न पड़ाव हैं। इन पड़ावों को कोई भी सूक्ष्मपाठ रेखांकित कर सकता है। शुरू के व्यंगों का हार्स लाफ्टर बाद में गंभीर होता गया है और उमरावनगर में कुछ दिन तक पहुँचते पहुँचते रचना में एक गहरा अनुशासन झलकने लगता है। इस प्रकार दृष्ठि और शैली दोनों के फर्क लेखक के विकास की दिशा को संकेतित करते हैं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रीलाल शुक्ल के काफी व्यंग ऐसे हैं जिनमें विषयवस्तु साहित्य है और साहित्य में भी खासकर कविता। यह कविता का एक व्यंग लेखक द्वारा किया गया पाठ है। यदि यह कविता का उत्तरपाठ है तो इसे हास्योत्तरपाठ कहना बेहतर होगा। आधुनिक कविता का भक्तिकाल, धुड़सरी का काव्यपाठ, साहित्योद्यानसुमनगुच्छा आदि कविता की संस्कृति की बखिया उधेड़ते हैं। निराला के बहाने साहित्य चर्चा में उनका निशाना साहित्य की सत्तावादी संस्कृति है जिसका शिकार स्वयं निराला का साहित्य हो गया है। साहित्यिक सन्दर्भ श्रीलाल जी के यहाँ भरे पड़े हैं और वे उन्हे जमकर व्यंग और हास्य के स्त्रोत के रूप में करते हैं। 'स्वर्णग्रंाम और वर्षा','बया और बन्दर की कहानी','कालिदास का संक्षिप्त इतिहास' जैसे व्यंग यह बतातें हैं कि साहित्य को व्यंग के प्रहारो ंसे नहीं बचाया जा सकता क्योंकि विसंगतियाँ बहॉ कुछ कम नहीं। लेकिन यह सब उनके साहित्य के गंभीर पाठक होने के अगंभीर लगने वाले प्रमाण हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;व्यंग एक ऐसी चीज है जो विधाओं की सीमा को अतिक्रांत करती है यद्यपि यह एक सच है कि व्यंग अपने में गद्य की एक विधा भी है, यह उपन्यास, कहानी, कविता, नाटक आदि विधाओं में स्वतंत्रतापूर्वक विचरण करती रहती है। श्रीलाल शुक्ल का लेखन भी इसका अपवाद नहीं। लेकिन उनके किसी भी सुधी पाठक के लिए वे मुख्यत: गल्प विधा के ही दायरे में व्यंग लिखने वाले लेखक हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण तो राग दरबारी ही होगा मगर जहालत के पचास साल में भी प्रमुखता इसी प्रकार के व्यंगों की है। उनके कुछ व्यंग जरूर शोध पत्र से लेकर आलोचना और समीक्षा तक की शैली में लिखे गये हैं। तथापि इस पुस्तक में संकलित तमाम व्यंग कहानी पढने जैसा आनन्द देते हैं। 'द ग्रैंड मोटर डाइविंग स्कूल', 'अंगद के पाँव','कुत्ते और कुत्ते',और 'धोखा' जैसे व्यंगों का पाठानन्द कहानी जैसा ही है। उमरावनगर में कुछ दिन तो लगभग उपन्यासिका जैसी चीज है। 'अंगद के पाँव' जैसी रचना में लोगों की प्रतिक्षण की मानसिकता को श्रीलाल शुक्ल किसी मनोवैज्ञानिक लेखक की तरह उकेरते जाते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रीलाल शुक्ल के व्यंगों में अक्सर हास्य के तत्व अधिक प्रबल हो जाते हैं। हास्य और व्यंग का मिश्रण तो सामान्य बात है और अक्सर इनमे फर्क कर पाना भी बहुत सरल नहीं होता। दोनों के लक्ष्य भी लगभग एक जैसे होते हैं। हास्य का पुट रचना को ज्यादा स्वीकृति योग्य बनाता है और लेखक के विरोधियों तक के लिए वह पठनीय हो जाती है। ऐसे में मनोरंजन के चलते जनसामान्य तक के लिए शुक्ल जी के निबन्ध अधिक ग्राह्य होजाते हैं। मगर इससे कहीं कहीं लेखन में गंभीरता की क्षति भी होती है। यही कारण है कि परसाई जैसे लेखक की ऊॅंचाई बनी रहती है। श्रीलाल शुक्ल में हर जगह ऐसा भी नहीं, वे गंभीर भी हैं जैसे अपने 'पंडित, ठाकुर, लाला, बाबू, मुशी आदि' जैसे व्यंग में, मगर इधर के हिन्दी व्यंगकारों को पढ़ते समय एक कमी सी महसूस होती है जिसका नाम हरिशंकर परसाई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन ऐसा नहीं है कि व्यंग की धार  नहीं बनी है। वह लगातार बनी रहती है और समाज की विसंगतियों पर लगाातार प्रहार करती रहती है। पिछले पचास वर्षें के भारतीय समाज की विसंगतियों की पूरी खोज खबर लेने वाले व्यंग, मूल्यों के लिए ही एक सीधा संघर्ष हैं। 'दि ग्रैंड मोटर ड्राइविंग स्कूल' जैसी रचना का निरंतर हास्य, अंत में निहायत ही राजनीतिक हो जाता है जिसमें उस्ताद ट्रेनर कार के बोनट पर झुककर एक झटकू व्याख्यान दे डालते है कि हर जगह गलत आदमी है तो फिर उनके गलत होने पर आपत्ति क्यों? वाकई यथार्थ भी तो यही है। यह व्यंग यथार्थ का अन्वेषण कहाँ तक, किस तरह और कितने प्रभावी ढंग से कर पाता है, यही महत्वपूर्ण है। कहीं कहीं व्यंग की धार जोनाथन स्विफ्ट जैसे व्यंगकारों की याद दिला देती है। अगली शताब्दि का शहर का आफिसर अध्यक्ष रिहाइशी कालोनी में सुअरों की अनिवार्यता पर टिप्पणी करते हुए कहता है कि रिटायरमेंट के बाद वे कालोनी में रहेंगे तो सुअरों की कमी पूरी हो जायेगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हास्य व्यंग की एक शैली के रूप में श्रीलाल शुक्ल कैरीकेचरिंग का इस्तेमाल करते हैं। वे पात्रों को विरुपित करते हैं और उनके अवगुणों को प्रस्तुत करने के लिए उन्हें इसी तरह सामने करते हैं। वे चीजों को कुछ इसतरह बढ़ा चढ़ा कर प्रस्तुत करते हैं कि पाठकों के समक्ष विद्रूप स्पष्ट हो जाते हैं। यह एक तरह से वास्तविकता का यथातथ्य चित्रण नहीं है अपितु उसे अपनी अवस्थिति से प्रस्तुत करना है। श्रीलाल शुक्ल के लेखन की एक विशेषता या गड़बडी यह होगी कि वे वस्तुस्थ्िति को इस परिहासप्रियता के साथ प्रस्तुत करते हैं कि साहित्य की आलोचनात्मक रूढ़ियों से परे वे समाज के पात्रों के साथ खडे होकर वर्चस्वी व्यवस्था की आलोचना करनें का प्रयास करते लगते हैं। इस कार्य में अक्सर उनकी परिहासप्रियता उन्हें इनसाइडर जैसा बनाये रखती है। परिणामत: पाठकों में व्यवस्था के प्रति विरक्ति के स्थान पर आनन्दभाव आ जाता है। मगर यदि पाठक विचारशील है तो वह हँसने के बाद सोचेगाा कि वह किस बात पर हंस रहा है। संभव है कि वह ऐसा न भी करे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहालत के पचास साल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें संकलित व्यंगों को यदि एक तरफ से पढ़ा जाय तो हमें गुजरे पचास सालों की कुछ छायाएँ दिखाई देंगी। ये छायाएँ बीते हुए समय से इन व्यंगों में उतरती हैं। व्यंग लेखन वैसे भी ऐकांतिक नहीं होते मगर श्रीलाल के इन व्यंगों में इतिहास के निशान सीधे मिल जाते हैं। चन्द ख़तूत-जो हसीनों के नही हैं में सलमान रुश्दी के सैटनिक वर्सेज का हवाला आता है तो होरी और उन्नीस सौ चौरासी में जार्ज ऑरवेल के उपन्यास का जिक्र है जिसकी चर्चा 1984 में बड़े पैमाने पर हुई थी। लकीर का साँप में फैजाबाद के सहमत प्रदशर्नी का हवाला है जिसमें धर्मिक कट्टरतावादियों नें प्रदर्शनी पर हल्ला बोल दिया था। राजीव गााँधी, हर्षद मेहता, मंदिर आन्दोलन की सब्जी पूड़ी आदि का जिक्र श्री लाल शुक्ल के व्यंगों को समय की पृष्ठभूमि प्रदान करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रीलाल शुक्ल की भाषा को लेकर काफी चर्चा होती रही है, विशेषकर उनके उपन्यास राग दरबारी की भाषा को लेकर। उनके वाक्य अक्सर सीधी गति में न चलकर सर्पीले रास्ते अख्तियार करते हैं। मगर कहीं सादगी भी पाठकों को लुभा जाती है। कहीं कहीं तो पूरी नाटकीयता वाक्य संरचना में ही दिखती है जिसकी तिर्यकता पाठकों को प्रभावित करती है। भाषा का प्रवाह कई जगह गल्पकारों जैसा सफल है और यह व्यंग की पठनीयता का प्रमुख कारण है। अलग अलग व्यंगों में भाषा का वैभिन्य होते हुए भी यहाँ अभिव्यक्ति का चुटीलापन प्रभावोत्पादक है। यह हिन्दी के उस पुष्ट गद्य का उदाहरण है जिसमें प्रयोगधर्मिता की कोई कमी नहीं। यह निहायत ही आश्चर्यजनक है कि इस पुस्तक में वर्तनी की बहुत सी अशुध्दियाँ रह गयी हैं। आखिर एक व्यंगकार की कुति में इतनी विडंबना के लिए स्थान बचना ही चाहिए वगर्ना बाकी लिखे पढ़े से फर्क ही कैसा?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज के दौर में व्यंग लेखन एक बहुत बड़ी चुनौती है क्योंकि परिस्थितियाँ कुछ ऐसी हो गयीं हैं कि व्यंग का प्रभाव कम होता जा रहा है। समाज में वास्तविक परिस्थितियाँ ही इतनी विडंबनापूर्ण हो गयी हैं कि व्यंग की धार को बनाये रखना बहुत कठिन होता जा रहा है। बार बार यह बात दिमाग में आती है कि अब नये शस्त्रों की जरूरत है। मगर यदि सामाजिक परिथितियाँ ही ऐसी हैं तो उसके लिए व्यंगकार को कितना जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। श्रीलाल शुक्ल के पिछले पचास सालों के दौरान लिखे गये ये व्यंग इसी ओर संकेत करते हैं कि समाज में जो सुधार होने चाहिए थे, वे नहीं हो पाये हैं। यह हमारे प्रजातंत्र का पराभव है, हमारे लेखक का नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-------------------------------------------------------&lt;br /&gt;समीक्षित कृति:  जहालत के पचास साल&lt;br /&gt;रचनाकार:     श्रीलाल शुक्ल&lt;br /&gt;प्रकाशक:      राजकमल प्रकाशन&lt;br /&gt;मूल्य:         395 रूपये मात्र&lt;br /&gt;------------------------------------------------------&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-8683429347637568633?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/8683429347637568633/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=8683429347637568633' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/8683429347637568633'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/8683429347637568633'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2007/09/blog-post_30.html' title='प्रजातंत्र के पराभव की कहानी'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-8675358882085974318</id><published>2007-09-28T13:59:00.000-07:00</published><updated>2007-09-28T14:02:16.266-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='व्याख्यान'/><title type='text'>बिछलन भरी जमीन पर आलोचना का संतुलन</title><content type='html'>&lt;strong&gt;बिछलन भरी जमीन पर आलोचना का संतुलन&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                                         रघुवंशमणि&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कुछ दिनों पहले हिन्दी साहित्य में ज्ञानोदय पत्रिका में प्रकाशित विजय कुमार के लेख पर लम्बा विवाद छिड़ा। इस विवाद में हिन्दी आलोचना के कई काले पक्ष नज़र आये। विवादों में न केवल अतिरेकपूर्ण बातें सामने आयीं बल्कि आपसी आरोप-प्रत्यारोप बढ़कर गाली-गलौज के स्तर तक पहुँचे। स्वस्थ वाद-विवाद किसी भी साहित्य के लिए महत्वपूर्ण होता है पर अतिरेकपूर्ण वक्तव्यों और अपशब्दों तक पहुँचने वाले आरोपों-प्रत्यारोपों से साहित्य का कुछ  भला नहीं होने वाला। बस होता इतना ही है कि कुछ लोग इस प्रकार चर्चा में आ जाने में सफल हो जाते हैं। ऐसे में यदि कोई आलोचक चुपचाप और गंभीरतापूर्वक अपने कार्य में सन्नध्द है और अपने दायित्वों का जिम्मेदारी के साथ पालन कर  रहा है तो यह सराहनीय है। आलोक गुप्त हिन्दी के ऐसे ही आलोचक हैं जो हिन्दी क्षेत्र से थोड़ा अलग बैठे आलोचना के कार्यभार का गंभीरतापूर्वक निर्वहन कर रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आलोक गुप्त की इधर प्राकशित आलोचना पुस्तकों में मुक्तिबोध: युगचेतना की अभिव्यक्ति रेखांकित करने योग्य कृति है। इस आलोचना कृति में उन्होने मुक्तिबोध जैसे लेखक के विभिन्न पक्षों पर विचार किया है जिनकी रचनाएँ विवाद का विषय रही हैं। अक्सर मुक्तिबोध की रचनाओं को लेकर विभिन्न प्रकार के आलोचना विमर्श बनते रहे हैं। डॉ राम विलास शर्मा और डॉ नामवर सिंह में मुक्तिबोध को लेकर मतान्तर रहे है। अपनी प्रतिबध्दताओं के साथ आलोक गुप्त मुक्तिबोध की कविताओं पर निष्पक्षतापूर्वक विचार करते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह कृति मुक्तिबोध के समस्त कृतित्व पर एक व्यवस्थित कार्य है जिसमें उनकी सर्जनात्मक कृतियों से लेकर उनकी आलोचनात्मक कृतियों तक को अध्ययन के दायरे में लाया गया है। आलोक गुप्त मुक्तिबोध के साहित्य को समझने के लिए उसकी सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक पृष्ठभूमि में जाते हैं। फिर वे मुक्तिबोध के साहित्य चिन्तन, उनकी कविता, उनके कथा साहित्य पर विचाार करते हुए उनके युगबोध तक पहुँचते हैं। यहाँ एक शोधकर्ता की सन्नध्दता और आलोचक का तीक्ष्ण विवेक दोनों एक साथ सक्रिय दिखाई देते हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ मुक्तिबोध के बारे में फैले कई आग्रहों का परिहार भी होता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आलोक गुप्त मुक्तिबोध की रचनाओं को वर्गीय चेतना के आधार पर देखते हैं। उनके अनुसार मुक्तिबोध मध्यवर्ग के लेखक हैं। मध्यवर्ग में भी निम्नमध्यवर्ग के। अपने वर्ग से गहराई से जुड़े होने के कारण ही वे उसकी सीमाओं और संभावनाओं को सही तरीके से जान सके हैं। उनके सामने मघ्यवर्ग का एक बड़ा समुदाय था जो अपनी जिजीविषा और मानवीयता के होते भी सुविधापरस्त होता जा रहा था। उसकी सुविधापरस्ती पर चिढ़ने या नाराज होने के बजाय मुक्तिबोध उसके कारणों की खोज करते हैं। इसी कारण वे इस जीवन के विभिन्न कोणों को पकड़ पाते हैं। सत्ता के भयानक चित्र भी इसी कारण उनकी कविताओं में आते हैं। क्लाडइथरली जैसी कहानियों में भी चेतनशील मनुष्य को पंगु बनाने वाली व्यवस्था है जो क्लाड ईथरली को एक बार हीरो का खिताब देती है और फिर पागलखाने में कैद कर देती है। परन्तु इस बोध के साथ साथ मुक्तिबोध में मनुष्य शक्ति के प्रति अनन्य आस्था भी है जो उन्हे सकारात्मक के चयन की ओर ले जाता है और उनके साहित्य में मनुष्य निरन्तर भीरुता को छोड़ता हुआ आगे बढ़कर अपना ऐतिहासिक दायित्व भी निभाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुक्तिबोध के प्रति अपनायी गयी यह संतुलित दृष्टि उनके अन्य आलोचनात्मक विमर्शों में भी दिखलायी पड़ती है। आलोक गुप्त छायावाद पर टिप्पणी करते हुए उसके अन्तर्विरोध के बारे में बताते हुए लिखते हैं कि यह नयी शिक्षा और राजनीतिक आदर्शवाद तथा प्रतिष्ठित सामन्तीय मूल्यों का अन्तर्विरोध था जिसकी अभिव्यक्ति छायावादी विद्रोह और निराशा में होती है। प्रगतिवाद को वे कहीं से भी विदेशी न मानते हुए उसे हिन्दी काव्य परम्परा की देन मानते हैं। उत्तरछायावाद की मस्ती और फक्कड़पन के तत्व बच्चन के हालावाद में हैं तो दिनकर की राष्ट्रीय चेतना की कविताओं में भी। वे आधुनिक कविता की सबसे बड़ी विशेषता उसके लौकिक होने में देखते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक आलोचक के रूप में आलोक गुप्त साहित्यिक आन्दोलनों को प्रतिक्रियाओं भर का परिणाम मानने से इंकार करते हैं। वे लिखते हैं:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'हिन्दी आलोचना में सामान्यत: नये आन्दोलनों को पुराने का प्रतिक्रियास्वरूप मान लिया जाता रहा है। जैसे छायावाद की अतिभावुकता और कल्पनाप्रवणता के प्रतिक्रियास्वरूप प्रगतिवाद और प्रगतिवाद की शुष्कता और नारेबाजी के प्रतिक्रियास्वरूप प्रयोगवाद या नयी कविता। अब आलोचक इस सरलीकरण से बचने लगे हैं और मानने लगे हैं कि  प्रतिक्रिया के अतिरिक्त आन्दोलन का एक ऐतिहासिक महत्व होता है। जिस प्रयोगवाद को प्रगतिवाद का प्रतिक्रियास्वरूप माना जाता है उसमें प्रगतिवाद के स्वरों की प्रबलता है।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी परिप्रेक्ष्य में वे नयी कविता में सिर्फ नये मूल्य, नये भावबोध, नया शिल्प ही नहीं देखते। उनके अनुसार इसमें यदि वैयक्तिक अनुभूति को स्थान मिला तो यथार्थवादी दृष्टिकोण को भी । वे मानते हैं कि नयी कविता का स्वर एक नहीं विविध है। साठोत्तरी कविता पर टिप्पणी करते हुए वे लिखते हैं कि साठोत्तरी कविता में व्यंग और विडम्बना का स्वर काफी प्रभावकारी है, विशेषकर धूमिल, रघुवीर सहाय और श्रीकांत वर्मा के यहाँ। लेकिन इन कविताओं की अर्थवत्ता फिर इसमें है कि विद्रोह, खीज और बौखलाहट के पीछे शोषित मनुष्य के प्रति गहरी आत्मीयता है। सातवें दशक की कविता के खीज, विद्रोह के विकास के ही रूप में वे आठवें दशक को देखते हैं जहाँ आक्रामकता और विद्रोह का स्वर मंद पड़ जाता है और पूर्ववर्ती आत्मीयता में से ही सकारात्मक दृष्टि विकसित होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नवें दशक की कविता पर टिप्पणी करते हुए आलोक गुप्त कुछ रोचक बातें कहते हैं। मसलन विचारधारा सीधे कविता की सहायता नहीं करती जब तक कि उसे कवि द्वारा आत्मसंघर्ष के द्वारा अर्जित न किया जाय। कहने के लिए यदि कुछ न हो तो शिल्प साधना बेकार होती हॅै। इस दौर की कविताएँ उनके अनुसार माक्र्सवाद और आधुनिकतावाद के प्रचलित और पारम्परिक द्वैतसाँचे को अस्वीकार करती हैं। महत्वपूर्ण यह नहीं है कि कवि अपनी काव्यवस्तु क्या चुनता है, महत्वपूर्ण यह ळै कि कवि कहाँ खड़ा है, किस जगह से बातें कर रहा है। सहज काव्य भाषा समकालीन कविता का विशेष गुण बन गया है, लेकिन यह सरलता और सहजता, सूक्ष्मता और जटिलता का विलोम नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आलोक गुप्त ने केदारनाथ सिंह, सुल्तान अहमद, फूलचन्द गुप्ता जैसे कवियों पर अपनी समीक्षात्मक टिप्पणियाँ प्रस्तुत की हैं। गुजरात से जुड़े होने के कारण उन्होंने गुजरात की समकालीन कविता पर भी लिखा है। कविता का अनुवाद, प्रेमचंद की कहानियाँ, राग दरबारी की प्रति ऑंचलिकता, रामकथा और स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी उपन्यास, मिथक का कलात्मक विनियोग, परती परिकथा, स्वातंत्र्योत्तर ग्राम जीवन और हिन्दी गुजराती उपन्यास, गुजरात का स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी लेखन आदि उनके अन्य महत्वपूर्ण लेख हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस प्रकार देखें तो आलोक गुप्त की आलोचना में अनेक महत्वपूर्ण प्रस्थान छिपे हुए हैं। आलोक फतवेबाजी के अतिरेकों से बचते हैं और निष्कर्षात्मक जल्दबाजी से बचते हुए अपनी विश्लेषण क्षमता का प्रयोग करते हैं। जहाँ वे हिन्दी के पूर्ववर्ती आलोचकों से स्वयं को सहमत पाते हैं, उसे बताने में वे कतई संकोच नहीं करते। वे दूसरे की बातों पर अपनी मोहर लगाकर बेचने में विश्वास नहीं करते। इसी कारण उनकी बातें अक्सर पूरी आलोचना परम्परा से छन कर आती हैं और उसे समृध्द बनाने में अपने आलोचकीय श्रम को सार्थक समझती हैं। उन्हे प्रदान किया जा रहा डॉ. रामविलास शर्मा आलोचना सम्मान एक संतुलित आलोचना दृष्टि के आलोचक का सम्मान है जिनसे हिन्दी आलोचना को गंभीर और विचारोत्तेजक लेखन की उम्मीद है। डॉ. रामविलास शर्मा सम्मान प्राप्त करने के अवसर पर मैं उन्हें बधाई देता हूँ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                                                                  रघुवंशमणि&lt;br /&gt;                                                                    बाँदा&lt;br /&gt;                                                                                23-09-2007&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-8675358882085974318?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/8675358882085974318/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=8675358882085974318' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/8675358882085974318'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/8675358882085974318'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2007/09/blog-post_28.html' title='बिछलन भरी जमीन पर आलोचना का संतुलन'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-8949638972662510679</id><published>2007-09-27T08:49:00.000-07:00</published><updated>2007-09-27T08:52:34.150-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पत्र'/><title type='text'>कुपत्र</title><content type='html'>&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;                                   &lt;strong&gt;कुपत्र&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;प्रिय मणि जी                                                                21.9.07&lt;br /&gt;           नमस्कार &lt;br /&gt;आषा हेै आप साहित्य कर्म में लीन होंगे। निराला की तोड़ती पत्थर वाली कविता की मजदूरनी की तरह। यह उपमा यदि ठीक नहीं लगी तो मैं आप को मर्दवादी समझूंगा और किसी ब्लागिये से मिल कर आप को बदनाम भी कर सकता हूु। इसलिये इसे स्वीकार करने मे ही आप अपना भला समझेंगे।ऐसा मेरा विष्वास है। यदि आप ऐसा करते हैं तो आप को नारी समर्थक कहा जाएगा और आप की प्रगतिषीलता पर अगर किसी को किसी कारण कभी संदेह रहा होगा तो वह अपने आप को ठीक करने के लिये बाध्य होगा क्योकि यदि वह ऐसा नहीं करेगा तो उसे नारी विरोधी समझा जाएगा। इस प्रकार, आप समझ सकते हैं ंकि मेरे द्वारा आप को जो उपमा दी गई है, वह नारी कल्याण्ा की दिषा में एक ऐसी क्रा्रंति का सूत्रपात करेगा ंकि सारे मर्दाें में  नारी समर्थक होने या दिखने की होड़ लग जाएगी और देखते ही देखते नारी आंदोलन अपनी प्रत्याषित या अप्रत्याषित परिणति तक अतिषीध्र पहुंच जाएगा। हां, यह जरूर है ंकि इस परिणति की तीब्रता मर्दों की आंखो में इतनी भभ्भाहट पैदा करेगी ंकि बहुत से मर्द अपनी आंखों पर काला चष्मा चढा कर नारियों को घूरते हुए उनकी प्रषंसा का प्रगतिगान करेंगें। परिण्ााम यह होगा ंकि यह नारी आंदोलन जितनी तेजी से उत्थान की सीढ़ियां चढ़ कर अपने एवरेस्ट का निर्माण करनें में कामयाब होगा, उतनी ही जल्दी अप्रासंगिक भी हो जाएगा। नारी आंदोलन की अग्रणी नारियां अपनी आजादी की नषीली सफलता से बोर होकर पुन: अपने घरों में लौट जाएंगी और आप तो जानते ही हैं ंकि नारी घर में लौटी नहीं ंकि उसे गृहिणी बनाने में पुरूष को तनिक भी देर नहीं लगेगी।&lt;br /&gt;       मणि जी, मुझे क्षमा करेंगे ंकि अपने को उपमावादी कालिदास का आधुनिक वंषज सावित करने के लोभ में आप के साहित्य कर्म को मैंने जिस उपमा से नवाजा, मैं नहीं जानता था ंकि उसका तार्किक परिणाम इतना द्विधर्मी या विधर्मी होगा ंकि प्रगतिषील और प्रतिक्रियावादी --दोनों इसका अपने अपने ढंग से मजा लेंने का अवसर पा लेंगे। मुझसे सबसे बड़ी भूल यह हुई ंकि मैं यह भूल ही गया ंकि तुलसी के इस देष में ऐसा कोई नहीं है जो घ्अवसर चूके पुनि पछितैहैं वाला उपदेष गांठ बांध कर नहीं चलता । यकीन मानें, यदि यह जानता तो ऐसा कदापि न करता । मगर अब तो क्षमा याचना के अलावे कोई रास्ता भी नहीं बचा है। जो लिख चुका उसे वापस कैसे लिया जाता है, यह हमें अभी सीखना है। यह सीखने में कितना सफल हो पाउंगा ओैर कितना योगाभ्यास करना पड़गा, यह अभी भविष्य के गर्त में है।फिलहाल तो मै यही कहना चाहता हूं ंकि  आप मुझे इस अपराध के लिए साहित्य के गर्त में (गर्तवादी साहित्य का उभार इस दषक की ताजी घटना है।)जाने का अभिषाप दे डालें , इसके पहले मैने आप से माफी मांग लिया है। मैने सुना है आप ने बहुत से साहित्यिक अजामिलों को माफ करने का कीर्तिमान स्थापित ंकिया है। यदि आप ने माफ कर दिया तो आप के कीर्तिमान के तापमान  में इजाफा ही होगा और हमारा साहित्यजगत आप की कीर्तिश्री के चकाचौंध से बचने के लिये नीचता का फोटोका्रेमिक चष्मा लगाने मे तनिक देर नहीं करेगा, यह भी मैं जानता हँॅू। बहरहाल, अपनी मूर्खता के आवेग में मैनें साहित्य के सीधे से सवालों पर सीधे-सीधे सोचने, या कहें ंकि बनी बनाई लीक को पीटकर संतुष्ट हो जाने के आजमाए रास्ते को र्छोड़कर तर्क के जिस लपेटे में अपने को फंसा दिया है उसी का परिण्ााम है ंकि बात कहां से चलकर कहां पहुंच गई और अंतहीन हरिकथा का अंत यह हुआ ंकि अपनी नारी विरोधी छवि से निकलने की हमारी हर चेष्टा हमें अंतत: वहीं पहुंचा देती है जहां से निकल भागना मेरा स्वप्न रहा है। साहित्य में तर्क की यही सबसे बडी ख़ूबी या खामी है ंकि इसकी आंत जटिल रूप से इतने पेंचोखम में उलझी होती है कि इसकी वास्तविक लम्बाई का अंदाजा पाना तो दूर की बात है, यह तक नहीं पता चल पाता ंकि इसका मॅुह ंकिधर है। कहां से चलेेंगे तो कहां पहुंचेंगे। सो अपनी बात को कहीं न कहीं अधूरा ही छोड़ना पड़ता है--जैसे रामचरितमानस की इतनी मोटी पोथी लिखनेवाले तुलसी को भी आखिर कहना ही पड़ा। मै कोई तुलसी नहीं । मगर उनके बाद के जमाने मे पैदा होने का एक यह लाभ तो मिला ही है ंकि जो बात उन्होंने इतनी मोटी पोथी लिख कर सीखी उसे मैने उनसे ही विना कोई पोथी लिखने का जहमत उठाए ही सीख लिया। उनकी सीख का ही प्रभाव है ंकि इस षैतान की आंत को यहीं काट रहा हूं। अच्छा हो आप हम मिलजुल कर एक दूसरे की खामियों की सरे-आम बखिया उधेडें । घ्यान बस इतना रहे ंकि हम एक क्षण के लिये भी न भूलें ंकि यह एक खेल है जिसे अगर समझदारी से ओैर फाउल होने के खतरों से बचते हुए खेला जाय तो यह आपसी मेलजोल को ओैर अधिक बेलौस ओैर प्रौढ़ बनाता है । आजकल इसी का नाम हिन्दी साहित्य है। सुप्त भारतीय मनीषा को नये ज्ञानोदय से आलोकित करने का नया प्रयास।&lt;br /&gt;                                                       सादर &lt;br /&gt;                                                                       साहित्य का छिद्रान्वेषी&lt;br /&gt;                                                                               कपिलदेव&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-8949638972662510679?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/8949638972662510679/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=8949638972662510679' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/8949638972662510679'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/8949638972662510679'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2007/09/blog-post_27.html' title='कुपत्र'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-5386384868663774100</id><published>2007-09-21T08:13:00.000-07:00</published><updated>2007-09-21T08:16:00.508-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>प्रारम्भ</title><content type='html'>कविता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;प्रारम्भ&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बच्चा&lt;br /&gt;खींचता है&lt;br /&gt;एक पड़ी लकीर&lt;br /&gt;और एक बेंड़ी&lt;br /&gt;बायीं ओर एक गोला&lt;br /&gt;दायीं ओर एक पूँछ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बना देता है&lt;br /&gt;'क'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहीं से&lt;br /&gt;शुरू होती है &lt;br /&gt;कविता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी तरह &lt;br /&gt;लिखा जाता है&lt;br /&gt;इतिहास&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                      रघुवंशमणि&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-5386384868663774100?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/5386384868663774100/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=5386384868663774100' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/5386384868663774100'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/5386384868663774100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2007/09/blog-post_21.html' title='प्रारम्भ'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-7712170533939858674</id><published>2007-09-16T14:27:00.000-07:00</published><updated>2007-09-16T14:30:35.518-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>कुदाल</title><content type='html'>कविता&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;br /&gt;कुदाल&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बार फिर वही सवाल&lt;br /&gt;कि क्या हो इस कुदाल का&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शब्दों से भर गया हूँ कुछ इस कदर&lt;br /&gt;कि किसी शोक प्रस्ताव की तरह&lt;br /&gt;मौन रहूँ कुछ क्षण&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस मौन के अन्तस्थल से उभरती है &lt;br /&gt;एक साफ और ठोस आकृति&lt;br /&gt;जो बार-बार उभरती रही है &lt;br /&gt;जब बैठता रहा हूँ&lt;br /&gt;किसी अनुकूलित विचारस्थली में&lt;br /&gt;पड़ी रही है एक कुदाल&lt;br /&gt;मेरे मस्तिष्क के अंधेरों में &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बाहर सब कुछ चमकदार है&lt;br /&gt;धूल रहित व्यवस्थित इतना&lt;br /&gt;कि मैं हो जाता हूँ उथल-पुथल &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कि क्या करूॅं मैं इस कुदाल का&lt;br /&gt;जो गड़ती है मेरे दिमाग में इस कदर&lt;br /&gt;कि अकेला पड़ जाता है दर्द&lt;br /&gt;यह शायद समायोजन की समस्या हो &lt;br /&gt;जिसका सम्बंध है व्यक्तित्व विकास से &lt;br /&gt;जिसके लोहे पर लगी है गीली मिट्टी खेत की&lt;br /&gt;और पसीने की गंध&lt;br /&gt;उसकी बेंट पर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कैसे रखूं इस कुदाल को &lt;br /&gt;विकसित मस्तिष्क की जटिल बहसों में&lt;br /&gt;जिसकी अत्याधुनिक तकनीक से&lt;br /&gt;हमारे सुसभ्य प्रयासों के बाद भी&lt;br /&gt;रह-रह कर उभरते हैं &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जटिल तारों में उलझे &lt;br /&gt;हमारे कुटिल शास्त्रार्थ&lt;br /&gt;संगणक की अगणित माइक्रोचिप्स से &lt;br /&gt;उभरकर प्रदीप्त होती लिजलिजी इच्छाएँ&lt;br /&gt;और बाजार के जालजंजाल में प्रतियोगी सी&lt;br /&gt;आत्मघाती अहम्मन्यताएँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई अलंकरण नहीं है कुदाल&lt;br /&gt;पर यहाँ लगेगी किसी जादुई कल्पना जैसी&lt;br /&gt;हालांकि यह कोई यंत्र तक नहीं &lt;br /&gt;एक निखालिस हथियार भर है अप्रासंगिक&lt;br /&gt;जो नहीं मुख्यधारा की परिभाषा तक में&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन्हे हाशिये पर ढकेल रहा है समय&lt;br /&gt;उन्हें विस्मृत करके ही न बनें हमारी स्मृतियाँ&lt;br /&gt;ऐसी निरपेक्ष चेतना पर&lt;br /&gt;उस मोंगफली के छिलके&lt;br /&gt;जिसे मैने नानी जैसी बुढ़िया से खरीदे थे&lt;br /&gt;और जिसने राजस्थानी में कुछ कहा था&lt;br /&gt;और मैं मात्र इतना ही समझ सका&lt;br /&gt;कि बेटा सर्दी बहुत तेज है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तेज ठंडक में कोई चला रहा है कुदाल&lt;br /&gt;आती है कोन गोड़ने की आवाज&lt;br /&gt;जिनमें से उभरती हैं&lt;br /&gt;दर्द के समंदर में डूबी हजार ऑंखें&lt;br /&gt;और लम्बी निरीह चुप्पियाँ&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                               रघुवंशमणि&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/17903418-7712170533939858674?l=wangmaya.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://wangmaya.blogspot.com/feeds/7712170533939858674/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=17903418&amp;postID=7712170533939858674' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/7712170533939858674'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/17903418/posts/default/7712170533939858674'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://wangmaya.blogspot.com/2007/09/blog-post_16.html' title='कुदाल'/><author><name>रघुवंशमणि</name><uri>http://www.blogger.com/profile/10009784178500296315</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='25' height='32' src='http://www.freewebs.com/raghuvanshmani/Raghuvansh.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-17903418.post-7815345737746947618</id><published>2007-09-14T11:36:00.000-07:00</published><updated>2007-09-14T11:38:59.875-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='साक्षात्कार'/><title type='text'>प्रतिभा के लिए कोई शर्त नहीं</title><content type='html'>साक्षात्कार&lt;br /&gt;                 &lt;strong&gt;प्रतिभा के लिए कोई शर्त नहीं &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;                                                       दूधनाथ सिंह&lt;br /&gt;------------------------------------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;हिन्दी के वरिष्ठ लेखक दूधनाथ सिंह का यह साक्षात्कार कथाक्रम पत्रिका में प्रकाशित हुआ था। इस पर बहुत से विवाद खड़े हुए थे। बाद में राजकमल प्रकाशन ने इसे 'कहासुनी' नामक पुस्तक में प्रकाशित किया था। नेट मित्रों के लिए इसे दुबारा प्रस्तुत किया जा रहा है।&lt;br /&gt;------------------------------------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संपादकीय टिप्पणी:&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हिन्दी के प्रसिध्द कहानीकार और उपन्यासकार दूधनाथ सिंह इधर अपने उपन्यास 'आखिरी कलाम' के कारण चर्चा में हैं। अयोध्या के बाबरी-मस्जिद ध्वंस की पृष्ठभूमि पर साम्प्रदायिकता के विरुध्द लिखे गये उनके इस उपन्यास को 'एक लम्बी छलांग' और 'एक सर्जनात्मक विस्फोट' कहा जा रहा है। यह उपन्यास विभिन्न प्रकार की त्वरित आलोचनात्मक प्रतिक्रियाओं के चलते विवादास्पद भी हो गया है। दूधनाथ सिंह के इस उपन्यास और उनके जीवन तथा कृतित्व के विभिन्न पहलुओं को लेकर कथाक्रम के लिए यह बातचीत समालोचक रघुवंशमणि और कवि अनिल सिंह ने मिलकर की। दूधनाथ सिंह हिन्दी जगत में अपनी बेबाक टिप्पणियों के लिए जाने जाते रहे हैं। इस बातचीत के दौरान उनकी विभिन्न विचार-मुद्राएं सामने आयीं, कभी चिंता, कभी किलक तो कभी नाराजगी और दुख। यहाँ यह बताना जरूरी है कि यह साक्षात्कार संसदीय चुनावों के बाद केन्द्र में भाजपा सरकार के पतन के बस दो दिन पहले सम्पन्न हुआ।&lt;br /&gt;--------------------------------------------------------------------------------------------&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रघुवंशमणि:-दूधनाथ जी! 'आखिरी कलाम' को हिन्दी जगत में इधर लिखा गया एक महत्वपूर्ण उपन्यास माना जा रहा है। साम्प्रदायिकता पर लिखी गयी यह एक बेजोड़ कृति है फिर भी इसे लेकर समीक्षक आशंकित हैं। ऐसा क्यों है?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह- समीक्षकों की शंका के बारे में मैं पूरी तरह से बता नहीं सकता। तरह-तरह की शंकाएं हैं।  उपन्यास का जो एक रस होता है और उसका जो एक बना बनाया ढांचा होता है, वह वहां नहीं। उपन्यास लोगों को थोड़ा सकते में डालता है। इस तरह की चीजें पढ़ने की आदत में नहीं है। समीक्षकों का एक बना-बनाया मान्य समीक्षा व्यवहार भी है। कुछ लोग तो कुछ भी स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं रहते। इसलिए ये शंकाएं हो सकती हैं, लेकिन इस उपन्यास को लेकर अधिकांश समीक्षकों ने सारी अपनी शंकाओं के बावजूद, अपनी पसंदगी का इज़हार किया है। कुछेक को छोड़कर। फिर भी समीक्षाओं को लेकर मैं हिन्दी जगत का कृतज्ञ हूं। मुझे शुरू से ही उदासीनता और उपेक्षा तथा मार-धाड़ का शिकार होना पड़ा है। लेकिन उसका नतीजा मेरे पक्ष में ही गया है।&lt;br /&gt;रघुवंशमणि :- यदि निराला जी के शब्दों का प्रयोग करना हो तो क्या यह अभ्यास के कारण पैदा हुई समस्या है या कि यह उपन्यास परंपरागत उपन्यास आलोचना को समस्याग्रस्त करता है? &lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह :- निराला जी की समस्या! मैं समझा नहीं!&lt;br /&gt;रघुवंशमणि :- निराला जी ने 'परिमल' की भूमिका में मुक्तछंद के संदर्भ में यह बात कही है कि कविता पढ़ने के 'अभ्यास' के कारण मुक्त छंद को स्वीकार करने में असुविधा हुई।&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह :- यह संभव है, क्योंकि अभ्यास तो प्लाट संरचना वाले उपन्यासों को पढ़ने का है।&lt;br /&gt;रघुवंशमणि :-आरोप यह है कि आपके इस उपन्यास में विस्तार बहुत हो गया है जिसके कारण इसका साम्प्रदायिकता विरोधी स्वर थोड़ा बिखर गया है या कहें कि थोड़ा कम प्रभावी हुआ है।&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह :-मैं ऐसा नहीं मानता कि इसमें विस्तार है। मैंने उपन्यास की अंतिम पांडुलिपि तैयार करते वक्त उसमें से लगभग डेढ़ सौ पेज निकाल दिये। शब्द संक्षिप्ति का भी एक विस्तार होता है। इस कहानी में कोई भी पात्र लगातार विकसित नहीं होता क्योंकि वह कथा का उद्देश्य नहीं है। तत्सत् पाण्डेय एक बिन्दु की तरह है जिसके चारो ओर घटनाएं और चरित्र ग्रह-नक्षत्र की तरह घूमते रहते हैं। आकर्षण और विकर्षण भी तत्सत् पाण्डेय का ही है। जाहिर है कि प्लाट बांधने की संरचना में यह कथा कभी भी फिट नहीं होती। तत्सत् पाण्डे की जो बड़बड़ाहट है, वही मूल कथ्य है। मुझे कथा को आगे पूरा करने के लिए, तत्सत पाण्डेय के घायल होने के बाद बहुत परिश्रम करना पड़ा।&lt;br /&gt;रघुवंशमणि :-फिर भी यह उपन्यास थोड़ा कम पृष्ठों का होता तो क्या प्रभाव की तीव्रता बढ़ जाती?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह :- उपन्यास लेखक से यह सवाल कैसे मौजूं हो सकता है? डा. इन्द्रनाथ मदान ने प्रेमचंद को लिखे अपने एक पत्र में यह सुझाव दिया था कि गोदान से शहरी कथा निकाल दी जाय तो वह ज्यादा संघटित और प्रभावोत्पादक उपन्यास होगा। प्रेमचंद ने इसे कतई स्वीकार नहीं किया। 'आखिरी कलाम' सूक्तियों में बोलता है। बड़बड़ाहटों में बात करता है। वह वर्तमान भारतीय समाज पर एक कमेंट्री की तरह संरचित हुआ है। हर चैप्टर एक ही समय में स्वतंत्र भी है और अंतर्ग्रथित भी। उसका यह शिल्प मेरे दिमाग में पहले  से नहीं था, नोट्स भी नहीं थे। मेरी स्मृति बहुत अच्छी है। और अनिल को भी यह विश्वास नहीं है कि मैंने उन्हीं के साथ बाबरी ध्वंस के दो दिन पहले अयोध्या का दौरा सिर्फ एक बार किया। बड़ी रचनाएं नोट्स और इकट्ठा की हुई सामग्रियों से नहीं बनतीं, वे मन पर पड़े हुए सम्प्रभावों का कलात्मक संघटन होती हैं। अब मैं किसको-किसको रोऊं कि मैंने कैसे लिखा और क्यों लिखा। जो लोग इस कथा पर संदेह करते हैं, वे पछता रहे हैं। &lt;br /&gt;अनिल सिंह :- आपके उपन्यास के मुख्य पात्र तत्सत् पाण्डेय का सफरनामा क्या एक प्रतीकात्मक प्रतिक्रिया या प्रतिरोध भर है? यदि ऐसा है तो फिर उसकी सार्थकता को आप किस प्रकार देखते हैं?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह :-प्रतिरोध भर नहीं है। लेकिन फिर भी प्रोटेस्ट है। उसके, यानि तत्सत् के अन्दर राजनीति और पुराने कम्युनिस्टों की एक बची-खुची झंकृति अभी विद्यमान है। लेकिन इतने से ही वह यात्रा पर नहीं निकलता। वह अपनी पारिवारिक असफलताओं और नष्ट-भ्रष्ट पारिवारिक जिंदगी से उबा हुआ, उदास और चिड़चिड़ा बूढ़ा भी है। जीने का रस उसके लिए बड़बड़ाहट, झगड़े और अध्ययन के अतिरिक्त कहीं बचा नहीं है। लेकिन इन सबके पीछे अपने इकलौते बेटे के न होने की एक घनी उदासी भी कारण है और उससे मिलाजुला एक बड़ा कारण आजादी और प्रजातंत्र का धीरे-धीरे एक विकृति में परिवर्तित होते जाना भी है। मैने कहीं कहा है कि उसका सफर उसकी अपनी शवयात्रा भी है। जीने और मरने में कोई भेद नहीं। इस स्थिति को अगर कोई समीक्षक आलोचक पाठक करुणा से नहीं देखेगा तो वह उपन्यास के सत्व से निश्चित ही वंचित रहेगा। तत्सत् पाण्डेय एक व्यक्ति नहीं एक युग की असफलता और अवसाद है। लोग नहीं समझते तो मैं क्या करूं। गालिब ने कहा है-&lt;br /&gt; 'पूछते हैं वो कि गालिब कौन है&lt;br /&gt; कोई बतलाओ कि हम बतलाएं क्या'&lt;br /&gt;रघुवंशमणि :- आज के सांप्रदायिक उत्पात के दौर में यह बात कितनी आगे जा सकती है?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह :-कौन सी बात?&lt;br /&gt;रघुवंशमणि :- यही तत्सत् पाण्डेय के विद्रोह की बात?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह :- मैं तो लगभग भविष्यवक्ता हूं। 'कारसेवक एक्सप्रेस' चैप्टर तो मैंने सन् 1998 में लिखा था। अब इसी से समझ लो, गोधरा कांड कब घटित हुआ। गालिब ने अपने उर्दू दीवान की अधिकांश गजलें 18 वर्ष की उम्र में लिख ली थी। यानि सन् 1819-20 तक। 1816 मे उन्होंने अपना पहला दीवान तैयार किया था। 1821 में दूसरा तब वो कुल 25 वर्ष के थे। लेकिन उनकी गजलें 1857 पर ऐसे लागू होती है, जैसे उस मुक्ति संग्राम गदर के दौरान लिखी गयी हों। मैला आंचल 1954 में लिखा गया और जातिवादी समीकरण हमारे प्रजातंत्र मेें 2004 में अपना नंगा नाच दिखा रहा है। लेखक एक ऐतिहासिक दौर के घटने पर भी अपने पहले के लिखे हुए से अगर प्रमाण्0श्निात और सार्थक होते हैं तो यह बहुत ही महत्वपूर्ण बात है। गालिब का शेर है-&lt;br /&gt; 'दागे फिराक सोहबते शब की जली हुई&lt;br /&gt; इक शम्अ रह गयी है सो वो भी खमोश है'।&lt;br /&gt;आप 1857 में घिरे हुए बहादुरशाह जफर को देखिये और इस शेर को। लगता है कि दोनो एकमेक हैं, जबकि शेर 1820 के आसपास लिखा गया होगा।&lt;br /&gt; 'आखिरी कलाम' तो सांप्रदायिक उन्माद का एक प्रारंभिक प्रतीक है। गुजरात पर तो इससे बड़े महाकाव्यात्मक उपन्यास लिखे जा सकते हैं, कोई करे तो। मेरा उपन्यास एक बिम्ब की तरह है जो इशारा भर करता है कि हिन्दू आतंकवाद किस सीमा तक जा सकता है। जो सार्वजनिक विरोध और व्यक्तिगत यानि तत्सत् अवसाद का प्रतीक है उसकी लाश तो एक रेलगाड़ी के ब्रेकवैन में एक उन्मादग्रस्त लौटती हुई भीड़ के साथ शंटिग कर रही है और कहीं नहीं पहुंच रहीं है। आशावाद का मतलब होता है। एक कलात्मक कृति में मृत्यु एक नैतिक गुस्से को जन्म दे सकती है। इस वक्त हमारा समाज बहुत घिसा हुआ, चुप्पी साधे और उदासीन समाज की तरह व्यवहार कर रहा है। मिली-जुली कौमियत के बारे मेें लोग उदासीन हो गये हैं।&lt;br /&gt;रघुवंशमणि :- हमारे समय में सांप्रदायिकता के विरोध मेें चल रहा संघर्ष ज्यादातर नकारात्मक रहा है। सांप्रदायिक उन्माद के इस सारे घटनाक्रम को आप कैसे देखते हैं? आप इस परिप्रेक्ष्य में अपने समय को किस प्रकार देखते हैं? सांप्रदायिकता का प्रतिरोध किस प्रकार होना चाहिए?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह :- मैं अपने समय को एक टैजिक समय की तरह देखता हूँ। सांप्रदायिकता का प्रतिकार जनता ही करेगी और जनता को 'अपनी ही खबर' नहीं है। अगर ऐसा नहीं होता तो साम्राज्यवादी घुसपैठ का खतरा ज्यादा बना रहेगा। अपनी समस्याएं हमेें खुद हल कर लेनी चाहिए। कब और कैसे होगा इसको मैं क्या कहूं? यह एक भयावह स्थिति है और हिन्दुत्ववाद, हिन्दू राष्ट और इससे सम्बध्द पार्टियां और संगठन इसके लिए जिम्मेदार हैं। हम अपने बचपन में यह भेद नहीं जानते थे। 'दाहा' उठाने पठानाें के गांव जाते थे। खानपान था। मिलाजुलापन पर्व था। यह अनुभव ही नहीं था कि हिन्दू मुसलामान दो कौमें हैं। मुझे अब इस संबंध में एक बेचारगी का अनुभव होता है। बड़बोली, पैम्फलेट, घोषणपत्र हम बहुत देखते रहते हैं। मध्य वर्ग से आये हुए बुध्दिजीवी भी इसको मिटाने के लिए जनता की हौसिला आफजाई कर सकते हैं। खुद उनका रोल बहुत सीमित है। &lt;br /&gt;रघुवंशमणि :- उपन्यास के पात्रों और उनके वक्तव्योें को अक्सर लेखक के अपने वक्तव्यों के रूप मेें देखा जाता है। मेरे विचार से यह सही नहीं। 'आखिरी कलाम' पर अपने विचार व्यक्त करते हुए एक आलोचक ने लिखा है कि अपने पात्र की ही तरह आप की 'प्रतिबध्दता दिखाउ है' और लगता है कि आप 'साइकिक क्लोजर' के शिकार हैं। अपने और अपने पात्र पर की गयी यह टिप्पणी आपको कैसी लगती है?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह :- इस तरह का आक्षेप कोई करता है तो उसका यह अधिकार मैं कैसे छीन सकता हूं। तत्सत् पाण्डेय को तो मैं खुद ही ढूढ़ता हूं कि यह आदमी कहां से आया, यह कौन है। यह इतिहास की किस गुफा से निकलकर नमूदार हुआ। कितने ऐतिहासिक, अनऐतिहासिक चरित्रों का वह एक विम्ब है। मेंरे लिए तो वह खुद ही एक 'हेलूसिनेशन' की तरह है। जब वह खड़ा हो गया तो मैं अपने किये पर ही आश्चर्यचकित । वह तो अपनी देह से भारतीय राजनीति, स्वतंत्रता आंदोलन और उसके बाद की स्थितियों का प्रतीक चिन्ह है। वह संकल्पना से रचित है और मुझे ही सकते में डालता है। जहां तक मेरी अपनी प्रतिबध्दता के दिखावटी होने का सवाल है तो मैं कोई राजनीतिक व्यक्ति तो नहीं हूँ। धर्र्म का निषेध तो सांप्रदायिकता, नस्लवाद साम्राज्यवाद के विरोध की पहली शर्त है। लेकिन इस सत्य को कौन मानेगा? धर्म चढ़ा बैठा हैं। समुन्नत समाजों में भी धार्मिक आस्था वैसी की वैसी बनी हुई है। टेड टावर के ध्वस्त होने के बाद अमरीका ने जहां अफगानिस्तान पर चढ़ाई की वहां न्यूयार्क की जनता ने प्रार्थना सभाएं भी आयोजित कीं और उन प्रार्थना सभाओं में लोग रो रहे थे। अमरीका के लिए धर्म क्यों 'आत्मा की कराह' है, दलित शोषित तीसरी दुनिया के लिए हो तो हो। इसका उत्तर उपन्यास में है। जब तत्सत् पाण्डेय कहता है कि हर आदमी मरने से डरता है। हमारे यहां अनभयता की बात बहुत की गयी है। लेकिन ब्रेश्ट कहते हैं कि अगर आदमी डरे नहीं तो वह अपनी सुरक्षा के सवाल को ही नहीं उठायेगा। डर आत्मरक्षा और संघर्ष को जन्म देता है, जो नहीं डरता वो अत्याचारी होता है। &lt;br /&gt;रघुवंशमणि :- तत्सत् पांडेय को लेकर एक स्फटिक फाँक की भी बात है- यानि कि सिध्दांत और व्यवहार के बीच की दूरी। क्या आप इसे इस उपन्यास की एक महत्वपूर्ण समस्या के रूप मे देख पाते हैं? एक सक्रिय वामपंथी  के रूप में आप इस बात को किस प्रकार ग्रहण करेंगें?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह :- तत्सत् पाण्डेय एक सक्रिय वामपंथी नहीं है । जातिवादी उभार के बाद उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्य प्रदेश में जिस तरह से सक्रिय वामपंथ की गतिविधियों का क्षरण हुआ, उसकी झलक उपन्यास में है। कार्यकर्ताओं की आस्था अपनी जगह पर है। लेकिन उनका वैचारिक संघर्ष उत्तर भारत में जनता के संघर्ष से एकमेक नहीं है। यह एक टेजडी की तरह है। मुक्ति संघर्ष की बात हम करते हैं और जनता अपने मुक्तिसंघर्ष के लिए जातिगत खेमों में बटी हुई है। इसको वर्गयुध्द में कैसे परिवर्तित किया जाय, यह समस्या है। मैने उपन्यास में इसका बहुत विस्तार से चित्रण किया है। निष्कासन में भी इसका जिक्र था। मैं झूठ तो नहीं बोल सकता, जो देखता हूं वही कहूंगा। एक कलाकार के नाते यह मेरा 'धरम' है।&lt;br /&gt;अनिल सिंह :- आपके उपन्यास में वामपंथी राजनीति की आलोचना कुछ अधिक ही हो गयी लगती है, ऐसा कहना है लोगों का। आपने सांप्रदायिकता के विरुध्द यह उपन्यास लिखते समय वामपंथ की यह लानत-मलामत क्याें जरूरी समझी?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह :- क्योंकि अंतत: मुझे वामपंथ से ही आशा है। मुलायम सिंह ने थोड़ा सा सन् 1991 में किया, लेकिन जातिवादी उलझनों में सत्तापरस्ती का ख्वाब देखने वाली पार्टियाें से मुझे कोई आशा नहीं है। मुझे कांग्रेस से भी आशा नहीं है। जिस समय बाबरी मस्जिद गिरी उस वक्त केन्द्र में कांग्रेस की सरकार थी। अगर नरसिंह राव चाहते तो उनके लिए कारसेवकाें को रोकना बहुत साधारण बात थी। अभी फिर मुलायम सिंह ने कुछ नहीं होने दिया। लेकिन इसके बावजूद मुझे आशा वामपंथ से ही है। अगर वामपंथ कमजोर होता है तो सांप्रदायिकता मजबूत होती है। और मैं यह देख रहा हूं कि उत्तर भारत में वामपंथ का क्षरण लगातार जारी है। पश्चिम बंगाल और केरल, त्रिपुरा में जातिवाद, सांप्रदायिकता और हिन्दुत्ववाद अपना सर क्यों नहीं उठाते? क्योंकि बामपंथियों ने इसकी बू वहां जाने हीे नहीं दी। उससे वे बहुत कड़ाई से पेश आये, जबकि वहां का समाज भी जातियों में बंटा हुआ है, लेकिन वह वर्गाधार पर सोचता है। आरएसएस और बीजेपी के लोग इसको तोड़ने की कोशिश में लगातार लगे हुए हैं। इस संदर्भ में अगर 'आखिरी कलाम' में वामपंथ की आलोचना को आप देखें तो वह लानत मलामत नहीं है। मेरी आत्मा का संताप बोलता है। आखिर रामदीन मिसिर, शशांक, सर्वात्मन् जैसे जुझारू और प्रतिबध्द कार्यकर्ता आज भी वामपंथ मेें है। वह हिस्सा इसलिए भी लिखा गया है कि वामपंथी पार्टियों को अखबारों के बजाय सच्ची सूचनाएं दूसरी जगह से भी मिलें। उनकी आलेचना नहीं, बल्कि तकलीफ और सत्यता का वर्णन है।&lt;br /&gt;रघुवंशमणि :- अपने उपन्यास के पात्र रामदीन मिसिर की तरह आप भी अपने हिन्दी क्षेत्र में वामपंथ को गहराई तक समस्याग्रस्त पाते हैं। आखिर रास्ता क्या है?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह :-रास्ता हमारे समाज को जातिवाद वर्णवाद से बाहर आकर इस लड़ाई को गरीबी और अमीरी की लड़ाई में परिवर्तित करना होगा। दूसरा कोई भी रास्ता कारगर नहीं है। उससे प्रजातंत्र और विकलांग होता चला जायेगा।&lt;br /&gt;रघुवंशमणि :-हिन्दी उपन्यासों में एक अलग से पहचाने जाने योग्य पात्र है तत्सत् पाण्डेय। वृध्द, अन्तर्विरोधों का शिकार, स्मृतिभ्रंश की दहलीज पर खड़ा, वर्तमान और भूत में आता-जाता मगर दृढ़। इस अद्भुत पात्र का विचार आपके जेहन में कैसे आया? इस पात्र की सृष्टि किस प्रकार हुई?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह :- मैं बहुत लंबा जवाब नहीं दूंगा। लिखने के दौरान अचानक भूलने और याद करने का जिक्र आया। उससे मुझे इस शिल्प का 'क्लू' मिला। यह पहले से सोची हुई व्यवस्था नहीं थी। मगर एक बार सूझ जाने पर मैंने इसका भरपूर इस्तेमाल किया। &lt;br /&gt;रघुवंशमणि :-'आखिरी कलाम' अपनी औपन्यासिक तकनीक मेें अलग किस्म का है। डा. परमानंद श्रीवास्तव इस बात को स्पष्ट स्वीकृति देते हैं। यथार्थोन्मुख होते हुए भी यह उपन्यास तकनीक के मामले में पारंपरिक यथार्थवाद का शिकार नहीं। यह ईजाद कैसे हुई?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:- इसके बारे में मैं कुछ भी बतााने में असमर्थ हूं। रचना प्रक्रिया के दौरान बहुत सी बातें घटित हुई और उसी में से यह शिल्प भी आविष्कृत हुआ।&lt;br /&gt;रघुवंशमणि :- आज के दौर में जब आपके उपन्यास के साथ ही साथ 'सूत्रधार' जैसी कृति भी आयी है तो हिन्दी उपन्यासों मे आने वाले इस तकनीक के वैविध्य को आप कैसा विकास मानेेंगे?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:- हिंदी उपन्यास का वस्तुगत और शिल्पगत वैविध्य दर्शनीय और स्वागत योग्य है। संजीव मेरे प्रिय लेखक हैं। वे हमेशा सामग्री एकत्र करके लिखते हैं। अमृतलाल नागर भी यह काम करते थे। भिखारी ठाकुर पर उनको सरकारी वजीफा मिला था। राजेन्द्र जी ने दिलवाया था, ऐसा उन्होेंने मुझसे खुद कहा। संजीव सुलतानपुर के हैं। कुल्टी, पश्चिम बंगाल में रहते हैं। भोजपुरी भाषा-भाषी नहीं है। भिखारी ठाकुर पर यह वजीफा केदार जी को मिलना चाहिए था, क्योंकि उन्होंने भिखारी ठाकुर को लाखों के मजमें में देखा है और वे निखालिस भोजपुरी भाषी हैं। संजीव ने उस सामग्री पर एक कथाकृति की रचना की। 'धार' और 'सावधान नीचे आग है' के लिए भी उन्होंने इसी तरह सामग्री एकत्र की और प्रामाणिक उपन्यास लिखे। लेकिन ऐसी कृतियां गुम हो जाती हैं। साहित्य और कलाकृति में हमें स्थूल प्रमाण नहीं चाहिए। लेकिन जहां तक औपन्यासिक वैविध्य का सवाल है अलका सरावगी, असगर वजाहत का नया उपन्यास 'किसने आग लगायी' मैत्रेयी पुष्पा और इन सबसे महत्वपूर्ण चित्रा मुद्गल का कुछ वर्ष पहले लिखा उपन्यास 'आंवा' है जिस पर लोगों ने ध्यान नहीं दिया। स्त्री विमर्श की वह एक महाकाव्यात्मक कृति है। 'सूत्रधार' से भिखारी ठाकुर हमको खड़े दिखाई नहीं देते, हां योजनाबध्दता जरूर है।&lt;br /&gt;अनिल सिंह:- आप भी तो अवधी भाषा-भाषी नहीं है फिर भी 'आखिरी कलाम' में आपने निखालिस अवधी भाषा का जोरदार प्रयोग किया है तो आप पर भी तो यह सिध्दांत लागू होता है?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:- मेरे कहने का यह मतलब नहीं है कि संजीव नहीं लिख सकते। संजीव तो अपने उपन्यासों में पूरब की आंचलिक शब्दावली का प्रयोग करते है। मेरा मतलब यह था कि संजीव और केदार जी में किसका अधिकार ज्यादा बनता है भिखारी ठाकुर पर लिखने के लिए। मेरा कहना है कि केदार जी लिखते तो ज्यादा मौजू होता, हालांकि वह उपन्यास तो लिखते ही नहीं। अभी पिछले दिनों सारनाथ में 'संगमन' की गोष्ठी में नामवर जी ने यह कह दिया कि प्रोजेक्ट्स पर उपन्यास नहीं लिखे जा सकते। इस पर उनमें और संजीव में मारामारी की नौबत आ गयी थी। प्रोजेक्ट का अर्थ है स्थूल प्रामाणिकता। 'आखिरी कलाम' में कोई प्रोजेक्ट नहीं था। यहां तक कि बाबरी मस्जिद के गिराये जाने का ढंग भी कल्पित है। अगर आप बी.बी.सी. या मीडिया के चित्रों से मिलायेंगे तो वह यथातथ्य नहीं है, क्योंकि वह 'प्रोजेक्ट' नहीं है, कलात्मक और कल्पित है। यथार्थ का संवर्धन इस तरह होता है. वह यथातथ्य नहीं होता।&lt;br /&gt;अनिल सिंह:- लेकिन टालस्टाय का 'युध्द और शान्ति' तथा 'पुनरूत्थान' भी तो शोध के आधार पर लिखे गये हैं। और शोध करके उपन्यास लिखने की एक परंपरा तो रही ही है। इस पर आप क्या कहेंगे?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:- 'युध्द और शान्ति' में सिर्फ तीन ऐतिहासिक पात्र हैं। इन तीनोें का चौदह सौ पृष्ठों के उपन्यास में कितना योगदान है। इतिहास का एक स्केल्टन या अस्थि पंजर लिया है टालस्टाय ने। बाकी तो रूसी समाज है। नताशा, पियरे और अंद्रेई और ओल्ड प्रिंस निकोलाई और मारिया जैसे कल्पित सामाजिक चरित्र है। 'पुनरूत्थान' में सिर्फ जेल जीवन की सामग्री टालस्टाय ने एकत्रित की थी। बड़ी प्रतिभा के लिए कुछ भी वर्जित नहीं है, कोई शर्त नहीं है। लेकिन वह हो तब न।&lt;br /&gt;रघुवंशमणि :- उपन्यास के क्षेत्र में तकनीक के स्तर पर प्रयोगधर्मी कृतियों को स्वीकार करने मेें क्या हिन्दी आलोचको मेें आप एक प्रकार की हिचक पाते हैं।&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:- हिचकिचाहट तो होती है। लेकिन फिर स्वीकृति भी मिलती है। हमारे आलोचक इतने कठोर और दम्भी नहीं हैं कि वो लगातार अस्वीकृति के ही शिकार हों।&lt;br /&gt;रघुवंशमणि :- विचारधारा के स्तर पर आलोचकगण रचनाकारों से जिस प्रकार की डिमांड करते हैं क्या उसे आप सर्जनात्मकता के प्रतिकूल पाते है?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:-आलोचना एक पैरासाइट काम है। कृति पहले है आलोचना बाद में। अक्सर आलोचक यह समझते हैं कि उनकी मांगे जायज हैं, क्योंकि वे पढ़े लिखे लोग हैं। रचनाकार अपनी स्वतंत्र मेधा, अनुभव सम्पदा और कल्पना से काम लेता है। आलोचक गाहे बगाहे अपनी बातें लादते हैं। ज्यादा लादोगे तो लेखक एक कमजोर प्राणी होता है वह नमक का बोरा लादे हुए उस बैल की तरह होगा जो नदी हेलते वक्त बीच धार मेें बोझ से दबकर बैठ गया और सारा नमक बह गया। लेखक पर लादोगे तो वह इसी तरह बैठ जायेगा और हल्का होकर नदी पार कर जायेगा। चाहे उसे जितने डण्डे मारो वह तुम्हारा नमक वापस नहीं लौटा सकता। वह तुम्हारे लादे हुए बोझ को नहीं ढोयेगा। तुम्हारा विचार बड़ा है या लेखक की संकल्पना शक्ति यह तो समझना चाहिए।&lt;br /&gt;रघुवंशमणि :- 'आखिरी कलाम' ब्राह्मणवाद विरोधी कृति भी है। उपन्यास मेें यदि एक तरफ सांप्रदायिकता का विरोध है तो दूसरी तरफ जातिवाद का भी। मुझे लगता है कि किसी विन्दु पर ये दोनों समस्याएं एकाकार होती हैं?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:-बिल्कुल! जातिवाद भी एक तरह की सांप्रदायिकता है। लोगों की समझ में अभी नहीं आया, शायद आगे आये।&lt;br /&gt;रघुवंशमणि :- 'आखिरी कलाम' लोहिया के चिंतन का भी एक क्रिटीक प्रस्तुत करता है। 'जाति ही वर्ग है' इस विचार की जोरदार आलोचना है। तो क्या लोहिया के चिंतन में भी सांप्रदायिकता के तत्व हैैं?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:- आज जार्ज फर्नांडिस से बड़ा इसका उदाहरण कौन हो सकता है। लोहिया के चिंतन में भयंकर हिन्दुत्ववाद है। गांधी जी जब कहते थे कि 'मैं एक सनातनी हिन्दू हूँ' तो उनके कहने में खोट नहीं थी लेकिन लोहिया जब राम, कृष्ण और शिव के मिथकों पर लिखते हैं तो वह हिन्दुत्ववाद का एक रसमय प्रतीक चिन्ह भी बन जाता है। क्या यह यूं ही है कि लोहिया के अधिकांश अनुयायी हिन्दुत्ववादियोें के साथ चले गये।&lt;br /&gt;रघुवंशमणि :- लोहिया अपने विचारोें में साम्प्रदायिकता के समर्थक तो नहीं थे? वे तो बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता को फासीवाद की जननी मानते हैं?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:- लोहिया में यह अंतर्विरोध है। बहुसंख्यक सांप्रदायिकता का हीरो आखिर कौन है? राम, कृष्ण और शिव। जब आप तीनों मिथकीय प्रतीकों की रसभरी संरचना करते हैं तो आप क्या बहुसंख्यक फासीवादी सांप्रदायिकता का अनजाने ही समर्थन नहीं करते? तो लोहिया में अंतर्विरोध तो हैं। वह जनता को एक समग्र एनटिटी नहीं मानते। कभी अगड़ा- पिछड़ा, कभी राम, कृष्ण और शिव, कभी 'माक्र्स के बाद अर्थशास्त्र' इस तरह की विवेचनाएं और तरह-तरह की युक्तियां उनकी विचारधारा में एक अंतर्विरोध को जन्म तो देती ही हैं। कोई आदमी ईमानदार हो इससे यह साबित नहीं हो जाता कि उसमें अंतर्विरोध न हों।&lt;br /&gt;अनिल सिंह:- जाति और वर्ग के संदर्भ में आपने 'कथन' मेें नामवर जी का यह वक्तव्य उध्दृत किया था कि ' वर्ग के साथ वर्ण और वर्ण के साथ-साथ जाति को ध्यान में रखकर विश्लेषण करना चााहिए और उस वर्ग संघर्ष को समझना चााहिए।' क्या आपकी यह बात उस टिप्पणी से अलग नहीं है, जिसमेें आपने नामवर जी का समर्थन किया था?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:- नामवर सिंह के कथन से मेरी सहमति अभी भी पूरी तरह गलत साबित नहीं हुई है। नामवर सिंह तो कभी कुछ कहते हैं कभी कुछ। लेकिन वो अक्सर बड़ी और व्यवहारिक बातें भी करते हैं। वामपंथी दलों ने 'पुश द कास्ट फैक्टर फारवर्ड एण्ड देन पुल इट टूवड्र्स क्लास फैक्टर' का जो नारा दिया था उस नारे पर काम करने की जरूरत है। जातिगत समीकरण कभी भी इस देश का भला नहीं कर सकते। अंतत: वे एक तरह के फासिज्म  से दूसरे तरह के फासिज्म की तरफ ढकेलते रहेंगे। ऐसी स्थिति में समाज का ढांचा चरमरा सकता है और एक गहन अराजकता उत्पन्न हो सकती है। अभी भी हमारा समाज कबीलाई गिरोहों का समाज है। जो आप जी.डी.पी. बढ़ने और विदेशी मुद्रा भंडार की बढ़ोत्तरी की बात करते हैं, वह भारत की 10 प्रतिशत नवधनिक परिवारों के लिए है। मेटोपोलिसेज में भी नये कबीलाई समाजों का उदय हो रहा है और भारत की वर्गीय संरचना लगातार बदल रही है। इन सबको ध्यान में रखकर तब मैंने यह बात कही थी, क्योंकि रामविलास जी अपने कथन में आर्थोडाक्स माक्र्सवाद से इंच भर भी नहीं खिसकना चाहते। आखिर हमें जमीनी सच्चाइयों पर गौर तो करना ही होगा।&lt;br /&gt;रघुवंशमणि :- आपके उपन्यास में नेहरू के प्रति गहरा सम्मान व्यक्त किया गया है। नेहरू वास्तव में भारत के सबसे बड़े आधुनिक और सेकुलर व्यक्ति रहे हैं। मगर क्या उनके प्रति गहरा लगाव थोड़ा नॉस्टाल्जिक नहीं?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:-नास्टैल्जिक है। लेकिन इस नास्टेल्जिया का कारण है। अगर 1935-40 के बीच स्वराज्य भवन मेें काम करने वाले लोगों के बारे में आप गौर करें तो उसमें प्रतिबंधित कम्युनिस्ट पार्टी के लोगों को आप ज्यादा पायेंगे। यह नेहरू की बदौलत ही संभव हुआ। यह घुसपैठ नहीं बल्कि नेहरू के मिजाज के अनुकूल भी था। सन्1916 मेें किसान आंदोलन से उन्होंने अपना राजनैतिक जीवन शुरू किया और 1935-36 मेें कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की संकल्पना भी की। मिश्रित अर्थव्यवस्था का स्वप्न नेहरू का था। विनिवेशीकरण के दौरान आज जिस तरह हम देशी संसाधनों की बिक्री देख रहे है। अंग्रेजी भाषा के साम्राज्यवाद के कारण आउटसोर्सिंग के माध्यम से जिस तरह हिन्दुस्तान को क्लर्को के देश में परिवर्तित किया जा रहा है उससे मैकाले की छवि एक ब्रम्हराक्षस की तरह दिखायी देती है। इन सभी कारणों से 21वीं सदी के इस प्रारंभ में नेहरू और गांधी का नास्टैल्जिया किसी बुध्दिजीवी और लेखक के जीवन का एक जरूरी हिस्सा होना चाहिए।&lt;br /&gt;रघुवंशमणि:- 'अकार' मेें 'आखिरी कलाम' की जो समीक्षा छपी है, आपने पढ़ी?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:- देखिये मुझ पर धौंस नहीं चल सकती। आखिरी कलाम को समझने के लिए दिमाग की जरूरत है,दाँतों की नहीं। कोई कारसेवक है जो भेस बदल कर बैठा हुआ है।..... वैसे मैं उनको नहीं जानता। हो सकता है, कभी दुआ सलाम हो। मुझे थोड़ा शक भी था। एक अरूण प्रकाश आनन्द में भी हैं। भारत भारद्वाज का एक दिन फोन आया। वे मेरे लिए अक्सर चिंतित और दुखी रहते हैं-खासकर ऐसे अवसरों पर। मैने अपना शक जाहिर किया। दुबारा उनका फोन आया तो उन्होनें 'कन्फर्म' किया कि नहीं आनन्द वाले  अरूण प्रकाश नहीं ,दिल्ली वाले अरुण प्रकाश हैं। 'थोरा-थोरा लंगरा कर चलते हैं' भारत जी ने कहा।&lt;br /&gt;देखिये, उनको इस समीक्षा से शोहरत मिलेगी। कहानीकार के रूप में उनको कौन जानता है। ऐसे दो हजार कहानीकार हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं का पेट भरने के लिए पड़े हुए हैं।&lt;br /&gt;अनिल सिंह:-गिरिराज जी ने यह समीक्षा क्यों छापी?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:-यह तो गिरिराज जी से पूछिये। वे हमारे जवानी के दिनों के मित्र हैं और हमारी मैत्री बरकरार है। गिरिराज जी ने छापने से पहले मुझे बता दिया था। और मैंने उनसे कहा कि चाहे जितनी खिलाफ हो कुछ भी काटना पीटना मत। भोजपुरी मेें एक कहावत है 'बड़-बड़ बहाइल जांय गदहा पूछे कितना पानी'। अब क्या अरूणप्रकाश -अरूणप्रकाश!&lt;br /&gt;अनिल सिंह:- 'तद्भव' में छपे हुए काशीनाथ जी के संस्मरण 'घर का जोगी जोगड़ा' में एक जगह उन्होंने कहा है कि 'इलाहाबाद से कोई आया और बताया कि अशोक वाजपेयी दूधनाथ सिंह को 'निराला सृजन पीठ' से निकालने वाले हैं।' क्या वाकई ऐसा ही था?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:-यह बाबू काशीनाथ सिंह का निखालिस झूठ है। 'इलाहाबाद से कोई आया' इसमें यह ध्वनि है कि यह इलाहाबाद में प्रचारित होगा, और प्रचारित होगा तो इसमें मेरा हाथ होगा।मेरे लिए तो जो किया कमला प्रसाद ने किया। उन्होंने ही मेरा बायोडाटा भेजा। अभी भी मेरे लिए जो करते हैं, वही करते हैं।'कला-परिषद' में उन दिनो श्री राम तिवारी थे। उनका फोन आया। उस दिन 14 दिसंबर 1996 था। 'हिन्दुस्तानी एकेडमी' में 'अश्क-निधि' का कार्यक्रम चल रहा था। शेखर जी वहाँ थे। मैंने उनसे पूछा और सलाह मांगी। उन्होंने जोर देकर कहा,'जाओ।' 15 को चलकर मैं 16 को भोपाल पहुँचा और उसी दिन 'ज्वाइन' किया। मुझे तो तब तक यह भी नहीं मालूम था कि 'निराला  सृजन-पीठ' भारत भवन से संबध्द है। जैसे 'मुक्तिबोध सृजन-पीठ' सागर विश्वविद्यालय और 'प्रेमचंद सृजन-पीठ' विक्रम विश्वविद्यालय से संबध्द है वैसे ही मैं समझता था कि 'निराला सृजन-पीठ' बरकतुल्ला विश्वविद्यालय,भोपाल से संबध्द होगी। वहाँ जाने पर जब मालूम हुआ तो मैं और खुश हुआ। अशोक वाजपेयी मेरे घनिष्ठ मित्र हैं और मेरे उपर उनके बहुत-सारे साहित्येतर उपकार हैं।मैं खुश तो हुआ लेकिन मैं 'दो-पाटन के बीच' भी था।....बहरहाल,जो काशीनाथ सिंह ने कहा है वह झूठ ही है।उस बीच अशोक के दो-तीन पत्र मुझे मिले....अत्यन्त प्रिय और आत्मीय।...'इस बीच हो सकता है, तुमने अपने छोटे उपन्यास को अन्तिम रूप दे दिया हो। उसकी क्या खबर है?तुम्हें क्या बताना कि अन्तत: हमारा लिखा ही बचने वाला है और समय बड़ी तेजी से भागता है। अवसर मिला है तो उसे दाँत से पकड़कर रखो, व्यर्थ मत जाने दो।' 'रचनात्मक विस्फोट' है तो उसे भरपूर होने दो।' यह पत्रांश 1 जून,1997 के लिखे हुए पत्र से है। वहाँ रह कर मैने वह 'छोटा उपन्यास' तो पूरा नहीं किया, हाँ, 'नमो अंधकारं' लिखी,कहानी पर अभी तक मेरा मात्र इकलौता लेख 'हिन्दी कहानी का झूठा-सच' लिखा,जो'पूर्वग्रह' में छपा, और 'आखिरी कलाम' का दूसरा हिस्सा पूरा किया। &lt;br /&gt;काशीनाथ सिंह इस तरह के गढ़न्त में माहिर है। 'किस्सा साढे चार यार' में लिखा कि मैं गाजीपुर से पैदल चलकर आया था, जबकि मैं मुगलसराय से पैदल चलकर आया था । किसी की जगहंसाई हो, किसी की गर्द्रन उतर जाय, काशीनाथ सिंह सुर्ती फटकाकर दबा लेते हैं और हंसते है। गले मिलते हैं तो शाइस्ता खां की तरह मिलते हैं। पिछले 'कथाक्रम' की गोष्ठी मे भी उन्हें मेरे उपर कुछ नहीं बोलना था। सो उन्होंने एक लतीफा गढ़ा। उन्हें ' सिरी लाल सुकुल' और ' दूधनाथ सिंह' के नामों का मजाक उड़ाना था। क्यों, आप समझ सकते है। श्रीलाल जी मुंह बाये उन्हें देखते रह गयें। काशीनाथ सिंह ने कभी मेरे साथ इलाहाबाद में नौका विहार नहीं किया। लेकिन जब कुछ कहने को नहीं है तो लतीफा तो चलेगा। विजय मोहन ठीक ही कहते है।कि काशी आधा 'बफून' है। &lt;br /&gt;बहरहाल, जिस बात की ओर काशी का इशारा है, वह बात मुझे दस महीने बाद भोपाल के एक मित्र ने बतायी। मैं बहुत खिन्न हुआ। अगर अशोक नहीं चाहते थे तो मैं यहां नहीं रहूंगा। मैंने अपने एक मित्र की इच्छा का अनजाने ही अनादर किया। वह खबर सच हो या झूठ, मैं इसे 'कन्फर्म' भी नहीं करूंगा। दूसरे दिन चुपके से मैं स्टेशन गया चार दिन बाद का रिजर्वेशन मिला। मैं गुमसुम पड़ा रहा या राजेश के साथ 'अप्सरा' में बैठकर वक्त बिताता रहा। चौथे दिन मैने अपना इस्तीफा लिखा, खुद ही जवाहर चौक पर जाकर टाइप कराया, चार लिफाफों में भरकर, चिपकाकर, 'पिउन बुक' में चढ़ाकर बहादुर को बल्लभ भवन, कला-परिषद और भारत भवन भेजकर प्राप्ति स्वीकृति ली। सिर्फ भारत भवन में मदन सोनी ने पत्र खोला और तुरंत अशोक को 'फैक्स' पर लगा दिया। मैं अभी स्टेशन चलने के लिए सामान समेट ही रहा था कि अशोक का फोन आ गया, ' क्या हुआ? क्यों जा रहे हो? भारत भवन में किसी ने तुम्हें कुछ कहा क्या? मैंने सिर्फ यही कहा कि मेरी पत्नी इलाहाबाद में अकेली है। मैने उस बात को अपने प्रिय मित्र से 'कन्फर्म' भी नहीं किया। अगर सच हो तो मुझे कितना 'डिप्रेशन' होगा और झूठ होगा तो मैं उसके सामने गड़ जाउंगा। इसलिए जैसा-का-तैसा रहने दो। मैंने अपने एक मित्र कमला प्रसाद की इच्छा का सम्मान किया, अब मुझे झूठ या सच दूसरे मित्र की इच्छा का भी सम्मान करना चाहिए। लेकिन निकालने वाली बात तो गढ़न्त है, क्योंकि काशी सास-बहू का किस्सा नामवर जी के हवाले से लिखना चाहते थे।......और मै भिखमंगा तो हूं। बिड़ला तो काशीनाथ सिंह है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रघुवंशमणि:- इधर के दशकों में लिखे जाने वाले हिन्दी के गल्प अर्थात कहानी एवं उपन्यास को आप नई कहानी के दौर के गल्प से कैसे विलगायेंगे?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:- दरअसल इधर का सारा कहानी लेखन या औपन्यासिक काम पहले के कामों का ही विस्तार है। यह भी है कि ये सारे काम अपने समय को समाज या राजनीति को प्रमाणित करते चलते हैं लेकिन एक बड़ी दुर्घटना को इधर के उपन्यास या कहानियों में नहीं छुआ और वह है आपातकाल। उसकी छाया लेखकों पर यहां तक कि कवियों पर भी कम दिखाई देती है। जिस तरह से प्रेमचंदोतर उपन्यासों में क्रांतिकारी राजनीति और विभाजन तथा संयुक्त परिवारों के विखंडन को अपना विषय बनाया गया उस तरह से आपातकाल को नहीं उठाया गया। &lt;br /&gt;रघुवंशमणि:-एक उपन्यास है निर्मल वर्मा का 'रात का रिपोर्टर'।&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:-वह उनके उपन्यासाें में मेरे हिसाब से सबसे अच्छा उपन्यास है, जो पहाड़ और मृत्यु की नास्टैल्जिया से अलग है। और जिसमें भय और आतंक का अद्भुत चित्रण किया गया हैं। लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि उसमें भय और आतंक के अमूर्तन द्वारा आपातकाल का अमूर्तन है।&lt;br /&gt;रघुवंशमणि:-आप लोगों की पीढ़ी यानि कि ज्ञानरंजन, काशीनाथ सिंह और आप की पीढ़ी नई कहानी वाले दौर के लेखकों की पीढ़ी से अलग थी। आज के गल्प लेखकों और अपनी पीढ़ी के बीच क्या आप किसी प्रकार का गैप देखते है? मतलब यह कि रचनात्मक स्तर पर अस्सी के बाद के लेखकों को आप अपनी पीढ़ी से अलग पहचान किस प्रकार देना पसंद करेंगे?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:-कोई बहुत बड़ा फर्क नहीं है। जैसाकि मैंने कहा कोई बहुत सारे नये विषय 80 के बाद नहीं उठाये गये। पारिवारिक विखंडन, नगरीकरण, बेरोजगारी, सामाजिक अवमूल्यन, राजनैतिक विकलांगता, शहराें की ओर पलायन ये विषय हैं जिनकी दुरभिसंधि में घिरे हुए पात्रों का चित्रण 80 के बाद के कहानीकार करते है। उनके लेखन में हमारी पीढ़ी और नयी कहानी की पीढ़ी की प्रवृत्तियों का अद्भुत घालमेल है। एक ओर मोहभंग और पारिवारिक विखंडन तो दूसरी ओर राजनैतिक और सामाजिक विकृतियां और तीसरी ओर रोमांस। इन तीनों का मिला जुला समृध्द विस्तार है  80 के बाद की कहानियां। अभी हाल में जब हम लोग नागपुर में उदयप्रकाश को पहल सम्मान दिये जाने के अवसर पर एकत्र हुए और वहां से सेवाग्राम और महात्मा गांधी अन्तर्राष्टीय हिन्दी वि.वि. गये तो विश्वविद्यालय की एक गोष्ठी में संजय चतुर्वेदी ने कहानीकार उदय प्रकाश के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही थी- 'उदय प्रकाश हिन्दी कहानी परंपरा का विस्तार नहीं उसका विचलन है।' मेरे कहने का अर्थ यह है कि उदय प्रकाश के अलावे 80 के बाद के कहानीकार प्रेमचंद से चली आती कहानी और उपन्यास परंपरा का विस्तार है और विचलन सिर्फ एक हैं वह है उदय प्रकाश। यह जान लीजिये कि कोई परंपरा के विस्तार से बड़ा लेखक नहीं होता विचलन से बड़ा लेखक होता है क्योंकि वह एकदम से कुछ नया करता है जैसे कि जैनेन्द्र, फणीश्वरनाथ रेणु और राही मासूम रजा इत्यादि।&lt;br /&gt;रघुवंशमणि:-लेकिन विषय वस्तु के मामले में दलित और स्त्री बिल्कुल नये ढंग से सामने आये हैं? ये भी तो नया है।&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:-स्त्री विमर्श तो हिन्दी कथा साहित्य का आदि और मूल विषय है। सेवा सदन क्या स्त्री विमर्श नहीं है? स्त्री मुक्ति के सवाल को क्या नहीं उठाया गया है। स्त्री के दमन और स्त्री की पितृसत्तामक समाज के प्रति जो भक्ति और आस्था मिलती है जैसे कि कृष्णा सोबती के लेखन में, वह कैसे स्त्री विमर्श नहीं है? मृणाल, गीता, पार्टी कामरेड, दिव्या, अमिता, मैला आंचल की कमली, 'झूठा-सच' की तारा- स्त्री विमर्श पर तो पूरा हिन्दी कथा साहित्य टिका हुआ है। यशगान और तिरिया चरित्तर स्त्री के दमन की श्रेष्ठतम कहानियों में से हैं। इसलिए स्त्री विमर्श नया विषय नहीं है। देहमुक्ति स्त्री विमर्श का अर्थान्तर न्यास है। दलित चेतना अवश्य एक नया विषय है लेकिन प्रेमचंद और निराला और रेणु ने अपने-अपने ढंग से दलित चेतना को अपनी रचनाओें का विषय बनाया है। 'सद्गति' और 'ठाकुर का कुआं' से बड़ी दलित चेतना की कहानियां इधर कौन सी लिखी गयी? दलित लेखकों का यह एक हठ है कि सिर्फ दलित चेतना की कहानी वही लिख सकते हैं। हिन्दी के सवर्ण लेखक उनके इस हठ के कारण दलित लेखकों के तुष्टिकरण की नीति अपनाएं हुए है। वामपंथी व अति वामपंथी भी। लेकिन फिर भी दलित चेतना का उभार और साहित्य में उसकी उपस्थिति इधर बहुत महत्वपूर्ण हो उठी है।&lt;br /&gt;रघुवंशमणि:- पुरुष करुणा और सवर्ण करुणा से परे सीधे अधिकार मांगने का एक स्वर भी तो है?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:-अधिकार मांगने का भाव हो सकता है और मिलना भी चाहिए। लेकिन चाहे स्त्रीवाद हो या दलित चेतना का उभार, प्रेमचंद की कहानियां गुस्सा अधिक पैदा करती हैं करुणा कम। 'सद्गति' में दलित का पैर में रस्सी डालकर घसीटा जाना प्रतिशोध की आग पैदा करता है। 'कफन' की गिरावट भी गुस्सा पैदा करती है- उन लोगों के प्रति गुस्सा, जिन्होंने मनुष्य देहधारी घीसू और माधव को भूख के पशुजगत में ढकेल दिया है। लेकिन फिर भी अधिकार मांगने और लेने की मांग जायज हैं। और उसे कोई रोक नहीं सकता।&lt;br /&gt;रघुवंशमणि:-नई कहानी के दौर की महानगर केंद्रीयता से भी तो विचलन है?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:-नई कहानी के दौर में सम्पूर्णत: महानगर केन्द्रीयता तो नहीं थी। अमरकांत, कमलेश्वर, रेणु, मारकण्डेय, शेखर जोशी, जितेन्द्र इत्यादि महत्वपूर्ण कहानीकार सबर्व्स के कहानीकार हैं। कृष्णा सोबती और रेणु तो दो विपरीत अंचलों के कहानीकार हैं पंजाब और बिहार मुक्तिबोध जैसे कहानीकार का भूगोल एकदम से छत्तीसगढ़ है। निर्मल वर्मा पहाड़ों और सबर्व्स की रोमांटिक शांति के कहानीकार है। दिल्ली, कलकत्ता या बम्बई पर कितनी कहानियां लिखी गयीं। दिल्ली पर और उसके ऐकान्तीकरण पर सबसे महत्वपूर्ण कहानी तो कमलेश्वर ने लिखी जो मैनपुरी, इलाहाबाद होते हुए दिल्ली पहुंचे जिस कहानी का शीर्षक है 'दिल्ली में एक मौत'। इसका यह अर्थ है कि हिन्दी कथा साहित्य मेटोपालिस का मोहताज नहीं है।&lt;br /&gt;रघुवंशमणि:-निहायत ही प्रयोगधर्मी औपन्यासिक कृतियों के भाषिक प्रयोगों मे क्या आप हिन्दी गल्प का भविष्य देखते है?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:-जैसे?&lt;br /&gt;अनिल सिंह:-विनोद कुमार शुक्ल, उदय प्रकाश, मनोहर श्याम जोशी वगैरह?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:- हिन्दी का कथात्मक गद्य अभी पिछले सौ वर्षों से बनने बिगड़ने की प्रयोगात्मक प्रक्रिया में है। उसका कोई क्लासिकल मानदंड अभी तक नहीं बना। लेखक पुराने पैटर्न से छुट्टी पाने के लिए अक्सर प्रयोगधर्मिता पर उतरते हैं। जैसे प्रेमचन्द से छुट्टी पाने के लिए जैनेन्द्र ने त्यागपत्र लिखा। जैसे 'मैला आंचल' या ज्ञानरंजन की कहानियां। उसी परंपरा में विनोद शुक्ल के गद्य का विखण्डन और संरचना आती है। इस बार-बार की तोड़फोड़ मेें भारतीय समाज के ढांचे के विखंडन की अनुगूंज भी है। अत: इस तरह की कुछ साहसिक और दुस्साहसिक कृतियां सामने आ सकती हैं।&lt;br /&gt;रघुवंशमणि:- आपने जब लिखना प्रारंभ किया था तबसे आज तक काफी समय गुजर गया है? बहुत सी ऐसी घटनाएं घटित हुई हैं जिन्होंने संवेदनशील मनोमस्तिष्क को झकझोरा है? हिन्दी के एक वरिष्ठ लेखक के रूप मेें जब आप इस पूरे कालखण्ड को देखते हैं तो कैसा लगता है?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:- यह लगता है कि कितने सधे हुए हाथों के बाद यदि मैं जवान हूं, अगर मुझमें शारीरिक ताकत है तो मैं एक लेखक के रूप मेें काफी उलट फेर कर सकता था। लेकिन उम्र की एक सीमा होती है। अब अधिक काम नहीं होता और मैं यह सोचता हूं कि 'आखिरी कलाम' लिखकर मैंने इस बनते बिगड़ते समाज के प्रति अपना हक कुछ हद तक अदा कर दिया है। लेकिन मैं फिर भी पछतावे की मन:स्थिति में हूं। मैंने बहुत सारा समय व्यर्थ में गवां दिया जबकि मुझे काम करते रहना चाहिए था. इस पछतावे से छुटकारे का शायद कोई रास्ता नहीं है।&lt;br /&gt;रघुवंशमणि:-समय के इन परिवर्तनों के साथ साहित्य का जो अन्तर्सम्बन्ध बना है क्या आप उससे संतुष्ट हैं? &lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:-नहीं। लेखक लोग उपरी तौर पर ज्यादा देख रहे है। साहस और प्रतिभा की कमी हैं। फन और फैशन के प्रति आकर्षण ज्यादा है। सत्ता से सटने और छत्र चंवर की हवा खाने की फिक्र मेें लोग ज्यादा समय निकाल रहें हैं। घोर हैवानियत है। किसी पर किसी को यकीन नहीं। प्रायोजित प्रशस्तियों और प्रायोजित मल्ल युध्द, प्रायोजित फटकार ज्यादा है। जैसे साहित्य में विखण्डन है वैसे ही साहित्यिक बिरादरी भी विखण्डन का शिकार है। साहित्य और कला पर बात करने में भी चतुराई और चौकन्नापन नजर आता है। खुलेपन का अभाव है। जब कोई आपकी तारीफ करता है तो यह भी संभव है कि वह आपकी गर्दन रेतने की तैयारी कर रहा हो। चौबिसों घंटे सचेत रहकर अच्छा कैसे लिखा जा सकता है। इसके लिए तो आलस्य, दोस्त बिरादरी और छल-छदम विहीन मेल-मुहब्बत जरूरी है। जब एक लेखक अपने दूसरे सहयोगी से निश्चिन्त ओर निरावृत्त हो. ऐसा नहीं दिखता। सुकून नहीं है और  मीडियाक्रिटी की बहार है। साहित्य मेें साहित्येतर नाते रिश्ते है। इस पूरे प्रपंच मे कितना कठिन हो गया है लिखना- विखना।&lt;br /&gt;अनिल सिंह:-हिन्दी साहित्य में कहानी कितनी सम्भावनाशील लगती है आपको?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:-कहानी एक छोटी विधा है । केवल कहानी के बल पर दुनिया में बहुत कम लेखक बच सके हैं जैसे चेखव। लेकिन वह एक सहवर्ती विधा है- उपन्यास की। उससे बहुत अधिक आशाएं करना व्यर्थ हैं। नयी कहानी के जमाने में इसे एक बिल्कुल स्वतंत्र और महत्वपूर्ण विधा बनाने का प्रयास किया गया। आप देखें तो 50से सन् 60 के बीच में जितने बड़े और अच्छे कहानीकार पैदा हुए उतने फिर आगे नहीं हुए। प्रेमचंद, जैनेन्द्र अज्ञेय, यशपाल, रेणु, इन सबके लिए कहानी एक सहवर्ती विद्या है। निर्मल वर्मा और कृष्णा सोबती के लिए भी। मात्र कहानियों के बल पर जीवित रहने वाले ज्ञानरंजन और अमरकांत ही लगते है। आगे के बारे में बात करना अभी से कुछ ठीक नहीं है लेकिन आजकल जो लोग दो चार कहानियों को लेकर घुरघुटिया की तरह उड़ते है वो फुस्स होकर गिर जाते है।&lt;br /&gt;रघुवंशमणि:- आपने अपने लेखन में किसे सहवर्ती विधा माना है?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:- अपने बारे में कुछ नहीं कह सकता। पास्तरनाक ने भी जीवन में एक ही उपन्यास लिखा है।&lt;br /&gt;रघुवंशमणि:- डॉ. नामवर सिंह के साथ चले एक विवाद में आपने कहा था कि हिन्दी में गल्प की परंपरा है, परंपराएं नहीं। लखनउ कथाक्रम के एक कार्यक्रम में उपजे इस विवाद को आप अब कैसे देखते है? क्या हिन्दी गल्प की परंपरा मोनोलिथिक है?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:- हां, हिन्दी गल्प की एक मोनोलिथिक परंपरा है. वह मुख्य रूप से एक ग्रैण्ड नैरेटिब अनेक खानों में बंटा हुआ है। नामवर जी ने जब कहा तो उनके उपर दूसरी परंपरा का जिन्न सवार था जो आज भी बोतल की ठेंपी खोलकर निकल आता है। तब उन्हाेंने कहा था कि 'प्रेमचन्द इकहरे यथार्थवाद के लेखक हैं'। नामवर जी सोच समझकर किसी गोष्ठी को उलझाने के लिए आते है। उनके पीटने का तरीका अद्भुत हैं । अगर उदयप्रकाश को पीटना है तो वे 'जल डमरू मध्य' की तारीफ से पूरी गोष्टी को इस तरह हलकान कर देंगे कि उस कहानी का लेखक भी लाज से गड़ जायेगा। वहां यही हुआ था। दूसरे उन्हें विनोद कुमार शुक्ल की तारीफ करनी थी। अत: उन्होंने 'परीक्षा गुरु' से प्रारंभ हो कर प्रेमचन्द तक आने वाली परंपरा को बहिष्कृत करते हुए कहा कि हिन्दी उपन्यास सन्1880 से 'श्यामा स्वप्न' से शुरू होता है और 1980 में 'नौकर की कमीज' पर खत्म। यह है दूसरी परंपरा का जिन्न। &lt;br /&gt;रघुबंश मणि:- इस मोनोलिथिक ग्राण्डनैरेटिब की परंपरा की मूल पहचान क्या बनेगी?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:- इसकी पहचान भारतीय मनुष्य का संघर्ष-पैसिव और एक्टिव दोनों तरह का संघर्ष है। सांप्रदायिकता- साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष, अपनी मिली जुली और विशाल कौमियत के पक्ष में संघर्ष और उसके लिए मर मिटने की तैयारी। आप देखेंगे कि यह हमारे सौ वर्ष के ग्रैण्ड नैरैटिब के मूल तत्व है। लेकिन ये सिध्दांत के रूप में नहीं है। यह एक गल्प के कलात्मक ढांचे के अंतर्गत विन्यस्त है।&lt;br /&gt;रघुवंशमणि:- आपके गल्प में लोगों का व्यक्तिगत जीवन चला आता है जिससे विवाद भी खड़े हुए है। 'नमो अंधकारम्' या 'निष्कासन' कहानी में इलाहाबाद के ही तमाम मित्र उपस्थित हैं. इसी तरह से ' आखिरी कलाम' में। इस बात को लेकर आपकी आलोचना भी होती रही है?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:-प्रेमचंद की कई कहानियों के बारे में ऐसे दोषरोपण हुए थे। कालिया की 'नौ साल छोटी पत्नी' जिसके लिए उसने मार भी खाई  और 'काला रजिस्टर' पर इस प्रकार की बातों का इल्जाम आता है । नैतिक गुस्से के बिना कोई लेखक नहीं हो सकता। और जहां अनैतिकता होगी गलत काम होगा, उस पर गुस्सा करना और उस गुस्से को रचना एक लेखक का कर्तव्य है। मैंने किसी व्यक्ति विशेष के बारे मे नहीं लिखा बल्कि नैतिक पतन की स्थितियो के बारे में लिखा जो हमेशा एक लेखक के कलात्मक अवदान का एक हिस्सा होती है। लोगों ने अपना चेहरा देखा तो इसका यह अर्थ है कि मेरा कलात्मक दर्पण एकदम पारदर्शी था और यह मेरी सफलता है। जब मैं लिखता हूं तो लोग तिलमिलाते हैं और दस साल बाद वही स्थितियां सच निकल आती है। वैसे भ्रष्टाचार और कुकर्म रोज होने लगते है। तब लोग कहते हैं कि हां उसने तो ठीक ही कहा था। &lt;br /&gt;रघुवंशमणि:-लेकिन यह सवाल तो अपनी जगह है ही कि सर्जनात्मक साहित्य में दूसरों का व्यक्तिगत जीवन किस हद तक आना चाहिए?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:- हां, यह सवाल है। लेकिन यह सवाल तात्कालिक है क्योंकि लोग क्षणजीवी हैैं। कला मेें आये चरित्र दीर्घायु हैं. टालस्टाय के 'अन्ना करेनिना' के अधिकांश पात्रों की पहचान उनके जमाने में की गयी। कहीं पुश्किन की बेटी है तो कहीं लेविन के रूप मे टालस्टाय स्वयं  है। नोखलोदोव के बारे में  भी लोगों को मालूम है, लेकिन वे लोग कहां है। चरित्र ही दीर्घजीवी है क्योेंकि वे कला संरचना के अंग है। फिर भी यह बात बहस तलब है और गलत भी हो सकती  है।&lt;br /&gt;रघुवंश मणि:-आपके रचनात्मक जीवन में सुखांत 1972 के प्रकाशन के बाद कुछ वर्षो का मौन है। यह मौन 'माई का शोकगीत' से टूटता है। इस रिक्ति का कारण क्या है?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:-इस रिक्ति का पहला कारण बच्चे पालना हैं। यह वह दौर है जब उन्हें पढ़ाने लिखाने में मै लगा रहा। गरीबी थी और वे अगर ठीक से न पढ़ते तो आगे बेसहारा होने का डर था। इस काम में मेरा लगभग दस साल का समय गया। दूसरा कारण यह मेरे घोर वैचारिक परिवर्तन का समय है। विचारधारात्मक परिवर्तन का समय। पुराने तरीके से लिखना संभव नहीं था और वस्तु को नये ढंग से उठाने की आदत नहीं थी। इस तरह यह एक प्रकार के रचनात्मक और गैर रचनात्मक संघर्ष का दौर था। मेरे चरित्र के अराजक भटकाव भी इस संबंध में कुछ कारक थे। इसीलिए इतना लम्बा दौर व्यर्थ हुआ। हमारी पीढ़ी के लोग इससे दुखी नहीं होते लेकिन मैं आज भी पछतावे के गर्त में हूं। गृहस्थी, अवैध प्रेम और वैचारिक, आत्मिक संघर्ष तीनों ने मिलकर मुझे क्षत-विक्षत किया और मेरा काफी समय खाया। मैं कहता हूं कि लोगों को खुश होने दो और मुझे मरने दो।&lt;br /&gt;अनिल सिंह:-अभी आपने अपनी अराजक जीवन स्थितियों और अवैध प्रेम की बात कही। क्या प्रेम भी अवैध होता है? किन संदर्भों में ये बातें आयी हैं?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:-मैं पुरानी चाल का आदमी हूं और उसमें इस प्रकार की कोई कुपथगामिता मुझे अवैध लगती है। अपनी स्त्री के प्रति किसी को भी कृतघ्न नहीं होना चाहिए इसलिए मैं अवैधता की बात करता हूं। ये बातें आज हास्यास्पद और अनर्गल लग सकती है। दुनिया बहुत आगे बढ़ गयी है और उसी हिसाब से पीछे घूमकर गर्त में गिर भी रही है। मैंने अपनी किसी कहानी में कहा है कि 'उपर उठना ही नीचे गिरना है।' मैं आधुनिक फैशनपरस्त उत्तर आधुनिक नहीं होना चाहता हूं। मैं अपने को निर्वसन और खुला रखना चाहता हॅू ताकि लोग जानें और समझें कि मैं इतना ही अच्छा और इतना ही बुरा हूं। यह मेरी कमी हो सकती है और मेरी जगहसांई का कारण हो सकती है कि न मैं शुध्द हूं न अशुध्द, न पवित्र हूं न अपवित्र। कहीं दोनाें के बीच, शायद।&lt;br /&gt;अनिल सिंह:- ये आप कह रहे रहे हैं। आप तो एक दौर में 'मुक्ति प्रसंग' के कवि के बहुत निकट रहे हैं। एक तरफ आपके प्रिय कवि पंत, निराला और शमशेर हैं दूसरी तरफ अपनी अराजकता की  तीव्र चुंबकीय शक्ति से खींचता हुआ राजकमल चौधरी का व्यक्तित्व। इन दो पाटों के बीच में आप कहां है?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:-कलकत्ते के दिनों की बात है। राजकमल मेरे लिए घनघोर आकर्षण की तरह थे. सभी लोग उसकी निंदा करते थे। उससे बचे रहने की सलाह देते थे। पर कहीं अपने अन्तरतम मेें सारे झूठ, सारी चरित्रहीनता, सारी कमीनगी के बावजूद उसमें एक नंगी सच्चाई और प्रेम गृहस्थी के प्रति जिजीविषा और जीने का अद्भुत हठ भी था। मेरे स्वभाव की यह विशेषता है कि मैं किसी के कितने भी पास होता हुआ उससे प्रभावित नहीं होता। मैं एक घोंघे की तरह हूं जो अपने को भीतर समेट लेता है और बचाये रखता है। मैंने राजकमल चौधरी से कोई बुरी बात नहीं सीखी जबकि वह हर बुराई के द्वार तक मुझे ले जाता था। मैंने उसकी प्रतिभा का आदर करना सीखा। मै। अपने जीवन में किसी के लेखन और व्यक्तित्व से इस तरह प्रभावित नहीं हुआ कि अपना पथ खो दूं. अगर प्रभावित ही होना होता तो मेरा यह सौभाग्य है कि मैं महादेवी, पंत, निराला, अज्ञेय, शमशेर जैसे बड़े लेखकों के निकट रहा। लेकिन मैं तुरंत सावधान हो जाता था कि मुझे इनकी तरह नहीं होना है। यह चौकन्नापन एक अहमन्यता का पर्याय भी है। मैं किसी दूसरे की तरह न लिखना चाहूंगा, न लिखता हूं। मैं अपने नुक्ते पर अकेला हूं और हर लेखक को होना चाहिए।&lt;br /&gt;अनिल सिंह:- राजकमल चौधरी की मॉर्बिड मन:स्थितियाें, जीवन शैली और कविता विन्यास का ही असर तो नहीं कि आप भी रचनात्मक प्रतिभा को आत्मघाती मानते हैं। जैसे कि 'लौट आ ओ धार' में आपने लिखा कि कलाकार ऐसे सिंह के समान होता है जिसके मुंह में अपना खून लग गया हो। या 'निराला: आत्महंता आस्था' शीर्षक इस संदेह को क्या और पुख्ता नहीं करता। निराला आपके प्रिय कवि हैं। आप पर आरोप भी तो लगे थे?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:-अपने को खाना और रचते जाना एक चीज है जो निराला शमशेर या अज्ञेय सब बडे क़वियों में मिलती है। मार्बिडिटी के कारण आत्महत्या दूसरी चीज है। राजकमल चौधरी और निराला को मिलाया नहीं जा सकता क्योेंकि उनकी कवि प्रतिभा में जमीन आसमान का फर्क हैं. दोनों की जीवन शैली में एक  फर्क है। इस प्रकार एक के लिए जो महानता का कारण बनती है दूसरे के लिए मीडियाक्रिटी का। यह कोई शर्त नहीं है लेकिन मैं आज भी इस बात पर कट्टरतापूर्वक स्थिर हूं कि एक बड़ा लेखक जितना ही अपने को खाता है उतना ही बाहर उसकी रचनात्मक समृध्दि बढ़ती है। अराजकता और आत्मभोज में फर्क है। शमशेर से बड़ा अराजक और आत्मभोजी कोई दूसरा नहीं। लेकिन यह प्रतिभा का ही कमाल है कि उसमें से कविता निकल कर आती है. गालिब से बड़ा अवसरवादी और पैरासाइट कम मिलेंगे लेकिन उसकी कविता उससे क्षरित नहीं होती। आत्मभोज वहां भी है लेकिन वह एशिया के सबसे बड़े कवि के रूप में उभर कर आता है। अत: कला की कोई शर्त नहीं है कि कैसा जीवन जियो। बड़ी कला और लेखक के जीवन का कोई अन्तर्सामंजस्य जरूरी नहीं है।&lt;br /&gt;अनिल सिंह:- आपके लिए कविता एक छोड़ा हुआ रास्ता है। आप अपनी प्रारंभिक कविताओं को क्या जुवनेलिया समझते है या बाद के लेखन में उससे कुछ मदद मिली? आपने कविता का रास्ता क्यों त्याग दिया?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:- कविता का रास्ता मुझसे सधा नहीं इसलिए मैंने छोड़ दिया। मैं उस किसी विधा में लिखना नहीं चाहता जिसमें मुझसे अच्छा लिखने वाला विद्यमान हो। चाहे लोग मुझे जितना मारें पीटें, वे जानते है कि कथा साहित्य मेें मुझसे पार पाना आसान नहीं है।&lt;br /&gt;रघुवंशमणि:- समकालीन कविता के आप एक सुधी पाठक रहे है और इस पर टिप्पणियां भी करते रहे हैं। क्या समकालीन कविता परिदृश्य से आप संतुष्ट हैं?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:-समकालीन कविता में काफी कुछ अच्छा लिखा जा रहा है। मैं समझता था आलोकधन्वा बहुत आगे जायेंगे लेकिन यह उनका दुर्भाग्य है कि वे बीच हराई में ही थउस गये । फिर भी अपने एक ही संग्रह से वे बड़े कवि हैं। इसके अलावा इस वक्त के जीवित कवियों मेें मेरे सबसे प्रिय कवि विष्णु खरे है। उनकी प्रयोगधर्मिता और नये रिद्म का कोई जोड़ नहीं। चे ग्वेरा पर ऐसी कविता वे ही लिख सकते है। मेरी पसंद के कवियों की सूची काफी बड़ी है । अरुण कमल, राजेश जोशी, वीरेन डंगवाल, चन्द्रकांत देवताले, कुंवर नारायण मेरे बहुत प्रिय कवियों में से है।&lt;br /&gt;अनिल सिंह:-आपने अपने कविता संग्रह में 1977 में भी रीति का प्रश्न उठाया था। अभी कुछ वर्ष पूर्व हिन्दी साहित्य सम्मेलन की एक गोष्ठी में भी आपने समकालीन कविता पर रीतिग्रस्त होने का आरोप लगाया था। उस समय की कविता और आज की कविता में आये रीति और रूपवाद को कैसे देखते हैं?&lt;br /&gt;दूधनाथ सिंह:-मेरा 
